भारतीय राजनीति का यह दौर ‘जय भीम’ नारे की राजनीतिक दिशा को तय करने से जुड़ा है। इसीलिए यह भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण दौर है। इसे इस तरह से हम समझ सकते हैं कि यह नारा समानता की चेतना का हिस्सा बनकर उभरा। यह नारा समानता की राजनीतिक दिशा को एक निश्चित दिशा की तरफ संगठित करने का एक मंच बना। इस मंच के तैयार होने के साथ ही यह प्रक्रिया भी तेज हो गई कि इसे समानता की राजनीतिक वैचारिकी से किस तरह विमुख किया जा सकता है।
सरल शब्दों में हम यह समझने की कोशिश कर सकते हैं कि ‘जय भीम’ का नारा किस-किस तरह की शक्तियां लगा रही हैं। वास्तव में क्या ये शक्तियां समानता की राजनीतिक वैचारिकी की दिशा की तरफ बढ़ने वाली हैं या फिर इस नारे में घुसपैठ के जरिए गैर-बराबरी के वैचारिक ढांचे को बनाए रखने की कोशिश में लगे हैं। जैसे भगत सिंह की तस्वीरों और नारों से एक राजनीतिक दिशा स्पष्ट करने और दूसरी तरफ उसे उलझाने की कोशिश देखी गई है।
गौर करें तो 2014 के बाद से डॉ. आंबेडकर और भगत सिंह के लिए क्रमश: नीले और लाल रंग संयुक्त रूपक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले आंदोलन के रूपों से आंदोलन खड़ा किया जा रहा है लेकिन गांधी की तस्वीरें और नारों को हटाकर। इस उदाहरण से आंदोलनों की दिशा के अंतर्विरोधों को समझने में आसानी हो सकती है, इसी लिहाज से इसका उल्लेख किया गया है। इन दिनों यह एक प्रवृति बहुत प्रभावी है जिसमें यह देखा जाता है कि डॉ. आंबेडकर का संदर्भ देने वाले नामी-गिरामी चेहरे बहुत सुने जाते हैं। यह समझना जरूरी है कि वह संदर्भ केवल सुनाने के लिए हैं या फिर संदर्भों की राजनीतिक दिशा को स्वयं भी स्वीकार करना है।
भारतीय राजनीति का यह आधार बना हुआ है जिसमे कि समानता की चेतना विकसित हुई है। यानी बराबरी की बात भारतीय समाज की राजनीति का आधार है। उस बराबरी के लिए राजनीतिक चेतना की दिशा क्या होगी, यह आजादी के बाद से एक ऐसा विषय है जिसे सबसे ज्यादा जटिल बनाया गया है। या फिर कहें कि उसमें सबसे ज्यादा जटिलताएं पैदा की गई हैं। यह बात बहुत स्पष्ट है कि भारतीय समाज में गैर-बराबरी के सदियों से शिकार होने वाले वे लोग हैं, जिन्हें वंचित कहा जाता है। उनकी पहचान जाति समूह के आधार पर भी की जाती है। यानी वंचित समाज का नाम प्रमुख रूप से दलित, पिछड़ा, महिलाएं और आदिवासी हैं। चूंकि इन्हें बराबरी की स्थितियों व हालात को हासिल करना है, इसीलिए वे किसी भी ऐसी मुहिम से जुड़ने के लिए बेचैन होते हैं जो कि उन्हें बराबरी का भरोसा दिलाता दिखता है। यदि वह भरोसा आर्थिक स्तर पर दिखता है तो उसके साथ उनकी लामबंदी या समर्थन का भाव खड़ा हो जाता है। यदि शिक्षा के स्तर पर बराबरी का भरोसा मिलता है तो वे उसके साथ खड़े होने की बेचैनी से भर जाते हैं। यानी हर स्तर पर बराबरी की स्थितियों व हालातों के लिए वे एक राजनीतिक दिशा के लिए खुद को तैयार होने का संकेत देते हैं। लेकिन वर्चस्व की शक्तियां उन्हें अपने सांस्कृतिक औजारों से भटकाने की हर संभव कोशिश में लगी रहती हैं।

