अगर पहले पता नहीं था तो कम-से-कम अब तो पता चल ही गया है – भारत अर्थात् ‘इंडिया’ का सबसे पवित्र संस्थान न तो गाय है, और न ही अयोध्या का नवनिर्मित मंदिर। हमारा परम पवित्र संस्थान तो परीक्षा ही है।
हम गौमाता की उपासना करने का दम भरते हैं, परंतु हमें उसके साथ दुर्व्यवहार करने, उसे भूखा मारने, या परित्यक्ता बनाकर घर से बाहर करने में कोई संकोच नहीं होता। इसी तरह, हम अयोध्या के मंदिर में भक्तों के चढ़ावे की चोरी को बिना खास परेशानी के झेल लेते हैं। मगर देश की परीक्षाओं का बार-बार दूषित किया जाना हमारे लिए असह्य है। प्रवेश परीक्षाओं पर केंद्रित युवाओं के ज़बरदस्त राष्ट्रव्यापी आंदोलन ने वह हासिल किया जो किसानों का लंबा आंदोलन भी हासिल नहीं कर सका। युवा आंदोलन ने स्वाधीन भारत की सबसे कम जवाबदेह सरकार को अपनी जवाबदेही स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया।
परीक्षा की पवित्रता जहां हमें उसके बाहरी ढांचे की पूजा करने को प्रेरित करती है, वहीं हमें उसकी मूल अवधारणा और उसके औचित्य की पड़ताल करने से रोकती है। हालिया विरोध प्रदर्शनों का जोर परीक्षा-संस्थान के सतही पक्षों पर था – जैसे उनका ईमानदार संचालन, सुविचारित व्यवस्था, और इन महकमों के संचालकों की जवाबदेही। ऐसी पड़ताल हमें बहुत पहले ही कर देनी चाहिए थी, फिर भी देर आयद दुरूस्त आयद। आंदोलन-जनित जांच-सुधार स्वागतयोग्य है, विशेषकर सरकारी आकाओं से जवाब-तलब किया जाना।
जेन-ज़ी विरोध प्रदर्शनों में जो व्यथा दिखी वह उपासकों की उपासना के अवसर से वंचित किए जाने की व्यथा ही थी। लेकिन इसके बावजूद युवा प्रदर्शनकारियों के अपूर्व साहस, धैर्य और सत्ता को धत्ता बताने के अद्भुत अंदाज़ ने जनमानस का मन जीतकर नई संभावनाओं का द्वार खोला है। इस या उस परीक्षा को ‘क्रैक’ करने की बजाए आंदोलनकारियों ने परीक्षा की पूरी संस्था को ही ‘क्रैक’ कर दिया है। नतीजतन इस नए माहौल में हम इस संस्थान की जांच-पड़ताल एक ऐसे परिप्रेक्ष्य से कर सकते हैं, जो न नास्तिक है और न आस्तिक।
आज हम परीक्षा के प्रति नास्तिक रवैया नहीं अपना सकते क्योंकि यह एक अपरिहार्य संस्था बन चुकी है। खासकर भारत जैसे देश में परीक्षा का कोई विकल्प नहीं है। इसके अलावा हमारे पास कोई किफ़ायती – यानी कम लागत, श्रम और समय लगाकर हजारों-लाखों प्रत्याशियों का आकलन कर सकने वाला – समाज-स्वीकृत तरीका नहीं है। इतिहास गवाह है कि आधुनिक समाज में परीक्षा से छुटकारा पाना नामुमकिन है।
मगर हमें परीक्षा की संस्था का सिर्फ इसलिए अंधभक्त नहीं बन जाना चाहिए क्योंकि वह अपरिहार्य है, उसके बिना काम नहीं चल सकता। परीक्षा की संस्था की निरपेक्ष व्याख्या से हमें पता चलेगा कि उसके अदृश्य वैचारिक प्रभाव क्या होते हैं। इससे हम इस संस्था का उपयोग करते समय अधिक सचेत और सावधान रह सकेंगे। इस पड़ताल की शुरुआत हमें रोजाना की जिंदगी में परीक्षाओं की भूमिका के अध्ययन से करनी चाहिए। इसके बाद हम परीक्षा की संस्था के अनदेखे और अनजाने उद्देश्यों और प्रभावों का गहराई से अध्ययन कर सकते हैं।
दैनिक जीवन में परीक्षाएं
