चर्चित मार्क्सवादी चिंतक एंतोनियो ग्राम्शी ने लिखा है कि किसी समाज की वास्तविक शक्ति केवल उसके राजनीतिक और आर्थिक संस्थानों में नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक चेतना और स्मृतियों में निहित होती है। प्रभुत्वशाली वर्ग अपने वर्चस्व को केवल सत्ता के माध्यम से नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और नायकों की व्याख्या के जरिए भी कायम रखता है। यही कारण है कि किसी समाज के उपेक्षित, वंचित और सबाल्टर्न समुदायों के लिए अपने नायकों की पुनर्खोज और उनकी वैचारिक विरासत का पुनर्स्मरण एक महत्वपूर्ण राजनीतिक-सांस्कृतिक कार्य बन जाता है।
ऐसे समय में जब हिंदी फिल्म उद्योग लंबे समय तक राजाओं, सामंतों, महान पुरुषों और स्थापित राजनीतिक व्यक्तित्वों की कहानियों तक सीमित रहा है, जगदेव प्रसाद पर बनी हिंदी फिल्म ‘दी इंडियन लेनिन बाबू जगदेव’ का आना एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना है। यह फिल्म महज एक व्यक्ति की जीवनी भर नहीं है, बल्कि बिहार और हिंदी पट्टी के उस सामाजिक संघर्ष का सिनेमाई दस्तावेज है, जिसने ब्राह्मणवाद, सामंतवाद और जातिगत वर्चस्व के विरुद्ध, समतामूलक और न्यायपूर्ण समाज निर्माण के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी।
फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह जगदेव प्रसाद के जीवन को किसी चमत्कारी नायक की कथा में बदलने के बजाय उनके सामाजिक और वैचारिक निर्माण की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करती है। उनके आरंभिक जीवन संघर्ष, पारिवारिक परिस्थितियां, सामाजिक अपमान और उससे पैदा हुई प्रतिरोध की चेतना को फिल्म बारीकी से प्रस्तुत करती है। दर्शक समझ पाता है कि जगदेव प्रसाद अचानक पैदा नहीं हुए थे, बल्कि वे उस सामाजिक यथार्थ की उपज थे जिसमें बहुसंख्यक आबादी राजनीतिक सत्ता और सामाजिक सम्मान दोनों से वंचित थी।
फिल्म ब्राह्मणवाद और सामंतवाद दोनों पर समान रूप से चोट करती है। बिहार के सामाजिक ढांचे में इन दोनों शक्तियों ने लंबे समय तक एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम किया है। फिल्म यह दिखाने का प्रयास करती है कि जगदेव प्रसाद का संघर्ष केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का संघर्ष नहीं था, बल्कि सामाजिक संबंधों को लोकतांत्रिक बनाने का भी संघर्ष था। उनकी प्रसिद्ध राजनीतिक पंक्ति “सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है” के पीछे छिपी सामाजिक दृष्टि को फिल्म कई प्रसंगों के माध्यम से अभिव्यक्त करती है।
फिल्म का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वह डॉ. राममनोहर लोहिया और रामस्वरूप वर्मा जैसे समाजवादी बहुजन चिंतकों के प्रभाव को रेखांकित करती है। विशेष रूप से रामस्वरूप वर्मा और अर्जक चिंतन की उपस्थिति यह बताती है कि जगदेव प्रसाद का संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन की व्यापक परियोजना का हिस्सा था। धर्म, जाति और सामाजिक असमानता के प्रश्नों पर अर्जक आंदोलन की वैचारिक भूमिका को फिल्म में शामिल किया गया है, जो स्वागतयोग्य है।

हालांकि, फिल्म की कुछ सीमाएं भी हैं। अर्जक संघ के बाद के अपक्षरण और उसके सामाजिक प्रभावों को जिस तरह प्रस्तुत किया गया है, वह अपेक्षाकृत सीमित दृष्टि का परिचायक लगता है। कई स्थानों पर ऐसा प्रतीत होता है कि फिल्म व्यापक बहुजन सामाजिक गठबंधन के बजाय कुछ जातीय सीमाओं में सिमट जाती है। विशेषकर दांगी उपजाति के लोगों को प्रमुख सहयोगी के रूप में रेखांकित करने से यह धारणा बनती है कि फिल्मकार कभी-कभी उस व्यापक सामाजिक दृष्टि से दूर चले जाते हैं, जिसके लिए स्वयं जगदेव प्रसाद जाने जाते थे।
