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सबको दुखी कर गया राम बिलास भारती का अचानक चले जाना

बीते 26 सितंबर, 2026 को डॉ. राम बिलास भारती का हृदयगति रुकने के कारण दिल्ली में निधन हो गया। वे महज 52 वर्ष के थे। एक कर्मठ आंबेडकरवादी और संगठनकर्ता के रूप में पूर्वांचल में प्रसिद्ध डॉ. भारती के निधन पर अनेक लोगों ने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दी।

यह फुले, पेरियार और आंबेडकर जैसे महानायकों का युग नहीं है। आज बहुसंख्यक दलित-बहुजनों का आंदोलन छोटे-छोटे नायकों के कंधों पर टिका हुआ है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के मऊ जिले के ऐसे ही एक नायक राम बिलास भारती भी थे। बीते 26 सितंबर, 2026 की रात करीब 9 बजे दिल्ली में हृदयगति रुकने से उनका निधन हो गया। वे करीब 52 वर्ष के थे। दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल में 28 सितंबर को उनके पार्थिव शरीर पोस्टमार्टम हुआ और इसके बाद मऊ स्थित उनकी जन्मभूमि दोहरीघाट में उनका अंतिम संस्कार किया गया।

दिल्ली में, उनके गांव धरौली (मऊ)  में, अंतिम यात्रा के दौरान जिस तरह का जनसैलाब सहज रूप से अपने नायक को विदा करने के लिए उमड़ा, वह इस बात का साक्ष्य है कि उनका व्यक्तित्व कितना प्रभावशाली और लोकप्रिय था।

बीते 27 सितंबर की सुबह यह दुखद खबर सोशल मीडिया पर उनके चाहने वालों के दिलों में दर्द और अवसाद की छाया छोड़ गई। लोगों ने उनके संदर्भ में अपनी-अपनी स्मृतियों और दुख को साझा किए।

डॉ. राम बिलास भारती ने गोरखपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से ‘बीसवीं सदी में दलित समाज’ विषय पर प्रो. एस.एन.आर. रिजवी के निर्देशन में पीएचडी की थी। इसी विभाग के प्रोफेसर तथा राम बिलास भारती के शिक्षक और बाद में मित्र बने चंद्रभूषण गुप्त ‘अंकुर’ के अनुसार, राम बिलास भारती गोरखपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से पीएचडी करने वाले दलित समाज के पहले व्यक्ति थे। प्रो. रिजवी से राम बिलास भारती के इतने घनिष्ठ एवं आत्मीय रिश्ते थे कि लोग उन्हें उनका मानस पुत्र कहते थे।

इसका साक्ष्य दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल में 27 सितंबर को भी देखने को मिला। करीब 75 वर्षीय प्रो. रिजवी पोस्टमार्टम हाउस के सामने खड़े रहे। जब राम बिलास भारती का पार्थिव शरीर बाहर लाया गया तब दर्द और पीड़ा से भरी अपनी आंखों से वे अपने प्रिय छात्र को निहारते रहे। फेसबुक पर उन्होंने एक पोस्ट के जरिए अपनी स्मृति इन शब्दों में साझा की–

“आज दुखी एवं भरे मन से यह पोस्ट लिख रहा हूं। मेरे निर्देशन में लगभग बीस वर्ष पहले शोध कार्य करने वाले डॉ. राम विलास भारती का हृदयगति रुक जाने से असामयिक निधन हो गया। डॉ. भारती की दो प्रकाशित कृतियों में ‘बीसवीं सदी में दलित समाज’ और चार खंडों में ‘आंबेडकर इन पार्लियामेंट’ हैं। लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान समाज के निर्धन, दबे-कुचले तबके के लोगों के उत्थान के लिए सतत कार्य करना था। इसके लिए वह न केवल मऊ जनपद, बल्कि आसपास के जनपदों में अत्यधिक प्रसिद्ध थे। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि वह कभी भी डेढ़-दो हजार की भीड़ इकट्ठी कर सकते थे। हर साल वे अपने क्षेत्र के 120 लड़के-लड़कियों की पूरे साल की फीस छात्रवृत्ति के रूप में अपनी जेब से देते थे। शायद ही कोई ऐसा महीना होता, जिसमें वे कोई गोष्ठी न आयोजित करते हों। दलित चेतना को विकसित करने में वे सतत रूप से लगे हुए थे। इसी के साथ वे सामाजिक समरसता की स्थापना के लिए भी प्रयासरत रहते थे। संप्रति वे उत्तर प्रदेश इतिहास कांग्रेस के ज्वाइंट सेक्रेटरी भी थे। उम्र में उनसे बड़े कुछ लोग, जो उनसे नजदीक से जुड़े हुए थे, राम बिलास को मेरा मानस पुत्र कहते थे। निश्चित रूप से मैंने आज न केवल एक शिष्य, बल्कि मानस पुत्र खो दिया है, जिसकी पीड़ा की अनुभूति केवल पुत्र खोने वाले पिता ही कर सकते हैं।”

