गत 25 जुलाई, 2026 को भारतीय कॉकरोचों ने जो कामयाबी हासिल की वह सभी जातियों, धर्मों, वर्गों और विचारधारा के युवाओं को जागृत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। हम सब जानते हैं कि भारतीय शिक्षा प्रणाली स्वाधीनता के समय से ही हमारे देश और हमारे युवाओं के लिए हितकर नहीं रही है। कॉकरोच जनता पार्टी ने शिक्षा प्रणाली पर बहस और चर्चा के एक नए दौर की शुरुआत की है। कॉकरोच आंदोलन ने सन् 1968 के प्रसिद्ध पेरिस छात्र आंदोलन – जो जनरल डी. गॉल और उनकी दक्षिणपंथी शैक्षणिक नीतियों के खिलाफ था – को भी पीछे छोड़ दिया है। पेरिस छात्र आंदोलन ने फ़्रांसीसी युवाओं को जागृत किया और उसके कारण फ्रांस की शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन हुए। मगर जनरल गॉल इसके अगले साल हुए चुनावों में फिर जीत गए। पेरिस आंदोलन को मानव इतिहास का सबसे प्रसिद्ध छात्र आंदोलन माना जाता है।
लेकिन सन् 2026 का भारतीय छात्र आंदोलन उससे कहीं अधिक बड़ा था, उससे कहीं बेहतर ढंग से संचालित था और उसके लक्ष्य कहीं अधिक साफ़ और स्पष्ट थे। यह आंदोलन आरएसएस-भाजपा की धार्मिक कट्टरपंथी सरकार के खिलाफ था। जनरल डी. गॉल प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्रिमंडल के सदस्य जैसे किसी सौ साल पुराने लेकिन फिर भी गैर-पंजीकृत और ऊंची जातियों द्वारा नियंत्रित हिंदुवादी संगठन आरएसएस के प्रभाव में नहीं थे। कहने को भारत पर भारतीय जनता पार्टी का शासन है, लेकिन सरकार की डोर आरएसएस के हाथों में है, जिसके बारे में दुनिया अब पहले से कहीं ज्यादा जानती है। भारतीय शिक्षा प्रणाली का विचारधारात्मक आधार आरएसएस निर्धारित करता है और सरकार के पास उसे लागू करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता।
कॉकरोच आंदोलन ने देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने पर मजबूर किया। इसके साथ ही, सरकार को उसकी यह मांग भी माननी पड़ी कि नीट के पेपर लीक और उस परीक्षा के रद्द होने के बाद देश के अलग-अलग इलाकों में डॉक्टर बनने का सपना पाले जिन विद्यार्थियों ने आत्महत्या की, उनके परिवारों को मुआवजा दिया जाए। साथ ही यह भी तय किया गया कि आंदोलन में भाग लेने वाले छात्रों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज नहीं किए जाएंगे।
छात्रों का आंदोलन लगातार 36 दिनों तक चला। इसकी सफलता से उन लोगों में एक आशा जागी है जो पिछले 12 वर्षों से शिक्षा प्रणाली पर दक्षिणपंथियों के बढ़ते दबदबे के सामने स्वयं को असहाय अनुभव कर रहे हैं। विपक्ष की आलोचना से सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही थी।
हालांकि यह देखा जाना बाकी है कि यह आंदोलन भारतीय शिक्षा प्रणाली को नया आकार देने में कहां तक सफल होता है। अवैज्ञानिक, दकियानूसी और आदिम सोच को बढ़ावा देने वाले पाठ्यक्रमों को लागू करने और शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों को धार्मिक रंग में रंगे जाने से शिक्षा प्रणाली को जबरदस्त नुकसान पहुंचा है। आरएसएस ने लगभग सभी सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं पर कब्ज़ा कर लिया है और संघ से जुड़े कुबेरपतियों ने एक समानांतर शैक्षणिक तंत्र खड़ा कर दिया है जो केवल और केवल धनिकों की संतानों के लिए आरक्षित है। शिक्षा के क्षेत्र में दक्षिणपंथियों के एजेंडा में जाति भी एक महत्वपूर्ण कारक है।
