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हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव : आदिवासी उम्मीदवार को दी जा रही है धमकी

विश्वविद्यालय किसी छात्र के लिए सिर्फ डिग्री लेने की जगह नहीं होते। खासकर उन छात्रों के लिए जो हाशिए के समाज से आते हैं। उनके लिए विश्वविद्यालय अपने सवालों और अपनी आवाज को सामने रखने की जगह भी होता है।

हैदराबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघ के चुनाव होने वाले हैं। आगामी 28 सितंबर को मतदान होगा और उसके अगले दिन 29 सितंबर को परिणाम घोषित किए जाएंगे। बीते 21 सितंबर को नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख थी। लेकिन नामांकन के आखिरी दिन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में जो हुआ, उसने कैंपस की राजनीति को एक बार फिर लोकतंत्र, जाति और राजनीतिक स्वतंत्रता के सवालों कोे सामने खड़ा कर दिया है।

अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एएसए) ने आरोप लगाया है कि उसके एक छात्र उम्मीदवार, जो कि अनुसूचित जनजाति समुदाय से आते हैं, पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की ओर से चुनाव लड़ने के लिए दबाव बनाया गया। जब छात्र ने ऐसा करने से इनकार किया और एएसए के साथ चुनाव लड़ने का फैसला किया, तो उसे डराने-धमकाने की कोशिश की गई।

इस मामले में सबसे गंभीर आरोप उस कथित धमकी का है, जो छात्र की लैब सुविधा से जुड़ी बताई जा रही है। एएसए का कहना है कि स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के एक पीएचडी शोधार्थी ने उस उम्मीदवार छात्र को कथित तौर पर कहा कि अगर वह एबीवीपी के खिलाफ चुनाव लड़ेगा, तो उसे प्रयोगशाला की सुविधा इस्तेमाल नहीं करने दी जाएगी।

यह आरोप अगर सही साबित होता है, तो मामला सिर्फ छात्र चुनाव का विवाद नहीं रह जाता। सवाल यह बन जाता है कि क्या किसी छात्र की राजनीतिक पसंद का असर उसकी पढ़ाई और शोध पर पड़ सकता है? विश्वविद्यालय में लैब, लाइब्रेरी या दूसरी अकादमिक सुविधाएं किसी संगठन के प्रति राजनीतिक निष्ठा के आधार पर तय नहीं हो सकतीं।

सवाल सिर्फ चुनाव का नहीं, अपनी राजनीति चुनने के अधिकार का भी है

विश्वविद्यालय किसी छात्र के लिए सिर्फ डिग्री लेने की जगह नहीं होते। खासकर उन छात्रों के लिए जो हाशिए के समाज से आते हैं। उनके लिए विश्वविद्यालय अपने सवालों और अपनी आवाज को सामने रखने की जगह भी होता है।

अनुसूचित जनजाति एक छात्र का आंबेडकरवादी संगठन के साथ खड़ा होना उसका राजनीतिक अधिकार है। वह किस संगठन के साथ जाएगा, किस विचारधारा को मानेगा और किसके खिलाफ चुनाव लड़ेगा। यह फैसला छात्र को खुद करने का अधिकार होना चाहिए। 

हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर में स्थापित है रोहित वेमुला की प्रतिमा

नामांकन के आखिरी दिन मामला और आगे बढ़ गया। एएसए के अनुसार, स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में स्कूल बोर्ड और काउंसलर पदों के लिए नामांकन दाखिल करने के दौरान उस उम्मीदवार के नामांकन पत्र को फाड़ने की धमकी दी गई और बाद में उसे फाड़ भी दिया गया। 

लेकिन इस पूरे मामले में एक साधारण-सा सवाल है, अगर किसी संगठन को अपने समर्थन और राजनीति पर भरोसा है, तो उसे किसी दूसरे उम्मीदवार को रोकने की जरूरत क्यों पड़ी? चुनाव का मतलब ही यही है कि अलग-अलग विचार और उम्मीदवार छात्रों के सामने जाएं और छात्र तय करें कि वे किसके साथ हैं।

अंबेडकरवादी राजनीति से असहजता का सवाल

हैदराबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में सामाजिक न्याय, जाति और प्रतिनिधित्व के सवाल लंबे समय से मौजूद रहे हैं। एएसए भी इसी राजनीतिक परंपरा का हिस्सा है। ऐसे में अनुसूचित जनजाति के छात्र का अंबेडकरवादी संगठन के साथ चुनाव लड़ना महज एक व्यक्तिगत फैसला नहीं है। यह उस बड़े सवाल से भी जुड़ता है कि विश्वविद्यालय में दलित, आदिवासी और दूसरे वंचित समुदायों से आने वाले छात्र अपनी राजनीतिक आवाज कितनी स्वतंत्रता से उठा सकते हैं।

एएसए ने जारी अपने बयान में एबीवीपी की राजनीति की आलोचना की है और उसे ब्राह्मणवादी राजनीति से जोड़ते हुए अपना विरोध दर्ज कराया है। संगठन का कहना है कि विचारधारा का विरोध विचारधारा और लोकतांत्रिक राजनीति के जरिए होना चाहिए, किसी छात्र को डराकर या दबाव में लाकर नहीं।

आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन द्वारा की गई शिकायत

लैब की कथित धमकी को सिर्फ एक चुनावी विवाद क्यों नहीं माना जा सकता?

