[यह पत्र (पत्रांक जीओआई/पीएम-01/08/26/एमपी/करुर, दिनांक 15 अगस्त, 2026) तमिलनाडु के करुर लोकसभा क्षेत्र की सांसद एस. ज्योतिमणि द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित है। इसका विषय है– ‘जनगणना 2027 में ओबीसी आबादी की उचित गणना हेतु तत्काल हस्तक्षेप बाबत – सुस्पष्ट ओबीसी / एसईबीसी श्रेणी के निर्माण और मानकीकृत जाति कोडिंग के उपयोग हेतु अनुरोध’। पढ़ें, मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए इस पत्र का हिंदी अनुवाद]
प्रिय महोदय,
वनक्कम [अभिवादन],
यह पत्र मैं आपका ध्यान जनगणना 2027 हेतु हाल में अधिसूचित जनसंख्या गणना अनुसूची और अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) की गणना से जुड़े एक गंभीर कार्यप्रणाली संबंधी सरोकार की ओर आकर्षित करने के लिए लिख रहा हूं।
पिछले कई वर्षों से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं माननीय विपक्ष के नेता थिरू [सम्मानसूचक] राहुल गांधी लगातार सामाजिक न्याय एवं साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण के लिए विस्तृत जातिगत जनगणना किए जाने की मांग करते आ रहे हैं। इस मांग का केंद्र सरकार ने लंबे समय तक विरोध करने के बाद अंततः 2025 में उसे स्वीकार कर लिया। अब चूंकि यह महत्वपूर्ण कदम उठा लिया गया है इसलिए यह आवश्यक है कि जातिगत जनगणना के लिए जो पद्धति और कार्यप्रणाली अपनाई जाए, वह उसके उद्देश्यों के लिए हानिकारक न हो।
जिस तरह एससी व एसटी के कल्याणार्थ लक्षित नीतियां बनाने के लिए उनके बारे में विश्वसनीय आंकड़े आवश्यक हैं, उसी तरह पिछड़े वर्गों के सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक विकास के लिए नीतियों व कार्यक्रमों के निर्माण में ओबीसी की आबादी की जानकारी महत्वपूर्ण है।
1. ओबीसी की स्पष्ट पहचान आवश्यक
जनसंख्या गणना अनुसूची का प्रश्न 10 इस प्रकार है :
“अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी)/जाति”
जहां एससी व एसटी को विशिष्ट श्रेणियों के रूप में चिह्नित किया गया है, वहीं कोई अलग ओबीसी/एसईबीसी श्रेणी नहीं निर्धारित की गई है। जो उत्तरदाता एससी अथवा एसटी नहीं है, उनकी जाति का केवल नाम दर्ज किया जाएगा।
यह गंभीर चिंता का विषय है।
जातिगत पहचान व ओबीसी के रूप में श्रेणीकरण एक ही बात नहीं है। कोई नागरिक भले ही अपनी जाति सटीक रूप से बता दे मगर उसकी जाति, संबंधित ओबीसी/एसईबीसी श्रेणी में है या नहीं यह गणना के बाद होने वाले श्रेणीकरण में तय किया जाएगा।
संविधान के अनुच्छेद 342ए, जिसे 105वें संविधान संशोधन के जरिए संशोधित किया गया है, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की केंद्रीय व राज्य/केंद्र शासित प्रदेश दोनों सूचियों को मान्यता देता है। अलग-अलग राज्यों व केंद्र व किसी राज्य में विभिन्न जातियां अलग-अलग सूचियों में दर्ज हो सकती हैं। जनगणना के लिए अपनाई जाने वाली कार्यपद्धति में इस तथ्य का ख्याल रखा जाना चाहिए।

2. सिर्फ जाति का नाम अंकित करने से सामाजिक-आर्थिक और जाति गणना 2011 (एसईसीसी 2011) के दोहराव की आशंका
एसईसीसी 2011 का अनुभव हमें समुचित रूप से मानकीकृत कोडिंग फ्रेम वर्क के बिना केवल जातियों के नाम इकट्ठा करने के खतरों के प्रति आगाह करता है।
जातियों के नामों में वर्तनी के अंतरों, स्थानीय नामकरणों व पर्यायवाचियों के उपयोग, उपजातियों के नाम दर्ज करवाने और उच्चारण में अंतर से बहुत भारी संख्या में अलग-अलग जातियों के नाम इकट्ठा कर लिए गए थे, जिससे उनके सत्यापन, एकत्रीकरण एवं श्रेणीकरण करने में गंभीर समस्याएं सामने आईं।
हमें जनगणना 2027 में इस अनुभव को नहीं दोहराना चाहिए।
अगर यह सुनिश्चित किया जाना है कि ओबीसी से संबंधित आंकड़े वैज्ञानिक और विश्वसनीय हों तो हम गणना के बाद लाखों जातियों में से ओबीसी/एसईबीसी का श्रेणीकरण करने का खतरा नहीं उठा सकते।
जनगणना के दौरान ही ओबीसी/एसईबीसी दर्जे को सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। इस काम को जनगणना के बाद अफसरशाही पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
3. तेलंगाना का व्यावहारिक मॉडल
तेलंगाना सामाजिक-आर्थिक, शैक्षणिक, रोजगार, राजनीतिक व जाति (एसईईईपीसी) सर्वेक्षण 2024-25 के अनुभव से यह स्पष्ट है कि संरचित जाति प्रश्नावली और पिछड़े वर्गों का सुव्यवस्थित श्रेणीकरण कितना महत्वपूर्ण है।
