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फैसले के बाद डांगावास और पीड़ित दलित

मृतक पांचाराम की पत्नी सोनकी देवी जिस गांव में बिना मुंह ढंके और बिना सिर झुकाए कभी नहीं चलीं, उसी गांव की तथाकथित ताकतवर और प्रभावशाली जाति ने उन्हें वैधव्य, गंभीर शारीरिक चोटें और कभी न उबर सकने वाला सदमा – सबकुछ दिया। उन्हें धुंधला दिखने लगा है। चश्मा लगाती हैं। इन सबके बावजूद न्याय की आस उनकी आंखों में जीवित है। पढ़ें, यह रपट

राजस्थान के मेड़ता सिटी से लगभग तीन किलोमीटर दूर डांगावास गांव जाते समय मेड़ता के जिला एवं सेशन न्यायालय की इमारत आपकी नजरों से नहीं बच सकती। इसी परिसर में एससी-एसटी विशेष न्यायालय ने गत 5 अगस्त, 2026 को 11 साल पुराने चर्चित डांगावास दलित नरसंहार पर अपना निर्णय सुनाया। न्यायालय ने नरसंहार के सभी 40 आरोपियों को ‘संदेह का लाभ’ देते हुए बरी कर दिया। यह निर्णय चौंकाने से ज्यादा निराश करता है। इसका कारण इस क्षेत्र की जातिवादी सामाजिक सरंचनाओं, तथाकथित प्रगतिशील जाति-विशेष की हिंसक मनोवृत्ति, व्यवस्था-प्रशासन में बैठे लोगों की स्व-जाति के प्रति विशेष झुकाव और राजनीतिक गठजोड़ में छिपा है, जो एक जमीन के विवाद को जातीय श्रेष्ठता के लिए बर्बर नरसंहार में बदल देते है।

नरसंहार, जिसे जातीय उन्माद के कारण अंजाम दिया गया

दरअसल, डांगावास वर्ष 2015 में तब चर्चा में आया, जब एक जाति-विशेष की हमलावर भीड़ ने एक ही दलित परिवार के पांच लोगों की हत्या कर दी और दस लोगों को गंभीर रूप से घायल कर दिया। इस हिंसा की जड़ में एक जमीनी-विवाद रहा। दस्तावेजों के अनुसार तकरीबन पचास साल पहले 1964 में गांव के दलित बस्ताराम मेघवाल ने 1,500 रुपए के ऋण पर अपनी 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन चिमनाराम जाट को गिरवी रख दी। कालांतर में चिमनाराम जाट ने इस जमीन पर अपना कब्जा कर लिया। राजस्थान सरकार के काश्तकारी अधिनियम,1955 के अनुसार किसी दलित-मालिकाना जमीन का किसी अन्य वर्ग के व्यक्ति के साथ खरीद-बिक्री कानूनी जुर्म है। इस कानून का उद्देश्य स्थानीय ताकतवर जातियों से दलितों के जमीन-स्वामित्व को बचाना ही था। बस्ताराम ने ऋण चुका भी दिया, पर चिमनाराम जाट ने जमीन पर अपना अवैध कब्जा जारी रखा। कानून की दृष्टि में अपराध होने के बाद भी इस ‘जाटलैंड’ नाम से अभिहित किए जाने वाले क्षेत्र में इस तरह का कब्जा नई बात नहीं है। इस अन्यायपूर्ण वातावरण और बस्ताराम के पुत्रहीन होने की स्थिति ने चिमनाराम जाट को जमीन के अवैध कब्जे के प्रति बिलकुल निश्चिंत बना दिया होगा। लेकिन, बस्ताराम के दत्तक पुत्र रतनाराम मेघवाल ने अपनी गिरवी रखी जमीन पर अधिकार लेने की कोशिश की। राजस्व-रिकॉर्ड में तो जमीन उनके नाम पर थी ही, कानूनी कार्यवाही में उपखंड-अधिकारी ने भी जाट-परिवार को जमीन का भौतिक कब्जा रतनारम मेघवाल को सौंपने का निर्देश दिया।

