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असम : समान नागरिक संहिता और चर क्षेत्र की महिलाएं

हमें यह भी याद रखना होगा कि कानून द्वारा उन्हें समान नागरिक का दर्जा दिए जाने से असम के चर इलाके की महिलाओं का सच्चा सशक्तिकरण नहीं होगा। यह तभी होगा जब समाज उन्हें बराबरी का दर्जा दे और उन्हें एक बराबर नागरिक के रूप में अपना जीवन जीने दे। पढ़ें, डॉ. अशरफुल इस्लाम और सुवा लाल जांगू का यह आलेख

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) काफी लंबे समय से भारत के संवैधानिक और राजनीतिक विमर्श का अहम हिस्सा रही है। असम में अब यह सिर्फ बहस-मुबाहिसों का मुद्दा न रह कर कानून का रूप ले चुकी है। राज्य में सन् 2026 के विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने वायदा किया था कि अगर वह सत्ता में फिर से आई तो सूबे में यूसीसी लागू करेगी। गत 9 मार्च, 2026 को असम की जनता ने नई विधानसभा चुनने के लिए मतदान किया और भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को भारी बहुमत से जिताया। एनडीए ने कुल 126 में से 102 सीटें जीत लीं। अकेले भाजपा के हिस्से में 82 सीटें आईं। हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार ने 12 मई, 2026 को पदभार संभाला। इसके तुरंत बाद यूसीसी संबंधी वायदे को पूरा करने की कवायद शुरू हो गई। राज्य की विधानसभा ने लंबी बहस के बाद 27 मई को यूसीसी विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया। रायजोर दल और कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों की इस मांग को नामंजूर कर दिया गया कि विधेयक को विचारार्थ प्रवर समिति को सौंप दिया जाए।

उत्तराखंड और गुजरात के बाद असम देश का तीसरा ऐसा राज्य बन गया है जिसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, दत्तकग्रहण एवं इनसे संबंधित पारिवारिक मामलों के लिए समान नागरिक संहिता है। सरकार का दावा है कि नया कानून लैंगिक न्याय और समानता की स्थापना की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। मुख्यमंत्री सरमा ने 15 मई को ‘एक्स’ पर लिखा– “असम में समान नागरिक संहिता के लागू होने से यह सुनिश्चित होगा कि सभी के लिए कानून एक समान हों और सभी – विशेषकर महिलाओं और बच्चों – को समुचित अधिकार हासिल हो सकें। जनजातीय समाज के रस्मों-रिवाजों और परंपराओं की हिफाजत के लिए उन्हें यूसीसी की जद से बाहर रखा गया है।”

मगर समाजसुधार के किसी भी कदम की असली कसौटी यह होती है कि वह समाज के हाशिए पर जी रहे समुदायों के जीवन को किस तरह प्रभावित करता है।

चर क्षेत्र और उसका महत्व

असम में ‘चर’ क्षेत्र से आशय है ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के बीच उभरे द्वीप, जिनके चारों ओर पानी होता है। असम सरकार के चर क्षेत्र विकास संचालनालय के अनुसार, चर-चपोरी क्षेत्र सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से असम का सबसे पिछड़ा इलाका है। सन् 2003 में प्रकाशित सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य के करीब 2,300 चर गांवों में 24 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं। तबसे करीब दो दशक गुज़र चुके हैं और इस अवधि में प्रदेश की आबादी में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। अतः हम यह मान सकते हैं कि इन इलाकों की आबादी आज कम-से-कम 40 लाख होगी। चर क्षेत्र असम के कुल क्षेत्रफल का करीब पांच फीसद है मगर वहां राज्य की 10 फीसद आबादी रहती है। इस आबादी का एक बड़ा हिस्सा बंगाली मूल के मुसलमानों का है, जिनकी जड़ें तत्कालीन पूर्वी बंगाल में हैं। नतीजा यह कि चर क्षेत्रों के बारे में बात करते समय इस समुदाय की चर्चा से बचना संभव नहीं होता। चर क्षेत्र में रहने वाली महिलाओं की बदहाली विशेष चिंता का विषय है।