आखिर क्या कारण है कि पिछले 15-20 वर्षों में सबसे ज्यादा नारा ‘जय भीम’ का गूंजा? क्या वजह कि सबसे ज्यादा प्रदर्शन संविधान की किताब के साथ हुआ? क्या वजह है कि प्रदर्शनों व राजनीतिक कार्यक्रमों में सबसे ज्यादा तस्वीरें डॉ. आंबेडकर की दिखी। महिलाएं ‘जय भीम’ का नारा लगा रही हैं, अल्पसंख्यक लगा रहे हैं, दलित लगा रहे हैं, पिछड़े वर्ग की सूची में दर्ज जातियों के सदस्य लगा रहे हैं, आदिवासी लगा रहे हैं। इसके साथ ही भारतीय राजनीति में वर्चस्व की वैचारिकी की अगुवाई करने वाली राजनीतिक दिशाओं में डॉ. आंबेडकर की विशालकाय मूर्तियां बनाई जा रही हैं। विशालकाय और भव्यता वर्चस्व के सांस्कृतिक औजार होते हैं और सदियों से बने हुए हैं। इस दिशा में भी ‘जय भीम’ के नारे लगाने वाले खड़े हैं। दूसरी तरफ ‘जय भीम’ के नारे साथ भगत सिंह के नारे ‘इंकलाब जिंदाबाद’ को जोड़ने वाले भी खड़े हैं।
यह स्पष्ट है कि ‘जय भीम’ का नारा तमाम वंचितों और बराबरी के हक को हासिल करने की चेतना को संगठित करने का एक केंद्र बना है। दिल्ली में नीट पेपर लीक को आधार बनाकर छात्रों और युवाओं का जो आंदोलन हुआ और जिसके असर में समाज का व्यापक हिस्सा बना, की शुरुआत डॉ. आंबेडकर की तस्वीर के साथ हुई। आम आदमी पार्टी ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे को सामने रखकर गांधीवादी वेशभूषा और आंदोलन के रूपों का इस्तेमाल किया था। आम आदमी पार्टी को सत्ता मिली तो उसने भगत सिंह और डॉ. आंबेडकर की तस्वीरों को अपना चेहरा बनाया। दरअसल सवाल तस्वीरों को चेहरा बनाने के बाद ‘भीम के लोगों’ के लिए बराबरी के हक का क्या ढांचा बनता है, यह महत्वपूर्ण है। ‘जय भीम’ कर्मकांडों की जगह का जयकारा का नारा नहीं है। यह समानता की स्थितियां और हालात बनाने की एक गूंज है।
जंतर-मंतर पर जब शुरुआती दौर में नारे लगे तो केवल दो नारे थे– ‘जय भीम’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे। बाकी सभी तरह के नारों को दूर रखा गया। लेकिन सोनम वांगचुक के आगमन के बाद इसके नारों में नए नारे जुड़ गए। ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे मंच से गूंजने लगे और सामने डॉ. आंबेडकर की तस्वीर लिए लोग खड़े रहे। आजादी के नारों से परहेज बरतने की सलाह और निर्देश उन लोगों के लिए थे जो कि ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘जय भीम’ के नारों के साथ लाल रंग के झंडे लेकर जुटे थे।
‘जय भीम’ का नारा धार्मिकता के लिए नहीं है और न ही धार्मिकता की किसी धारा को आंबेडकर के लोगों के बीच जड़ जमाने या उसकी घुसपैठ कराने के लिए हो सकती है। जब यहां ‘आंबेडकर के लोग’ का संबोधन किया जा रहा है तो उसका अर्थ वंचित वर्गों से हैं और बराबरी हासिल करने की चेतना तक की यात्रा की है एवं जो गैर-बराबरी के खिलाफ लड़ने के लिए डॉ. आंबेडकर और समान विचारधारा को अपना रास्ता मानते हैं।
इस राजनीतिक परिदृश्य को इस तरह भी देखा जाना चाहिए कि ‘जय भीम’ का नारा जहां से गूंजा उसमें नए तरह के नारे जोड़ने वाली प्रवृति नेतृत्व करने वालों की है। जबकि राजनीतिक चेतना की यह दिशा मजबूत होनी चाहिए कि जिनके बीच से यह नारा गूंजा वह इस नारे के साथ नए नारों को जोड़कर उसे विस्तार दें और उसे नेतृत्व देने का आत्मविश्वास विकसित करें। इतना तो जरूर होना चाहिए कि भीम का जयकारा लगवाने की राजनीति वास्तविकता में भीम की समानता की चेतना की दिशा में बढ़ रही है या नहीं, इसके प्रति सतर्कता बरती जाए।
‘डॉ. आंबेडकर’ का नारा एक राजनीतिक चेतना की अगुवाई करने वाला वैचारिक रूपक है। इसे केवल भावनात्मक स्तर पर संतुष्टि महसूस कराने की सीमा तक नहीं बंधा होना चाहिए।
(संपादन : नवल/अनिल)