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राजस्थान में नगर निकाय चुनाव : विकास के दावों के बीच दलित बस्तियों के सवाल

नगर निकाय चुनाव में विकास के दावों के बीच दलित और गरीब बस्तियों की तस्वीर कई असहज सवाल खड़े करती है। बड़ा सवाल है कि बजट, बुनियादी सुविधाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का लाभ आखिर इन बस्तियों तक कितना पहुंचा? पढ़ें, अमरपाल सिंह वर्मा की यह रपट

राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव की सरगर्मियों के बीच शहर बदल गए हैं। हर छोटे और बड़े शहर में उम्मीदवार वोट मांग रहे हैं, गलियों में उनके समर्थक घूम रहे हैं और हर नुक्कड़ पर विकास की चर्चा चल रही है। दोबारा जीतने के लिए मैदान में उतरे प्रत्याशी अपने प्रयास से सड़कें बनाने, नालियां बनाने, पानी की सुविधा उपलब्ध करवाने और सफाई-व्यवस्था सुधारने जैसी तमाम उपलब्धियां गिना रहे हैं। पहली बार मैदान में डटे प्रत्याशी चहुंमुखी विकास के वादे कर रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या राजधानी जयपुर से लेकर राज्य के अंतिम छोर पर बसे छोटे कस्बों तक कोई गरीबों, दलितों और पिछड़े समुदायों की बस्तियों की भी थाह ले रहा है? क्या चुनावों में किए जा रहे वादों का कोई असर आने वाले दिनों में इन बस्तियों में दिखाई देगा या फिर ये वादे कुछ समय बाद किसी को याद भी नहीं रहेंगे?

सवाल यह नहीं है कि शहर में विकास हुआ या नहीं। सवाल यह है कि विकास किसके हिस्से में कितना आया? यह सवाल इसलिए भी जरूरी है कि शहरों की सरकारें सीधे नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी होती हैं। और किसी शहर की विकास नीति की असली परीक्षा उसके सबसे कमजोर हिस्से में होती है। यानी उन बस्तियों में, जहां गरीब, दलित और वंचित तबके के लोग रहते हैं। 

राजस्थान में आगामी 9 और 11 सितंबर को मतदान होना है। प्रदेश के 309 शहरी निकायों में 10 हजार 245 पार्षद चुने जाने हैं। इनमें 1,794 वार्ड अनुसूचित जाति और 395 वार्ड अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। यानी शहरों की राजनीति में दलित और आदिवासी प्रतिनिधित्व की मौजूदगी केवल संख्या भर नहीं है। लेकिन क्या राजनीतिक प्रतिनिधित्व का असर उन बस्तियों की जिंदगी में भी दिखाई देता है, जहां इन समुदायों की बड़ी आबादी रहती है?

नगरीय निकाय चुनावों की सरगर्मी के बीच गरीब और दलित बस्तियों के विकास तथा वहां मूलभूत सुविधाओं के विस्तार का प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इसलिए नहीं कि ये केवल दलित बस्तियां हैं, बल्कि इसलिए कि शहर का सबसे कमजोर हिस्सा ही अक्सर उसकी विकास नीति की सबसे बड़ी परीक्षा होती है। चुनावी दौर में आश्वासनों की खेती हो रही है, वादों की बारिश हो रही है। इनके बीच जयपुर की जवाहर नगर कच्ची बस्ती की हाल की तस्वीर परेशान करने वाली है। जयपुर को खुले में शौच मुक्त घोषित किया जा चुका है, लेकिन इस बस्ती में अनेक परिवार अब भी खुले में शौच जाने को मजबूर हैं। छोटे-छोटे मकानों में शौचालय के लिए जगह ही नहीं है। महिलाओं और बच्चियों को मुंह अंधेरे, सूर्योदय से पहले जंगल में निकलना पड़ता है। इसे सिर्फ गरीबी की कहानी कहकर आगे बढ़ जाना आसान है, लेकिन जिस शहर को खुले में शौच मुक्त घोषित किया जा चुका है, उसी शहर की एक बस्ती में ऐसी स्थिति क्यों बनी हुई है?

इस कॉलोनी में कहने को सार्वजनिक शौचालय हैं, लेकिन उनकी हालत और पानी की उपलब्धता सवालों के घेरे में है। वहां अस्थायी शौचालयों में 150 से 200 लीटर पानी आता है और दिन में एक बार भरने के कारण कई बार शाम से पहले ही खत्म हो जाता है। बस्ती के लोगों की शिकायत है कि कचरा, रुका हुआ पानी और सीवरेज की समस्या बनी हुई है।