इस घटना का सबसे चिंताजनक हिस्सा यही है कि आरोप सिर्फ चुनावी प्रक्रिया से जुड़े नहीं हैं। कथित धमकी एक छात्र की पढ़ाई और शोध से जुड़ी सुविधा को लेकर बताई गई है। दलित और आदिवासी छात्रों के लिए यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी विश्वविद्यालय में प्रवेश मिल जाना सामाजिक बराबरी की पूरी कहानी नहीं है। असली सवाल यह भी है कि कैंपस के भीतर उन्हें बराबर सम्मान मिलता है या नहीं, वे बिना डर के अपनी बात कह सकते हैं या नहीं और उन्हें पढ़ाई तथा शोध के संसाधनों तक समान पहुंच हासिल है या नहीं।

अगर किसी छात्र को यह डर हो कि उसकी राजनीतिक पसंद उसके शोध या अकादमिक भविष्य को प्रभावित कर सकती है, तो यह विश्वविद्यालय के बराबरी के दावे को कमजोर करता है। आंबेडकर के लिए शिक्षा केवल नौकरी पाने का रास्ता नहीं थी। शिक्षा सामाजिक मुक्ति, आत्मसम्मान और बराबरी की लड़ाई का भी माध्यम थी। इसलिए किसी छात्र की राजनीतिक स्वतंत्रता को उसकी शिक्षा या शोध सुविधाओं से जोड़ने का आरोप अपने आप में गंभीर है।

एएसए ने विश्वविद्यालय प्रशासन से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन चाहता है कि संबंधित छात्र की लैब और दूसरी अकादमिक सुविधाएं सुरक्षित रहें, उसके चुनाव लड़ने के अधिकार की रक्षा हो और पूरे मामले की जांच की जाए। साथ ही, संगठन ने स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की मांग की है।

हालांकि एबीवीपी और आरोपों में बताए गए संबंधित लोगों का पक्ष भी सामने आना बाकी है। इसलिए किसी भी आरोप को अंतिम तथ्य मानने से पहले जांच जरूरी है।

लेकिन जांच की जरूरत का मतलब यह नहीं कि मामले को नजरअंदाज कर दिया जाए। विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने असल सवाल यही है कि क्या कोई छात्र बिना किसी दबाव के अपनी राजनीतिक पहचान चुन सकता है? क्या वह किसी संगठन के साथ खड़ा हो सकता है, भले ही वह संगठन कैंपस की किसी दूसरी ताकत के खिलाफ हो? और क्या उसकी राजनीतिक पसंद का उसकी पढ़ाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा? चुनाव में जीत और हार लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन किसी उम्मीदवार को मैदान में उतरने से रोकना लोकतांत्रिक राजनीति की भावना के बिल्कुल विपरीत है।

अगर किसी संगठन को अपने समर्थकों पर भरोसा है, तो उसे चुनाव लड़ना चाहिए और छात्रों से अपना जनादेश मांगना चाहिए। किसी भी विश्वविद्यालय में राजनीतिक ताकत का सबसे बड़ा प्रमाण यही होना चाहिए कि वह अपने विरोधी की आवाज को दबाए नहीं, बल्कि उसके सामने अपने विचार रखे। आखिरकार, विश्वविद्यालय में लोकतंत्र की असली परीक्षा सिर्फ इस बात से नहीं होती कि चुनाव कौन जीतता है। असली परीक्षा तब होती है जब कोई छात्र बहुमत की राजनीति से अलग खड़ा होने का फैसला करता है।

लेकिन क्या वह बिना डर के बोल सकता है? क्या वह बिना दबाव के चुनाव लड़ सकता है? क्या वह अपनी पढ़ाई और शोध जारी रख सकता है? अगर इन सवालों का जवाब हां है, तभी विश्वविद्यालय को वास्तव में लोकतांत्रिक कहा जा सकता है। और जब सवाल एक एसटी छात्र की राजनीतिक स्वतंत्रता का हो, तब यह परीक्षा सिर्फ एक उम्मीदवार की नहीं रहती। यह पूरे विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक चरित्र की परीक्षा बन जाती है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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