ऊंची जातियों के धनिकों को निजी क्षेत्र में शिक्षा और रोज़गार के अवसर उपलब्ध हैं। भाजपा सरकार ने जो परीक्षा प्रणाली लागू की है उसने धनी परिवारों के बच्चों के लिए कोचिंग के ज़रिए शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश पाना आसान बना दिया गया है। रही-सही कसर प्रश्नपत्रों को लीक कर पूरी कर दी जाती है। पेपर लीक अकस्मात् नहीं होते। वे प्रणालीगत होते हैं और उन्हें ऊपर से स्वीकृति हासिल होती है। कभी-कभी पोल खुल जाती है मगर अधिकांश मामलों में आरएसएस-भाजपा और बाज़ार पर काबिज़ बड़े व्यापारिक घरानों के नियंत्रण वाले चैनलों के ज़रिए पेपर लीक की खबर को दबाया जाता है। अगर पेपर लीक से केवल दलित, ओबीसी और आदिवासी युवा प्रभावित हो रहे होते तो यह कभी मीडिया के लिए इतना बड़ा मुद्दा नहीं बनता। मगर इस बार उच्च जातियों के मध्यमवर्गीय परिवारों के छात्र इसके शिकार हो गए। यह वर्ग आरएसएस-भाजपा की आर्थिक रीढ़ भले ही न हो मगर उसका वोट बैंक तो है ही। इसके साथ ही यह भी सही है कि अब तो आरएसएस ने चुनाव आयोग की मदद से ईवीएम में गड़बड़ियां कर वोट जुगाड़ने की तरकीब में महारत हासिल कर ली है और इसलिए अब शायद उसे ऊंची जातियों के हिंदू मतदाताओं की भी विशेष परवाह नहीं है। संघ-भाजपा जानते हैं कि हर सरकारी संस्था उनके साथ है क्योंकि उन सबमें उनकी विचारधारा में रचे-बसे लोगों का बोलबाला है। वे यह भी मानते है कि न्यायपालिका भी अब उनके नियंत्रण में है। इस तरह की शासन व्यवस्था से भविष्य में राष्ट्र के मूलभूत ढांचे में किस तरह के बदलाव आएंगे यह तो आगे चलकर ही पता चलेगा।
इस पृष्ठभूमि में अमेरिका में रह रहे अभिजीत दिपके के ज़रिए जेन ज़ी की कॉकरोच जनता पार्टी अस्तित्व में आई।
कॉकरोच जनता पार्टी दरअसल है क्या?
अब से कुछ महीने पहले अगर उच्च जाति का कोई शिक्षित व्यक्ति या कोई विदेशी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का नाम सुनता तो निश्चय ही वह उसे किसी अर्द्धविक्षिप्त व्यक्ति का फूहड़ और भद्दा मज़ाक मान कर सिरे से ख़ारिज कर देता। इस व्यंग्य के पीछे थी– भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की एक टिप्पणी। उन्होंने खुली अदालत में बेरोजगार नौजवानों को ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ बताया। कॉकरोच जनता पार्टी ने कॉकरोच के बारे में सामान्य समझ को चुनौती दी। उच्च जाति के किसी लड़के या लड़की के लिए खुद को कॉकरोच से जोड़ना असंभव होता। आखिर कॉकरोच को एक गंदा और घिनौना जीव माना जाता है जो रसोईघरों के कोनों में, और नालियों और पाईपों के गीले कचरे में छुपा रहता है। कॉकरोच जब रसोईघरों में खाने-पीने की चीजों के आसपास दिखता है तो लोग – और विशेषकर महिलाएं – उसे वितृष्णा की दृष्टि से देखते हैं। हमारे देश में खाना पकाने का काम अधिकांशतः महिलाएं करती हैं। हालांकि बड़ी होटलों में अधिकांश शेफ पुरुष होते हैं। जाहिर है कि मुख्य न्यायाधीश ने जब बेरोजगारों को कॉकरोच बताया तब वे उनके प्रति अपनी वितृष्णा का इज़हार कर रहे थे। हालांकि बाद में उन्होंने सफाई दी कि उनका इशारा नाकाबिल वकीलों की ओर था जो अदालतों का समय बर्बाद करते हैं।
