भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में किसी भी समुदाय के खिलाफ होने वाला भेदभाव केवल उस समुदाय का सवाल नहीं होता, बल्कि वह लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों की पूरी व्यवस्था के सामने खड़ा प्रश्न होता है। साउथ एशिया जस्टिस कैंपेन की इंडिया पर्सेक्यूशन ट्रैकर की जनवरी-अप्रैल 2026 की रिपोर्ट इसी संदर्भ में भारत में मुसलमानों के खिलाफ दर्ज मानवाधिकार उल्लंघनों की गंभीर तस्वीर सामने रखती है। रिपोर्ट स्वयं स्पष्ट करती है कि इसमें दर्ज घटनाएं संपूर्ण नहीं हैं, बल्कि मीडिया में रिपोर्ट हुई और सत्यापित घटनाओं का एक हिस्सा हैं। फिर भी चार महीनों के आंकड़े और घटनाओं के बीच दिखाई देने वाले पैटर्न इस बात पर गंभीर विचार करने के लिए मजबूर करते हैं कि भारत में मुस्लिम नागरिकों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा की स्थिति किस दिशा में जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार जनवरी से अप्रैल, 2026 के बीच धार्मिक नफरत से हुई हिंसा में कम-से-कम 13 मुसलमानों को मार दिया गया। ये घटनाएं आठ राज्यों में दर्ज की गईं। इसके अतिरिक्त, कम-से-कम चार मुसलमानों की मौत पुलिस, सेना या अन्य राज्य सुरक्षा एजेंसियों से जुड़ी घटनाओं में हुई। इनमें उत्तर प्रदेश में कथित ‘पुलिस मुठभेड़’, जम्मू-कश्मीर में एक विवादित सैन्य अभियान और दिल्ली में पुलिस हिरासत में हुई मौत शामिल हैं। इन आंकड़ों को केवल अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय उस व्यापक सामाजिक और राजनीतिक माहौल के संदर्भ में समझने की जरूरत है, जिसमें किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान उसके खिलाफ हिंसा, संदेह या राज्य की कठोर कार्रवाई का आधार बनती दिखाई देती है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य की होती है, लेकिन उसी के साथ यह भी जरूरी है कि किसी नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा कानून और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से हो। जब पुलिस कार्रवाई, हिरासत में मौत या कथित मुठभेड़ जैसे मामलों में सवाल उठते हैं, तो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच लोकतांत्रिक जवाबदेही का अनिवार्य हिस्सा बन जाती है। यही कारण है कि रिपोर्ट में दर्ज ये आंकड़े केवल मुसलमानों की सुरक्षा का प्रश्न नहीं उठाते, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में कानून के समान अनुप्रयोग और नागरिक अधिकारों की स्थिति पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
मानवाधिकार संकट का दूसरा गंभीर पहलू सांप्रदायिक हिंसा और मॉब लिंचिंग है। रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी से अप्रैल, 2026 के बीच आठ राज्यों में कम-से-कम 13 मुसलमानों की हत्या हिंदू अतिवादी तत्वों द्वारा की गई। इन हत्याओं के पीछे कभी गो-रक्षा के नाम पर हिंसा, कभी किसी को ‘बांग्लादेशी’ बताने का आरोप, कभी अंतरधार्मिक संबंध और कभी स्थानीय विवादों को सांप्रदायिक रंग देने जैसे कारण सामने आए। इसके अलावा कम-से-कम 12 राज्यों में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर भीड़ की हिंसा की घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि 18 राज्यों में मुसलमानों के खिलाफ अलग-अलग नफरत से जुड़ी हिंसा और घटनाएं सामने आईं।
इन घटनाओं को केवल आपसी विवाद या अचानक हुई हिंसा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया जाता है और किसी समुदाय को लगातार ‘बाहरी’, ‘घुसपैठिया’, ‘बांग्लादेशी’ होने का संदेह या देश के लिए खतरे के रूप में पेश किया जाता है, तो इससे समाज में नफरत और अविश्वास का माहौल बनता है। रिपोर्ट के अनुसार 2026 में पश्चिम बंगाल और असम में चुनावी अभियान के दौरान भी मुस्लिम समुदाय के खिलाफ अपमानजनक और अमानवीय भाषा का इस्तेमाल हुआ। ऐसी भाषा और राजनीतिक बयानबाजी केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज में एक समुदाय के प्रति हिंसा और भेदभाव को सामान्य बनाने का माहौल तैयार करती है।