चर क्षेत्र में महिलाओं को कई तरह के अभावों और वंचनाओं से जूझना पड़ता है। वे भौगोलिक दृष्टि से राज्य के अन्य क्षेत्रों से कटी रहती हैं। उन्हें घोर गरीबी, अपर्याप्त सार्वजनिक सेवाओं और गहरे तक जड़ जमाये पितृसत्तात्मक मानकों के साथ जीना पड़ता है। सरकार के अपने आंकड़े कहते हैं कि सन 2003 में गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों (बीपीएल) की राज्य की कुल आबादी में हिस्सेदारी करीब 36 फीसद थी, लेकिन चर क्षेत्र के 68 प्रतिशत निवासी बीपीएल श्रेणी में थे। (चक्रवर्ती, 2009) साक्षरता के मामले में भी हालात उतने ही गंभीर हैं। सन् 2001 में असम की औसत साक्षरता दर 63 प्रतिशत थी, मगर चर क्षेत्र में यह करीब 19 फीसद थी। चर क्षेत्र की मुसलमान महिलाओं की साक्षरता दर तो 10 प्रतिशत से भी कम आंकी गई थी। (चर क्षेत्र विकास संचालनालय, 2003) शिक्षा से इस दूरी के गंभीर दूरगामी परिणाम होते हैं। लड़कियों का बहुत कम उम्र में विवाह कर दिया जाता है, वे किशोरावस्था में मां बन जाती हैं और पूरे जीवन आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पातीं। बाल विवाह, किशोर वय में गर्भधारण, उससे जनित स्वास्थ्य समस्याएं और स्कूल ड्रापआउट की उच्च दर इस इलाके की प्रमुख समस्याएं हैं।

चर-चपोरी साहित्य परिषद् के अध्यक्ष डॉ. हाफ़िज़ अहमद बताते हैं– “चर क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवहन सुविधाओं की भारी कमी है। लड़कियों की ड्रापआउट दर बहुत ज्यादा है क्योंकि इन इलाकों में उच्च और उच्चतर माध्यमिक स्कूलों और कॉलेज उपलब्ध ही नहीं हैं और माता-पिता अपनी बच्चियों को उच्च शिक्षा के लिए घर से दूर भेजने में हिचकिचाते हैं। समाज धार्मिक कट्टरपंथियों के शिकंजे में कैद है जो लड़कियों को वस्तु से अधिक नहीं मानते और नहीं चाहते कि वे ज्यादा पढ़ें-लिखें।”

बार-बार गर्भधारण, घरेलू कामकाज का भारी बोझ और अपर्याप्त पोषण चर क्षेत्र की महिलाओं को असमय बूढ़ी बना देता है। अपने जीवन के तीसरे दशक में ही वे काफी उम्रदराज नज़र आने लगती है।

इन सबका असर चर क्षेत्र की महिलाओं के निम्न शिक्षा स्तर में देखा जा सकता है। इस समुदाय में उच्च शिक्षित महिलाओं की संख्या न के बराबर है।

डॉ. हाफ़िज़ के अनुसार, “नदियों के बहाव से होने वाला भूमि कटाव महिलाओं के स्वास्थ्य और शिक्षा पर गंभीर कुप्रभाव डालता है। चर क्षेत्र की आबादी में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले 55 प्रतिशत हैं। जाहिर है कि वे घोर गरीबी में जी रहे हैं। चर इलाकों में अलग-अलग मौकों पर ज़मीन के अलग-अलग टुकड़े जलमग्न होते रहते हैं। इससे खेती करने वालों के जीवन में स्थायित्व नहीं आ पाता और परिवहन सुविधाएं बाधित होती रहती हैं। इसके अलावा, चर के अधिकांश रहवासियों के पास मियादी ज़मीन (पट्टे की भूमि) नहीं है। उदाहरण के लिए बारपेटा जिले के केवल 37.5 फीसदी निवासियों के पास मियादी ज़मीन है।”

यह महत्वपूर्ण है कि सूबे के जिन तीन जिलों – धुबरी, बारपेटा और गोलपारा – में किशोर उम्र में गर्भावस्था की समस्या सबसे गंभीर है, उन सभी में चर गावों की संख्या सबसे ज्यादा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार, बाल विवाह का सबसे अधिक चलन असम के उन जिलों में है जिनमें चर इलाकों में रहने वाले मुसलमानों की बहुतायत है। एनएफएचएस-5 के जिला-स्तरीय आंकड़ों के मुताबिक, धुबरी में बाल विवाह का प्रतिशत सबसे अधिक (50.8) है। इसके बाद हैं दक्षिण सालमारा-मानकाचर (44.7 प्रतिशत) एवं दरांग (42.8 प्रतिशत)। गोलपारा और बारपेटा में बाल विवाह का प्रतिशत क्रमशः 41.8 और 40.1 है, जो राष्ट्रीय औसत 23.3 प्रतिशत से काफी अधिक है। [इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ पापुलेशन साइंसेज (आईआईपीएस) एवं आईसीएफ, 2021] यहां यह बताना महत्वपूर्ण होगा कि बारपेटा, धुबरी, दक्षिण सालमारा-मानकाचर और गोलपारा जिलों में चर गांवों की संख्या सबसे ज्यादा है। जाहिर है कि यह कोई संयोग नहीं हो सकता और इससे यह साफ़ है कि चर इलाकों की महिलाओं को किस तरह की संरचनात्मक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