हमारा देश परीक्षाओं का देश हैं। कैट, सीबीएसई, सीयूईटी, गेट, जेईई, नीट, नेट/जेआरएफ, यूपीएससी – ये उनमें से कुछ के संक्षिप्त नाम हैं। इनके अलावा क्षेत्रीय स्तर की कई परीक्षाएं हैं। फिर स्थानीय स्तर पर अनेक ऐसी परीक्षाएं होती हैं, जिनका कोई विशिष्ट नाम नहीं है, मगर वे हमारी जिंदगी का अहम् हिस्सा हैं। तीन साल की उम्र से हम परीक्षाएं देना शुरू कर देते हैं (नर्सरी में दाखिले के लिए) और 30 वर्ष या उससे अधिक आयु तक (नौकरी हासिल करने के लिए या किसी पेशे में प्रवेश पाने के लिए) हम परीक्षाएं देते रहते हैं। करोड़ों भारतीयों की जिंदगी – वे क्या सीखेंगे और क्या बनेंगे – परीक्षाओं से ही तय होती है। अगर आप किसी छोटी-मोटी परीक्षा में भी अच्छा कर दिखाएं तो समाज आपको मुस्कुरा कर देखता है। और अगर कहीं आपने जेईई या यूपीएससी जैसी परमपूज्य परीक्षा में अव्वल स्थान हासिल कर लिया तब तो आप भगवान और सेलिब्रिटी दोनों बन जाते हैं। यह भी सच है कि परीक्षा में अच्छा न कर पाने के डर से परीक्षार्थियों को गहन चिंता और तनाव से गुजरना पड़ता है। परीक्षाओं और तनाव का परस्पर संबंध विपरीत दिशा में भी काम करता है। सिग्मंड फ्रायड हमें एक सदी पहले ही बता गए हैं कि अगर हम अपनी चिंताओं और तनाव का लगातार दमन करते हैं तो वे ‘एग्जामिनेशन ड्रीम’ या परीक्षा दुस्वप्न के रूप में प्रगट होती हैं।
पिछले कुछ दशकों में परीक्षा एक बड़ा उद्योग बन गई है। परीक्षा उद्योग का सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाला हिस्सा है कोचिंग। भारत में ही नहीं, बल्कि संपूर्ण उत्तर एशिया में कॉलेजों में दाखिले के लिए आयोजित होने वाली प्रतियोगी परीक्षाएं उम्मीदवारों के परिवारों के लिए एक बड़ा आर्थिक बोझ बन गई हैं। उन्हें कोचिंग पर ख़ासा खर्च करना होता है और माता-पिता को संतानों की पढ़ाई-लिखाई पर नज़र रखने में रात-दिन एक कर देना होता है। परीक्षा-उद्योग के केंद्र में होते हैं किशोर परीक्षार्थी, जो जबरदस्त दबाव में रहते हैं। उन्हें बार-बार याद दिलाया जाता है कि उनके परीक्षा प्रदर्शन से ही उनकी ज़िंदगी बनेगी या बिगड़ेगी।
चूंकि हमारे समाज की नज़र में परीक्षाओं का दर्जा बहुत ऊंचा है, इसलिए उनके लिए हम कुछ भी कर सकते हैं। परीक्षा की खातिर और उनके नाम पर सामान्य से हट कर कुछ भी किया जा सकता है और उस पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। अगर आपकी परीक्षा नज़दीक है तो आपको घरेलू कामों और कर्तव्यों से मुक्त किया जा सकता है। अगर परिवार में किसी की मौत हो गई हो तो उसका समाचार भी आपसे छुपाया जा सकता है ताकि आपकी तैयारी में कोई विघ्न न आए। आपकी खातिर आपके मित्र और रिश्तेदार कोई भी त्याग करने के लिए राजी हो सकते हैं। परीक्षाओं में सफलता का उत्सव मनाया जाता है, मगर दुखद पक्ष यह है कि असफलता के कारण आत्महत्याएं भी होती हैं।
संक्षेप में हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी में परीक्षा की छवि यही रही है। मगर इस सतही छवि के नीचे झांक कर देखने पर हम पाएंगे कि परीक्षाएं मूलतः योग्यतावाद (मेरिटोक्रेसी) की विचारधारा को पुष्ट करती हैं। योग्यतावाद उस धारणा का नाम है जिसके मुताबिक समाज में जो कुछ हासिल करने योग्य माना जाता है – बेहतर नौकरी, अच्छी आमदनी, रुतबा, संपत्ति – उसे हासिल करने का उपयुक्त साधन केवल आपकी अपनी योग्यता ही होनी चाहिए। आपको अपनी उपलब्धियां सिर्फ इसलिए विरासत में नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि आपका जन्म किसी विशिष्ट सामाजिक समूह में हुआ है। पुराने जमाने के कुलीनतंत्र में श्रेष्ठ वर्ग जन्म-आधारित होता था। इसके विपरीत योग्यतावाद में श्रेष्ठ वर्ग में प्रवेश पाने के लिए आपकी व्यक्तिगत योग्यता ही काम आती है। उसमें योग्यता और प्रतिभा ही कुलीनता होती है। मेरिटोक्रेसी की अवधारणा का आधुनिक समाजों में महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि वह आधुनिकता की संस्कृति को पूंजीवाद की आर्थिक अनिवार्यताओं से जोड़ती है।