इसी आदेश के बाद रतनाराम ने अप्रैल, 2015 में खेत में एक पट्टी का एक मकान बना लिया। चिमनाराम के बेटे ओमाराम और कानाराम को यह बात नागवार गुजरी। अदालत में मुकदमा हारने के बाद उन्होंने अपने जाट बहुल गांव की अनौपचारिक, सामाजिक रूप से संकीर्ण, रूढ़िवादी और अधिकतर एक-पक्षीय पंचायत (ध्यान रहे कि ग्राम पंचायत या ग्राम सभा नही) का रुख किया। इस बीच रतनाराम के परिवार को लगातार धमकियां मिलती रहीं, जिसकी शिकायत रतनाराम ने स्थानीय पुलिस थाने में भी की। पुलिस ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। 11 मई, 2015 को गांव की एक-पक्षीय पंचायत बुलाई गई। पंचायत से कुछ लोग रतनाराम को बुलाने आए। रतनाराम घर पर नहीं थे, तो उनके भाई खेमाराम और बेटे मुन्नाराम साथ चलने को तैयार हुए। उन दोनों को यह कहकर बीच-रास्ते से वापिस भेज दिया गया कि तुम लोगों से क्या बात करनी, बात तो रतनाराम की है। इस तरह का व्यवहार गांव की जाति-विशेष के मन में रतनाराम के लिए पले-पोसे गुस्से को दिखाने के लिए काफी है। उसी दिन इस भीड़ ने मिलकर कलेक्टर को ज्ञापन सौपा, जिस पर कलेक्टर ने लोगों को धैर्य रखने और विधिक-कार्यवाही का सुझाव दिया। अपनी रिश्तेदारी में गए हुए रतनाराम ने पुलिस प्रशासन से फिर सुरक्षा की गुहार लगाई, लेकिन पुलिस मौन बनी रही। कलेक्टर के प्रतिकूल उत्तर और रतनाराम के कानूनी रूप मजबूत होने से यह जमीन-विवाद गांव की जाति-विशेष की पंचायत के लिए अपनी श्रेष्ठता, प्रभुसत्ता, मान्यता और दलितों को सबक सिखाने का प्रश्न बन गया। इसलिए आनन-फानन में 14 मई, 2015 को फिर से एक भीड़ जुटी। इस भीड़ ने अलसुबह खेत में मौजूद रतनाराम के परिवार के 16 सदस्यों पर प्राणघातक हमला किया। महिलाओं की लज्जा भंग का घिनौना प्रयास किया। यह हमला इतना भयानक था कि पांच लोगों की मृत्यु हो गई। बचे ग्यारह लोग, जिनमें छह महिलाएं भी शामिल थीं, गंभीर रूप से घायल हुए और अगले कई वर्षों तक बिस्तर पर रहे। रामपाल नाम के एक अन्य ग्रामीण की मौत भी हुई, जिसके आरोप में दलित परिवार के 16 सदस्यों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। सनद रहे कि इनमें उनका नाम भी शामिल किया गया जो 14 मई की हिंसा में मारे गए।

यह भी पढ़ें – राजस्थान : डांगावास दलित संहार मामले में ‘न्याय’ की हत्या

इस दलित नरसंहार को महज दो परिवारों का आपसी विवाद बना देने की भरपूर कोशिशें हुईं। लेकिन दलित समाज के आक्रोश, प्रदर्शनों, सामाजिक न्याय से संबंधित संगठनों और सिविल-नागरिकों की लंबी मांग के बाद यह मामला सीबीआई को सौंपा गया। कुल 40 लोग नामजद हुए। इनमें से कुछ फरार रहे और अब 11 साल बाद विशेष आदालत ने सभी अभियुक्तों को मुक्त कर दिया है।