बहुविवाह प्रथा का बोझ

गत 27 मई को प्रांत के विधानसभा सत्र में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पर चर्चा में भाग लेते हुए असम सरकार में कैबिनेट मंत्री और भाजपा नेता पीजुष हजारिका के कहा– “पहली पत्नी की सहमति के बिना चार शादियां करने की इज़ाज़त भला कैसे दी जा सकती है? अगर किसी हिंदू, सिक्ख या बौद्ध पुरुष को दो शादियां करने के अपराध में जेल भेजा जा सकता है तब किसी समुदाय विशेष के सदस्यों को ऐसा करने की इज़ाज़त कैसे दी जा सकती है?” उन्होंने यह भी कहा कि यह विधेयक महिलाओं के सम्मान और उन्हें समान अधिकार देने की खातिर लाया गया है।

गोलपारा, बारपेटा और माजुली जिलों के चुनिंदा इलाकों में 2021-22 में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक इस क्षेत्र में यद्यपि बहुपत्नी प्रथा उतनी आम नहीं है जितना कि बाल विवाह है, लेकिन चर मुस्लिम समुदायों में बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन काफी है। (अशराफुल इस्लाम द्वारा उनके पीएचडी शोधप्रबंध ‘वीमेन इन द मार्जिन: ए क्रिटिकल स्टडी ऑफ़ द चर एरियाज ऑफ़ आसाम’ के लिए 2021 में किया गया मैदानी अध्ययन) बहुपत्नी प्रथा के संबंध में विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन महिलाओं के जीवन पर उसके प्रभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अध्ययन से सामने आया कि एक से अधिक महिलाओं से विवाह करने वाले पुरुषों ने न तो ऐसा करने से पहले अपनी पहली पत्नी (या पत्नियों) की सहमति ली और न ही इस्लाम की इस आवश्यक शर्त को पूरा किया कि सभी पत्नियों के साथ बराबरी का व्यवहार किया जाना चाहिए। बहुपत्नी प्रथा को सही ठहराने के लिए तो धर्म का सहारा लिया गया, लेकिन धर्म द्वारा निर्धारित जिम्मेदारियों को भुला दिया गया। यह एक तरह का विरोधाभास है। इस्लामिक कानून बहुपत्नी प्रथा की इज़ाज़त तो देता है मगर सभी पत्नियों के साथ एक-सा व्यवहार और न्याय करने की कड़ी शर्तों के साथ।

कुल मिलकर नतीजा यह हुआ कि बहुपत्नी प्रथा – जिसका बचाव इस आधार पर किया जाता है कि उसे धार्मिक स्वीकृति हासिल है – दरअसल एक पितृसत्तात्मक विशेषाधिकार बन गई है। महिलाओं पर इसके गंभीर कुप्रभाव पड़ रहे हैं। वे महिलाएं, जिनकी पतियों की एक से अधिक पत्नियां हैं, अक्सर मानसिक कष्ट और आर्थिक असुरक्षा का शिकार रहती हैं। भोजन, स्वास्थ्य की देखभाल, शिक्षा और घरेलू संसाधनों तक पहुंच के मामले में उनके साथ भेदभाव किया जाता है।

परिवारों में तनाव रहता है, विवाद होते हैं और बच्चों को माता-पिता से एक-बराबर प्रेम और स्नेह नहीं मिलता। इसके अलावा, महिलाओं को हमेशा यह डर सताता रहता है कि कहीं उनका पति दूसरा विवाह न कर ले। करीब बत्तीस साल की रोहिटन नेस्सा आंचलिक पंचायत की सदस्य हैं और बारपेटा जिले के मांडिया निर्वाचन क्षेत्र की बलिकुरी ग्राम पंचायत में स्थित चर इलाके का प्रतिनिधित्व करती हैं। वे यूसीसी लागू होने से प्रसन्न हैं। उनके अनुसार, “यूसीसी से निश्चित रूप से चर महिलाओं को समाज में आगे आने में मदद मिलेगी। बहुपत्नी प्रथा के कारण चर क्षेत्र की बहुत-सी महिलाएं डर और असुरक्षा के साये में जीने को मजबूर हैं। इस कानून से वे निर्भय हो कर जी सकेंगी। महिलाओं को अब यह डर नहीं सताएगा कि कहीं उनके पति दूसरी शादी कर एक और महिला को घर में न ले आएं।”

