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मध्य प्रदेश : बालाघाट में 19 आदिवासी बच्चों की मौत

जिन गांवों में बच्चों की मौत हो रही है, वहां सड़क, स्वास्थ्य, पानी जैसी अन्य सुविधाओं का घोर अभाव है। बच्चे कुपोषित हैं। लोगों के पास राशन की कमी है। हैंडपंपों में कहीं-कहीं आर्सेनिक युक्त लाल पानी भी आता है। बच्चों की मौत के पीछे इन्हीं परिस्थितियों को माना जा रहा है। पढ़ें, सतीश भारतीय की रिपोर्ट

मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल बालाघाट जिले में एक के बाद एक 19 आदिवासी बच्चों की मौत हुई हैं। ये बच्चे 1-14 वर्ष की उम्र के थे। ये मौतें जिले के बिरसा विकासखंड के ग्राम बोंदारी, कुंडेकसा और कोरका सहित कई गांवों में हुई हैं। ये गांव जिला मुख्यालय से करीब 60 से 90 किलोमीटर की दूरी पर हैं।

बोंदारी गांव में पहली मौत 16 जून, 2026 को रूपलाल धुर्वे की हुई। इसके बाद 28 जुलाई को पूजा धुर्वे, 31 जुलाई को सचिन मरकाम और 12 अगस्त को प्रियंका धुर्वे की मौत हो गई। ऐसे ही कोहनीमोडटोला गांव के लमनिन धुर्वे की मौत 26 जून और साहिल धुर्वे की मौत 27 जून को हुई। कुंडेकसा गांव में प्रीति मरकाम की मौत 23 जुलाई और अरविंद धुर्वे की मौत 6 अगस्त को हुई। मछुरदा गांव में सूरज मरकाम की मौत 1 अगस्त और रोवन‌ धुर्वे की मौत 3 अगस्त को हुई। इस तरह अब तक 19 बच्चों की मौत हो चुकी है।

जिन गांवों में बच्चों की मौत हो रही है, वहां सड़क, स्वास्थ्य, पानी जैसी अन्य सुविधाओं का घोर अभाव है। बच्चे कुपोषित हैं। लोगों के पास राशन की कमी है। लोग झिरिया और हैंडपंप से पानी पीने को मजबूर हैं। हैंडपंपों में कहीं-कहीं आर्सेनिक युक्त लाल पानी भी आता है। बच्चों की मौत के पीछे इन्हीं परिस्थितियों को माना जा रहा है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि स्थानीय प्रशासन को इन मौतों के बारे में खबर नहीं है। जब 8 बच्चों की मौत हुई थी तभी 12 अगस्त, 2026 को जिलाधिकारी द्वारा एक पत्र जारी किया गया। इस पत्र में जिक्र किया गया कि बालाघाट जिले के विकासखंड बिरसा के सेक्टर सोनगुड्डा के अंतर्गत ग्राम बोंदारी, कुंडेकसा एवं कोरका में जून, 2026 से अगस्त 2026 तक मौसमी बीमारियों, यथा सर्दी, खांसी, बुखार, शरीर में चट्टे, दाने, मीजल्स, फाल्सीफेरम मलेरिया आदि का प्रकोप पाया गया है। इनके कारण 8 बच्चों की मौत हुई है।

कुंडेकसा गांव के एक स्कूल में बनाए गए अस्थायी अस्पताल में इलाजरत बच्चे (तस्वीर : सतीश भारतीय)

पत्र में यह जानकारी भी दर्ज है कि क्षेत्र में बीमारी की सूचना प्राप्त होने पर घर-घर जाकर सर्वेक्षण कराया जा रहा है, जिसमें 20 सर्वेक्षण दलों और 10 चिकित्सा अधिकारियों के माध्यम से सर्वेक्षण कराए जाने के साथ ही कुंडेकसा गांव में 5 बिस्तरों वाला एक अस्थायी अस्पताल स्थापित किया गया है। स्वास्थ्य विभाग के दल द्वारा बच्चों के स्वास्थ्य पर निरंतर निगरानी रखी जा रही है।

पत्र में आगे वर्णित है कि बीते एक माह में आज (12 अगस्त) तक कुल 100 बच्चों को अस्पताल में भर्ती किया गया था, जिनमें से 93 बच्चों को उपचार उपरांत स्वस्थ होने पर डिस्चार्ज किया गया है। शेष 7 बच्चे अस्पताल में भर्ती रहकर उपचाररत हैं। एहतियात के तौर पर 8 अन्य बच्चों को अस्पताल लाया गया है। इस प्रकार कुल 15 बच्चे अस्पताल में उपचाररत हैं। सभी बच्चे खतरे से बाहर हैं एवं सभी की स्थिति सामान्य है।

मृतक बच्चों के पीड़ित परिजन बातचीत में अपना दर्द बेहद दुखी मन‌ से बताते हैं। कोहनीमोडटोला गांव के सम्हारू धुर्वे एक ऐसे पिता हैं जिनके दो बच्चों की मौत हो चुकी है। वे कहते हैं कि, “मेरे बेटे लमनिन (14 वर्ष) की मौत 26 जून को और अगले ही दिन मेरे दूसरे बेटे साहिल (एक साल) की मौत हो गई। मैंने बच्चों का झाड़-फूंक भी करवाया था और पंडा के पास भी ले गया था। जब कोई आराम नहीं मिला तो बच्चों को डाबरी के अस्पताल ले गया। वहां इलाज नहीं हुआ। फिर सोनगुड्डा के अस्पताल भी ले गया। लेकिन अपने बच्चों की जान नहीं बचा पाया।”