वर्तमान में डांगावास गांव और पीड़ित दलित

डांगावास के मेघवाल मोहल्ले में रहने वाले इस परिवार के लिए यह निर्णय सहज नहीं हैं। करीब 11 पहले परिवार के पांच परिजनों की निर्मम हत्या, आर्थिक-सामाजिक संकटों के बीच इतनी लंबी कानूनी लड़ाई और ऊपर से इस प्रतिकूल निर्णय ने परिवार को किस स्तर पर विचलित किया है, यह सिर्फ उनसे ही जाना जा सकता है। जब मैं और मेरे साथी मेड़ता सिटी से डांगावास पहुंचकर रामदेव मंदिर की गली में गोविंद मेघवाल (रतनाराम मेघवाल के निकटतम परिजन) का घर पूछ रहे थे, तभी एक बाइक पर सवार दुबले-पतले व्यक्ति ने हमारी ओर मुड़कर देखा। रामदेव मंदिर के पास जाकर वे वापिस मिले और परिचय में पता चला कि उनका नाम अर्जुनराम है। वे मृतक रतनाराम मेघवाल के पुत्र हैं। मजदूरी का काम करते हैं। अभी मजदूरी से ही लौट रहे थे। यही हाल बाकी सबका है।

रतनाराम के दूसरे बेटे किशनाराम ने हमें बताया, “और क्या करें? मेहनत-मजदूरी से अपना और बच्चों का पेट तो पालना ही पड़ता है। न तो हमारे परिवार में किसी के पास सरकारी नौकरी है और न ही बड़ी पैतृक संपत्ति। मजदूरी ही करते हैं।” मेहनत-मजदूरी करते हुए अपने परिजनों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ते परिवार को इस निर्णय से धक्का लगा है, लेकिन न्यायपालिका और संविधान पर विश्वास अब भी कायम है। गोविंद मेघवाल की आंखें थकी हुई लगती हैं। वे 5 अगस्त को अदालती निर्णय के बाद सो नहीं पाए हैं। वकीलों और मीडिया के अधिकतर संपर्क में गोविंद ही रहे हैं। गोविंद उच्च-शिक्षित हैं। वे कहते हैं, “रामपाल [वह व्यक्ति, जिसकी हत्या इस प्रकरण में जोड़ी जाती रही है] की हत्या का आरोप मुझ पर लगाया गया। जबकि मैं तो उस दिन घर पर ही था। मैंने उन दिनों नर्सिंग की डिग्री की थी और 5 जून, 2015 को पटना में नर्सिंग स्टाफ के एग्जाम के लिए जाना था।” गोविंद न तो नर्सिंग का वह एग्जाम लिख पाए और न ही पढाई चालू रखते हुए किसी अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर पाए। अपनी युवावस्था के सबसे महत्वपूर्ण कालखंड को परिजनों की हत्या के लिए न्याय के लड़ाई में होम कर देने वाले गोविंद परिवार के साथ हाईकोर्ट में एससी-एसटी विशेष न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील करने का मन बना चुके हैं। उन्होंने कहा, “हम सब न्यायपालिका का सम्मान करते हैं, लेकिन यह निर्णय संतुष्टिजनक नहीं है। हम न्याय के लिए उच्च न्यायलय के दरवाजे पर दस्तक देंगे। हमें विश्वास है कि उच्च न्यायालय तत्परता से इस वाद को देखेगी और आरोपियों को सजा सुनिश्चित करेगी।”