नए कानून से महिलाओं का जीवन बेहतर बन सकेगा और वे अधिक हिम्मत से प्रताड़ना, भेदभाव और अन्य किस्म के अन्यायों के खिलाफ आवाज़ उठा सकेंगी। अगर उन्हें यह डर नहीं होगा कि उनके पति दूसरी शादी कर लेंगे तो वे खुलकर अपने अधिकार और न्याय मांग सकेंगी। बहुपत्नी प्रथा भले ही बहुत आम न हो मगर यह तथ्य कि वह जायज़ है, उसे महिलाओं पर नियंत्रण का औज़ार बनाने के लिए काफी है। कई महिलाएं अपने पति के अन्याय का प्रतिरोध केवल इसलिए नहीं कर पातीं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि अगर उन्होंने ऐसा किया तो उनका पति दूसरा विवाह कर लेगा। इस तरह, बहुपत्नी प्रथा, पितृसत्तात्मकता को मजबूती देती है, महिलाओं को लीक पर चलते रहने पर मजबूर करती है और विवाहित महिलाओं के अपने पति से सौदेबाजी करने की क्षमता को कमज़ोर करती है। इस अर्थ में बहुपत्नी प्रथा केवल एक वैवाहिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक संस्था है जो लैंगिक असमानता को बनाए रखती है।

जहां तक असम के चर क्षेत्र का सवाल है, बहुपत्नी प्रथा और बाल विवाह एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कई लड़कियों की शादी बहुत कम उम्र में कर दी जाती है और जल्दी ही वे मां बन जाती हैं। बार-बार गर्भधारण, घरेलू कामकाज का भारी बोझ और अपर्याप्त पोषण उन्हें असमय बूढ़ी बना देता है। अपने जीवन के तीसरे दशक में ही महिलाएं काफी उम्रदराज नज़र आने लगती हैं। पतियों को उनकी पत्नियां कम आकर्षक लगने लगती हैं और वे एक और विवाह करने की जुगत में लग जाते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि समाज उन्हें इसकी इज़ाज़त देता है।

लैंगिक न्याय बनाम धार्मिक स्वतंत्रता

यूसीसी पर विधानसभा में हुई बहस ने एक अधिक व्यापक संवैधानिक दुविधा को भी रेखांकित किया। और वह यह कि लोकतांत्रिक समाज में लैंगिक न्याय और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन किस तरह कायम हो। मुस्लिम विधायक और असम विधानसभा में विपक्ष के नेता वाजेद अली चौधरी ने यूसीसी विधेयक का विरोध करते हुआ कहा– “असम जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज में समान नागरिक संहिता लागू नहीं की जा सकती। पहले से ही कई कानून मौजूद हैं और ऐसे में यूसीसी केवल जटिलताओं को बढ़ाएगी। इससे समाज में टकराव बढ़ेगा।”

इसके विपरीत, विधेयक के समर्थकों का तर्क था कि महिलाओं को समान दर्जा देना और उनकी गरिमा और उनके अधिकारों की रक्षा करना राज्य का संवैधानिक कर्त्तव्य है। न्यू गुवाहाटी से भाजपा विधायक दिप्लु रंजन सरमाह का कहना था कि विधेयक से राज्य में महिलाओं के साथ हमेशा से होता आ रहा अन्याय समाप्त होगा। लेकिन आलोचकों का मानना था कि विधेयक के प्रावधान मुस्लिम पर्सनल लॉ के साथ छेड़छाड़ करते हैं, जो धार्मिक स्वतंत्रता के गारंटी देने वाले संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है। विधेयक का सबसे विवादास्पदद प्रावधान है बहुपत्नी प्रथा का निषेध। विधेयक के विरोधियों का तर्क था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ कतिपय विशिष्ट परिस्थितियों में पुरुषों को एक से अधिक विवाह करने की इज़ाज़त देता है और राज्य को धर्म द्वारा स्वीकृत प्रथा के साथ छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए। लेकिन इस तर्क से एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उपजता है और वह यह कि क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ का हर प्रावधान अपने आप में मूलभूत धार्मिक प्रथा बन जाता है जिसे संवैधानिक सुरक्षा हासिल होनी चाहिए? यदि हम इस्लामिक देशों को देखें तो यह सही नहीं लगता। तुर्की और ट्यूनीशिया इस्लामिक देश हैं, लेकिन वहां बहुपत्नी प्रथा पूर्णतः प्रतिबंधित है। पाकिस्तान, इंडोनेशिया और मिस्र जैसे देशों में इस मामले में कड़ी शर्तें लागू हैं। (पुर्वान्तो एवं अन्य, 2021) 

