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पिछड़े वर्ग की चेतना की कीमत पर जातिगत जनगणना करा रही सरकार

गत 14 अगस्त, 2026 को जारी अधिसूचना में जातियों के नाम पूछे जा सकते हैं, लेकिन वह जाति समूह के किस वर्ग में आते हैं। इसका उल्लेख यहां नहीं किया जा सकता है। जैसे इस अधिसूचना में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति का उल्लेख मिलता है, उसी तरह क्या पिछड़े वर्ग का उल्लेख नहीं किया जा सकता है? पढ़ें, अनिल चमड़िया का यह आलेख 

सौ में नब्बे होने और उसके अनुपात में दावेदारी का नारा क्यों आया? बहुजन का नारा क्यों आया? पिछड़े वर्ग का नारा क्यों आया? दलित राजनीति के केंद्र में कैसे आए? ये नारे संख्या के परिणाम के रूप में नहीं आए। ये वैचारिक चेतना के बनने और उसकी एकजुटता से निकले। इन नारों में जाति को खत्म करने की वैचारिकी गूंथी हुई है।

दूसरी तरफ केंद्र सरकार द्वारा जातिगत जनगणना को किस तरह से अंजाम देने की योजना है, इसे भारत के महारजिस्ट्रार के कार्यालय से जारी अधिसूचना के जरिए पहले देखें। फिर इसे समझने की कोशिश करेंगे।

ओबीसी के साथ किया गया छल

सनद रहे कि 31 अगस्त, 2010 को जारी अधिसूचना में कहा गया कि जनगणना में लगे कर्मचारी परिवार अनुसूची के माध्यम से जानकारी एकत्रित करने के लिए इस तरह से नागरिकों से पूछ सकते हैं। इसमें आठवें नंबर पर नागरिकों के बीच यह जानकारी लेने के लिए कहा गया कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के हैं तो अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का नाम क्या है।

2011 में जातिगत जनगणना कराने की बात हुई थी। लेकिन यह केवल सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण बनकर रह गया और इसके आंकड़ों को त्रुटिपूर्ण बताकर जारी नहीं किया गया। इसके बाद 2021 में जनगणना नहीं की गई। इसी बीच एक राजनीतिक बदलाव यह आया कि ऊंची जातियों के बढ़ते वर्चस्व के चलते सामाजिक दबाव के कारण जाति के आधार पर जनगणना कराए जाने की मांग केंद्र से सभी विपक्षी पार्टियों ने की।

असल में संविधान की व्यवस्था लागू होने के बाद भी सामाजिक स्तर पर उन्हीं जातियों का वर्चस्व रहा है। संवैधानिक संस्थाओं व संविधान के समानता लाने के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए बनाई गई संस्थाओं में जातिवादी वर्चस्व बरकरार है। शिक्षा, न्याय, स्वास्थ्य, समाज सुधार यानी सभी तरह की संस्थाएं व विभाग इनमें शामिल हैं। आर्थिक क्रियाकलापों में जातिवादी वर्चस्व की स्थिति बनी हुई है। सरकारें बनती हैं समानता की स्थिति बहाल करने और जातीय स्तर पर भेदभाव को समाप्त करने के लिए, लेकिन सरकारें सामाजिक नियमों के तहत ही चलती रही हैं। लिहाजा पूरे देश में जातिगत जनगणना को लेकर लंबे समय से चल रहे अभियान ने एक राजनीतिक नारे का आकार लिया और केंद्र सत्तासीन में भाजपा व नरेंद्र मोदी की सरकार को जातिगत जनगणना का फैसला लेने के लिए बाध्य होना पड़ा।

इस तरह जातिगणना की मांग ने नारे के रूप में तो एक राजनीतिक सहमति जरूर हासिल कर ली, लेकिन जातिगत जनगणना राजनीतिक तौर पर बनी सामाजिक चेतना को किस दिशा में ले जा रही है, यह प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है।

नई दिल्ली स्थित जनगणना भवन का मुख्य द्वार

केंद्र सरकार किस रूप में जातिगत जनगणना को अंजाम देना चाहती है। इसके लिए गत 14 अगस्त, 2026 को भारत के महारजिस्ट्रार के कार्यालय द्वारा जारी अधिसूचना को देखा व समझा जा सकता है। इस अधिसूचना में जनगणना कर्मियों से नागरिकों की जाति के बारे में जानकारी लेने के लिए कहा गया है। लेकिन इसमें पेंच है।

इसमें 10वें प्रश्न में लिखा गया है– ‘अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/जाति’। यानी इस कॉलम में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पिछली जनगणना के कॉलम के मुताबिक अलग से जाति का उल्लेख नहीं किया गया है। यह जाति का उल्लेख अन्य सभी के लिए किया गया है।