राम बिलास भारती के दशकों पुराने मित्र और उनके गृह नगर के निवासी, पूर्व जिला विद्यालय निरीक्षक शिव चंद्र राम उनके साथ अपने रिश्ते और उनकी सामाजिक भूमिका को याद करते हुए लिखते हैं–

“26 सितंबर, 2026 की वह काली शाम, जिसने दलित-वंचित समाज के लिए बेहतर समाज निर्माण के स्वप्नद्रष्टा डॉ. राम बिलास भारती को हमसे छीन लिया। विभागीय अनुमति के बाद दक्षिण दिल्ली स्थित सीसीआरटी में प्रशिक्षण के लिए आए डॉ. राम बिलास भारती का दिल का दौरा पड़ने से आकस्मिक देहावसान हो गया। डॉ. राम बिलास भारती ने एक आंबेडकरवादी चिंतक, बेहतर शिक्षक, अच्छे सामाजिक कार्यकर्ता एवं संगठनकर्ता के रूप में समाज में, विभाग में और अपने मित्रों के बीच अपने अध्यवसाय से एक विशिष्ट जगह बनाई।

डॉ. भारती ने एक शिक्षक के रूप में अनेक नवाचार एवं प्रयोग किए। चाहे वह गरीब प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं के लिए जगपूरनी देवी बरखू शैक्षिक समृद्धि छात्रवृत्ति योजना को लागू करना हो, जूनियर हाई स्कूल के शिक्षक के रूप में कार्य करते हुए अपने विद्यालय से पास हुए बच्चों को उच्च कक्षाओं में प्रवेश दिलाकर उनका आर्थिक भार वहन करना हो या अपने विद्यालय को अद्वितीय बनाए रखने के लिए शैक्षिक समृद्धि बैंक का निर्माण, इसरो के सहयोग से विज्ञान लैब का निर्माण अथवा विद्यालय का अपने वेतन से सौंदर्यीकरण – ऐसे अनेक प्रयोगों के माध्यम से उन्होंने प्रदेश और जनपद में एक उदाहरण प्रस्तुत किया। विद्यालय के सौंदर्यीकरण में बुद्ध दर्शन और संस्कृति का प्रभाव परिसर में स्पष्ट दिखाई देता था।

जहां तक मेरे व्यक्तिगत संबंधों की बात है, बरबस याद आ रहा है कि कुछ भी नया करने, लिखने या किसी कार्यक्रम का विषय और रूपरेखा तय करते समय एक-एक शब्द और उनके भावों पर मेरे साथ गंभीर चर्चा और विमर्श एक सामान्य बात थी। व्यक्तिगत समस्याओं पर चर्चा होते-होते प्रायः बातें एक बेहतर समाज के निर्माण, उसमें फैले अंधविश्वास और बुराइयों को दूर करने, नशामुक्ति, समाज को सही दिशा में जागरूक करने की चिंताओं और अपने स्तर पर कुछ कर सकने वाली रणनीतियों पर खत्म होती थीं।

डॉ. भारती ने पिछले लगभग चार-पांच वर्षों में अपने माता-पिता, दो भाइयों, भतीजे और रिश्तेदारों को असमय खोने के दर्द को अपने अंदर जज्ब किया। अनेक परेशानियों में रहते हुए भी समाज और शिक्षा के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने की ललक और उत्साह कभी कम नहीं हुआ। जब संविधान दिवस को सरकारों ने औपचारिक रूप नहीं दिया था, उसके पूर्व ही हम सबने मिलकर संविधान दिवस पर चर्चाएं और होर्डिंग लगाना शुरू कर दिया था। डॉ. आंबेडकर का दर्शन और भारत का संविधान उनके मन में रचा-बसा था। उनके विद्यार्थियों में अधिकांश को भारतीय संविधान की प्रस्तावना हिंदी या अंग्रेजी में मौखिक रूप से याद थी। प्रायः सभी कार्यक्रमों में मूर्तियों के बजाय प्रतीक रूप में संविधान को सामने रखकर कार्यक्रम किया करते थे। यह संविधान के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का द्योतक था।