इन सुधारों के बाद भी ये देश इस्लामिक देश कहलाते हैं, और हैं। इससे पता चलता है कि बहुपत्नी प्रथा पर कानूनी रोक को इस्लाम के खिलाफ बताना हमेशा सही नहीं होता। अतः मुद्दा धर्म बनाम धर्मनिरपेक्षता नहीं है। मुद्दा यह है कि क्या महिलाओं के लिए नुकसानदेह किसी प्रथा को केवल इसलिए बनाए रखी जानी चाहिए क्योंकि उसकी जड़ें इतिहास या धर्म में हैं? अगर कोई सामाजिक रीति-रिवाज़ या प्रथा, असमानता और भेदभाव को बढ़ावा देती हो तो क्या कोई संवैधानिक लोकतंत्र उसके प्रति तटस्थ रह सकता है?

चर-चपोरी क्षेत्र की महिलाओं को घर, समुदाय और राज्य संस्थाओं – सभी में भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

लेकिन चचेरे, ममेरे, फुफेरे भाई-बहनों (कजिन्स) के बीच शादी पर प्रतिबंध का मसला अधिक जटिल है। बहुपत्नी प्रथा के महिलाओं पर कुप्रभाव के पर्याप्त दस्तावेजी सबूत उपलब्ध हैं। लेकिन कजिन्स के बीच विवाह दो वयस्कों का अपनी मर्ज़ी से लिया गया निर्णय है। इस कारण, आलोचकों का मानना है कि इसे केवल समाज सुधार के नाम पर प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। इसके लिए अधिक मज़बूत तर्कों की ज़रूरत है। इसी संदर्भ में विधानसभा में टीएमसी के एकमात्र सदस्य शरमन अली अहमद ने कहा– “विधेयक के अधिकांश प्रावधानों से मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन इसके कुछ प्रावधान – जैसे कौन किससे विवाह कर सकता है – पवित्र कुरान की शिक्षाओं के खिलाफ हैं।”

अगर राज्य नागरिकों के अत्यंत निजी निर्णयों का भी विनियमन करना चाहता है तो उसे इस आशय के अकाट्य सबूत प्रस्तुत करने होंगे कि ऐसा विनियमन लोकहित में हैं। जहां बहुपत्नी प्रथा पर लगाम लगाना इस आधार पर वैध ठहराया जा सकता है कि वह लैंगिक न्याय के हित में है, वहीं चचेरे, ममेरे व फुफेरे भाई-बहनों के बीच शादी पर प्रतिबंध का कोई स्पष्ट कारण नज़र नहीं आता और इस पर गहराई से सार्वजनिक विमर्श ज़रूरी है।

क्या यूसीसी से चर महिलाएं समाज की मुख्यधारा में आ जाएंगीं?

इसमें कोई संदेह नहीं कि यूसीसी के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क यही है कि वह सुनिश्चित करेगा कि महिलाओं को उनके अधिकार मिलें। बहुपत्नी प्रथा पर प्रतिबंध, विवाह के पंजीकरण की अनिवार्यता, पैतृक संपत्ति में हिस्से और भरण-पोषण के अधिकार व मनमाने ढंग से तलाक पर रोक से चर महिलाओं को काफी फायदा हो सकता है। यद्यपि इस्लामिक कानून यह कहता है कि लड़कियों को अपने पिता की संपत्ति में एक-तिहाई हिस्सा मिलना चाहिए लेकिन ज़मीनी स्थिति काफी अलग है। महिलाएं अक्सर परिवार के दबाव में आकर अपना हक छोड़ देती हैं या उन्हें उनका हक दिया ही नहीं जाता। निरक्षरता, गरीबी और सामाजिक निर्भरता के कारण बहुत कम महिलाएं इस तरह के अन्याय को चुनौती दे पाती हैं। इसी तरह यद्यपि कई इस्लामिक अध्येता यह तर्क देते हैं कि तीन तलाक को धार्मिक वैधता हासिल नहीं है, लेकिन इसके दुरुपयोग के कारण बड़ी संख्या में महिलाओं को कष्ट भोगने पड़ रहे हैं।