आधुनिकता समानता के विचार को नैतिकता के सबसे ऊंचे पायदान पर रखती है। मगर पूंजीवाद एक ऐसी आर्थिक प्रणाली है जिसके फलने-फूलने के लिए असमानता ज़रूरी है। इन दोनों परस्पर विरोधी शक्तियों का संगम कैसे हो? इस समस्या के समाधान के लिए सबसे पहले बराबरी या समता के विचार के दायरे को कानून (सबके लिए समान न्याय-तंत्र) और चुनावी राजनीति (हर मतदाता को एक मत देने का अधिकार) की औपचारिकताओं तक सीमित किया जाता है। फिर योग्यतावाद की विचारधारा को आगे किया जाता है। मेरिटोक्रेसी शब्द के जन्मदाता माइकल यंग ने करीब 70 साल पहले ही हमें बताया था कि मेरिटोक्रेसी का उपयोग यह साबित करने के लिए किया जाता है कि (पूंजीवादी) असमानता की जननी असमान योग्यता ही है। चाहे आप अमीर हों या गरीब, आपकी आर्थिक हैसियत के लिए आपकी निजी योग्यता ही जिम्मेदार है, यह आपको विरासत में या किसी अन्य सामाजिक कारण से नहीं मिली है। समाज में आपकी औकात जो भी हो, आप उसी के लायक हैं।

इसके अलावा पूंजीवाद के दौर में तकनीकी के क्षेत्रों का जबरदस्त विस्तार होता है। पूंजीवाद अनेक किस्म के नए तकनीकी ज्ञान और कौशल को जन्म देता है। इस ज्ञान और कौशल के व्यवस्थित संचालन के लिए उनका प्रमाणीकरण ज़रूरी होता है। परीक्षा ही इस प्रमाणीकरण का जरिया बनती है। यही कारण है कि आधुनिक पूंजीवादी युग में परीक्षा की प्राचीन संस्था को मेरिटोक्रेसी के मूल तत्व के रूप में नए और विविध स्वरूपों में अवतरित किया जाता है। परीक्षाएं मेरिटोक्रेसी की अमूर्त अवधारणा को ठोस स्वरूप प्रदान करती हैं। परीक्षा और योग्यता-परीक्षण के द्वारा ही योग्यता या प्रतिभा का प्रमाणीकरण संभव होता है। शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले के लिए आयोजित की जाने वाली परीक्षाएं मेरिटोक्रेसी का वैचारिक आधार हैं क्योंकि वे यह संदेश देती हैं कि हर करियर के द्वार किसी भी सामाजिक पृष्ठभूमि के योग्य व्यक्ति के लिए खुले हुए हैं। हमेशा नहीं तो कभी-कभार यह सही भी होता है। लेकिन योग्यतावाद वह नैतिक दीपक है जिसके तले फैला सामाजिक-आर्थिक असामनता का अंधेरा हमें नहीं दिखता। इसकी नैतिक आभा के कारण योग्यतावाद के प्रति जो अंधश्रद्धा पनपती है वह प्रायः हर आधुनिक समाज – जो सभी कमोबेश लोकतांत्रिक, पूंजीवादी और असमान हैं – के विचारधारात्मक ढांचे का महत्वपूर्ण अंग बनता है।
जाति-आधारित समाज में योग्यता, गतिशीलता और परीक्षा : एक संक्षिप्त इतिहास
जाति लंबे समय से भारतीय समाज का मूल आधार रही है। इसके अलावा, भारत में आधुनिकता और पूंजीवाद का आगमन उपनिवेशवाद के साये में हुआ। इन दोनों कारणों से भारत का परीक्षा से जुड़ा अनुभव अन्य देशों से अलग और विशिष्ट रहा है। जाहिर है कि जातिगत समाज योग्यतावादी समाज का विलोम है क्योंकि जाति-व्यवस्था में व्यक्ति की समाजिक हैसियत जन्मजात होती है। लेकिन औपनिवेशिक भारत में भारतीयों को वे अवसर उपलब्ध नहीं थे जो अंग्रेजों को थे, इसलिए यहां जाति-आधारित समाज और योग्यतावाद के बीच अपेक्षित टकराव नहीं हुआ। देश पर अंग्रेजों के शासन के चलते यह संभावित टकराव टल गया। मगर उच्च जातीय अभिजात वर्ग और अंग्रेजों के बीच टकराव ने भारतीय राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता की मांग को जन्म दिया। स्वतंत्रता के ठीक पहले के कुछ दशकों में भारतीयों के लिए अवसरों में बढ़ोत्तरी हुई, मगर इसका लाभ केवल कुछ ही जातियों के लोग उठा सके। इसका कारण था साक्षरता की निम्न दर, खासकर अंग्रेजी के ज्ञान का अभाव।
