h n

अरजाल सहित सभी गैर-हिंदू दलितों के लिए काला दिवस है 10 अगस्त

समय की मांग है और सरकार का कर्तव्य बनता है कि वह मुस्लिम दलितों (अरजाल) के साथ इंसाफ करे। उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए आर्टिकल 341 से धार्मिक पाबंदी खत्म करे। बता रहे हैं इमानुद्दीन

भारतीय संविधान भाषा, धर्म और संस्कृति जैसे मुद्दों पर अल्पसंख्यकों को संरक्षण प्रदान करने, सुरक्षा तथा समानता का अधिकार दिलाने की देश की जिम्मेदारी के प्रति प्रतिबद्ध है। संविधान की रचना करते समय भी विविधता में एकता पर जोर दिया गया था। देश की जनता को किसी प्रकार की तकलीफ न हो, शासन सुचारू रूप से चले, सबके मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें, धर्म-जाति के नाम पर विवाद न हों, इन सभी बातों का ध्यान हमारे संविधान-निर्माताओं ने रखा। लेकिन दुखद यह है कि अनुच्छेद 341 के मामले में संविधान को न केवल मनमर्जी से तोड़ा-मरोड़ा गया, बल्कि संविधान की भावना का उल्लंघन भी किया गया।

डॉ. बी.आर. आंबेडकर ‘पाकिस्तान ऑर द पार्टिशन ऑफ इंडिया’ में अरजाल मुसलमानों की बात करते हैं और बताते हैं कि यहां भी छुआछूत मौजूद है। निम्न जातियों के अधिकांश मुसलमान वे हैं, जो हिंदुओं के निचले सामाजिक तबके के विभिन्न पारंपरिक पेशागत समूहों से जुड़े हुए थे और हैं। धर्म परिवर्तन से उनका सामाजिक और आर्थिक दर्जा नहीं बदला। वे गरीब और उपेक्षित बने रहे।

लेकिन भारतीय संविधान में अनुच्छेद 341 का तीसरा उपबंध डॉ. आंबेडकर के विचार के विपरीत दिखाई देता है। यह उपबंध 10 अगस्त, 1950 को तत्कालीन राष्ट्रपति के अध्यादेश से जोड़ा गया।

निस्संदेह आजादी के बाद से भारत ने काफी प्रगति की है। उसने गरीबी उन्मूलन, साक्षरता, शिक्षा तथा स्वास्थ्य के स्तर को सुधारने में भी सफलता पाई है। लेकिन भारत के अरजाल (दलित मुस्लिम) समान रूप से  लाभ से वंचित रहे है। सच्चर आयोग और रंगनाथन मिश्रा आयोग की रपटों में भी इनके हालाताें को दलित हिंदुओं से भी बदतर बताया है।

राष्ट्रपति के अध्यादेश ने छीना गैर हिंदू दलितों का हक

1946 में जब संविधान सभा का गठन हुआ। तबसे लेकर और 26 नवंबर, 1949 तक यानी संविधान निर्माण की पूरी प्रक्रिया के दौरान डॉ. आंबेडकर तथा अन्य सदस्य हिंदू समाज में निचली जातियों (जिन्हें दलित भी कहा गया) के उत्थान के लिए संविधान में प्रावधान करने हेतु प्रयत्न करते रहे। संविधान के अनुच्छेद 341 में राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वह विभिन्न जातियों और कबीलों के नाम एक सूची में शामिल कर दें। 10 अगस्त, 1950 को राष्ट्रपति ने एक अध्यादेश के जरिए एक अनुसूची जारी की, जिसमें अस्पृश्य जातियों के भागों को विनिर्दिष्ट कर दिया गया। इन सूचीबद्ध जातियों को ही अनुसूचित जाति कहा गया। साथ ही, राष्ट्रपति के अध्यादेश के पैरा (3) में लिखा गया कि किसी भी ऐसे व्यक्ति को, जिसका संबंध हिंदू धर्म से न हो, उसे अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त न हो सकेगा। हालांकि इस अध्यादेश में सिक्खों को छूट दे दी गई और 1990 में बौद्धों को पैरा (3) में सम्मिलित कर दिया गया।

अब परिदृश्य यह बना कि कोई भी व्यक्ति जिनका संबंध हिंदू, सिक्ख या बौद्ध धर्म से न हो, अनुसूचित जाति की श्रेणी में सम्मिलित नहीं होगा। इस प्रकार ईसाई और मुसलमान इस श्रेणी से बाहर रहे।

10 अगस्त, 2026 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में आयोजित अरजाल पंचायत की तस्वीर

यह साफ है कि इस आदेश के तहत अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण केवल हिंदुओं (सिक्ख या बौद्ध दलितों सहित) को उपलब्ध है, ईसाई या मुसलमान दलितों या किसी अन्य धर्म के दलितों को नहीं। इसका अर्थ यह है कि अनुसूचित जाति का हिंदू केवल तब तक ही आरक्षण का लाभ ले सकता है, जब तक कि वह हिंदू बना रहेगा। अगर वह अपना धर्म परिवर्तित कर लेता है, तो वह आरक्षण का पात्र नहीं होगा।

