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‘बॉडी काउंट’ : लैंगिक असमानता के खिलाफ नए तेवर की शार्ट फिल्म

एक सवाल से अगर स्त्री के बॉडी काउंट एक से अधिक हुए तो उसके चरित्र पर धब्बा लग जाता है और वहीं पुरुष का एक से जितना अधिक, मर्दानगी का तमगा उतना बड़ा होता है। ‘मर्द है इतना तो होता ही है’ जैसे वाक्य प्रयोग होते हैं। ये असमानता आखिर समाज में बदलती क्यों नहीं? पढ़ें, आर्यन प्रजापति का यह आलेख

‘बॉडी काउंट’ शब्द मैंने कहां सुना या कैसे, इस बारे में सोचता हूं तो दोस्तों की याद आती है। गाली या नशाखोरी आदि की उत्पत्ति अधिकतर दोस्तों से ही होती है। शायद इसीलिए घर वाले सही दोस्त बनाने की बात कहते हैं। अक्सर दोस्तों संग बातचीत में ‘तेरी कितनी बॉडी काउंट है’ या ‘मेरी इतनी बॉडी काउंट है’ जैसे वाक्य सुनता हूं। जिसका जितना बॉडी काउंट होता है, वह उतना सीना चौड़ा करता है और जिसका जीरो होता है, वह चुपचाप खड़ा रहता है।

‘बॉडी काउंट’ शब्द का उपयोग दो अर्थों में किया जाता है। पारंपरिक रुप से देखें तो इसका मतलब किसी लड़ाई या दुर्घटना में मारे गए लोगों की संख्या से होता है। लेकिन आजकल इस शब्द का प्रयोग आम बोलचाल की भाषा में किसी व्यक्ति के यौन साथियों की कुल संख्या के रूप में किया जाता है। यह सोशल मीडिया पर बहुत प्रचलित है, जो अक्सर किसी के पिछले शारीरिक संबंधों को दर्शाता है।

बीते दिनों मेरे इंस्टाग्राम फीड में भी कुछ इसी तरह की दो रील्स दिख गई थीं। दोनों में पति अपनी पत्नी से बॉडी काउंट पूछता है। एक रील में पत्नी अपनी बॉडी काउंट चौबीस बताती है और दूसरी रील में पत्नी बारह बताती है। दोनों रील में पतियों का मुंह देखने लायक था। बाद में जब पति पूछते हैं कि इतना बॉडी काउंट कैसे तो दोनों समझाती हैं। एक बताती है कि मेरी उम्र अभी चौबीस है तो मेरी बॉडी काउंट चौबीस हुई। तुम्हारी भी तो छब्बीस है और दूसरी बताती है कि मेरे शरीर के अंग बारह ही हैं। दोनों रील्स में यह सुनकर पति तसल्ली की सांस ले रहे थे।

फिर इंस्टाग्राम से ही एक शॉर्ट फिल्म के बारे में पता चला। शॉर्ट फिल्म का नाम है– ‘बॉडी काउंट’। यह यूट्यूब पर आसानी से उपलब्ध है। यह शार्ट फिल्म छह मिनट चार सेकंड की है।

फिल्म शुरू होती है नृत्य की मुद्रा में एक प्लास्टिक की गुड़िया के साथ। एक लड़की की गोद में लड़का अपना सिर रखे हुए था। लड़का टिशू पेपर का फूल उसके कान पर लगाता है। लड़के के चेहरे पर चारकोल का मास्क लगा होता है और लड़का एक हाथ लड़की की हथेली और दूसरे हाथ से लड़की की पैर का तलवा छूते हुए सवाल करता है– “बुरा मत मानना, तुम्हारा बॉडी काउंट कितना है?” लड़की सवाल करती है– “क्यों? आज अचानक” लड़का कहता है– “बस ऐसे ही।” लड़की फिर पूछती है– “ऐसे कभी यह नहीं सोचा या नहीं पूछा कि मुझे डांस क्यों पसंद है।” लड़का जवाब देता है– “वह तो हॉबी हुई ना।”

