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बिहार में सामंती उत्पीड़न और दलित-पिछड़े मजदूरों पर बढ़ते हमले

रोहतास में चंद्रेश्वर चौधरी की हत्या के बाद नवादा में एक गरीब महिला मजदूर द्वारा अपनी मजदूरी मांगना यदि उसके खिलाफ ऐसी बर्बर यौन हिंसा का कारण बनता है, तो यह ग्रामीण समाज में मौजूद असमान सत्ता-संबंधों की गंभीरता को दर्शाता है। बता रहे हैं कुमार दिव्यम

बिहार में भाजपा के सत्ता में आने के बाद राज्य के ग्रामीण इलाकों में सामंती उत्पीड़न की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। इन घटनाओं में केवल व्यक्तिगत अपराध ही नहीं, बल्कि जातीय वर्चस्व, बंधुआ मजदूरी, भूमिहीनों की जमीन पर कब्जा और प्रतिरोध करने वाले दलित-पिछड़े समुदायों को दबाने की कोशिशें भी दिखाई देती हैं। रोहतास के मिल्की मनिहारी और नवादा के रामगढ़ की हालिया घटनाएं इस व्यापक सामाजिक स्थिति की गंभीर तस्वीर पेश करती हैं।

बीते 5 अगस्त, 2026 को रोहतास जिले के मिल्की मनिहारी गांव में नोनिया जाति (अति पिछड़ा) के चंद्रेश्वर चौधरी की उनके बगल के गांव जोगिया में गोली मारकर हत्या कर दी गई। आरोप है कि जोगिया गांव केअजीत तिवारी ने मजदूरी और काम के सवाल पर हुए विवाद के बाद चंद्रेश्वर चौधरी की गोली मारकर हत्या की। हत्या के बाद शव को गायब करने की कोशिश की गई। आरोपी शव को वाहन में रखकर फरार हुआ और उसे एक झाड़ी में फेंक दिया। अजीत तिवारी की गिरफ्तारी गाजीपुर से हुई और उसकी निशानदेही पर शव बरामद किया गया।

परिजनों के अनुसार चंद्रेश्वर चौधरी लंबे समय से अजीत तिवारी के यहां पीढ़ीगत रूप से बंधुआ मजदूरी करते थे। इस वर्ष उन्होंने अजीत तिवारी के यहां काम करने से इनकार कर दिया था और गांव में ही किसी अन्य व्यक्ति के यहां मजदूरी करने लगे थे। परिजनों का आरोप है कि बंधुआ मजदूरी से इनकार करने के बाद ही उन्हें निशाना बनाया गया।

इस घटना को बंधुआ मजदूरी, मजदूर के प्रतिरोध और सामंती वर्चस्व के संदर्भ में देखा जाना जरूरी है। हत्या के बाद ग्रामीणों में भारी आक्रोश पैदा हुआ और लोगों ने अजीत तिवारी के घर पर हमला कर आगजनी की। ग्रामीणों का कहना है कि जनता के प्रतिरोध और आक्रोश के बाद ही पुलिस ने आरोपी की गिरफ्तारी तथा शव की खोजबीन में तेजी दिखाई।

रोहतास के मिल्की मनिहारी गांव में रोते-बिलखते मृतक चंद्रेश्वर चौधरी के परिजन

इसके बाद घटना ने जातीय रंग ले लिया है। अजीत तिवारी के समर्थन में बड़ी संख्या में भूमिहार समुदाय के लोग लामबंद हुए और उन्होंने हत्या के आरोपी के पक्ष में प्रदर्शन किया। इस दौरान अजीत तिवारी के घर में हुई आगजनी को मुख्य मुद्दा बनाकर हत्या के मूल प्रश्न को पीछे धकेलने की कोशिश लगातार जारी है। क्या किसी व्यक्ति पर हत्या का गंभीर आरोप होने के बावजूद केवल जातीय पहचान के आधार पर उसके पक्ष में लामबंद होना ग्रामीण समाज में सामंती दबदबे को पुनर्स्थापित करने की कोशिश नहीं है? बिहार के इतिहास में रणवीर सेना जैसी सामंती ताकतों द्वारा दलित-पिछड़े समुदायों के खिलाफ हिंसा का एक लंबा इतिहास रहा है। ऐसे में किसी हत्या के आरोपी के समर्थन में जातीय लामबंदी को व्यापक सामाजिक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

चंद्रेश्वर चौधरी की हत्या के बाद उनका परिवार दहशत में जी रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अभी तक सरकार की ओर से पीड़ित परिवार से कोई प्रतिनिधि मिलने नहीं गया है और उन्हें मुआवजा भी नहीं मिला है। जबकि इससे पहले भरत तिवारी की पुलिसिया हत्या के बाद बिहार सरकार उनके परिवार को नौकरी एवं मुआवजे की घोषणा कर चुकी है। क्या यह राज्य सत्ता का जातिगत भेदभाव नहीं है?