भारत के जातिग्रस्त समाज में कॉकरोच शब्द के सामाजिक निहितार्थ भी हैं। लोगों ने मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी की अपनी-अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि और विचारधारात्मक झुकाव के आधार पर व्याख्या की। दिपके ने उसे दलित पहचान के नजरिए से देखा।

धनिक वर्गों, जिनमें मुख्यतः ऊंची जातियों के लोग शामिल हैं, में कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल दलितों के लिए किया जाता है। उन्हें सबसे गंदा माना जाता है क्योंकि अतीत में वे चमड़े के काम, साफ़-सफाई और अन्य ऐसी उत्पादक गतिविधियों में संलग्न रहे हैं, जिन्हें गंदा माना जाता रहा है। अभिजीत दिपके दलित हैं और वे उस सामाजिक और शैक्षणिक वातावरण में पले-बढ़े हैं, जिसमें जातिगत नामकरणों और पहचानों को निडरता से क़ुबूल किया जाता है – “हां, हम दलित हैं। हां, हम चांडाल हैं। हां, हम मोची हैं।” अभिजीत ने मुख्य न्यायाधीश के कॉकरोच के रूपक को उसके सिर के बल खड़ा कर दिया। उन्होंने दबंगई से लिखा, “हां, सभी बेरोजगार कॉकरोच हैं। मगर क्या होगा यदि वे सब एक हो जाएं?” उन्होंने मुख्य न्यायाधीश के लांछन को लोगों को एक करने का औजार बना लिया। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में दलित पहचान के अपनी विशिष्ट जगह बनाने के पहले कोई दलित युवा ऐसा नहीं कर पाता। ऊंची जाति का कोई युवा इस अपमान को सभी धर्मों और जातियों के बेरोजगारों का एक राजनीतिक-सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करने के लिए इस्तेमाल नहीं कर पाता। यह इस तथ्य के बावजूद कि सब एक ही नौका पर सवार हैं – बेरोज़गारी की नौका।
बेरोज़गारी के निर्माताओं – आरएसएस-भाजपा और एकाधिकारी व्यापारिक घराने – के खिलाफ गुस्से ने कॉकरोच जनता पार्टी के गठन की घोषणा के साथ एक नाटकीय स्वरूप अख्तियार कर लिया – विशेषकर बेरोजगारों और ‘आलसियों’ के उसके घोषणापत्र के चलते। कॉकरोचों को आलस्य का पर्याय भी माना जाता है। भारत में दलित चाहे जितना श्रम करें, ऊंची जातियों के लोग उन्हें आलसी ही मानते हैं। इसके विपरीत हमें यह बताया जाता है कि शोषक धनिक वर्ग कड़ी मेहनत करता है। रातों-रात सोशल मीडिया पर अभिजीत दिपके सातों दिन 24 घंटे काम करने वाले ‘आलसी’ कॉकरोच बन गए।
शुरुआत में नई पार्टी के समर्थक मुख्यतः दलित और आदिवासी थे। कुछ ओबीसी भी उसके साथ जुड़ गए। मगर धीरे-धीरे ओबीसी और बेरोजगार महिलाएं भी इससे जुड़े। और अंततः आरएसएस-भाजपा के कट्टर समर्थकों और बड़े व्यापारिक घरानों की नौकरी करने वाले युवाओं को छोड़ कर, सभी अभिजीत की पार्टी से ऑनलाइन जुड़ गए। अभिजीत जब बोस्टन में थे तभी से उन्होंने अपनी पार्टी के प्रवक्ताओं को चुनने में काफी सावधानी बरती। युवाओं को गोलबंद करने में उन्होंने जाति का तनिक भी प्रयोग नहीं किया। उनकी पार्टी का साथी बनने के लिए यह काफी था कि संबंधित व्यक्ति ‘आलसी’ (असल में श्रमजीवी) हो और अपनी पहचान को कॉकरोच अर्थात लांछित बेरोजगार – से जोड़ सके।