‘बॉडी काउंट’ फिल्म का एक दृश्य

लड़की तब पहले सवाल को परत-दर-परत खोलती है और सवाल से ही शुरू करती है– “वो वाला टाइम इंक्लूड करना है जब ऑर्गज्म नहीं आया था?…” लड़का कहता है– “मतलब ऑफ कोर्स यार … जितने भी लड़कों के कॉन्टैक्ट्स में आई थी वो सब…।” लड़की फिर सवाल करती है– “हग इंक्लूड करना है और हाथ मिलाना?” लड़का हंसते हुए कहता है– “यार तुम मजे कर रही हो। बता दो ना! मैं भी बता दूंगा।” लड़की फिर सवाल करती है– “वो वाला टाइम जब मुझे मेरी मर्जी के बिना टच किया गया होगा या टच से ज्यादा किया गया होगा..?” लड़का थोड़ा हिचककर मतलब पूछता है। लड़की आखिरी सवाल करती है– “बचपन से गिनना है ना? सबसे पहले एक कजन भैया ने टच किया था, फिर ट्यूशन टीचर ने … स्कूल में बेस्ट फ्रेंड ने … ट्रेन, बस, ऑटो ये सब गिनना है ना?”

अगले दृश्य में लड़का अपने चेहरे से चारकोल फेस मास्क खींचकर उतार रहा था। मुझे फेस मास्क नहीं, बल्कि पितृसत्ता की परत उतरती दिख रही थी और मन में आस उठ रही थी कि एक दिन पितृसत्ता भी समाज से उतर कर कूड़ेदान में चली जाएगी। लड़की प्लास्टिक की गुड़िया की मुद्रा में नृत्य करती नजर आती है। वह अपने आप में मगन है। जैसे लगा वो जो डॉल दिख रही थी उस में जान आ गई है। महसूस हुआ कि बोलने से उसके दुख झर गए हैं। शैलजा पाठक की एक कविता है–

अधिकार जानना
और मिलने में कई हजार प्रकाशवर्ष की दूरी है
बस फिर भी मेरी तरह
बोलते रहना जरूरी है।

फिल्म के इसी दृश्य में लड़का असली फूल लेकर उस रूम में आता है, जिस रूम में लड़की नृत्य कर रही थी। उस कमरे में लड़की अपनी मर्जी से डांस कर रही थी, वह एक स्त्री द्वारा बनाया गया समाज था, जिसमें असली फूल थे और स्त्री-पुरुष दोनों की खुशी थी। लड़का असली फूल देता है और दोनों मुस्कुराने लगते हैं। फिल्म यहीं खत्म हो जाती है।

यह फिल्म हमें एक बेहतरीन नजरिया देती है। एक सवाल किसी के लिए गर्व की चीज बन जाती है, तो किसी के लिए शर्मिंदगी की। चाहे वो सवाल आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और जातीय के सवाल हो। समाज में ऐसा क्यों है? 

एक सवाल से अगर स्त्री के बॉडी काउंट एक से अधिक हुए तो उसके चरित्र पर धब्बा लग जाता है और वहीं पुरुष का एक से जितना अधिक, मर्दानगी का तमगा उतना बड़ा होता है। ‘मर्द है इतना तो होता ही है’ जैसे वाक्य प्रयोग होते हैं। ये असमानता आखिर समाज में बदलती क्यों नहीं? बॉडी काउंट मर्दों के लिए गर्व और सामान्य बात तथा महिलाओं के लिए चरित्र और शर्मिंदगी की बात कैसे है। अगर गलत है तो स्त्री-पुरुष दोनों के लिए गलत है और सही है तो दोनों के लिए सही है। 

फिल्म निर्देशक ने बहुत बारीकी से हर चीज को दिखाया है और लेखक ने कहानी के जरिए अहम सवाल उठाया है। इतनी कम समय की शॉर्ट फिल्म का इतना बड़ा दृष्टिकोण बनाना मामूली बात नहीं है। शॉर्ट फिल्मों के आने से नए-नए मुद्दे सामने आ रहे है और कम संसाधनों में जिसके पास कहानी है, वह शॉर्ट फिल्म बना पा रहा है। जो काम अब शॉर्ट फिल्में और डॉक्यूमेंट्री कर रही हैं, वो अपवादों को छोड़कर बड़ी-बड़ी बजट वाली फिल्में भी नहीं कर पा रही हैं। फिल्में सिर्फ मनोरंजन का साधन और पैसा कमाने का साधन बन गई हैं।

‘बॉडी काउंट’ शॉर्ट फिल्म की प्रस्तुति देवाशीष मखीजा ने की है। संपादन, निर्देशन और कहानी लिखने का काम अमन विशेरा ने किया है। भूमिकाएं आरिया और आर्यन ने निभाई हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

आर्यन प्रजापति

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज के छात्र हैं

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