कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्य सभा में प्रतिपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने गत 13 अगस्त, 2026 को मानसून सत्र के आखिरी दिन देश के सामने जिस घटना की चर्चा की, वह एक बात स्पष्ट करती है कि वर्णवादी-जातिवादी विचारधारा अब भी कायम है।
असल में 8 अगस्त, 2026 को उत्तराखंड के हल्द्वानी के रामलीला मैदान में खरगे ‘विजय शंखनाद रैली’ को संबोधित करने पहुंचे थे। खरगे के अनुसार उस कार्यक्रम में लाखों लोग मौजूद थे। उनके इस कार्यक्रम के बाद 9 अगस्त को श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास की ओर से रामलीला मैदान में शुद्धि हवन किया गया। शुद्धिकरण की यह विचारधारा अछूतों और मलेच्छों के नाम से बुलाई जाने वाली दलित व अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ इस्तेमाल की जाती है। यह सदियों से जारी है।
यह वर्णवादी-जातिवादी विचारधारा हिंदुत्व की पैरोकार है और वह अछूतों की परछाई को भी अशुद्ध मानती है। उसकी छुई हुई किसी चीज को हाथ लगाना एक धार्मिक अपराध की श्रेणी में रखा जाता है।
भारतीय समाज में इसके अनेकानेक उदाहरण हैं जब अछूतों से छू जाने वाली चीजों, जिसमें मनुष्य से लेकर तथाकथित पवित्र स्थान तक शामिल रहे हैं, उनका शुद्धिकरण किया गया। इस शुद्धिकरण के लिए हवन की विधि अपनाई जाती है। आग से शुद्ध करने का विचार इस हद तक इस विचारधारा में समाहित है कि ये मनुष्यों को जिंदा जलाने में भी संकोच नहीं करते हैं।
अखिल भारतीय कांग्रेस का जब आजादी की लड़ाई के दौरान अधिवेशन आयोजित किया जाता था तब उस अधिवेशन के पंडाल के बगल में समाज सुधार के लिए भी अधिवेशन कराने की व्यवस्था की जाती थी। लेकिन उस पंडाल को जलाकर समाज सुधार के अधिवेशन की परंपरा को रोक दिया गया। समाज सुधार का प्रमुख कार्यक्रम छुआछूत का विरोध रहा है। आजादी की लड़ाई के समय से ही यह दिखाई देता है कि छुआछूत के विरोध जैसे समाज सुधार के कार्यक्रमों व अभियानों से राजनीतिक पार्टियों ने अपना मुंह मोड़ लिया।

संविधान सभा में छुआछूत के खिलाफ बातें की गईं, लेकिन कानूनी स्तर पर उस तरह की कोई व्यवस्था नहीं की गई जिससे कि समाज में छूआछूत की विचारधारा पर लगाम लग सके। कानून की सफलता भी तभी सुनिश्चित की जा सकती है जब राजनीतिक स्तर पर इसके खिलाफ लगातार पहल किए जाएं। यह सदियों पुरानी ऐसी विचारधारा है जो मनुष्य को मनुष्य के रूप में स्वीकार नहीं करती है। धार्मिक स्तर पर छुआछूत को जारी रखने की कठोर व्यवस्था की गई है। इसीलिए यह देखा जाता है कि छुआछूत को अपराध घोषित करने वाले कानूनों के बावजूद उन लोगों के खिलाफ भी छुआछूत की प्रथा को जारी रखा गया जो कि संवैधानिक पदों पर रहे हैं। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के बाद राष्ट्रपति दौपद्री मुर्मू तक को नहीं बुलाया गया। आजादी के बाद से छुआछूत की प्रथा के बने रहने के आंकड़े दलित विरोधी अत्याचारों के आंक़ड़ों में शामिल मिलते हैं।
अछूत जातियों को संविधान में अनुसूचित जातियों के नाम से जाना जाता है। राजनीतिक तौर पर उन्हें दलित कहकर संबोधित किया जाता है। मल्लिकार्जुन खरगे इसी समुदाय की पृष्ठभूमि से आते हैं और यह सर्वविदित है और जगजीवन राम के बाद वे कांग्रेस के दूसरे दलित अध्यक्ष हैं। हल्द्वानी में कार्यक्रम के बाद रामलीला मैदान में शुद्धिकरण का हवन हिंदुत्ववादियों ने कराया, जिन्हें संसदीय राजनीति के स्तर पर भाजपा का समर्थक कहा जाता है। भाजपा उत्तराखंड और केंद्र यानी दिल्ली में सत्तारुढ़ है।
खरगे को यदि संसद में यह बोलने के लिए विवश होना पड़ता है कि उन्हें अछूत समझकर उनके कार्यक्रम स्थल का शुद्धिकरण किया गया तो इससे ज्यादा शर्मनाक स्थिति संवैधानिक व्यवस्था के आगे कोई दूसरी नहीं हो सकती है। इसका यह अर्थ निकलता है कि संवैधानिक मशीनरियां वर्णवादी-जातिवादी विचारधारा के आगे नतमस्तक हैं। यह भी जगजाहिर है कि हिंदुत्ववादी विचारधारा उस संविधान को स्वीकार करने से इंकार करती रही है जो छुआछूत की प्रथा को समाप्त करना चाहती है। यह विचारधारा वैसे लोगों को संवैधानिक पदों पर स्वीकार करने को तैयार नहीं है, जो अछूत जातियों में जन्मे हैं।
यह विचार करने का विषय है कि क्य़ा संसदीय राजनीति में सत्ता पर काबिज होने के लिए हिंदुत्ववादी विचारधारा का इस्तेमाल करने वाली पार्टियां कभी भी दलित विरोधी विचारधारा को समाप्त कर सकती हैं या इसके उलट दलित विरोधी हरकतों को ज्यादा से ज्यादा अंजाम देने के संकेत दे सकती है? आखिर क्यों इस दौर में दलित विरोधी वैसी घटनाएं सामने आने लगी हैं, जिन्हें अतीत की घटनाओं के रूप में देखा जाने लगा था। आखिर सत्ता की किस भाषा में यह संकेत मिलता है कि अछूतों की परछाई भी पड़ जाए तो शुद्धिकरण कराया जाए?
हालांकि भाजपा की ओर से केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने 13 अगस्त, 2026 को राज्यसभा में कहा कि वह इस तरह की घटना की भर्त्सना करते हैं। लेकिन भर्त्सना की यह भाषा नीचे तक क्यों नहीं पहुंच पाती है। हाल में दलित विरोधी अपराधों के खिलाफ मुकदमों में जो फैसले आए हैं, उस पहलू पर भी विचार करें। सत्ता मशीनरी विचारधारा के संकेतों को सुनती है। इसीलिए उसका व्यवहार संकेतों से संचालित दिखता है। हल्द्वानी में खरगे की सभा के बाद वहां शुद्धिकरण हवन की अनुमति किसने दी?
भारतीय समाज में शुद्धिकरण का अर्थ बहुत स्पष्ट है और इसकी जानकारी हर किसी को है। शुद्धिकरण की भाषा सामाजिक अपराध से जुड़ी है और संवैधानिक मशीनरी यदि उसे लेकर संवेदनशील नहीं है तो इसका क्या अर्थ निकाला जा सकता है? क्या यह कि वह धार्मिक नियमों के ही प्रभाव में रहती है और संविधान की भाषा से अछूती है?
(संपादन : नवल/अनिल)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in