अभिजीत में नेतृत्व के गुण
अभिजीत पहले ऐसे दलित नेता हैं जो सभी जातियों, समुदायों और धर्मों के युवाओं और यहां तक कि उनके माता-पिताओं को भी स्वीकार्य हैं। उन्होंने और उनकी टीम ने 6 जून से लेकर 25 जुलाई तक इस आंदोलन को संभाला। 6 जून को सीजेपी ने जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन का आगाज किया था और 25 जुलाई को इस आंदोलन को समाप्त कर दिया गया। जिस ढंग से इस आंदोलन का संचालन किया गया वह भारत के इतिहास में बेजोड़ है। काफी कठिन परिस्थितियों के बावजूद आंदोलन ने अपना लक्ष्य हासिल किया और इसकी समाप्ति राष्ट्रगान से हुई। निःसंदेह भारत के इतिहास में यह अपनी तरह का अनोखा आंदोलन था। युवा लड़के और लड़कियों की टीमों ने प्रदर्शनकारियों, मीडिया, पुलिस और अंततः सरकार से बातचीत में विलक्षण कौशल का परिचय दिया। उन्होंने दिखा दिया कि वे अपने आंदोलन के प्रति प्रतिबद्ध हैं, उन्हें अपनी क्षमताओं पर दृढ़ विश्वास है और उनकी सोच साफ है। आंदोलन के नेताओं ने अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में काफी बेहतर ढंग से संवाद किया। अभिजीत तो धारा प्रवाह मराठी भाषा भी बोल लेते हैं।
आंबेडकर एक महान बुद्धिजीवी, वक्ता और लेखक थे। अभिजीत में संवाद कौशल है और वे प्रभावशाली वक्ता हैं। उन्होंने कभी भावनाओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। मगर इसके साथ ही वे अपने श्रोताओं को प्रेरित करने में भी सफल रहे।
अभिजीत और उनके साथियों ने बुद्धिमत्तापूर्वक हमारे कुछ पड़ोसी देशों में जेन ज़ी के विरोध के तरीके से परहेज़ किया। उन्हें यह मालूम था कि श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में जेन ज़ी आंदोलनों ने बाहुबल और हिंसा का उपयोग कर अपने-अपने देशों की सरकारों को चुनौती दी। अगर अभिजीत और उनके साथियों ने यही रास्ता अपनाया होता तो उन्हें पूरी तरह कुचल दिया जाता और उनकी बड़ी हार होती। उसकी जगह उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध का गांधीवादी और आंबेडकरवादी रास्ता अपनाया और अपनी लड़ाई जीत ली।
उन्होंने अन्ना हजारे के ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन से भी सबक सीखे। उस समय भारतीय मीडिया के अधिकांश हिस्से ने सरकार के खिलाफ इस आंदोलन का साथ दिया था। इसके विपरीत सीजेपी के आंदोलन के दौरान वे ही मीडिया हाउस सरकार की गोद में बैठे रहे और उन्होंने आम लोगों को भ्रमित करने का प्रयास किया। लेकिन शिक्षित जेन ज़ी कार्यकर्ताओं ने अपने मोबाइल फोनों का जबरदस्त इस्तेमाल किया। उन्होंने रीलें बनाईं जो सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो गईं। नतीजा यह कि उनके आंदोलन के नॅरेटिव को मुख्यधारा का मीडिया नियंत्रित नहीं कर सका। सोशल मीडिया के ज़रिए उन्होंने जनता से सीधे संवाद किया।