धार्मिक आदर्श चाहे जो हों, सामाजिक सच्चाई अक्सर उनसे अलग होती है और इसीलिए कानूनी सुरक्षा अनिवार्य हो जाती है। इसके अलावा कई मामलों में धार्मिक प्रथाओं और पर्सनल लॉ में इस तरह के परिवर्तन कर दिए गए हैं, जिससे लैंगिक असमानता संस्थागत स्वरूप ग्रहण कर लेती है और महिलाओं के हितों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसलिए समानता स्थापित करने, व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा करने और यह सुनिश्चित करने कि भेदभावपूर्ण सामाजिक या धार्मिक आचरण के कारण न्याय के मूल सिद्धांतों से समझौता न हो, यह आवश्यक है कि जो भी कमजोर है उसे कानून का संरक्षण हासिल हो। विवाह का अनिवार्य पंजीकरण बाल विवाह रोकने में मददगार हो सकता है। वैवाहिक संबंधों के दस्तावेजीकरण से जवाबदेही सुनिश्चित हो सकेगी, कानून अपना काम बेहतर ढंग से कर सकेगा और कम उम्र में शादियों को छुपाना अधिक मुश्किल हो जाएगा।

लेकिन एक महत्वपूर्ण और असहज करने वाले प्रश्न से हम अब भी बच नहीं सकते और वह यह कि क्या केवल कानूनी सुधार से चर इलाके की महिलाओं के जीवन में बदलाव आ सकता है? इस प्रश्न का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है। कुछ हद तक ऐसा हो सकता है, लेकिन यह साफ़ है कि केवल कानूनी सुधार इन महिलाओं के जीवन में बदलाव लाने के लिए अपर्याप्त हैं। अध्येता और मानवाधिकार शोधकर्ता अंजुमन आरा बेगम असम से हैं। वे कहती हैं, “चर-चपोरी में रहने वाली महिलाओं को संरचनात्मक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उनके साथ घर के भीतर भेदभाव होता है। समुदाय में भेदभाव होता है और राज्य की संस्थाएं भी उनके साथ भेदभाव करती हैं। यूसीसी तो एक छोटा-सा कदम है। इसका उद्देश्य महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं है। यह तो केवल पर्सनल लॉ के विनियमन का प्रयास है। इससे मुसलमानों में बहुपत्नी प्रथा पर नियंत्रण लग सकता है, लेकिन मुसलमानों में इस प्रथा का प्रचलन पहले ही बहुत कम हो चुका है।”

अंजुमन बेगम का मानना है कि लड़कियों के लिए स्कूल आदि जैसी शैक्षणिक सुविधाएं उनके घर के पास उपलब्ध करवाई जानी चाहिए ताकि उन्हें आने-जाने पर खर्च न करना पड़े। उनका यह भी कहना है कि यूसीसी से उस लैंगिक भेदभाव पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है, जिसका सामना चर महिलाएं पीढ़ियों से कर रही हैं। इन महिलाओं की विशिष्ट समस्याओं के सुलझाव के लिए संरचनात्मक सुधारों की जरूरत है।

कानून किसी भेदभाव को प्रतिबंधित कर सकता है, परंतु वह उन सामाजिक परिस्थितियों को नहीं मिटा सकता जो उस भेदभाव की वाहक और पोषक हैं। बाल विवाह के संबंध में अनुभव से यही सिद्ध होता है। बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के बावजूद चर इलाकों में बाल विवाह होते आ रहे हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में उठाए गए कड़े कदमों – जिनमें बाल विवाह के खिलाफ कठोर कार्यवाही और संबंधित लोगों की गिरफ्तारी शामिल थी – से चर इलाकों में बाल विवाह में कमी आई है। इससे यह साफ है कि कानूनी प्रावधान तभी प्रभावकारी होते हैं जब उन्हें लागू करने की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति हो। इसी तरह यूसीसी के चलते भले ही कई नुकसानदेह प्रथाओं और रस्मों-रिवाजों पर प्रतिबंध लग गया हो मगर केवल इससे चर महिलाओं को लैंगिक भेदभाव एवं पितृसत्तात्मक दमन के गहरे तक जड़ जमाए ढांचे – जो पीढ़ियों से उनके जीवन को नियंत्रित करता आ रहा है – से मुक्ति नहीं मिलेगी। 

