पंजाब के संगरूर जिले के तूर बंजारा गांव के दलित गुलजार सिंह की मौत इन दिनों चर्चा में है। गुलजार सिंह कोई बड़ा आदमी नहीं था। न उसके पास कोई राजनीतिक ताकत थी, न ऐसी हैसियत कि उसकी कही बात सत्ता के गलियारों तक हलचल पैदा कर दे। वह एक गरीब आदमी था, जिसने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा भेड़-बकरियां चराने और दिहाड़ी-मजदूरी करने में गुजार दिया। इसी मेहनत से पत्नी और तीन बेटों का पेट पाला। आज उसकी मौत ने उसे चर्चा के केंद्र में ला दिया है। राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, भगवंत मान समेत तमाम बड़े नेताओं के बयानों में गुलजार सिंह का जिक्र है।
आखिर गुलजार सिंह ने ऐसा क्या कर दिया था कि उसकी मौत के बाद देश की राजनीति में उसका नाम गूंज रहा है? सच यह है कि उसने ऐसा कुछ नहीं किया था लेकिन जिंदगी भर अभावों से लड़ते रहे इस आदमी के सामने एक ऐसी मुसीबत आ खड़ी हुई, जिससे लड़ना शायद उसके बूते से बाहर था। पंजाब की बड़ी युवा आबादी की तरह उसके तीन बेटों में से एक को भी नशे की लत लग गई। हालात यहां तक पहुंच गए कि बेटा नशे के लिए घर का सामान तक बेचने लगा। पंजाब में ड्रग जिसे आम बोलचाल में ‘चिट्टा’ कहा जाता है, उसने गुलजार सिंह के घर में भी जगह बना ली।
एक पिता के लिए इससे बड़ी तकलीफ क्या होगी कि जिस बच्चे को उंगली पकड़कर चलना सिखाया हो, जिसके लिए बरसों धूप और सर्दी में मजदूरी की हो, उसे अपनी आंखों के सामने नशे में डूबते देखे। और कुछ न कर पाने की बेबसी झेले। गुलजार सिंह इसी बेबसी को झेल रहा था। इसी तकलीफ को लेकर गुलजार सिंह बीते 6 सितंबर, 2026 को गांव में हुए एक कार्यक्रम में पहुंचा था। वहां पंजाब के वित्त मंत्री और स्थानीय विधायक हरपाल सिंह चीमा मौजूद थे। परिजनों के अनुसार गुलजार सिंह ने मंत्री के सामने अपने बेटे की हालत बताई। उसने गांव में चिट्टा बिकने की शिकायत भी की।

यह एक पिता की फरियाद थी, जिसे शायद उम्मीद रही होगी कि मंत्री तक बात पहुंच गई है तो कुछ कार्रवाई होगी। बेटे को इस दलदल से निकालने का कोई रास्ता खुलेगा, लेकिन इसके बाद कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसका अंत गुलजार सिंह की मौत पर हुआ। परिवार का आरोप है कि मंत्री के समक्ष शिकायत करने के बाद कुछ लोगों ने गुलजार सिंह पर दबाव बनाया। उसे धमकाया गया, जातिसूचक अपशब्द कहे गए और पंचायत के सामने माफी मांगने के लिए कहा गया। इन आरोपों में कितनी सच्चाई है, यह तो अब जांच में तय होगा लेकिन इतना तथ्य सामने है कि अगले दिन गुलजार सिंह ने जहरीला पदार्थ खा लिया। हालत बिगड़ी तो उसे अस्पताल ले जाया गया और रात में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
मरने से पहले गुलजार सिंह का एक वीडियो भी सामने आया, जिसे उसे इलाज के लिए ले जाए जाते समय बनाया गया था। इस वीडियो में वह अपने साथ हुई घटना और कुछ लोगों के दबाव का जिक्र करता दिखाई देता है। वीडियो में कही गई बातों और परिवार के आरोपों की सत्यता भी जांच के दायरे में है। गुलजार सिंह ने किन परिस्थितियों में यह कदम उठाया और इसके लिए कौन जिम्मेदार है, इसकी जांच के लिए एसआईटी गठित कर दी गई है। पुलिस ने पांच लोगों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून की धाराओं में मामला दर्ज किया है। कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने भी मामले का संज्ञान लिया है।
पंजाब में नशे की समस्या पर दशकों से चर्चा हो रही है। सरकारें बदली हैं, नीतियां बनी हैं, अभियान चले हैं, तस्कर पकड़े गए हैं और नशामुक्ति केंद्र भी खुले हैं। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर इस समस्या को बढ़ाने या रोकने में नाकाम रहने के आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन इस पूरी बहस के दूसरे छोर पर ऐसे परिवार खड़े हैं, जिनके घर का कोई न कोई नौजवान नशे की गिरफ्त में है। ऐसे परिवारों का दर्द और उनकी दुनिया आंकड़ों से अलग है।