पहला प्रश्न तो यह है कि केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व पिछड़े वर्गों की जातियों की सूची बना रखी है। राज्यों में भी इसी तरह से सूची बनी हुई है। लेकिन इन सूचियों से भी यह दावा नहीं किया जा सकता है कि समस्त जातियों की सूची उनमें शामिल है। दूसरी बात यह भी कि कई जातियां एक समान मानकर भी उन सूचियों में रखी गई है। यानी कई जाति समूहों के रूप में जातियों के होने के दावों को स्वीकार किया गया है। देश में यदि सतही तौर पर जातियों की संख्या 6 हजार से ज्यादा है तो जातियों में उपजातियों की संख्या अनुमानित ही है। किसी एक जाति का ऊपरी ढांचा तीन सतहों पर निर्मित होता है। एक ऊपरी सतह जो दिखती है। दूसरी सतह उपजाति की होती है और तीसरी सतह उपजाति में पारिवारिक समूह की होती है, जिसे गोत्र के रूप में जाना जाता है।

एससी, एसटी के साथ ओबीसी का उल्लेख क्यों नहीं?

दो तरह से इस पूरे प्रसंग को समझा जा सकता है। गत 14 अगस्त, 2026 को जारी अधिसूचना में जातियों के नाम पूछे जा सकते हैं, लेकिन वह जाति समूह के किस वर्ग में आते हैं। इसका उल्लेख यहां नहीं किया जा सकता है। जैसे इस अधिसूचना में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति का उल्लेख मिलता है, उसी तरह क्या पिछड़े वर्ग का उल्लेख नहीं किया जा सकता है? जैसे 2010 की अधिसूचना में वर्ग के साथ जाति के उल्लेख की व्यवस्था की गई है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के साथ पिछड़े वर्ग का भी उल्लेख कर दिया जाता, तो क्या परेशानी हो जाती? पिछड़ा वर्ग संविधान स्वीकृत जाति समूह है। सरकारों ने इसी नाम से सूचियां बना रखी हैं।

पहली बात तो यह समझने की जरूरत हैं कि आखिर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के साथ पिछड़ा वर्ग का उल्लेख नहीं करने के पीछे क्या राजनीतिक उद्देश्य है। दूसरा यह कि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के अलावा यदि नागरिकों से जातियों के नाम पूछे जाते हैं तो वह जाति के रूप में किस तरह से बिखरी नजर आ सकती है और यदि वहीं नागरिक के वर्ग के रूप में जाति का उल्लेख किया जाता है तो वह किस तरह की सामूहिक चेतना में स्वयं के गुंथे होने की एक ताकत महसूस कर सकते हैं।

इन सवालों के राजनीतिक महत्व को समझने के लिए यह जरूरी है कि जातिगत जनगणना की मांग की पृष्ठभूमि पर एक नजर डाली जा सकती है।

जातिगत जनगणना की मांग की पृष्ठभूमि

देश में जातिगणना की मांग कहां से उठी? अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों की गणना तो पहले से होती रही है। केवल पिछड़े वर्ग के लोगों की गणना एक वर्ग के रूप में नहीं होती थी। काका कालेलकर आयोग में पिछड़े वर्ग की सूची देखने को मिलती है। इस उदाहरण से यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि 1931 में जब आखिरी बार अंग्रेजों ने जातिगत जनगणना कराई थी तो उसी गणना के आधार पर भारत की सरकार को पिछड़े वर्गों की पहचान और उन्हें एक सूची के रूप में बांधने की जरूरत महसूस की गई। यही तरीका अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए भी स्वीकार किया गया।

भारतीय समाज वर्णवादी जाति-व्यवस्था पर आधारित रहा है। शूद्र शब्द का इस्तेमाल एक जाति समूह के लिए होता था। यानी जातियों में बंटे इस समाज में भी एक व्यवस्था कृषक, शिल्पकार जातियों व सेवा देने के लिए थी। शासन की व्यवस्था में उनकी एक ही पहचान थी– शूद्र। यही बात अछूतों के साथ भी लागू होती है।

शासन, सत्ता व वर्चस्व की राजनीतिक विचारधारा के समानांतर समाज में एक तरह के आधार पर गैर-बराबरी के शिकार लोगों की एकजुटता की जरूरत ने सामाजिक न्याय की विचारधारा पर जोर दिया। इनमें शूद्र और अछूत के अलावा वे जातियां व समूह भी थे, जिन्हें जंगलों में सीमित किया गया। सामाजिक न्याय की विचारधारा के आधार में गैर-बराबरी, अन्याय, शोषण की व्यवस्था को समाप्त करने और बराबरी के सामाजिक ढांचे का निर्माण रहा है। यही सौ में नब्बे के नारे को आकार देता है या फिर इस नारे में शामिल होने वाले समूहों की पहचान के तौर पर बहुजन व पिछड़ा वर्ग की चेतना का निर्माण करता है।