सौरव दास, आशुतोष रंका और रत्ना सिंह, विजेता दाहिया, आफरीन नवाज़ व दीपक बालियान जैसे अभिजीत की टीम के मुख्य सदस्यों ने जनता और अन्यों से संवाद स्थापित करने और सरकार से बातचीत (विशेषकर सौरव और आशुतोष) करने में शानदार काम किया। उन्होंने कभी अपने व्यापक लक्ष्य को ओझल नहीं होने दिया।
सोनम वांगचुक के अनशन ने निश्चित रूप से आंदोलन को एक नई आभा दी। मगर भूख हड़ताल के विरोध के इस तरीके की अपनी कमज़ोरियां हैं। 21वीं सदी के युवाओं ने लोगों को लामबंद करने और उन्हें लंबे समय तक किसी भी आंदोलन से जोड़े रहने के नए तरीके ढूंढ लिए हैं। विरोध के गांधीवादी तरीके में सोते-जागते, गाना गाते, नाचते, भाषण देते हुए और अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए विरोध नहीं किया जाता। लेकिन सीजेपी के आंदोलन ने भारत के लोगों की मानसिकता को, उनकी सोच को बदलकर रख दिया। आरएसएस-भाजपा के चिंतकों और नेताओं ने कई दशकों से भारतीयों को विभाजित कर रखा था और उनकी बुद्धि पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आरएसएस करीब एक सदी से भारतीयों के मस्तिष्क और बुद्धि के विकास में रोड़े अटकाता आ रहा है। वे न तो स्वयं अनशन करते हैं, न ही अनशन करने वालों का सम्मान करते हैं और न ही उनकी बात सुनते-मानते हैं। क्या उन्होंने कभी गांधी के उपवास और उनके आत्मबलिदानी तरीकों का सम्मान किया? वांगचुक को भविष्य में यह रणनीति नहीं अपनानी चाहिए। हमें कॉकरोचों को उनके तरीके से काम करने देना चाहिए।
भविष्य की राह
सीजेपी नेतृत्वहीन आंदोलन नहीं है। उसका एक युवा नेतृत्व है जो संवैधानिक और लोकतांत्रिक सिद्धांतों से प्रेरित है। लोगों को गोलबंद करने और उन्हें इतने लंबे समय तक एक स्थान पर रोके रखने के लिए उन्होंने जिन तरीकों का इस्तेमाल किया उनका इस्तेमाल बुद्ध, आंबेडकर, गांधी या नेहरू ने भी कभी नहीं किया था। सीजेपी पूरी तरह से एक नया प्रयोग है। एक सच्चे और सोचने-समझने वाले आंबेडकरवादी की तरह अभिजीत ने 36 दिनों के विरोध प्रदर्शन का अंत इस चेतावनी के साथ किया कि “आप मुझे हीरो बत बनाइए।” यह आंबेडकर की असली सोच को प्रतिबिंबित करता है।
सीजेपी के नेतृत्व को पार्टी का पंजीकरण करवाना चाहिए। उसे आरएसएस के रास्ते पर नहीं चलना चाहिए, जो दशकों से बिना पंजीकरण और बिना एक भी बैंक खाते के काम कर रहा है और मजे़ की बात यह है कि वह अकूत अचल सम्पत्तियों का मालिक भी है। अगर सीजेपी अपना पंजीकरण नहीं कराएगी तो भाजपा सरकार उसे परेशान कर सकती है। उन्हें एक सोसायटी के रूप में अपना पंजीकरण कराना चाहिए और साथ ही चुनाव आयोग में एक राजनीतिक दल के रूप में भी, ताकि उनकी पहचान पर कोई और कब्जा न कर सके। उन्हें एक कानूनी संगठन और राजनीतिक दल के रूप में काम करना चाहिए। इसके साथ ही वे शैक्षणिक सुधारों के लिए एक आंदोलन के रूप में भी काम करना जारी रख सकते हैं। समय आने पर वे राजनीति में भी अपनी भूमिका अदा कर सकते हैं।
मूल अंग्रेजी में यह आलेख पूर्व में वेब पत्रिका ‘काउंटर करेंट्स’ द्वारा प्रकाशित व यहां इसका हिंदी अनुवाद लेखक की सहमति से प्रकाशित है।
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)
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