रईसों के अभियान को एक राष्ट्रीय आंदोलन में तब्दील करने के लिए, और आधुनिकता के प्रति अपनी घोषित प्रतिबद्धता को साबित करने के लिए, भारतीय राष्ट्रवाद के लिए यह ज़रूरी हो गया कि वह जाति के मसले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे। ऐसे में हमारे नए संविधान में एक दोहरी रणनीति अपनाई गई। एक ओर जिन समुदायों पर प्रत्यक्ष बहिष्करण का सबसे अधिक असर रहा – अर्थात अनुसूचित जाति और जनजाति – के लिए जाति-आधारित आरक्षण का प्रावधान किया गया। वहीं दूसरी तरफ अन्य सभी जातियों से यह मौन वायदा किया गया कि उनकी जातीय अस्मिता को औपचारिक तौर पर भुला दिया जाएगा, और उन्हें विशुद्ध, जाति-अस्मिता-रहित नागरिक के रूप में स्वीकार किया जाएगा। मगर चूंकि जातिगत उपलब्धियों और जाति-जनित संसाधनों को ज्यों-का-त्यों चलने दिया गया, इसका व्यवहारिक नतीजा यह था कि कथित उच्च जातियां, विशेषकर हिंदू उच्च जातियां, अपने उन विशेषाधिकारों का उपभोग करती रह सकतीं थीं, जो वे करती आईं थीं।
इस पृष्ठभूमि के साथ जब हम परीक्षा पर लौटते हैं तो पाते हैं कि जब भी कोई देश या समाज अपने स्तरीकृत व ग़ैरबराबरी भरे अतीत से निकलकर एक आधुनिक समता-मूलक एवं योग्यतावादी वर्तमान में प्रवेश करना चाहता है तो उसे परीक्षा के संस्थान का सहारा लेना पड़ता है। लेकिन ऐसी स्थिति में परीक्षा को दोहरी भूमिका निभानी पड़ती है। भारत में भी ऐसा ही हुआ। एक ओर परीक्षा की संस्था को यह दिखाना था (और कुछ हद सुनिश्चित भी करना था) कि योग्यता ही समाज में आगे बढ़ने का आधार है। दूसरी ओर, उसे दबे-छिपे ढंग से यह भी सुनिश्चित करना था कि पुराने जन्म-आधारित विशेषाधिकार बने रहें, लेकिन योग्यता-आधारित विशेषाधिकार का जामा पहन कर।
स्वतंत्रता के शुरुआती सालों में दोनों उद्देश्यों को एक साथ पूरा करना काफी आसान था। कारण यह कि नौकरशाही और आधुनिक पेशों में प्रवेश पाने के लिए जिन परीक्षाओं में भाग लेना होता था, उनके लिए पात्र मुख्यतः वही लोग थे, जिन्हें पहले से विशेषाधिकार हासिल थे, यानी सवर्ण शहरी मध्यवर्ग। भारतीय शिक्षा आयोग (1964-66), जो कोठारी आयोग के नाम से प्रसिद्ध है, के अनुसार, हाई स्कूल से उच्चतर शिक्षा में 18-23 वर्ष आयु समूह (सभी स्तरों, विषयों और लिंगों के मामले में) का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) सन् 1950-51 में 0.7 प्रतिशत था, जो 1965-66 में बढ़कर 2.1 प्रतिशत हो गया।[1] सन् 1970-71 में वह 2-3 प्रतिशत और 1980-81 में 4-5 प्रतिशत था। इस प्रकार, दस साल में इसमें केवल एक प्रतिशत की बढोत्तरी हुई। यहां तक कि 21वीं सदी की शुरुआत में भी जीईआर दो अंकों में प्रवेश नहीं कर सका था और 8-9.5 प्रतिशत के बीच बना रहा।[2]
इस छोटे-से उच्च शिक्षित तबके में किन जातियों और वर्गों के लोग रहे होंगे, इसका अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है। एक बात और। इस दौर में देश में लगातार वृहद् विकास परियोजनाएं लागू की जाती रहीं, जिनसे रोज़गार के अवसर पैदा हुए और नौजवानों को चिंता और तनाव से नहीं गुज़रना पड़ा। हां, 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत में ‘शिक्षित बेरोजगारों’ के मसले को लेकर कुछ बेचैनी और आशंकाएं सामने आईं। यही विद्यार्थी असंतोष का दौर भी था। मगर कुल मिलाकर शिक्षित वर्ग के छोटे आकार के कारण सार्वजनिक