डॉ. राम बिलास एक लेखक और विचारक के रूप में भी समाज में जाने जाते थे। पांच विषयों में पीजी एवं पीएचडी के साथ वे पत्रकारिता में गोल्ड मेडलिस्ट थे। जूनियर हाई स्कूल धरौली, जनपद मऊ में एक आदर्श शिक्षक के रूप में काम करते हुए उनकी विशिष्ट एवं उल्लेखनीय सेवाओं के दृष्टिगत 2025 में उन्हें राज्यपाल शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लेखक के रूप में उनकी प्रकाशित पुस्तक ‘20वीं सदी में दलित समाज’ है। अभी अनामिका प्रकाशन से प्रकाशित होने वाली पुस्तक ‘डॉक्टर अंबेडकर इन पार्लियामेंट’ प्रकाशनाधीन है। 26 सितंबर, 2026 को प्रकाशन के संदर्भ में ही वे सीसीआरटी से थोड़ी देर के लिए अवकाश लेकर अनामिका प्रकाशन के प्रकाशक से मिलने गए थे, जो उनकी अंतिम मुलाकात साबित हुई।

एक विशेष उपलब्धि के रूप में भारत और दुनिया में प्रचलित कैलेंडरों के अध्ययन के उपरांत डॉ. राम बिलास भारती ने हम सब से विचार-विमर्श के बाद एक भारतीय कैलेंडर का निर्माण किया, जो आंबेडकरवादी-बौद्ध संस्कृति के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा। अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि पूरी दुनिया में प्रचलित कैलेंडर या तो खगोलीय घटनाओं पर आधारित हैं या उनके दिनों और महीनों के नाम उन देशों और समाजों के इतिहास में उल्लेखनीय या विशिष्ट कार्य करने वाले नायकों के नाम पर हैं, किंतु भारत में इसकी उपेक्षा हुई है।

भारतीय संस्कृति के महान नायकों – तथागत बुद्ध, सम्राट अशोक, कबीर, डॉ. आंबेडकर, फुले दंपती, कांशीराम आदि – के नाम पर महीनों और पक्षों के नाम रखकर उन्होंने एक नवीन कैलेंडर तैयार किया, जिसे ‘भारतीय कैलेंडर’ नाम दिया गया। उन्होंने न केवल नया कैलेंडर तैयार किया, बल्कि उसके विभिन्न पृष्ठ भी किसी न किसी रूप में समाज को सचेत और जागरूक करने वाले बनाए। इसकी मुख्य थीम थी – “कोई भी दिन, तिथि या प्रहर शुभ या अशुभ नहीं होता। किसी भी मांगलिक कार्य के लिए जब अपनी या दोनों पक्षों की सहमति, आवश्यकता, सामर्थ्य और उचित समय हो, तब उसे किया जाए।” यह एक वैज्ञानिक दृष्टि-संपन्न समाज बनाने का आधार है।

डॉ. राम बिलास भारती वास्तव में विज्ञानसम्मत, संविधानसम्मत समाज और नई पीढ़ी के निर्माण के सही मायने में स्वप्नद्रष्टा थे। उनका निधन शिक्षा जगत और विशेषकर दलित-बहुजन समाज की अपूरणीय क्षति है।”

स्मृति शेष : डॉ. राम बिलास भारती

भारतीय जीवन बीमा निगम में कार्यरत कवि संजय आर्य लिखते हैं–

“यह हृदय विदारक सूचना सुनकर मन को विश्वास नहीं हो रहा है कि हमारे पुराने मित्र, घोसी के निकट ग्राम माछिल जमीन निवासी डॉ. राम बिलास भारती अब नहीं रहे। डॉ. राम बिलास भारती एक सच्चे आंबेडकरवादी, समाज सुधारक, इतिहासविद्, राज्यपाल द्वारा सम्मान प्राप्त एक अद्वितीय शिक्षक, मानवतावादी चिंतक, लेखक और समाज के लिए परिवर्तनकामी ऊर्जा से सराबोर एक महत्वाकांक्षी युवक थे। उनके मन में सामाजिक बदलाव के लिए और अपने छात्रों की बेहतरी के लिए बहुत कुछ करने की छटपटाहट थी। उन्हें अपने गांव से, अपने विद्यालय से और अपने विद्यार्थियों से अगाध प्रेम था। वे एक समाजोन्मुखी व्यक्तित्व एवं कर्तव्यपरायण शिक्षक थे। उन्होंने अपने वेतन का बड़ा हिस्सा लगाकर अपने विद्यालय को आदर्श, प्रेरक और दर्शनीय शैक्षणिक परिसर बना दिया था। ऐसा दूसरा उदाहरण शायद ही देखने को मिले। उन्हें उत्तर प्रदेश की वर्तमान राज्यपाल द्वारा सम्मानित भी किया गया था।