वहीं, बोंदारी गांव के चैन सिंह को अपने 5 वर्षीय बेटे सचिन को खोने का दर्द बहुत पीड़ा दे रहा है। उसकी मौत 31 जुलाई, 2026 को हो गई। वे पीड़ा व्यक्त करते हैं कि “मेरे बेटे सहित अन्य बच्चों का जान गंवाना असहनीय दर्द दे रहा है। हमारे गांव में पानी की बहुत परेशानी है। हम गंदा पानी पीते हैं। यही गंदा पानी बीमारी और मौत की वजह है। गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं की भी कमी है।”

बीमारी से ग्रसित एक बच्चा (तस्वीर : सतीश भारतीय)

बोंदारी गांव के ही जौनसिंह मरकाम कहते हैं कि “गांव‌ में बच्चों की मौत होने लगी। पहले तो लग रहा था कि बच्चों को बरसात की मौसमी बीमारी हो सकती है। लेकिन, जब बच्चों की मौत होने लगी तब गांव में मातम पसर गया। गांव की पंचायत ने बीमारियों‌ का मामला स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाया।”

अडोरी गांव के सरपंच परसराम धुर्वे इस पूरे घटनाक्रम पर अपना मत रखते हुए कहते हैं कि “जून माह से गांव‌ में बच्चे बीमार हो रहे थे। यह जानकारी मेरे सामने 21 जुलाई को आई। इस मामले पर मैंने ढंग से संज्ञान लिया। फिर, अधिकारियों से मामले पर बात की और स्वास्थ्य टीम गांव पहुंची। फिर भी हमें दुख है कि कुछ बच्चों को बचाया नहीं जा सका।”

आदिवासी मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने वाले और इस मामले को करीब से देखने वाले बालाघाट के पत्रकार नीतेश उचबगले कहते हैं कि “आदिवासी इलाकों में इस तरह की घटनाएं हर साल होती हैं। इस बार मौतों की स्थिति भयावह रूप से दिखी। ये मौतें स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण हुई हैं। कई गांवों से अस्पताल की दूरी 15 किलोमीटर से भी अधिक है। ये गांव कबीलों की तरह बसे हैं, जहां बहुत कम सुविधाएं हैं। कुपोषण की स्थिति को मैंने खुद देखी है कि एक 3 वर्ष की बच्ची का वजन महज 4 किलो 500 ग्राम है। लेकिन उसे कुपोषित के रूप में रिकॉर्ड भी नहीं किया गया।”

वे आगे कहते हैं कि “प्रशासन के अनुसार, नक्सलवाद की वजह से अब तक स्वास्थ्य सुविधाएं इन गांवों तक नहीं पहुंच पाईं। फिर सवाल उठता है कि सड़क कैसे बनी? पुलिस के कैंप कैसे बने? प्रशासन एक कारण यह बताता है कि वहां के लोग डॉक्टरों को देखकर दूर भागते हैं। इलाज करवाने से कतराते हैं। पाखंड व अंधविश्वास करते हैं। बलि देते हैं। लेकिन, वास्तव में इन सबकी आड़ में प्रशासन अपनी नाक छुपा रहा है।”

घटना के मामले में बालाघाट जिले के मुख्य चिकित्सा व स्वास्थ्य अधिकारी डा. परेश‌ उप्लव‌ कहते हैं कि “यदि यह मामला हम तक पहले पहुंचता तो हम बच्चों को बचा पाते। बच्चों को बहुत तेज बुखार आया और उनकी मौत हो गई। बच्चों के चेहरों पर जो दाने थे, वे चेचक के नहीं, चर्म रोग के थे। यह बीमारी दूषित पानी पीने से होती है।”

बैहर विधानसभा क्षेत्र के विधायक संजय उईके इस पूरे मामले में कहते हैं कि “सरकार को विकास का पैमाना अपने चश्मे से नहीं देखना चाहिए। जमीन पर जाकर उन गांवों को देखना चाहिए, जहां बच्चों की मौत हुई है। बच्चों की मौत का मामला बेहद संवेदनशील है। यह राजनीति करने का विषय नहीं है। आज यदि उन गांवों में अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं और जागरूकता होती तो भयंकर हालात नहीं देखने पड़ते।”

बहरहाल बीमारी से बच्चों की मौत का यह निंदनीय मामला उस भारत की तस्वीर पेश‌ करता है जो‌ सदियों से गांवों का रहा। गांव में पला बढ़ा। मगर गांव को इतना सशक्त नहीं कर पाया कि गंभीर स्वास्थ्य आपदा की स्थिति में कोई माता-पिता अपने बच्चों की जान बचा सकें।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सतीश भारतीय

मध्य प्रदेश के सागर जिला के निवासी सतीश भारतीय स्वतंत्र युवा पत्रकार हैं

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