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जातिगत जनगणना : हाथी नहीं, हाथी की पूंछ

गजट के जरिए जारी अधिसूचना के प्रश्न संख्या 10 में केवल “अनुसूचित जाति (अ.जा.)/अनुसूचित जनजाति (अ.ज.जा.)/जाति” का कॉलम है। अलग से ओबीसी/अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई कॉलम नहीं है। बता रहे हैं सुभाषचंद्र कुशवाहा

जिसकी आशंका थी, वही हुआ। यानी जातिगत जनगणना हवा-हवाई घोषणा के सिवा कुछ नहीं निकली। जातिगत जनगणना की राष्ट्रव्यापी मांग के मद्देनजर 25 अप्रैल, 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में निर्णय लिया गया था कि जातिगत जनगणना अलग से सर्वेक्षण के रूप में कराने के बजाय मुख्य जनगणना में शामिल की जाएगी।

जातिगत जनगणना की मांग का एक गहरा सामाजिक और आर्थिक पहलू था। सामाजिक न्याय की पक्षधर सरकारों को मुख्यधारा से पिछड़े समाज की आर्थिक हैसियत, जमीन-जायदाद और वास्तविक स्थिति का पता लगाना चाहिए था। लेकिन पहले चरण की जनगणना में ओबीसी वर्ग का कोई कॉलम नहीं था और अब 14 अगस्त, 2026 को जारी गजट में जातिगत जनगणना का जो लॉलीपॉप थमाया गया है, उसे कहने को तो जातिगत जनगणना कहा जा सकता है, मगर उसे ओबीसी वर्ग की जनगणना नहीं कहा जा सकता।

गजट के जरिए जारी अधिसूचना के प्रश्न संख्या 10 में केवल “अनुसूचित जाति (अ.जा.)/अनुसूचित जनजाति (अ.ज.जा.)/जाति” का कॉलम है। अलग से ओबीसी/अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई कॉलम नहीं है। अधिसूचना में एससी-एसटी के बाद खुला ‘जाति’ कॉलम रखा गया है, जहां व्यक्ति अपनी जाति बताएगा। सरकार का वर्तमान मॉडल ओबीसी श्रेणी को छिपाना और केवल जाति दर्ज कराना है।

अब इस कॉलम में हर कोई अपनी जाति दर्ज कराएगा। ऐसे में केंद्रीय स्तर पर यह कैसे पता किया जा सकता है कि ओबीसी वर्ग की कुल संख्या कितनी है? यह बताने की कोई स्पष्ट नीति फिलहाल दिखाई नहीं दे रही है। वैसे भी राज्यवार ओबीसी जातियों की सूची में भिन्नता है। तब क्या सरकार जाति के आंकड़े सार्वजनिक कर राज्यों को यह निर्देश देगी कि वे केंद्रीय जनगणना के आंकड़ों का उपयोग कर अपने यहां ओबीसी वर्ग की संख्या प्रकाशित करें? फिलहाल ऐसा कोई निर्णय लिखित रूप से कहीं नहीं लिया गया है।

अधिसूचना के प्रश्न संख्या 10 में सवर्ण और ओबीसी, सभी अपनी जाति दर्ज करेंगे। ओबीसी वर्ग के यादव, कुर्मी, कुशवाहा, नाई, सैनी, तेली, गुर्जर आदि अपनी-अपनी जाति लिखेंगे। इस प्रकार हजारों अलग-अलग जातियों के डेटा में से हर जाति या वर्ग की सटीक संख्या निकाल पाना संभव नहीं है, क्योंकि एक ही जाति अलग-अलग प्रदेशों में भिन्न वर्गों (कहीं ओबीसी, कहीं एससी या सामान्य) में शामिल है। इन हजारों जाति-नामों को ओबीसी, एससी, एसटी और अन्य सामाजिक श्रेणियों में किस आधार पर वर्गीकृत किया जाएगा, यह बहुत टेढ़ा सवाल है। अगर सरकार की मंशा ओबीसी की वास्तविक संख्या, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति और विभिन्न जातियों की हिस्सेदारी जानने की होती, तो ओबीसी की स्पष्ट पहचान और वर्गीकरण की व्यवस्था अधिसूचना में ही शामिल करती।

एक परिवार से जानकारियां लेता जनगणनाकर्मी

ऐप के जरिए हो रही इस जनगणना में हर आंकड़ों की हेराफेरी इतनी आसान है कि बहुसंख्‍यक आबादी को कुछ पता ही न चलेगा। यह भी संभव है इस जनगणना के बाद वंचितों की संख्‍या कम कर दी जाए।

दरअसल, ओबीसी वर्ग के प्रति सरकार लगातार उपेक्षा का भाव रख रही है। वह चाहती ही नहीं कि समाज का सबसे बड़ा वर्ग एक इकाई के रूप में संगठित दिखे। वह उसे विभिन्न तरीकों से बांटने के रास्ते निकाल रही है। ओबीसी वर्ग के कुछ नेताओं को कुर्सी देकर उनके समाज को छला जा रहा है, तो एनएफएस (नॉट फाउंड सूटेबिल) के द्वारा नौकरियों में ओबीसी का प्रतिनिधित्व कम किया जा रहा है।

किसी भी समाज में संसाधनों के न्यायसंगत वितरण और विकास नीतियों के निर्माण के लिए सटीक सामाजिक-आर्थिक डेटा का होना अत्यंत आवश्यक होता है। इस दृष्टि से भी जनगणना में ओबीसी वर्ग का स्पष्ट कॉलम होना चाहिए था। मगर सरकार ओबीसी वर्ग की मौजूदा सच्चाई पर पर्दा डालना चाहती है। एक लंबे जन-आंदोलन के बाद ओबीसी जाति गणना की मांग को इस प्रकार अनसुना किया जाना, समाज के बड़े वर्ग के साथ विश्‍वासघात है। ऐसा तब किया जा रहा है जब प्रधानमंत्री की जाति ओबीसी वर्ग में डाली गई है।

ओबीसी वर्ग का अलग से कॉलम न होने पर इस वर्ग के मन में यह आशंका उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि उनकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति को छिपाने का प्रयास किया जा रहा है। यानी भविष्य में ओबीसी का अधिकार छीनना तय है। सरकार की मंशा ठीक होती तो वह जाति गणना के प्रपत्र इतने स्पष्ट और सरल रखती कि ओबीसी वर्ग को अपनी पहचान या श्रेणी दर्ज करने में कोई भ्रम न रहता। कुल मिलाकर, यह अधिसूचना ओबीसी वर्ग की आशाओं पर तुषारापात के सिवा कुछ नहीं है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुभाष चंद्र कुशवाहा

सुभाष चन्द्र कुशवाहा एक इतिहासकार और साहित्यकार के रूप में हिंदी भाषा भाषी समाज में अपनी एक महत्वपूर्ण जगह बना चुके हैं। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में ‘चौरी-चौरा: विद्रोह और स्वाधीनता आंदोलन’, ‘अवध का किसान विद्रोह : 1920 से 1922’, ‘कबीर हैं कि मरते नहीं’, ‘भील विद्रोह’, ‘टंट्या भील : द ग्रेट इंडियन मूनलाइटर’ और ‘चौरी-चौरा पर औपनिवेशिक न्याय’ आदि शामिल हैं। वे अपनी किताबों में परंपरागत इतिहास दृष्टियों के बरक्स एक नयी इतिहास दृष्टि प्रस्तुत करते हैं।

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