तथागत गौतम बुद्ध और बाबा साहेब को एक युगप्रवर्तक और महामानव के रूप में युगों-युगों तक स्थापित करने के लिए डॉ. राम बिलास भारती ने एक ऐतिहासिक कार्य शुरू किया। उन्होंने गौतम बुद्ध के जन्म से ‘बुद्धाब्द’ और बाबा साहेब के जन्म से ‘अंबेडकराब्द’ नाम से कालगणना की शुरुआत की। इस कालगणना को सामाजिक मान्यता दिलाने के लिए वे प्रतिवर्ष 14 अप्रैल को एक आकर्षक कैलेंडर स्वयं प्रकाशित करवाते थे और दूर-दूर तक उसका वितरण भी करते थे।”

दलित इंटलेक्चुअल फोरम के मुख्य कन्वीनर डॉ. अलख निरंजन ने लिखा–

“27 सितंबर 2026 की सुबह एक मित्र के द्वारा हृदयविदारक एवं अत्यंत पीड़ादायी सूचना मिली कि डॉ. राम बिलास भारती अब इस दुनिया में नहीं रहे। मैं कॉलेज के दिनों से उनसे परिचित था। ज्ञान की ललक एवं सामाजिक समस्याओं से जूझना उनकी मूल प्रवृत्ति थी। बेसिक शिक्षा विभाग में प्रधानाध्यापक के रूप में उन्होंने अपने स्कूल का एक शानदार मॉडल खड़ा किया था। इसके लिए उनको महामहिम राज्यपाल द्वारा पुरस्कृत भी किया गया था। शिक्षा विभाग की नौकरी के साथ-साथ वे सामाजिक एवं शैक्षिक गतिविधियों में भी समान रूप से सक्रिय थे।

अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति/जनजाति कैटेगरी के कर्मचारियों-अधिकारियों को सभी विभागों में पदावनति का दंश झेलना पड़ा था। लेकिन डॉ. राम बिलास भारती के संघर्षशील नेतृत्व ने बेसिक शिक्षा में कार्यरत शिक्षकों को इस अभिशाप से बचा लिया था।

कोई उनके लिए पराया नहीं था, चाहे जाति के आधार पर, चाहे धर्म के आधार पर, चाहे शिक्षा-दीक्षा के आधार पर। राजनीतिक या गैर-राजनीतिक, सभी से उनका दोस्ताना था। लेकिन सबसे घुलते-मिलते हुए भी वे अपने तरह के अनूठे व्यक्ति थे। उनकी अपनी पहचान थी।”

डॉ. राम बिलास भारती की अंतिम यात्रा में शामिल लोग

प्रो. चंद्रभूषण गुप्त ‘अंकुर’ लिखते हैं—

“राम बिलास भारती गोरखपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से पीएचडी करने वाले पहले दलित छात्र थे। वे हमारे छात्र रहे और इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस तथा उत्तर प्रदेश इतिहास कांग्रेस के अधिवेशनों में हम अक्सर साथ-साथ जाया करते थे। विद्यार्थी जीवन में भारती एक अच्छे संगठनकर्ता थे। इतिहास कांग्रेस में चलने के लिए विद्यार्थियों को तैयार करना, रिजर्वेशन करवाना, रास्ते में सबकी सुविधाओं का ख्याल रखना—ये सारे काम वे सहजता से किया करते थे।

उनके पास इतने पब्लिकेशन हैं कि वे किसी भी विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर, क्या प्रोफेसर, बन सकते थे। लेकिन जब-जब उनका चयन होता था, यह बात फैला दी जाती थी कि वे राजनीतिक व्यक्ति हैं और विभाग चलाने में उनके रहने से दिक्कत आएगी। लिहाजा बेसिक शिक्षा में वे नौकरी करते रहे। लेकिन उन्होंने वहां भी नए कीर्तिमान स्थापित किए। ऐसा स्कूल बनाया कि लोग उसे देखने आते थे। राज्यपाल से पुरस्कार मिला, मुख्यमंत्री से सराहना मिली।