फिल्म की एक और कमी यह है कि वह अतीत और वर्तमान के बीच आवश्यक संवाद स्थापित नहीं कर पाती। आज जब बिहार और देश में सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक अधिकारों पर नए सिरे से बहस चल रही है, तब यह अपेक्षा की जा सकती थी कि फिल्म वर्तमान राजनीतिक संदर्भों के साथ भी एक आलोचनात्मक रिश्ता कायम करती। उदाहरण के लिए, जिस राजनीतिक-सामाजिक मानसिकता ने जगदेव प्रसाद की हत्या की परिस्थितियां निर्मित की, उसी परंपरा के प्रतीकों को आज भी सार्वजनिक संस्थानों में सम्मानित किए जाने के प्रश्न को फिल्म छू सकती थी। यह सवाल महत्वपूर्ण है कि आखिर क्यों उस क्षेत्र में, जहां जगदेव प्रसाद ने अपने संघर्ष की सबसे बड़ी लड़ाइयां लड़ीं, उनके विरोधियों और हिंसक विरासतों को संस्थागत सम्मान मिलता रहा है।
इसके बावजूद फिल्म का समापन अत्यंत प्रभावशाली है। बहुजन चेतना और विशेष रूप से स्त्री जागरूकता को केंद्र में रखकर दिया गया संदेश दर्शकों को भविष्य की ओर देखने के लिए प्रेरित करता है। यह महत्वपूर्ण है कि फिल्म बहुजन राजनीति को केवल पुरुष नेतृत्व या चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रखती, बल्कि सामाजिक परिवर्तन में महिलाओं की भूमिका को भी रेखांकित करती है।
फिल्म में जगदेव प्रसाद की विकास संबंधी दृष्टि को भी रेखांकित किया गया है। उन्हें केवल जातीय राजनीति के नेता के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय पूरे बिहार के विकास, संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण और लोकतांत्रिक भागीदारी के पक्षधर नेता के रूप में दिखाया गया है। यह प्रस्तुति उनके व्यक्तित्व की व्यापकता को सामने लाती है।
हिंदी फिल्म उद्योग के संदर्भ में इस फिल्म का महत्व और भी बढ़ जाता है। लंबे समय तक हिंदी सिनेमा में सबाल्टर्न समाज के नायक या तो अनुपस्थित रहे हैं या उन्हें हाशिये पर रखा गया है। पहली बार हिंदी समाज के एक बड़े बहुजन नायक को केंद्र में रखकर बनी यह फिल्म स्वागत की पात्र है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह पहल आगे बढ़ेगी और हिंदी समाज को वैचारिक रूप से दिशा देने वाले अन्य बहुजन और समाजवादी नायकों पर भी गंभीर फिल्में बनेंगी। विशेष रूप से रामस्वरूप वर्मा जैसे चिंतक, जिन्होंने सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक चेतना और अर्जक दर्शन को नई ऊंचाई दी, हिंदी सिनेमा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसी प्रकार अनेक ऐसे मिशनरी सबाल्टर्न नायक हैं, जिन्होंने सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई में अपना जीवन समर्पित कर दिया, लेकिन जिनकी कहानियां अभी भी व्यापक समाज तक नहीं पहुंच सकी हैं।
जगदेव प्रसाद पर बनी यह फिल्म इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह केवल अतीत का स्मरण नहीं करती, बल्कि भविष्य के लिए वैचारिक ऊर्जा भी उपलब्ध कराती है। ग्राम्शी के शब्दों में कहें तो यह उन लोगों की सांस्कृतिक स्मृति को पुनर्जीवित करने का प्रयास है जिन्हें इतिहास के हाशिए पर धकेल दिया गया था। यदि यह फिल्म हिंदी समाज के युवाओं को अपने बहुजन, समाजवादी और सबाल्टर्न नायकों की ओर देखने के लिए प्रेरित करती है, तो इसकी सबसे बड़ी सफलता यही होगी।
(संपादन : नवल/अनिल)
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