इस सर्वेक्षण हेतु अपनाई गई कार्यपद्धति – जिसमें संरचित घरेलू डेटा संग्रह व तत्पश्चात उसके आधार पर जातियों व पिछड़े वर्गों के श्रेणीकरण हेतु विश्लेषण – एक मजबूत राष्ट्रीय प्रणाली लागू करने के लिए उपयोगी मैदानी अनुभव प्रदान करता है।
भारत सरकार को राज्यों द्वारा अपनाई गई इस तरह की कार्यपद्धतियों से सीख लेनी चाहिए और एसईसीसी-2011 की कमियों को दोहराने से बचना चाहिए।
4. तुरंत सुधारात्मक कदम उठाए जाने की जरूरत
अतः मैं भारत सरकार से अनुरोध करता हूं कि जनगणना की कार्यपद्धति में तत्काल निम्न संशोधन किए जाएं :
- जनगणना प्रश्नावली में एससी व एसटी के अतिरिक्त एक सुस्पष्ट ओबीसी/एसईबीसी श्रेणी को शामिल किया जाए।
- ओबीसी/एसईबीसी के रूप में जातियों का श्रेणीकरण अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है अतः एक राज्यवार एकीकृत जाति निर्देशिका तैयार की जाए।
- चिह्नित जातियों और समुदायों के लिए अलग-अलग डिजिटल कोड निर्धारित किए जाएं ताकि वर्तनी, शब्दावली या उच्चारण में अंतरों के कारण होने वाली गड़बड़ियों से बचा जा सके।
- जो जातियां सूचीबद्ध नहीं हैं या जिनके श्रेणीकरण के संबंध में कोई विवाद है या जिनकी केवल स्थानीय पहचान है, ऐसी जातियों के नामों को अलग से सूचीबद्ध किया जाए ताकि बाद में उनका सत्यापन हो सके।
- उत्तरदाता द्वारा घोषित जाति और उसके अनुरूप उसकी जाति का प्रशासनिक श्रेणीकरण – इन दोनों से संबंधित रिकॉर्ड को सुरक्षित रखा जाए ताकि एक पारदर्शी और जांचने योग्य डेटा तैयार हो सके।
- जातिगत जनगणना को जातियों के नाम की गणना में न बदला जाए।
विपक्ष के माननीय नेता थिरू राहुल गांधी जातिगत जनगणना के लिए निरंतर संघर्षरत रहे हैं क्योंकि आंकड़े और तथ्य ही सामाजिक न्याय की नींव हैं। जाति जनगणना का उद्देश्य केवल जातियों के नामों का संकलन करना नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य भारत के समुदायों की जनसांख्यिकीय संरचना का सटीकता से पता लगाना और प्रतिनिधित्व, आरक्षण, जनकल्याण योजनाओं व सामाजिक-आर्थिक नीतियों के निर्धारण हेतु एक विश्वसनीय साक्ष्य-आधारित बुनियाद निर्मित करना है।
इस बात का गंभीर खतरा है कि जातिगत जनगणना केवल जातियों के नामों को संकलित करने की कवायद बन जाएगी और उससे ओबीसी से संबंधित आंकड़े व तथ्य उपलब्ध नहीं हो सकेंगे, जो इस जनगणना का मूल उद्देश्य है। वर्तमान में जो कार्यपद्धति अपनाई जा रही है उसकी कमियों को केवल तकनीकी कमियां कहकर टाला नहीं जा सकता। यह कार्यपद्धति राजनीतिक पसंद को प्रतिबिंबित करती है।
अगर सरकार जानते-बूझते ओबीसी/एसईबीसी के रूप में जातियों के चिह्नीकरण को गणना के बाद की जाने वाली कवायद पर छोड़ देती है तो उससे ऐसी स्थिति बन सकती है जिसमें यह दावा करने के बाद कि उसने जाति जनगणना करवाई है, सरकार यह कह सकती है कि एकत्रित आंकड़े अत्यंत जटिल और अपूर्ण हैं और उनका कोई भी सार्थक उपयोग संभव नहीं है।
इससे वह उद्देश्य ही पूरा नहीं हो सकेगा जिसके कारण कई दशकों से जातिगत जनगणना की मांग की जाती रही है।
अतः मैं आपसे इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने का अनुरोध करता हूं। मेरा अनुरोध है कि आप गृह मंत्रालय व भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त को यह निर्देश दें कि प्रश्न संख्या 10 में परिवर्तन कर उसमें एक सुस्पष्ट एवं अलग ओबीसी/एसईबीसी श्रेणी का समावेश किया जाए। इसके साथ ही मानकीकृत व डिजिटल कोडिंग पर आधारित राज्यवार जातिगत जनगणना फ्रेमवर्क निर्मित किया जाए। यह काम जनसंख्या गणना शुरू होने के पहले किया जाना चाहिए।
यह इसलिए आवश्यक है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जनगणना 2027 से ओबीसी जनसंख्या के बारे में विश्वसनीय, पारदर्शी व उपयोग करने योग्य आंकड़े व तथ्य उपलब्ध हो सकें और जिनका उपयोग पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व, आरक्षण, सामाजिक न्याय व सामाजिक-आर्थिक व शैक्षणिक विकास के लिए नीति निर्माण के आधार के रूप में उपयोग किया जा सके।
यह देश दशकों से व्यापक एवं सटीक जाति जनगणना का इंतजार कर रहा है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इसके लिए अपनाई जाने वाली कार्यपद्धति कहीं उन्हीं आंकड़ों और तथ्यों को अविश्वसनीय न बना दे, जिन्हें हासिल करने के लिए यह ऐतिहासिक कवायद की जा रही है।
मेरा अनुरोध है कि आप इस मामले में व्यक्तिगत रूप से तुरंत हस्तक्षेप करें।
सादर
एस. ज्योतिमणि
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया)
