बीते 30 अगस्त, 2026 को झारखंड की राजधानी रांची का ‘टाइम्स स्क्वायर’ यानी मोरहाबादी मैदान आदिवासियों के महाजुटान का गवाह बना। लाखों की संख्या में आदिवासी झारखंड के सुदूर इलाकों से चलकर आए थे। यह स्वत:स्फूर्त महाजुटान इस कारण भी यादगार बना क्योंकि मैदान में बने मंच पर मौजूद नेताओं में कोई तथाकथित बड़ा नेता नहीं था। हालांकि बैनर में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कांग्रेस के नेता राहुल गांधी की तस्वीर जरूर थी, लेकिन इस महाजुटान को संबोधित करने न तो हेमंत आए और न ही राहुल गांधी।
इस स्वत:स्फूर्त महाजुटान के पीछे झारखंड में प्रस्तावित परिसीमन है। दरअसल, देश में वर्ष 2002 में परिसीमन आयोग का गठन हुआ था, जिसके तहत 2006-2007 में झारखंड की लोकसभा और विधानसभा की सीटों के परिसीमन का प्रस्ताव आया और परिसीमन आयोग ने मई, 2007 में आदेश जारी किए थे। लेकिन उसके बाद जनसंख्या के आधार पर अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सीटें घटने की आशंका के चलते आदिवासी संगठनों और राजनीतिक दलों ने इसका भारी विरोध किया था।
इस विरोध की वजह थी। यदि परिसीमन हो गया होता तो राज्य की विधानसभा में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 28 से घटकर केवल 22 रह जातीं। इसी तरह राज्य में लोकसभा के कुल 14 सीटों में से एसटी के लिए आरक्षित 5 सीटों में एक सीट कमी हो जाती और यह केवल 4 रह जाती। तब कड़े राजनीतिक विरोध के बीच परिसीमन को टाल दिया गया और इसके बाद 2008 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने झारखंड में परिसीमन को 2026 तक के लिए स्थगित कर दिया था।
केंद्र सरकार द्वारा देश में जनगणना कराई जा रही है। चूंकि इस बार जातिगत जनगणना कराई जा रही है तो मुमकिन है कि आने वाले समय में जनसंख्या के नए आंकड़े सामने आने के बाद परिसीमन की प्रक्रिया का सवाल महत्वपूर्ण होगा।
केंद्र सरकार ने अप्रैल, 2026 में परिसीमन बिल, 2026 और इससे जुड़े संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा में पेश किया था। लेकिन संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला और 17 अप्रैल, 2026 को वह पारित नहीं हो सका। इसके बाद संबंधित परिसीमन बिल भी आगे नहीं बढ़ पाया। इसलिए अभी परिसीमन का नया कानून संसद से पास होकर लागू नहीं हुआ है। प्रस्तावित व्यवस्था में लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्गठन का रास्ता तैयार करने की कोशिश की गई थी। यही वजह है कि 2026 के बाद परिसीमन को लेकर संवैधानिक प्रावधानों के कारण यह मुद्दा फिर से चर्चा में है।
इसी मुद्दे को लेकर गत 30 अगस्त, 2026 को मोरहाबादी मैदान में आदिवासी समाज द्वारा ‘आदिवासी एकता महाजुटान’ का आयोजन हुआ। राज्य के लगभग सभी जिलों से आदिवासी समाज के लोग इस महाजुटान में शामिल हुए। अनुमान लगाया गया कि लगभग एक लाख के करीब लोग इस महाजुटान में शामिल हुए जो एक तरह से रांची में हुए अब तक के कार्यक्रमों में एक रिकार्ड है।

महाजुटान में मंच से जो बातें मुख्य तौर पर कही गईं, उनमें एक तो यह रही कि आदिवासी परिसीमन का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि विरोध उसकी प्रक्रिया से है। दूसरी यह चिंता जाहिर की गई कि नई व्यवस्था में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या कम होगी और उनका प्रतिनिधित्व कमजोर होगा। महाजुटान में यह मांग की गई कि यदि परिसीमन के बाद कुल सीटों की संख्या बढ़ती हैं, तो अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी आबादी और सीटों के अनुपात के अनुसार बढ़ाई जाए।
हालांकि महाजुटान में आदिवासी संगठनों के द्वारा और भी कई मांगें रखी गईं। मसलन, पिछले 75 वर्षों में हुए विस्थापन, भूमि हस्तांतरण और सामाजिक-आर्थिक नुकसान का आकलन कराने और इसके साथ प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार की गारंटी देने की भी मांग।
महाजुटान में पांचवीं अनुसूची के तहत राज्यपाल को प्राप्त संवैधानिक शक्तियों के प्रभावी इस्तेमाल की मांग भी उठाई गई। कहा गया कि राज्यपाल द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी हितों और संवैधानिक प्रावधानों की रक्षा के लिए इन शक्तियों का इस्तेमाल पूरी तरह किया जाना चाहिए। इसके अलावा यह भी कहा गया कि पांचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों में संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन कर होने वाली बाहरी बसावट पर नियंत्रण हो, क्योंकि आदिवासी बहुल क्षेत्रों में आबादी के स्वरूप में बदलाव का असर भविष्य में राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी पड़ सकता है।