जो लड़की शिक्षित नहीं है वह अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग नहीं कर सकती। अगर किसी महिला की अदालतों तक पहुंच नहीं है, उसे कानून की जानकारी ही नहीं है तो वह न्याय के लिए कैसे लड़ सकती है। किसी महिला को भले ही कानूनन संपत्ति पर अधिकार हासिल हो मगर अगर वह आर्थिक दृष्टि से दूसरों पर निर्भर है और सामाजिक बेड़ियों में बंधी हुई है तो यह अधिकार किस काम का है? चर महिलाओं की राह में आज सबसे बड़ी बाधा भेदभावपूर्व पर्सनल लॉ नहीं है, बल्कि शिक्षा के अवसरों का अभाव है। अधिकांश लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा एक सपना है। कॉलेज उनके घरों से दूर हैं और उनके परिवार आने जाने या दूसरे शहर में रहने का खर्च उठाने में या तो अक्षम हैं या अनिच्छुक। माता-पिता लड़कियों को गांव से बाहर पढ़ने नहीं भेजना चाहते क्योंकि वे उनकी सुरक्षा के बारे में चिंतित रहते हैं। उन्हें लगता है कि इससे समाज में उनकी इज्जत कम होगी। उनकी आर्थिक स्थिति भी इसकी इजाजत नहीं देती।

अगर चर महिलाओं की पहुंच उच्च शिक्षा तक हो तो उन्हें अनेक नए संसाधन हासिल हो सकते हैं। अगर असम के प्रमुख शिक्षा केंद्रों और जिला मुख्यालयों में चर इलाकों की लड़कियों के लिए आवासीय हॉस्टल स्थापित किए जाएं तो इससे एक बहुत बड़ा परिवर्तन आ सकता है। इस तरह के हॉस्टलों में रहवास मुफ्त होना चाहिए और सस्ती दर पर भोजन उपलब्ध करवाया जाना चाहिए। और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि लड़कियां वहां स्वयं को सुरक्षित महसूस करें। अगर यह होता है तो इससे लड़कियों की शिक्षा की राह का एक बड़ा अवरोध समाप्त हो जाएगा। राज्य सरकार की निजुत मोइना योजना के अंतर्गत विश्वविद्यालयों और कालेजों में पढ़ने वाली महिला विद्यार्थियों को आर्थिक मदद उपलब्ध करवाई जाती है। मगर इसका लाभ दूरदराज के चर इलाकों में रहने वाली लड़कियों को तभी मिल सकेगा जब वे उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिला लेंगी।

समान कानूनों से समान अवसर तक

असम सरकार का यूसीसी अधिनियम 2026, कानूनी और लैंगिक समानता की स्थापना की राह में मील का पत्थर है। यह कानून मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से जुड़ी कई समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करता है और उन पितृसत्तात्मक प्रथाओं और रूढ़ियों को चुनौती देने में अहम भूमिका अदा कर सकता है, जिनके चलते चर महिलाओं को पराधीनता में जीना पड़ रहा है। मगर वंचना की शिकार चर महिलाओं का वास्तविक सशक्तिकरण केवल कानूनी क़दमों से नहीं होगा। समाज के हाशिए पर सिमटी इन महिलाओं के समाज में वास्तविक समावेशीकरण के लिए केवल ‘एक देश, समान कानून’ काफी नहीं है। उनके लिए ज़रूरी है– ‘एक देश, समान अवसर’। समान अवसर एवं न्यायोचित कानून उन संरचनात्मक और भौगोलिक बाधाओं को दूर कर सकते हैं जिनके चलते असम में नदियों के किनारे बसे चर समुदाय मुख्यधारा से दूर बने हुए हैं। इसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और आर्थिक अवसरों तक आसान पहुंच जरूरी होगी और साथ ही कानूनी सुरक्षा व संस्थागत मदद भी।

इसके साथ ही हमें यह भी याद रखना होगा कि कानून द्वारा उन्हें समान नागरिक का दर्जा दिए जाने से असम के चर इलाके की महिलाओं का सच्चा सशक्तिकरण नहीं होगा। यह तभी होगा जब समाज उन्हें बराबरी का दर्जा दे और उन्हें एक बराबर नागरिक के रूप में अपना जीवन जीने दे। यूसीसी से एक दरवाज़ा खुल सकता है। लेकिन चर महिलाएं उस दरवाज़े से गुज़र पाएंगी या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि उन्हें कितने अवसर और संसाधन उपलब्ध करवाए जाते हैं और उन्हें कितनी संस्थागत मदद उपलब्ध हो पाती है। 