परीक्षाओं पर अधिक सामाजिक दबाव नहीं था। अधिकांश उम्मीदवार पुराने श्रेष्ठी वर्ग से हुआ करते थे और परीक्षाएं पास करने वालों को ठीक-ठाक काम मिल ही जाता था। मगर 1970 और 1980 के दशक में श्रेष्ठी वर्ग में आंतरिक प्रतियोगिता बढ़ने लगी। इससे परीक्षा, योग्यतावाद के एक औजार के रूप में और भी प्रतिष्ठित हुई, क्योंकि कुलीन उम्मीदवारों को भी परीक्षाएं पास करने के लिए कड़ी मेहनत और अनुशासित ढंग से पढ़ना पड़ा। लेकिन उन दिनों यह साफ़-साफ़ दिखलाई नहीं पड़ रहा था कि, दरअसल, परीक्षाएं केवल एक विशिष्ट सामाजिक समूह को ही आगे बढ़ने में मदद कर रहीं थीं।
फिर आया मंडल युग – अर्थात 1990 का दशक – जिसने सब कुछ उलट-पलट कर रख दिया। सन् 2000 के दशक में जीईआर में तेज़ी से वृद्धि हुई और 2010 के दशक में वृद्धि दर और बढ़ गई। इसने नए तनावों को जन्म दिया। यही वह दौर भी था जब भारत सरकार ने ऐसी नवउदारवादी नीतियां अपनाईं, जिनसे अर्थ-व्यवस्था में सरकार की भूमिका सिकुड़ने लगी। शिक्षा में सार्वजनिक निवेश घटा और सरकारी रोजगार के अवसरों में कमी आई। नई सदी में जीईआर में वृद्धि के पीछे निजी शिक्षण संस्थाओं का विस्तार था। मगर इसके साथ ही निजी क्षेत्र में रोज़गार सृजन (यानी नई नौकरियों का उद्भव) कम होने लगा। (सन् 1990 के दशक के आईटी क्षेत्र में सीमित उछाल को छोड़ कर)। 2020 का दशक आते-आते, गिग-व्यवस्था रोजगार के क्षेत्र में पूरी तरह छा गई। रोजगारी असुरक्षा अब केवल निम्न तबके तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि ऊपर से नीचे तक के सभी नौकरीपेशा इस डर के साये में जी रहे हैं कि उनकी नौकरी कभी भी जा सकती है। इसके कारण सार्वजनिक प्रवेश परीक्षाओं पर दवाब कई गुना बढ़ गया है और दिन-ब-दिन फलता-फूलता कोचिंग उद्योग इसे और बढ़ा रहा है। नौकरियां हासिल करने के लिए मैदान में उतरने वाले गंभीर प्रतियोगियों की संख्या बहुत बढ़ गई है। अब वे पुराने श्रेष्ठ वर्ग तक सीमित नहीं हैं। अब इनमें कुछ जातियों और वर्गों के ऐसे तबके भी शामिल हो गए हैं जिनकी परीक्षाओं में सफलता की संभावना न्यूनतम हुआ करती थी। अपने समुदायों की कुल आबादी में उनका अनुपात भले ही कम हो, लेकिन उनकी संख्या अच्छी खासी है।
लेकिन जो बात सबसे महत्वपूर्ण है, वह यह है कि आज हमारी वित्तीयकृत और अति-पूंजीवादी अर्थव्यवस्था बिना रोज़गार का सृजन किए मुनाफ़ा कमाने में सक्षम है। इससे व्यावसायिक व उच्च शिक्षा और अच्छी नौकरियों के बीच लंबे समय से चला आ रहा अंतर्संबंध लगभग टूट गया है। इसके फलस्वरूप परीक्षाओं पर दबाव में जबरदस्त वृद्धि हुई है और इसी का सीधा नतीजा है बार-बार पेपर लीक और अन्य गड़बड़ियों की घटनाएं। यह सही है कि प्रश्नपत्र केवल वही लोग खरीद सकते हैं जो प्रभावशाली हैं व जिनके पास संसाधन हैं। मगर खरीदारों की सामाजिक पहचान के बारे में हम केवल अंदाज़ा ही लगा सकते हैं। यह संभव है कि कोचिंग की उपलब्धता के कारण स्थापित श्रेष्ठ वर्ग के लिए केवल अपनी बेहतर सामाजिक पूंजी के बल पर परीक्षाओं में सफलता हासिल करना मुश्किल हो गया हो और इसलिए अब वे प्रश्नपत्र खरीद कर अपनी सफलता सुनिश्चित कर रहे हैं। यह भी संभव है – हालांकि इसकी संभावना कम है – कि श्रेष्ठ वर्ग का हिस्सा बनने को आतुर तबका यह कर रहा हो। लेकिन यह तो पक्का है कि प्रश्नपत्रों की लीक केवल उस वर्ग की समस्या है जिसे ‘सामान्य श्रेणी’ के भ्रामक नाम से जाना जाता है। पेपर लीक के लिए आरक्षण को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। परीक्षाओं में भ्रष्टाचार और उनका कुप्रबंधन, योग्यता की विचारधारा की धज्जियां उड़ाता है, उसे तितर-बितर करता है। इसी प्रहार के साझा दर्द व आक्रोश ने तथाकथित जेन-ज़ी विरोध आंदोलन को जन्म दिया है।