प्रसंगवश यह उल्लेख कर सकते हैं कि कैसे ‘दलित’ के संबोधन पर वर्चस्ववादी विचारधारा के सदस्य एतराज जाहिर करते रहते हैं।

इस स्थिति की कल्पना करें कि हजारों की संख्या में जातियां है और उनमें कई ऐसी हैं जो गिनती के हिसाब से बेहद थोड़ी-सी संख्या में हैं। उस जाति में सामूहिक चेतना की पहचान किस रूप में दिख सकती है। अकेले वह जाति के रूप में किस तरह दिख सकती है। लेकिन उसे एक वर्ग के रूप में खुद की पहचान बताने का अवसर मिलता है तो वह किस तरह की ऊर्जा व चेतना के साथ दिख सकती है।

सामाजिक न्याय के बरअक्स सोशल इंजीनियरिंग

इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि देश में जातिगत जनगणना को बंद करने के पीछे क्या उद्देश्य रहे हैं। असल में वर्चस्ववाद के भीतर एक सामूहिक समझौता दिखता है। जातिगत जनगणना को नहीं कराने का फैसला स्वतंत्रता के बाद जब किया गया तो उस समय की क्या दलीलें थीं। एक तो यही कि जाति आधारित भेदभाव को खत्म करना। लेकिन यह उद्देश्य तो उल्टे नतीजों के रूप में सामने आया। जाति के आधार पर न केवल यह ढांचा मजबूत हुआ बल्कि उसने जातियों के बीच विभाजन की व्यवस्था में नई तरह की इंजीनियरिंग विकसित की। इस इंजीनियरिंग से जो जातियां जाति के विनाश के लिए और वर्चस्व की विचारधारा के खिलाफ एक चुनौती के रूप में खुद को संगठित किया और एक बराबरी की चेतना का निर्माण किया, उन जातिय़ों में जातिवाद को बढ़ाने की हर संभव कोशिश की गई। सोशल इंजीनियरिंग का मुख्य सूत्र जातिवाद को बढ़ावा देना है।

जब यह सुनिश्चित हो गया कि बहुजनों, पिछड़े वर्गों की चेतना के मद्देनजर संसदीय व्यवस्था में जो भी सरकार बने रहना चाहती है, उसे जातिगत जनगणना को अंजाम देना ही होगा, तब वर्चस्व की विचारधारा के सामने यह चुनौती खड़ी होती है कि वर्चस्ववाद की सोशल इंजीनियरिंग के जो प्रयास चल रहे हैं, उन्हें वैचारिक स्तर पर कैसे अंजाम दिया जा सकता है? बांटो और राज करो की नीति की क्या व्याख्या होती है? यह केवल अंग्रेजों पर लागू नहीं होती है बल्कि हर अल्पमत वाले शासकों की नीति रही है।

सामाजिक न्याय के आंदोलन की विरासत को महसूस करने के लिए इस तथ्य को देखें और समझें कि इंदिरा गांधी ने 21 मई, 1971 को राज्यों के पिछड़े वर्ग और सामाजिक कल्याण मंत्रियों के सम्मेलन में कहा कि अधिकाधिक लोग पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल होना चाहते हैं। क्यों, तब तो आरक्षण नहीं था? जो लोग पिछड़े वर्ग की सूची में शामिल होना चाहते थे, उन्हें नए समाज में बराबरी की हैसिय़त चाहिए थी। यानी सामूहिक चेतना का हिस्सा वह हर जाति बनना चाहती थी जो कि शूद्र रूपी ढांचे में दबी हुई थी।

केंद्र में सरकार चलाने वाली संसदीय पार्टियां वर्चस्व की सामाजिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती हैं, यह बात बहुत स्पष्ट और खुली है। लेकिन इस विचारधारा ने जातियों के रूप में विभाजन की स्थिति की इंजीनियरिंग विकसित की है। मौजूदा जातिगत जनगणना जाति को समाप्त करने की सामाजिक न्याय की चेतना को पीछे धकेलने के वर्चस्ववादी ताकतों के इरादे को स्पष्ट कर रहा है। सामाजिक न्याय की राजनीति ने एक संगठित और सामूहिक चेतना विकसित की है। इसके विपरीत केंद्र सरकार जाति की पहचान को ही मुख्य तौर पर स्थापित करना चाहती है।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

अनिल चमड़िया

वरिष्‍ठ हिंदी पत्रकार अनिल चमडिया मीडिया के क्षेत्र में शोधरत हैं। संप्रति वे 'मास मीडिया' और 'जन मीडिया' नामक अंग्रेजी और हिंदी पत्रिकाओं के संपादक हैं

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