मुसलमानों में अस्पृश्यता

डॉ. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन’ में कहा है कि कुछ स्थानों पर मुस्लिमों में तीसरा वर्ग (अशराफ, अजलाफ के बाद) ‘अरजाल’ भी है, जिसमें आने वाले व्यक्ति सबसे नीच समझे जाते हैं। उनके साथ कोई भी मुसलमान मिलेगा-जुलेगा नहीं और न उन्हें मस्जिद और सार्वजनिक कब्रिस्तानों में प्रवेश करने दिया जाता है। जैसे– भानार, हलालखोर, हिजड़ा, कसबी, लालबेगी, मोगता, मेहतर।

डॉ. आंबेडकर ने 1901 में बंगाल प्रांत के जनगणना के तथ्यों के अवलोकन में यह बात कही है।

अक्सर मुस्लिम समाज में अस्पृश्यता की बात की जाती है तो उनके अस्तित्व को ही सिरे से खारिज कर दिया जाता है। मानो उस समस्या का अस्तिव ही नहीं है। वे भूल जाते हैं कि आरक्षण धार्मिक सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जाता है। नहीं तो इस्लाम की ही तरह बराबरी का दावा करने वाले सिख और बौद्ध धर्म को मानने वालों को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं दिया जाता।

मुस्लिम समाज में अस्पृश्यता के बारे में विगत कुछ वर्ष पूर्व अक्टूबर, 2014 से अप्रैल, 2015 के बीच उत्तर प्रदेश के 14 जिलों के 7,000 से ज्यादा घरों का सर्वेक्षण किया गया था। सर्वेक्षकों में प्रशांत के. त्रिवेदी, श्रीनिवास गोली, फ़ाहिमुद्दीन और सुरेंद्र कुमार का नाम प्रमुख है। इनका संयुक्त लेख ‘इकॉनामिक एंड पोलिटिकल वीकली’ में ‘क्या मुसलमानों में छुआछूत की प्रथा मौजूद है?’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। उनकी रिपोर्ट को ‘बीबीसी हिंदी’ ने 10 मई, 2016 को प्रकाशित किया था। इसमें दलित मुसलमानों के साथ किए जानेवाले भेदभाव के बारे में बताया गया।

बहरहाल, समय-समय पर पसमांदा समाज के सामाजिक संगठनों एवं सामाजिक कार्यकताओं द्वारा इस पाबंदी के खिलाफ आवाज उठायी जाती रही है। हर साल देश के कुछ जिलों एवं जंतर-मंतर पर प्रदर्शन एवं ज्ञापन भी दिया जाता रहा है, जिसके परिणामस्वरूप ही सच्चर कमेटी एवं रंगनाथ मिश्रा कमेटी गठित की गई एवं उन्होंने कई अनुशंसाएं कीं। लेकिन उनके ऊपर कोई अमल नहीं किया गया। आशा थी कि अरजाल (दलित मुसलमानों) के साथ इस नाइंसाफी के खिलाफ सरकार कुछ कदम उठाएगी, लेकिन वर्तमान सरकार ने पुरानी अनुशंसाओं पर अमल करने के बजाय एक नई बालकृष्णन कमेटी का गठन कर दिया है, जिसकी रपट अभी तक सामने नहीं आई है। समय की मांग है और सरकार का कर्तव्य बनता है कि वह मुस्लिम दलितों (अरजाल) के साथ इंसाफ करे। उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए आर्टिकल 341 से धार्मिक पाबंदी खत्म करे।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

इमानुद्दीन

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश के निवासी इमानुद्दीन लेखक, प्रकाशक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं

संबंधित आलेख

राजस्थान : डांगावास दलित संहार मामले में ‘न्याय’ की हत्या
बीते 5 अगस्त, 2026 को मेड़ता की एससी/एसटी विशेष अदालत ने इस मामले के सभी 40 अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त...
सामूहिक निराशा से निकलने के लिए मुसलमानों को संवैधानिक उपचारों पर बात करनी होगी
डॉ. आंबेडकर बार-बार यह भी कह रहे थे कि भारत में बहुमत राजनीतिक नहीं, बल्कि सांप्रदायिक होगा और एक स्थायी सांप्रदायिक बहुमत हमेशा अल्पसंख्यकों...
असम : समान नागरिक संहिता और चर क्षेत्र की महिलाएं
हमें यह भी याद रखना होगा कि कानून द्वारा उन्हें समान नागरिक का दर्जा दिए जाने से असम के चर इलाके की महिलाओं का...
पटना के बेऊर जेल में जेन-जी
बेऊर जेल में दिन के समय कैदी बाहर निकलकर परिसर में बैठते, एक-दूसरे से मिलते और बातें करते थे। सौ से अधिक छात्र जेल...
भविष्य की राह दिखाता ‘कॉकरोचों’ का अनूठा और असरदार आंदोलन
सन् 2026 का भारतीय छात्र आंदोलन सन् 1968 के प्रसिद्ध पेरिस छात्र आंदोलन से कहीं अधिक बड़ा था, उससे कहीं बेहतर ढंग से संचालित...