वहीं, हत्या के आरोपी अजीत तिवारी के घर पर भारी पुलिस बल की तैनात की गई है। ग्रामीणों का आरोप है कि पीड़ित परिवार को सुरक्षा देने के बजाय पुलिस की प्राथमिकता आरोपी के घर की सुरक्षा करना बन गई है।

इस मामले में ग्रामीणों के खिलाफ मुकदमे और गिरफ्तारियों की कार्रवाई भी की जा रही है। इससे भी पुलिस प्रशासन की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

अजीत तिवारी के पास लगभग 125 बीघा जमीन होने की बात सामने आई है। इनमें लगभग 30 बीघा जमीन बिहार सरकार द्वारा सीलिंग से अतिरिक्त भूमि के रूप में अधिग्रहित की गई थी। उक्त जमीन की भूमिहीन परिवारों के नाम बंदोबस्ती की गई और लाल पर्चे जारी किए गए। लेकिन आरोप है कि लाल पर्चा मिलने के बावजूद भूमिहीन परिवारों का वास्तविक कब्जा जमीन पर नहीं है। जमीन अब भी पूर्व भू-स्वामी के कब्जे और जोत-कोड़ में है। इससे स्पष्ट होता है कि समस्या केवल एक हत्या तक सीमित नहीं है। जमीन के असमान वितरण, भूमिहीनों के अधिकार और ग्रामीण सत्ता-संबंधों का प्रश्न भी इससे जुड़ा हुआ है।

इसी व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में नवादा जिले के रामगढ़ गांव की घटना भी बेहद गंभीर है। दलित समुदाय में शामिल मुसहर जाति की महिला लौलसी देवी (उम्र करीब 55 वर्ष) के साथ मजदूरी मांगने के कारण बर्बर यौन हिंसा की गई और उनकी हत्या का प्रयास किया गया।

बताया गया है कि गत 10 अगस्त, 2026 की सुबह लगभग 6 बजे लौलसी देवी अपने पति बौधु मांझी के साथ मजदूरी मांगने के लिए भूमिहार समुदाय से आने वाले बुलेचन सिंह (उम्र लगभग 40 वर्ष), पिता सुधीर सिंह के घर ओरैना गई थीं। उसी दिन उनके साथ बलात्कार किया गया और जान से मारने की नीयत से उनके गुप्तांगों में डंडे का इस्तेमाल किया गया। गंभीर रूप से घायल लौलसी देवी का इलाज पावापुरी अस्पताल में चल रहा है।

यह घटना भी मजदूरी, जातीय वर्चस्व और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के आपस में जुड़े हुए सवालों को सामने लाती है। एक गरीब महिला मजदूर द्वारा अपनी मजदूरी मांगना यदि उसके खिलाफ ऐसी बर्बर हिंसा का कारण बनता है, तो यह ग्रामीण समाज में मौजूद असमान सत्ता-संबंधों की गंभीरता को दर्शाता है।

असल में मौजूद जातीय असमानता, सामंती वर्चस्व, बंधुआ मजदूरी, भूमिहीनता और मजदूरों के अधिकारों के सवाल को फिर से सामने लाती हैं। इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच, दोषियों की गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ पीड़ित परिवारों को तत्काल मुआवजा, सुरक्षा और न्याय मिलना आवश्यक है। साथ ही, लाल पर्चा प्राप्त भूमिहीन परिवारों को उनकी जमीन पर वास्तविक कब्जा दिलाना और बंधुआ मजदूरी तथा सामंती उत्पीड़न के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करना भी जरूरी है।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बिहार में लोकतांत्रिक शासन की मौजूदगी के बावजूद ग्रामीण समाज में सामंती धाक और जातीय वर्चस्व को किस तरह चुनौती दी जाए? मजदूरों, दलितों, पिछड़ों और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा तभी संभव है जब राज्य प्रशासन अपराधियों और सामंती दबावों से स्वतंत्र होकर कानून का निष्पक्ष रूप से पालन करे।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

कुमार दिव्यम

लेखक पटना विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में स्नातकोत्तर छात्र व स्वतंत्र लेखक हैं

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