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जेन-ज़ी के आंदोलन को जो जबरदस्त प्रचार मिला और समाज में उसे जो सहानुभूति हासिल हुई, उसका कारण यह था कि इस आंदोलन के केंद्र में उच्च स्तर की परीक्षाएं थीं, जिनमें मध्यम और धनिक वर्गों की रूचि रहती है। ऑल इंडिया सर्वे ऑफ़ हायर एजुकेशन (एआईएसएचई 2023-24) की सबसे ताज़ा रपट के अनुसार 18-23 वर्ष आयु वर्ग में जीईआर 30 प्रतिशत है। इसका अर्थ यह है कि इस आयु वर्ग के 70 प्रतिशत युवा अब भी उच्च शिक्षा से बाहर हैं। स्कूली शिक्षा से संबंधित यूडीआईएसई+ 2024 डेटा बताता है कि स्कूल में दाखिला लेने वाले बच्चों में से केवल 47 फीसद कक्षा 11-12वीं तक पहुंच पाते हैं। इसका मतलब यह है कि जो बच्चे स्कूलों में दाखिला लेते हैं, उनमें से आधे से ज्यादा हाईस्कूल तक भी नहीं पहुंच पाते।
विरोध प्रदर्शन
यद्यपि विरोध आंदोलन के केंद्र में केवल नीट जैसी अभिजात वर्ग की परीक्षाएं थी, लेकिन इसके बावजूद उसमें भाग लेने वालों में ऐसे लोग भी थे जिनका इस तरह की परीक्षाओं से कोई लेना-देना नहीं था। इससे हमें परीक्षा संस्थान के बारे में दो चीज़ें पता चलती हैं, जिन्हें हम केवल सवर्ण तबके के भावी डॉक्टरों या इंजीनियरों के सरोकार कहकर टाल नहीं सकते। पहला यह कि दफ्तरों में चपरासियों, पुलिस में सिपाहियों और रेलवे में सबसे निचले दर्जे के कर्मचारियों की भर्ती भी किसी-न-किसी किस्म की प्रवेश परीक्षा से होती है। दूसरे, असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र, जहां 90 प्रतिशत श्रम शक्ति नियोजित है, में कामगारों की स्थिति बिगड़ती जा रही है। वहां आपकी नौकरी कभी भी जा सकती है और वेतन इतना कम होता है कि उसे शोषण के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता। नौकरीपेशा वर्ग में असुरक्षा का भाव बढ़ता जा रहा है और गिग-व्यवस्था ने रोज़गारी असुरक्षा को सहज-सामान्य बना दिया है।
यही कारण है कि छोटी से छोटी सरकारी नौकरी भी इतनी आकर्षक लगने लगी है कि उन्हें पाने के लिए लोग पागल हैं, जैसा कि मीडिया में खबरें हमें बताती हैं। सन् 2015 में उत्तर प्रदेश सरकार ने चपरासी के 368 पद भरने के लिए आवदेन आमंत्रित किए। जवाब में 23 लाख लोगों ने आवेदन किया – अर्थात हर चपरासी पद के लिए 6,250 आवेदन! उम्मीदवारों में दो लाख इंजीनियर और 255 पीएचडी डिग्रीधारी भी शामिल थे। सन् 2019 में गुजरात उच्च न्यायालय ने चतुर्थ श्रेणी (अमीन, चपरासी इत्यादि) के 1,149 पद भरने के लिए आवेदन मंगाए। कुल 1.6 लाख आवेदन आए। जिन लोगों को भर्ती परीक्षा में सफल होने बाद नियुक्त किया गया, उनमें सात डॉक्टर, 450 इंजीनियर और 547 स्नातकोत्तर शामिल थे। पिछले साल, 2025 में, देश के सबसे बड़े नियोक्ता भारतीय रेल ने चतुर्थ श्रेणी के 32,438 पद विज्ञापित किए, इनके लिए कुल 1.08 करोड़ उम्मीदवारों ने आवेदन दिए।