भारती अपने गांव माछिल और मऊ में बहुजन समाज से जुड़े विषयों पर संगोष्ठियां और अन्य आयोजन करते रहते थे। मैं, प्रोफेसर रिजवी, प्रोफेसर सुधाकर लाल श्रीवास्तव, प्रोफेसर सुभी धुसिया जैसे कई लोग गोरखपुर विश्वविद्यालय से उनके गांव और मऊ में आयोजित इन कार्यक्रमों में शामिल होने जाते रहे हैं। उन्होंने अपने गांव में अपने घर में एक बड़ा पुस्तकालय गांव के बच्चों की सुविधा के लिए स्थापित किया।

अभी दो माह पूर्व ही उन्होंने शादी की और हम सब उनकी शादी में शामिल होने उनके गांव गए थे। देश भर से कई बड़ी हस्तियां शादी में आई थीं। बारिश के कारण व्यवस्था गड़बड़ा गई थी। कल उन्होंने दिल्ली से एक फेसबुक पोस्ट डाली थी कि वह किसी ओरिएंटेशन प्रोग्राम में दिल्ली आए हैं। तब यह नहीं पता था कि यह पोस्ट उनकी अंतिम फेसबुक पोस्ट होगी। मन अंदर से बहुत दुखी है। किसी का भी जाना दुखद होता है, लेकिन असमय जाना ज्यादा दुखद है। अपने प्रिय विद्यार्थी, बेहतरीन शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और नेता, इतिहास के सजग विद्यार्थी राम बिलास भारती को मैं हृदय से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।”

अपने प्रिय शिक्षक को विदाई देते बिलख पड़ीं छात्राएं

चर्चित शायर बी.आर. विप्लवी फेसबुक पर राम बिलास भारती के व्यक्तित्व को याद करते हुए लिखते हैं–

“डॉक्टर राम बिलास भारती एक हंसमुख, मिलनसार, कर्मठ, अनुशासित तथा हर दिल अजीज इंसान थे, जो बहुजन समाज के आदर्शों को स्थापित करने के लिए लगातार प्रयासरत थे। उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन की सुख-सुविधाओं को एक तरफ रखकर समाज की कठिनाइयों को दूर करने के लिए जागरूकता मिशन चलाया तथा शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान किया।

उत्तर प्रदेश की बेसिक शिक्षा से जुड़े रहने वाले डॉक्टर राम बिलास भारती ने प्रायः उपेक्षित समझे जाने वाले बेसिक/प्राथमिक विद्यालय को अपनी कर्मठता, लगन तथा दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर भौतिक, शैक्षणिक तथा मानसिक विकास के उच्च स्तर पर ले जाने के लिए सीमित साधनों के बल पर ही हर तरह से सुसज्जित किया और उस क्षेत्र के जनमानस में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।”

लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रभूषण सिंह यादव राम बिलास भारती के मिशनरी व्यक्तित्व को याद करते हुए लिखते हैं–

“पूरे पूर्वांचल में डॉ. राम बिलास भारती जी सरीखा मिशनरी व्यक्ति शायद ही कोई हो, क्योंकि अपनी लगभग 50 साल की जिंदगी अविवाहित रहते हुए शिक्षक की नौकरी करते हुए अपने अनगिनत बच्चों को अपने तनख्वाह से पढ़ने को उद्यत किया, जो अब उनके न रहने से अनाथ हो गए हैं।

डॉ. राम बिलास भारती जी आंबेडकरवाद के ऐसे पहरुआ थे कि क्या कहना! आपका घर पूरा का पूरा आंबेडकरमय देखा जा सकता था। बुद्ध आपके रोम-रोम में थे। आपके आंबेडकरमय एवं बौद्धिज्म के प्रति पूर्ण समर्पण के ही कारण मेरी मुलाकात सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हुई।

मुझे याद है कि मैं आपसे और राकेश यादव जी से वर्षों पहले मिला था। साथी राकेश यादव जी भी आपके ही साथ बेसिक में शिक्षक थे और कट्टर आंबेडकरवादी थे, जो कोरोना में हम सबको छोड़कर चले गए। अब आप 2026 में अनंत यात्रा पर निकल गए। यह हम सबके एवं समाज के साथ बहुत बड़ा अन्याय है, जिसका प्रतिकार उफ और हाय के साथ करने के सिवा कुछ नहीं किया जा सकता है।