इसी परिवार के युवा सदस्य नरेंद्र भी कहते हैं कि “जबसे यह फैसला आया है, हम ढंग से सो नहीं पाए हैं। हम न्यायपालिका पर भरोसा करते हैं, लेकिन यह निर्णय हमारी समझ से परे है।” इस निर्णय का समझ से परे होना सिर्फ भावुक प्रतिक्रिया भर नहीं है, बल्कि कई ठोस आधार लिए हुए है। विशेष न्यायालय के न्यायाधीश आशीष बिजारनिया ने सभी अभियुक्तों को ‘संदेह का लाभ’ देते हुए मुक्त किया है। 245 पन्नों का यह निर्णय स्वीकारता है कि यह हिंसक घटना घटी है, लेकिन अभियुक्तों की स्पष्ट भागीदारी के पुख्ता सबूतों के आभाव को महसूस करता है। इस संबध में महत्वपूर्ण तर्क यह है कि परिवादी स्पष्ट रूप से नहीं बता पाए कि किस-किस अभियुक्त ने किस-किस मृतक या पीड़ित पर हमला किया। आदेश में अलग-अलग चश्मदीदों के बयानों में आए विरोधाभासों को रेखांकित किया गया है।

डांगावास गांव की बुजुर्ग सोनकी देवी, जिनके पति पांचाराम भी दलित नरसंहार में मारे गए थे

इस संबंध में यह देखा जाना आवश्यक है कि बेकाबू और जान से मारने पर उतारू भीड़ के हमले से किसी प्रकार अपनी जान बचाने वाले साक्ष्य-जनों से किस स्तर की स्पष्टता की अपेक्षा की जा सकती है? सात हजार से ज्यादा आबादी वाले गांव में अपने मोहल्ले की जद में रहने वाली इन छह महिलाओं और गांव से बाहर मजदूरी करने वाले गंभीर घायल-युवाओं को कितने नाम सही ढंग से पता और याद होंगे? ऐसे में जिस प्रकार रामपाल की हत्या में गोविंद मेघवाल का पोलिग्राफ टेस्ट करवाया गया, उस प्रकार क्यों नहीं अन्य चालीस आरोपियों का पोलिग्राफ टेस्ट हुआ? और यदि, उन 40 लोगों ने इस टेस्ट से मना कर दिया तो यह किस ओर इशारा करता है? आदेश बयानों को बदले जाने पर भी ध्यान देता हैं कि कई बार बयान बदले गए। इस संबंध में गवाहों से वजह क्यों नहीं मांगे गए और जांच करने वाली सस्थाओं से विस्तृत कारण क्यों नहीं पूछे गए? इन सब तर्कों के बीच गोविंद मेघवाल की एक बात मेरे कान में गूंजती है, “अगर उस दिन उन हत्यारों ने सभी सोलह लोगों को मार दिया होता तो कौन देता गवाही और कैसे होता फैसला?”

यह आक्रोश या निराशा में कही गई बात से ज्यादा उच्चतम न्यायालय की एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की ओर संकेत करती है। दिसंबर, 2018 में हमीदा बेगम बनाम उत्तराखंड राज्य के विवाद पर निर्णय देते समय उच्चतम न्यायालय ने कहा कि “किसी विरोधाभास का लाभ तब तक आरोपी को नहीं दिया जा सकता, जब तक विरोधाभास अभियोजन की संभावना ही ना ख़त्म कर दे।” अगर इस टिप्पणी को इस घटना के संदर्भ में देखा जाए तो अनुमान लगाया जा सकता है कि 11 साल से चल रहा यह वाद न्यायलय के कड़े-निर्देशों के साथ अंतिम पुष्ट निर्णय की ओर खींचा जा सकता था।