महाजुटान में सीएनटी एक्ट और एसपीटी एक्ट का सख्ती से पालन कराने की मांग की गई। यह कहा गया कि आदिवासी जमीन के अवैध हस्तांतरण के मामलों की जांच कर ऐसे हस्तांतरण तत्काल रद्द किए जाएं और जमीन मूल आदिवासी मालिकों को वापस दिलाई जाए।
अनुसूचित क्षेत्रों में परिसीमन क्यों नहीं होना चाहिए? इस बारे में शोधार्थी इमिल कन्डुलना कहते हैं कि “चूंकि परिसीमन, क्षेत्र आधारित कानून है, इसलिए हम भी विशेषकर पांचवीं अनुसूची को केंद्र में रखकर परिसीमन की व्याख्या की मांग सरकार से कर रहे हैं। अभी तक केंद्र सरकार इस तरह से व्यवहार कर रही है मानो पांचवीं अनुसूची का कोई अस्तित्व ही नहीं है। यह स्थिति तब है जब पांचवीं अनुसूची क्षेत्र राष्ट्रपति के संरक्षण में राज्यपाल के अधीन विशेष प्रशासनिक क्षेत्र हैं।” वे जोर देकर कहते हैं कि “पांचवीं अनुसूची की सबसे बड़ी व्यवस्था यह है कि यहां किसी भी कानून/नीति/अधिनियम को लागू करने के पहले पांचवीं अनुसूची की शर्तों से स्कैन होकर गुजरना ही पड़ेगा, जो अभी नहीं किया जा रहा है। आदिवासियों की सारी समस्याओं की जड़ में इसी व्यवस्था का उल्लंघन है, जिसके लिए सभी राजनीतिक दल एवं नेता और विशेषकर, राज्यपाल एवं ट्राइबल एडवाइजरी काऊंसिल (टीएसी) के सदस्य जिम्मेदार हैं। अगर सामान्य ढंग से परिसीमन को लागू किया जाएगा तो आदिवासियों के हाथ से वह सब कुछ भी फिसल जाएगा, समाप्त हो जाएगा, जो थोड़ा बहुत अभी उनके पक्ष में है।”
वे कहते हैं कि “सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सारी लूट कानूनी तौर पर, कानून की छत्रछाया में विधानसभा और लोकसभा के द्वारा ही की जाएगी, क्योंकि आदिवासियों के लिए बोलने वाला कोई व्यक्ति कानून बनाने की संस्था में नहीं रहेगा। अगर रहेंगे भी तो उनकी संख्या इतनी कम होगी कि वे कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकेंगे। उसके बाद आप यह मान कर चलिए कि आप राजनीतिक दलों के हाथों की कठपुतली बन जाएंगे और आप और हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पाएंगे। इसलिए हर आदिवासी के लिए इस बात को समझना बेहद जरूरी है।”
इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला कहती हैं कि “आज हम आदिवासियत को बचाने की मुहिम चला रहे हैं। झारखंड की लड़ाई में एक-एक आदिवासी की हिस्सेदारी है। अगर मोदी सरकार द्वारा सीट घटाई गई तो आर-पार की लड़ाई होगी।” वे आगे कहती हैं कि “यहां के आदिवासियों के लिए दो गुना सीट बढ़ाएंगे, तभी परिसीमन स्वीकार किया जाएगा। परिसीमन के नाम पर आदिवासियों को खत्म करने का प्रयास किया गया तो आंदोलन करके आदिवासियों को बचाने का प्रयास किया जाएगा। आदिवासियों के हक अधिकार के लिए आखिरी दम तक लड़ाई लड़ी जाएगी। मोदी सरकार संशोधन बिल लाई है। एक भी खनिज संपदा यहां से जाने नही देंगे। हम झारखंड में एक भी इंच जमीन लूटने नही देंगे।”
आदिवासी समन्वय समिति के संयोजक लक्ष्मी नारायण मुंडा कहते हैं कि “महाजुटान महारैली के माध्यम से परिसीमन की प्रक्रिया का विरोध हो रहा है। आदिवासियों की बड़ी आबादी का डैम के माध्यम से विस्थापन किया गया। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम के माध्यम से सभी आदिवासी विधायकों व सांसदों को बताया गया कि आदिवासियों के खिलाफ केद्र द्वारा साजिश रची जा रही है।”
सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग का कहना है कि “भाजपा और आरएसएस झारखंड पर कब्जा करना चाहते हैं। झारखंड में देश की करीब 40 प्रतिशत खनिज संपदा है। भाजपा को देश के बड़े-बड़े उद्योगपति चला रहे हैं। हम अनुसूचित क्षेत्रों में जनसंख्या के आधार पर परिसीमन को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। संविधान में सामाजिक और आर्थिक रूप से सम्मानजनक जीवन जीने की गारंटी दी गई है। इसके बावजूद यहां के आदिवासियों को पलायन के लिए मजबूर किया गया है। आदिवासियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक भागीदारी नहीं दी जा रही है।”
कांग्रेसी नेता बंधु तिर्की ने परिसीमन समेत आदिवासी अधिकारों के मुद्दे पर कहते हैं कि “परिसीमन केवल लोकसभा और विधानसभा की सीटों का सवाल नहीं है, बल्कि यह आदिवासियों के राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है। यदि जनसंख्या को आधार बनाकर परिसीमन में झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कम करने का प्रयास किया गया तो इसे कतई स्वीकार नहीं किया जाएगा। आदिवासी समाज अपने राजनीतिक अधिकारों और संविधान से मिले अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने को तैयार है।”
(संपादन : नवल/अनिल)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in