क्या लिखूं, कितना लिखूं? क्योंकि डॉ. भारती जी इतिहास बनकर अब एक मुकम्मल किताब हैं, जिनके पन्ने अनंत हैं। इतनी अल्पायु में आपने जो कृतित्व किया है, जैसा व्यक्तित्व बनाया है, वैसा करने, बनने या बनाने में पीढ़ियां लग जाती हैं।

क्या स्कूल, क्या घर, क्या समाज—सर्वत्र डॉ. राम बिलास भारती जी का अपना नूतन और अभिनव प्रयोग था, जो न सिर्फ अनुकरणीय, बल्कि अपने आप में अद्वितीय है। लेकिन ऐसे अभिनव प्रयोगों के जनक का इस दुनिया में न रहना बेहद अफसोसनाक है।”

राम बिलास भारती के मित्र, सिंचाई विभाग में अधीक्षण अभियंता नागेंद्र गौतम अपने मित्र को इन शब्दों में याद किया–

“डॉ. राम बिलास भारती पिछले 25 साल से हमारे अभिन्न मित्र रहे, जब वे गोरखपुर यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे थे। बाबा साहेब के सच्चे अनुयायी एवं मिशन के सिपाही थे। मान्यवर कांशीराम के मिशन के अनुरूप पूरा जीवन शादी एवं पारिवारिक जिम्मेदारी से इतर समाज के लिए समर्पित किया।

वे अपने घर पर बहुजन लाइब्रेरी एवं कई स्थानों पर बच्चों एवं समाज के लिए लाइब्रेरी अपने वेतन से बनाते रहे। जनपद मऊ के विकासखंड घोसी में स्थित जूनियर हाई स्कूल, जहां वे कई वर्षों से प्रधानाध्यापक रहे, उस स्कूल को अपने वेतन के पैसे से आधुनिकीकरण कराकर मॉडल स्कूल के रूप में विकसित कराया। इसमें लाइब्रेरी, विज्ञान लैब, स्मार्ट क्लास, बच्चों के लिए बैंक और सेमिनार हॉल आदि बनाए। पूरे स्कूल को संविधानमय, बुद्धमय जीवन एवं वैचारिकता के केंद्र के रूप में विकसित किया।

पिछले चार वर्षों में उनके बड़े भाई, जो टेलीकॉम में डायरेक्टर थे, एवं उनके माता-पिता, भतीजे एवं भांजे का आकस्मिक निधन हो गया। तदुपरांत भी राम बिलास जी मिशन के लिए प्रतिदिन लगातार कार्य करते रहे।”

प्रतिबद्ध आंबेडकरवादी डॉ. राम बिलास भारती के अंतिम दर्शन के लिए कई गांवों से महिलाएं भी पहुंचीं

शिक्षा विभाग में उच्च पद पर रहे सेवानिवृत्त के.सी. भारतीय उनके निकट सहयोगी रहे हैं। उन्होंने लिखा–

“ऐसी विभूति बार-बार जन्म नहीं लेती है। मैं नि:शब्द हूं। मेरे पास बोलने को शब्द नहीं हैं। विश्वास नहीं हो रहा है कि डॉ. राम बिलास भारती का परिनिर्वाण हो चुका है। लेकिन नियति और प्रकृति को यही मंजूर था। वह एक आधुनिक आंबेडकर की भूमिका में संपूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करते आ रहे थे। मैं प्रकृति से अनुरोध करता हूं कि उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें और उनके परिवारीजनों को इस दुख की घड़ी में सहन करने की शक्ति प्रदान करें। मैं उनको विनम्र आदरांजलि अर्पित करता हूं। जय भीम, नमो बुद्धाय।”

लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से सेवानिवृत्त प्रोफेसर कालीचरन स्नेही ने लिखा–

“वे आंबेडकर मिशन को अपना जीवन समर्पित कर चुके थे। उनका अचानक दुनिया से चले जाना हम सबके लिए किसी सदमे से कम नहीं है।”

डॉ. राम बिलास भारती के बचपन के सहपाठी संजीव श्रीवास्तव ने लिखा–

“वे एक उच्च कोटि के इंसान थे।”

राम बिलास भारती का जीवन इन तीनों मूल्यों – शील, करुणा और प्रज्ञा – के समन्वय का एक उदाहरण था। शिक्षक के रूप में उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया; आंबेडकरवादी चिंतक के रूप में संविधान, समानता और सामाजिक न्याय को अपने विचारों का आधार बनाया; और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने अपने संसाधनों और श्रम को वंचित समाज तथा नई पीढ़ी के निर्माण में लगाया।

(प्रस्तुति : डॉ. सिद्धार्थ रामू)


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