राजधानी जयपुर में ही झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले गरीब लोगों के लिए करीब 300 करोड़ रुपए की लागत से बनाई गई राजीव नगर आवास परियोजना का एक दशक से ज्यादा समय बाद भी पूरी तरह आबाद नहीं हो पाना सरकारी उदासीनता का बड़ा उदाहरण है। जयपुर के किशनबाग इलाके में 100 बीघा में विकसित इस योजना के तहत 4,000 घर बनाए गए थे, लेकिन इनमें लगभग 3,000 मकान अब भी खाली हैं। राजीव गांधी नगर योजना के तहत 2008 से 2013 के बीच तीन स्थानों पर इन मकानों का निर्माण किया गया था। बुनियादी सुविधाओं की कमी और निर्माण संबंधी खामियों के चलते यह परियोजना लंबे समय से उपेक्षा का शिकार है। खाली पड़े मकानों की खिड़कियां और दरवाजे तक चोरी हो चुके हैं। जिन गरीबों ने इन मकानों में बसने का सपना संजोया होगा, उन पर क्या बीती होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

जयपुर की कच्ची कॉलोनी जवाहर नगर की तस्वीर

यह तो राजधानी जयपुर की तस्वीर है। मीडिया समय-समय पर इसका कवरेज कर जिम्मेदारों का ध्यान भी दिलाता रहा है, लेकिन स्थिति में अपेक्षित बदलाव दिखाई नहीं देता। जोधपुर की कालीबेरी स्थित आंबेडकर नगर के हाल भी बुरे हैं। करीब तीस साल पहले यह कॉलोनी बसी। इसमें ज्यादातर दलित समुदाय से आने वाले खान श्रमिक हैं। तमाम आश्वासनों के बावजूद वहां मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। मकानों के पट्टे नहीं बन रहे। जब प्रदेश की राजधानी और जोधपुर जैसे बड़े शहर में यह हाल है तो श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, झालावाड़ और धौलपुर के दूरदराज के कस्बों की तो बात ही क्या की जाए। 

दरअसल, दलित बस्तियों की बदहाली के पीछे बड़ा सवाल यह है कि शहरों की विकास योजनाएं बनाते समय सबसे कमजोर बस्तियों को किस जगह पर रखा जाता है? प्रदेश में राजस्थान राज्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति विकास निधि (योजना, आवंटन और वित्तीय संसाधनों का उपयोग) अधिनियम, 2022 बनाया गया। इस अधिनियम ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के विकास के लिए निधि के नियोजन, आवंटन और उपयोग को कानूनी ढांचा दिया। इसके लिए बजट भी आवंटित किया जा रहा है। कानून बन जाना अपने आप में उपलब्धि हो सकता है लेकिन कानून का मूल्यांकन कागज पर नहीं, यथार्थ के धरातल पर होता है। चार साल बाद यह मूल्यांकन तो होना ही चाहिए कि इस व्यवस्था से दलित बस्तियों में क्या कुछ बदला?

यही सवाल दलित अधिकार नेटवर्क भी उठाता रहा है। दलित अधिकार नेटवर्क राजनीतिक दलों से दलित समुदाय के लिए अलग चुनावी गारंटी और सरकारी संसाधनों में न्यायपूर्ण भागीदारी का वादा करने की मांग करता आ रहा है। नेटवर्क के राज्य संयोजक तुलसीदास राज का आरोप है कि दलित समुदाय के लिए बजट में राशि रखे जाने के बावजूद उसका पूरा उपयोग निर्धारित उद्देश्यों पर नहीं होता और राशि दूसरी मदों में चली जाती है। यह एक संगठन का आरोप है। इसका जवाब भी इस तरह नहीं दिया जा सकता कि आरोप लगा और बात खत्म। इसका जवाब सरकारी आंकड़ों से मिलना चाहिए। आखिर कितना पैसा निर्धारित हुआ, कितना जारी हुआ, कितना खर्च हुआ और कितना खर्च नहीं हो सका, इन सबका हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए।

राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने भी हाल में अनुसूचित जाति कल्याण योजनाओं के बजट को लेकर सवाल उठाया है। जूली के अनुसार 2024-25 में अनुसूचित जाति विभाग के लिए 10,309 करोड़ रुपए स्वीकृत हुए थे, जिनमें से 2,345 करोड़ रुपए यानी लगभग 23 प्रतिशत सरेंडर कर दिए गए। जूली का कहना है कि सरकार बजट पेश करते समय बड़ी-बड़ी घोषणाएं करती है और राशि का अनुमान भी काफी ऊंचा रखा जाता है लेकिन बाद में संशोधित बजट में इस राशि में करीब 30 फीसदी तक की कटौती कर दी जाती है। उनका कहना है कि संशोधित अनुमान घटने के बाद जो राशि बचती है, उसका भी पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता।