इस तरह के घटनाओं और भीड़-भरी, अव्यस्थित सबाल्टर्न परीक्षाओं में होने वाली अफरातफरी की ख़बरों को अंग्रेजी मीडिया लगभग हास्यास्पद बनाकर पेश करता है। जबकि सच है कि यह एक सामाजिक त्रासदी है। हमारा श्रम बाज़ार इस हालत में पहुंच गया है कि केवल सरकारी नौकरियां ही आजीविका की सुरक्षा की गारंटी दे सकती हैं – चाहे वे कितने ही निचले स्तर की क्यों न हों। इससे यह भी पता चलता है कि समकालीन भारत में एक छोटे से उच्च वर्ग और दूसरी तरफ एक अत्यंत ग़रीब तबके को छोड़कर बाकी सभी के लिए परीक्षाएं कितनी अहम् बन गई हैं। बहुसंख्यक भारतीय परिवारों – यानी जिनके पास कोई संपत्ति नहीं है या न के बराबर संपत्ति है, और जो आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा को पुश्तैनी विरासत में नहीं पा सकते – इन परिवारों के लिए हैसियत हासिल करने और बनाए रखने का एकमात्र रास्ता परीक्षा से होते हुए गुजरता है। जब परीक्षा अवाम के लिए इतना महत्व रखती है तो राज्य और समाज ने इस केंद्रीय संस्था के लेकर अब तक क्या किया है?
विकृत स्वरूप और अपरीक्षित निहितार्थ
परीक्षाओं के महत्व की तुलना में उन पर दिया जाने वाले ध्यान – मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों दृष्टियों से – इतना कम है कि उसे शर्मनाक ही कहा जा सकता है। परीक्षाओं के शैक्षणिक पक्ष अर्थात् सीखने-सिखाने की प्रक्रिया, और सामाजिक पक्ष अर्थात उनके वैचारिक असर और अलग-अलग समूहों पर पड़ने वाले उनके प्रभाव, पर अत्यंत सतर्कता और सावधानी से शोध किए जाने की आवश्यकता है।
निकास परीक्षाएं, यानी पाठ्यक्रमों के अंत में होने वाली परीक्षाएं – जिन्हें स्कूल शिक्षा बोर्ड या विश्वविद्यालय संचालित करते हैं और जिनमें उत्तीर्ण होने पर आपको उक्त पाठ्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा करने का प्रमाणपत्र दिया जाता है – पर तो और भी कम ध्यान दिया जाता है। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद जिन भी अवसरों के द्वार खुलते हैं, उनमें से लगभग सभी के लिए आपको अलग से प्रवेश परीक्षाएं देनी होती हैं। इससे स्कूली और विश्वविद्यालयीन परीक्षाओं का महत्व कम हो गया है। लेकिन तथ्य यह कि इन परीक्षाओं का संबंध शिक्षा की गुणवत्ता से है और इसलिए ये महत्वपूर्ण हैं। परीक्षा सुधारों पर राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की रपटों – जैसे 1971 की ‘परीक्षा समिति’ या 2006 के नेशनल फोकस ग्रुप ऑन एग्जामिनेशन्स के पोजीशन पेपर – से ऐसा लगता है कि वही पुरानी समस्याएं और चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं और उनका मुकाबला करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए हैं।
देश का ध्यान इस समय केवल नीट जैसी प्रवेश परीक्षाओं पर है। और इनका गहन अध्ययन केवल बेलगाम कोचिंग उद्योग कर रहा है। और वह भी केवल व्यावसायिक नज़रिए से। बेहतर अंक हासिल करने के लिए इस उद्योग ने जो तरीके विकसित किए हैं, वह उनसे ज्यादा-से-ज्यादा धन कमाना चाहता है। कोचिंग उद्योग में निवेश से जिस तरह की भारी आमदनी होती है, वह स्वाभाविक रूप से भ्रष्टाचरण को प्रोत्साहित करती है। आश्चर्य नहीं कि पेपर लीक के कई मामलों के तार सीधे-सीधे कोचिंग इंस्टिट्यूटों से जुड़ते हैं। इन हालातों को बदलने के लिए यह ज़रूरी है कि अध्ययन के सभी क्षेत्रों और विषयों के बारे में ज्ञान के परीक्षण के तरीकों पर सार्वजनिक शोध हो। इसके उदाहरण बहुत कम हैं, जिनमें से एक है राष्ट्रीय स्तर की संयुक्त प्रवेश परीक्षाओं में सुधार पर एक्सपर्ट्स की उच्च-स्तरीय समिति (राधाकृष्णन समिति) की 2024 में प्रस्तुत रिपोर्ट। इस समिति की नियुक्ति नीट परीक्षा के प्रश्नपत्रों के पूर्व में लीक होने और इससे जुड़ी अन्य समस्याओं के अध्ययन के लिए की गई थी। रिपोर्ट के सारांश से ऐसा लगता है कि इस समिति ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) और योग्यता परीक्षण की तकनीकों का विस्तार से अध्ययन किया है। लेकिन इस समिति ने अक्टूबर, 2024 में अपनी जो रपट शिक्षा मंत्रालय को प्रस्तुत की, वह हम-आपको उपलब्ध नहीं है। केवल इसकी सिफारिशें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। संभवतः सरकार इन सिफारिशों से बहुत खुश नहीं है क्योंकि उन पर कोई कार्यवाही नहीं की गई है। उलटे, सरकार ने एक और उच्च-स्तरीय समिति (निलेकणी समिति) की नियुक्ति कर दी है। लेकिन इस नई समिति को भी सिर्फ सार्वजनिक परीक्षाओं का सुरक्षित ढंग से (बिना पेपर लीक) संचालन करने के लिए सिफारिशें करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।
अगर परीक्षाओं का समग्र (होलिस्टिक) अध्ययन किया जाना है (याद रहे कि ‘होलिस्टिक’ शब्द का प्रयोग 59-पृष्ठ के राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 दस्तावेज में 41 बार किया गया है), तो इसका कार्यक्षेत्र केवल पेपर लीक रोकने तक सीमित नहीं रह सकता। सबसे पहले राधाकृष्णन रिपोर्ट के उन महत्वपूर्ण हिस्सों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, जिसमें परीक्षा प्रणाली की कमियों का अध्ययन किया गया था ताकि उस पर सार्वजनिक चर्चा और बहस हो सके। एनटीए की स्थापना और उसके द्वारा किए गए घपले इसलिए संभव हो सके क्योंकि सरकार में सारे निर्णय ऊपर से लिए जाते रहे और उन पर प्रश्न उठाने या चर्चा करने का वास्तविक अवसर किसी को नहीं दिया गया। युवाओं के आंदोलन के चलते जो वातावरण देश में बना है, उसका लाभ उठाते हुए सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सार्वजनिक परीक्षाओं के महत्व के अनुरूप उन पर ध्यान दिया जाए।
लेकिन परीक्षाओं के शैक्षणिक और तकनीकी मुद्दों से जुड़े पहलुओं के साथ-साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि परीक्षाओं के सामाजिक पहलु पर ध्यान दिया जाए। यह आयाम केवल परीक्षाओं की डिजाईन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध हमारे सामूहिक भविष्य से है। हर पूंजीवादी समाज में अभिजात वर्ग के युवाओं को अवसर विरासत में मिलती हैं, और इसका इंतजाम समाज की संरचना और सहज संचालन से ही संपन्न होता है, इसके लिए कोई खास पहल नहीं करनी पड़ती है। लेकिन परीक्षाएं हमें एक अहम सवाल के सामने खड़ा करती हैं – जो अवसर विरासत में हासिल नहीं होते, उनका नियमन कैसे हो? इस सवाल के जवाब के साथ हमारा साझा भविष्य शामिल है। अगर परीक्षाओं के बारे में वर्तमान सरोकार केवल पेपर लीक को रोकने के उपायों तक सीमित रहेंगे, तो यह तय मानिए कि जेन-ज़ी प्रदर्शनकारियों ने भले ही फौरी तौर पर मोर्चा जीत लिया हो, वे – और हम – व्यापक युद्ध हार चुके हैं।
संदर्भ :
[1] एजुकेशन एंड नेशनल डेवलपमेंट, रिपोर्ट ऑफ दी एजुकेशन कमीशन 1964-66, पृष्ठ 300, सारणी 12.1
[2] जीईआर के आंकड़ों की गणना इन वर्षों में व्यवस्थित या नियमित तरीके से नहीं होती थी। विभिन्न एजेंसियों यथा योजना आयोग या यूजीसी से टुकड़ों में मिले अनुमानों को एक साथ जोड़कर जीईआर तय किया जाता था। यहां दिए गए आंकड़े भी अनुमानित ही हैं।
यह आलेख वेब पत्रिका ‘द इंडिया फोरम’ द्वारा मूल अंग्रेजी में प्रकाशित है। यहां लेखक व मूल प्रकाशक की अनुमति से हिंदी अनुवाद (छुटपुट संशोधन सहित) प्रकाशित है।
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया एवं सतीश देशपांडे, संपादन : नवल)
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