गुलजार सिंह की मौत के बाद राजनीति तेजी से गरमा गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस घटना को लेकर पंजाब सरकार पर गंभीर आरोप लगाए और वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा के इस्तीफे तथा स्वतंत्र जांच की मांग की। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने जवाब में विपक्ष पर मौत पर राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि सरकार ने मामले में कार्रवाई की है तथा नशा तस्करों को बख्शा नहीं जाएगा। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने राहुल गांधी के आरोपों पर पलटवार किया। उनका कहना है कि पंजाब सरकार नशे के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ रही है। उन्होंने पंजाब में नशे की समस्या के लिए पिछली सरकारों को जिम्मेदार ठहराते हुए कांग्रेस पर इस मौत को राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगाया।
पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने सवाल उठाया कि सरकार से शिकायत करने वाले एक आम आदमी को आखिर ऐसी स्थिति का सामना क्यों करना पड़ा? पंजाब भाजपा ने राज्यपाल को ज्ञापन देकर सीबीआई जांच और मंत्री के इस्तीफे की मांग की है। शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने एफआईआर में हरपाल सिंह चीमा का नाम शामिल करने की मांग की है।
मंत्री हरपाल सिंह चीमा का पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि उन्होंने गुलजार सिंह की शिकायत सुनी थी और नशे की बिक्री के खिलाफ पुलिस को कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। इन तमाम दावों और प्रतिदावों के बीच सच क्या है, यह जांच के बाद ही सामने आएगा लेकिन राजनीति अपनी गति से चल रही है।
गुलजार सिंह की मौत के साथ उन असंख्य परिवारों के सवाल भी जुड़े हैं, जिनके घरों में आज मां-बाप अपने बच्चे को नशे से निकालने की जद्दोजहद कर रहे हैं। पंजाब में नशे की लड़ाई केवल पुलिस और तस्करों के बीच की लड़ाई नहीं कही जा सकती। यदि किसी युवा को नशा मिलना बंद भी हो जाए तो उसे नशे से बाहर निकालने, इलाज कराने, फिर सामान्य जिंदगी में लौटाने और उसके परिवार को संभालने का काम भी उतना ही जरूरी है। परिवारों को यह भरोसा भी चाहिए कि वे नशा बेचने वालों की शिकायत कर सकते हैं। बिना किसी डर के। बिना यह सोचे कि सामने वाला कितना ताकतवर है। और बगैर इस चिंता के कि शिकायत के बाद उनकी अपनी जिंदगी मुश्किल हो जाएगी। गुलजार सिंह दलित था। गरीब था। मेहनत-मजदूरी करके परिवार पालता था। इसलिए उसकी कहानी में नशे के साथ सामाजिक हैसियत का सवाल भी जुड़ गया है। परिवार ने जातिसूचक दुर्व्यवहार का आरोप लगाया है। जांच से पता चलेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है। लेकिन हमारा समाज इस बड़े सवाल से मुंह नहीं मोड़ सकता कि सबसे निचली पायदान पर खड़ा आदमी जब व्यवस्था से न्याय मांगता है तो वह खुद को कितना सुरक्षित महसूस करता है।
आज गुलजार सिंह की मौत पर पंजाब की राजनीति में शोर है। सत्ता पक्ष अपना पक्ष रख रहा है, विपक्ष सवाल उठा रहा है, पुलिस जांच कर रही है, एसआईटी बनी है और आयोग सक्रिय हैं। यह सब अपरिहार्य है मगर उससे ज्यादा जरूरी यह देखना होगा कि छह महीने या एक साल के बाद तूर बंजारा में क्या बदलेगा? क्या वहां चिट्टा मिलना बंद हो जाएगा? क्या नशे में फंसे नौजवानों का इलाज और पुनर्वास हो सकेगा? क्या गुलजार सिंह के परिवार को न्याय और सहारा मिल पाएगा? क्या अब कोई और गुलजार सिंह अपने गांव में नशे के खिलाफ आवाज उठाने से डरेगा नहीं? क्या गुलजार सिंह की मौत के बाद पंजाब में यह सुनिश्चित होगा कि किसी और गरीब पिता को अपने बेटे को नशे से बचाने के लिए आवाज उठाने की कीमत जान देकर न चुकानी पड़े?
(संपादन : नवल/अनिल)
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