यह नेता प्रतिपक्ष का दावा है और इसके पीछे की पूरी तस्वीर सरकारी रिकॉर्ड से जांची जानी चाहिए। लेकिन यदि आंकड़ा सही है तो सवाल मामूली नहीं है। जिस वर्ग के विकास के लिए पैसा रखा गया, वह खर्च क्यों नहीं हो सका? यहीं से नगर निकाय चुनाव का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी दलित बस्ती में जाकर केवल यह पूछना कि सड़क कैसी है, शायद पर्याप्त नहीं होगा। यह भी पूछना चाहिए कि सड़क बनाने के लिए पैसा कब स्वीकृत हुआ था? नाली के लिए बजट कितना था? पानी की योजना कब बनी? सार्वजनिक शौचालय बना तो उसमें पानी की व्यवस्था की जहमत किसी ने उठाई? सफाई कितने दिनों बाद होती है और कूड़ा-कचरा कितने दिनों बाद उठता है? यानी बस्ती में विकास का ‘हिसाब’ देखा जाना चाहिए, केवल विकास का ‘दावा’ नहीं। यह ऐसा काम है जिसमें नगर निकायों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। आखिर शहरों की रोजमर्रा की जिंदगी नगर पालिका, नगर परिषद और नगर निगम ही संभालते हैं। कचरा उठाना, नालियां साफ रखना, सड़कें दुरुस्त करना, स्ट्रीट लाइट लगाना और सार्वजनिक सुविधाएं उपलब्ध कराना ऐसे काम हैं, जिनके होने या न होने का असर सीधे नागरिकों की जिंदगी में दिखाई देता है।

कमोबेश हर जगह दलित बस्तियों में एक और समस्या है। इन बस्तियों को अक्सर शहर के मुख्य हिस्से से अलग एक ऐसी जगह मान लिया जाता है, जहां किसी तरह बुनियादी सुविधाएं पहुंचा देना ही पर्याप्त है। जबकि ये बस्तियां भी उसी शहर का हिस्सा होती हैं। वहां रहने वाला व्यक्ति सड़क पर उतना ही अधिकार रखता है, जितना शहर के किसी बेहतर इलाके में रहने वाला नागरिक। दलितों और गरीबों की बस्ती के बच्चे भी साफ वातावरण में खेलने के हकदार हैं। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि महिलाओं को शौचालय के लिए अंधेरा होने का इंतजार नहीं करना पड़े। बारिश में घर के सामने गंदा पानी भरना सामान्य बात नहीं हो सकती है। रात में गलियों में अंधकार इस तर्क के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता कि यह तो गरीब बस्ती है।

राजस्थान में नगर निकाय चुनाव इसीलिए महत्वपूर्ण हैं। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में बड़े मुद्दे छा जाते हैं लेकिन नगर पालिका का चुनाव आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी के सबसे करीब होता है। यहां उम्मीदवार से यह पूछना ज्यादा जरूरी है कि वह हमारे वार्ड की नाली कब साफ करवाएगा, कचरा कहां जाएगा और पानी की समस्या कैसे दूर होगी? दलित बस्तियों के मतदाताओं को भी इस बार अपने सवाल थोड़े बदलने चाहिए। केवल यह पूछने के बजाय कि कौन जीतेगा, यह पूछा जाना चाहिए कि पिछले पांच साल में हमारे हिस्से में क्या आया? कितना पैसा आया? कितना खर्च हुआ? कौन-से काम स्वीकृत हुए? कौन-से अधूरे रह गए? उम्मीदवारों से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि क्या आप चुनाव के बाद भी हमारे लिए उपलब्ध रहेंगे? क्योंकि चुनाव के समय गरीबों की बस्ती में जाना आसान है। असली परीक्षा चुनाव के बाद होती है।

किसी शहर की पहचान उसके चौड़े रास्तों, चमकती इमारतों और सुंदर चौराहों से होती है, लेकिन उसकी संवेदनशीलता उसकी उन बस्तियों में जाकर समझी जा सकती है, जहां जीवन अब भी बुनियादी सुविधाओं के इंतजार में है। इसलिए नगर निकाय चुनाव में दलित बस्तियों के मुद्दे को केवल दलितों तक सीमित नहीं समझा जाना चाहिए। यह शहर की प्राथमिकताओं का मुद्दा है। यह बजट के न्यायपूर्ण इस्तेमाल का मुद्दा है। बड़ा सवाल यह है कि विकास की परिभाषा तय करते समय शहरी सरकारों के नीति-नियंता किन लोगों को सबसे पहले याद करते हैं और किन्हें सबसे अंत में?

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अमरपाल सिंह वर्मा

राजस्थान के हनुमानगढ़ के निवासी अमरपाल सिंह वर्मा वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। बीते चार दशकों की पत्रकारिता के दौरान उनका मुख्य फोकस ग्रामीण समाज, कृषि, जल, पर्यावरण, महिला मुद्दों और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषय रहे हैं। उन्हें उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए ‘दी स्टेट्समैन अवार्ड फॉर रूरल रिपोर्टिंग’, ‘सरोजिनी नायडू पुरस्कार’, ‘उदयन स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार’ और ‘लाडली मीडिया अवार्ड’ सहित अनेक सम्मान प्राप्त हैं।

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