कोर्ट ने मृतक पांचाराम मेघवाल की मृत्यु का कारण मानाराम जाट के ट्रैक्टर से या मकान से दबकर होने के विरोधाभास को भी छुआ। इस बात का उत्तर देते हुए पांचाराम मेघवाल के भाई और उस हिंसा में गंभीर रूप से घायल हुए खेमाराम आज भी घटना को याद करके सिहर जाते हैं। वे कहते हैं कि “भीड़ का हमला अचानक था। हमें कुछ समझ ही नहीं आया। रतनाराम को भीड़ ने घेर लिया। मैं, किशनाराम और पोकरराम बचकर मकान पर चढ़ गए थे। मानाराम ने ट्रैक्टर से मकान को टक्कर मारकर गिरा दिया। इस बीच किशनाराम मकान से कूद कर बचने के लिए खेत से दूसरी तरफ भाग गया। पोकरराम मकान से गिरा और गिरते ही हमलावरों के हाथ चढ़ गया। उसके बाद जिस गंदे तरीके से मारा गया, सोचकर किसी की रूह कांप जाए। मैं जिस तरफ गिरा उस तरफ मेरे पैरों पर ट्रैक्टर चढ़ा दिया गया। इसी समय ट्रैक्टर के धक्कों से पट्टी का मकान गिर गया, जिसके नीचे दबकर पांचाराम की मौत हो गई।” कोर्ट ने एक और कड़ी जोड़ी कि किसी साक्षी ने कहा कि पांचाराम की मौत पत्थर लगने से हुई। अपने हाथों-पैरों में डली लोहे की रॉड को दिखाते हुए खेमाराम पूछते है, “अगर मौत पत्थर लगने से हुई या मकान गिरने से तो पत्थर चलाने वाले कौन थे? मकान गिराने वाले कौन थे? हम साफ़-साफ़ कोर्ट को बता चुके है।” खेमाराम मेघवाल राजमिस्त्री का काम करते थे। उस जातीय हमले ने उन्हें दो साल बिस्तर में रहने को मजबूर कर दिया और बची हुई जिंदगी किसी मेहनत वाले काम करने में अयोग्य बनाकर छोड़ दिया।

इसके अलावा, कोर्ट का आदेश बार-बार गवाहों के बयानों में ‘भीड़’ और अभियुक्तों के नाम के भेद ना पाए जाने वाले बिंदु को अहमियत देता है। जब आदेश के अंत तक आते-आते यह घटना सिद्ध, कर्ता असिद्ध’ तक आता है, तब कोर्ट भीड़ शब्द का जिक्र किए बिना ही सारे अभियुक्तों को अभियोग से आज़ाद कर देता है। मृतक पांचाराम की पत्नी सोनकी देवी, जो घटना स्थल पर गंभीर रूप से घायल हुई थीं, पीड़ादायक स्वर में पूछती हैं, “अगर इन्होंने नहीं मारा तो बताओ हमारे आदमियों को किसने मारा?” यह सवाल कोर्ट के संज्ञान में आया या नहीं आया, पता नहीं। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने 1989 में लालजी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले में सुनवाई करते हुए स्पष्ट तौर पर कहा है कि “यदि कोई व्यक्ति अवैध जमाव में एक समान उद्देश्य के साथ मौजूद है, भले उसने अपराध न किया हो पर कानूनी दायरे में आ सकता है।” यदि, परिवादी अभियुक्त चिह्नित नहीं कर पाए तो यह वाद इस तरफ मुड़ सकता था।

खैर, बुजुर्ग सोनकी देवी और अन्य पांच महिलाएं जिस पीड़ा से गुजरी हैं, वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झझकोर देने के लिए काफी है। महिलाओं की इज्जत लूटने की कोशिशें, “डेढ़नी, चमारिन…” जैसी भद्दी-भद्दी गालियां। जिस गांव में बिना मुंह ढंके और बिना सिर झुकाए कभी नहीं चलीं, उसी गांव की तथाकथित ताकतवर और प्रभावशाली जाति ने उन्हें वैधव्य, गंभीर शारीरिक चोटें और कभी न उबर सकने वाला सदमा – सबकुछ दिया। उन्हें धुंधला दिखने लगा है। चश्मा लगाती हैं। इन सबके बावजूद न्याय की आस उनकी आंखों में जीवित है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

प्रखर

लेखक राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता व स्वतंत्र पत्रकार हैं

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