निष्कर्ष

एक प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है। और वह यह कि यूसीसी किस तरह उन अनेक विद्यमान कानूनों से अलग है, जो उन्हीं समस्याओं से निपटने के लिए बनाए गए हैं, जिनका विनियमन यूसीसी के ज़रिए किया जाना है? पिछले कुछ वर्षों में असम सरकार ने महिला अधिकारों की रक्षा के निमित्त कई कानून बनाए हैं। इनमें शामिल है– असम बहुपत्नी प्रथा निषेध अधिनियम 2025 एवं बाल विवाह निषेध अधिनियम 2026। सन् 2024 में असम सरकार ने औपनिवेशिक काल के असम मुस्लिम विवाह व तलाक पंजीकरण अधिनियम व नियम 1935 को रद्द कर दिया और कई अहम सुधार लागू किए। इनमें शामिल थे विवाहों का अनिवार्य पंजीकरण, बाल विवाह पर प्रतिबंध और विवाह व तलाक के क़ाज़ी द्वारा पंजीकरण की व्यवस्था की समाप्ति। इस व्यवस्था को रद्द किए जाने से चर इलाकों के मुसलमानों में तीन तलाक के प्रचलन पर भी रोक लगी।

इसी संदर्भ में वाजिद अली चौधरी जैसे यूसीसी आलोचकों का कहना है कि बाल विवाह, बहुपत्नी प्रथा, मनमाने ढंग से तलाक और विवाह का पंजीकरण जैसे मसलों को सुलझाने के लिए वर्तमान कानून काफी हैं। इसलिए उन्होंने सरकार से यह अनुरोध किया कि वह इस विधेयक को वापिस ले, क्योंकि इससे सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ेगा। मगर सच यह है कि यूसीसी का मुद्दा केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि कानूनों को कितना और किस तरह लागू किया जाता है।

असम के चर क्षेत्रों के मामले में सबसे बड़ी चुनौती है उनका भौगोलिक अलगाव। इसके अलावा वहां अक्सर बाढ़ आती रहती है और उन तक पहुंचना मुश्किल होता है। कई अर्थों में हम यह कह सकते हैं कि इन इलाकों में सरकार है ही नहीं। राज्य की संस्थाओं – चाहे वह नागरिक प्रशासन हो या कानून लागू करवाने वाली एजेंसियां – की पहुंच सीमित है। नतीजा यह कि पारंपरिक सामुदायिक नेता जिन्हें मताबर कहा जाता है समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सामाजिक, नागरिक और राजनीतिक मसलों में उनका मत ही अंतिम होता है। इसके चलते किसी कानूनी सुधार के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा बल्कि उसे इन दूरदराज के इलाकों में लागू करवाना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। इन सब समस्याओं के बावजूद इसमें कोई संदेह नहीं कि बाल विवाह, बहुपत्नी प्रथा और मनमाने ढंग से तलाक के कारण कष्ट भोग रही महिलाओं को यूसीसी से अधिक अधिकार मिल सकेंगे। लेकिन यह प्रयास पूरी तरह सफल तभी हो सकेगा जब सरकारी मशीनरी इसे लागू करने के बारे में गंभीर हो, जनजागृति अभियान चलाए जाएं और चर समुदाय व प्रशासनिक एजेंसियों के बीच आपसी विश्वास और सहयोग का वातावरण निर्मित हो।

संदर्भ :

[इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ पापुलेशन साइंसेज (आईआईपीएस) एवं, आईसीएफ, 2021] राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस5) 2019-21 : आसाम फैक्ट शीट, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार (https://nfhs.in

चक्रवर्ती, जी. (2009). आसाम्स हिंटरलैंड: सोसाइटी एंड इकॉनमी इन द चर एरियाज. नई दिल्ली. आकांक्षा पब्लिशिंग हाउस 

संचालनालय, चर क्षेत्र विकास. (2004). सोशियो-इकनोमिक सर्वे रिपोर्ट ऑफ़ चर एरियाज, 2003-04. आसाम सरकार

पुर्वान्तो, एम.आर; मुखार्रोम, टी.; स्यिब्ली, एम.आर.; ईवा, नुरोज़ी ए. (2021). पोलीगैमी इन मुस्लिम कन्ट्रीज: ए कम्पेरेटिव स्टडी इन ट्युनिशिया, सऊदी अरेबिया, एंड इंडोनेशिया. प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द सेकंड साउथईस्ट एशियन फोरम ऑन सस्टेनेबल डेवलपमेंट (एसईए-एऍफ़एसआईडी 2018) में प्रकाशित. (एडवांसेज इन इकोनॉमिक्स, बिज़नेस एंड मैनेजमेंट रिसर्च, खंड 168, pp. 435-437). अटलांटिस प्रेस. https://doi.org/10.2991/aebmr.k.210305.082

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अशरफुल इस्लाम और सुवा लाल जांगू

डॉ. अशरफुल इस्लाम गवर्नमेंट मॉडल डिग्री कॉलेज, डिब्लॉन्ग, दीमा हासो, असम में राजनीति शास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। डॉ. सुवा लाल जांगू मिजोरम विश्वविद्यालय, आईजॉल के राजनीति शास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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