रिपोर्ट में बंगाली भाषी मुसलमानों की स्थिति को भी विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने, नागरिकता और पहचान को लेकर की गई कार्रवाइयां तथा असम में कथित जबरन ‘पुशबैक’ जैसी घटनाओं को रिपोर्ट में बंगाली भाषी मुसलमानों के खिलाफ बढ़ते भेदभाव और उनके अधिकारों पर मंडराते खतरे के रूप में सामने रखा गया है। उसके अनुसार 13 राज्यों में 5.6 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम चुनावी सूची से हटाए गए और पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के नाम हटाए जाने की दर अधिक रही। इन दावों को लेकर स्वतंत्र सार्वजनिक बहस और पारदर्शी जांच इसलिए जरूरी है क्योंकि मतदान का अधिकार लोकतंत्र में नागरिक की सबसे बुनियादी राजनीतिक अधिकारों में से एक है।
मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भेदभाव केवल हिंसा या गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट घरों, दुकानों, धार्मिक स्थलों और शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े मामलों को भी इस व्यापक संकट का हिस्सा मानती है। कई राज्यों में बुलडोजर कार्रवाई, विस्थापन, मदरसों और मुस्लिम शैक्षणिक संस्थानों पर कार्रवाई तथा संपत्ति और आवास से जुड़े प्रतिबंधों का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है। यहीं लोकतंत्र की असली परीक्षा होती है। लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि बहुमत के शासन में अल्पसंख्यक नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहें। यदि किसी नागरिक के अधिकार उसके धर्म, नाम, भाषा या क्षेत्र के आधार पर कम हो जाएं, तो लोकतांत्रिक समानता का मूल सिद्धांत कमजोर होता है।
समाजशास्त्र के प्राध्यापक और पसमांदा चिंतक खालिद अनीस अंसारी के विचार इस पूरे सवाल को एक और महत्वपूर्ण सामाजिक दृष्टिकोण से देखने की जरूरत बताते हैं। उनके अनुसार सांप्रदायिक हिंसा और लिंचिंग का असमान बोझ सबसे अधिक पसमांदा मुसलमानों पर पड़ता है, जबकि मुस्लिम समाज के भीतर राजनीतिक और संस्थागत प्रतिनिधित्व में यह समुदाय अपेक्षाकृत नजरअंदाज रहा है। यही विरोधाभास इस बहस को और गंभीर बनाता है। जिन समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पहले से कमजोर है, उनके लिए सांप्रदायिक हिंसा केवल जान और संपत्ति के नुकसान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि रोजगार, शिक्षा, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा पर भी गहरा असर डालती है। जुलाहे, कसाई, रईन और दूसरे पारंपरिक पेशों से जुड़े पसमांदा समुदायों के लिए हिंसा और बहिष्कार का असर उनकी रोजमर्रा की आजीविका पर भी पड़ता है। एक तरफ जहां मुस्लिम पहचान के आधार पर सामूहिक भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ पसमांदा मुसलमान जाति और सामाजिक-आर्थिक वंचना की दोहरी चुनौती से भी गुज़र रहे हैं।
भारत का संविधान नागरिकों को धर्म के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा देता है और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है। इसलिए मुसलमानों के खिलाफ होने वाली हिंसा या भेदभाव को केवल ‘सामुदायिक विवाद’ कहकर टाल देना पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि क्या कानून सभी नागरिकों के लिए समान रूप से काम कर रहा है? क्या आरोपित अपराधी को न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है? क्या पीड़ित को न्याय मिलता है? और क्या राजनीतिक सत्ता से जुड़े लोगों की भाषा सामाजिक हिंसा के लिए जिम्मेदारी तय करने के दायरे में आती है?
जनवरी से अप्रैल, 2026 की उपरोक्त रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अलग-अलग घटनाओं को एक साथ रखकर एक पैटर्न के रूप में देखने की कोशिश करती है। किसी लोकतंत्र की मजबूती का पैमाना केवल उसकी आर्थिक वृद्धि, चुनावी सफलता या वैश्विक प्रतिष्ठा नहीं हो सकता। असली कसौटी यह है कि सबसे कमजोर और सबसे असुरक्षित नागरिक कितना सुरक्षित महसूस करता है। यदि किसी मुस्लिम नागरिक को अपने नाम, पहचान, धर्म या राजनीतिक विचार के कारण अतिरिक्त भय में जीना पड़ रहा है, तो यह केवल मुस्लिम समुदाय की समस्या नहीं है, यह भारतीय लोकतंत्र की समस्या है।
इसलिए जरूरत किसी समुदाय को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की नहीं, बल्कि संविधान को सामाजिक जीवन में वास्तविक रूप से लागू करने की है। न्याय तभी सार्थक होगा जब वह पहचान देखकर नहीं, अधिकार देखकर दिया जाए। भारत की बहुलतावादी परंपरा और लोकतांत्रिक भविष्य दोनों इसी बात पर निर्भर करते हैं कि नागरिक की सुरक्षा उसकी धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि उसके संवैधानिक अधिकार से तय हो।
(संपादन : नवल/अनिल)
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