h n

झारखंड : मनरेगा व वीबीग्राम(जी) योजना के बीच अधर में लटके ग्रामीण दलित-आदिवासी मजदूर

केंद्रीय बजटीय आवंटन के अभाव में 11 जनवरी, 2026 से झारखंड के लाखों मजदूरों का कुल 503.2 करोड़ रुपए की मजदूरी का भुगतान लंबित है। वहीं 12 मार्च, 2026 से राज्य के मनरेगा कर्मी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं। बता रहे हैं विशद कुमार

इन दिनों झारखंड में केंद्र और राज्य सरकार के बीच रस्साकशी का खेल जारी है। इसका परिणाम मनरेगा मजदूरों को भुगतना पड़ रहा है, जिनमें अधिकांश दलित और आदिवासी हैं। पहले से ही गरीबी और बेरोजगारी की मार झेल रहे झारखंड के मजदूरों की राह में बड़ा रोड़ा केंद्र सरकार द्वारा अटका दिया गया है। उसने अभी तक मनरेगा के बदले उसके द्वारा लाए गए भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) (वीबीग्राम-जी) योजना की अधिसूचना का गजट प्रकाशित नहीं किया है।

उल्लेखनीय है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने मनरेगा के बदले (वीबीग्राम-जी) नया कानून लागू किया है। कागजी तौर पर पिछले साल 16 दिसंबर, 2025 को संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किए जाने के उपरांत राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद यह कानून 21 दिसंबर, 2025 से प्रभाव में आ गया है। इस कानून के अनुसार योजना को लागू करने के लिए राज्य सरकार को कुल लागत का 40 प्रतिशत व्यय वहन करना होगा। लेकिन गजट की अधिसूचना जारी नहीं किए जाने के कारण पूर्व से चल रही मनरेगा योजना पर आशंका के बादल छाए हुए हैं। हालांकि नए कानून की धारा 30 और संविधान का अनुच्छेद 41 के आलोक में कर्नाटक सरकार ने इसकी पहल शुरू कर दी है। लेकिन झारखंड के लिए यह आसान नहीं है, क्योंकि मुख्यमंत्री मंईयां योजना के मद में सरकार को प्रतिवर्ष करीब 14 हजार 65 करोड़ से अधिक राशि खर्च करनी पड़ रही है।

इसलिए झारखंड सरकार ने वीबीग्राम-जी योजना को लागू करने में असमर्थता जताई है। इस अनिश्चितता का असर मनरेगा मजदूरों पर सीधा पड़ रहा है, जिसके कारण उन्हें तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

ध्यातव्य है कि 7 सितंबर, 2005 को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम का नरेगा के रूप में शुरुआत हुई थी, जिसको औपचारिक रूप से 2 फरवरी, 2006 से लागू की गई। फिर 2 अक्टूबर, 2009 को इसका नाम बदलकर ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (मनरेगा) कर दिया गया था, जो 20 दिसंबर, 2025 तक अस्तित्व में रहा।

मजदूरी नहीं मिलने पर विरोध में आयोजित एक कार्यक्रम में आदिवासी महिलाएं

अकुशल श्रमिकों के रोजगार संकट के आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार किस तरह मनरेगा मजदूरों की विरोधी है। झारखंड में विगत वित्तीय वर्ष 2025-26 में जहां अप्रैल माह में मनरेगा में 9.51 लाख मानव दिवस सृजित हुए थे, वहीं इस वर्ष इस माह के अंत तक मात्र केवल 45,638 मानव दिवस सृजित हुए हैं। यह विकट स्थिति इसलिए भी उत्पन्न हुई क्योंकि केंद्र सरकार ने वीबीग्राम-जी कानून का गजट नोटिफिकेशन जारी नहीं किया है। इसके कारण राज्य सरकारें असमंजस में हैं कि पता नहीं केंद्र सरकार मनरेगा योजना को कब बंद कर दे।

केंद्रीय बजटीय आवंटन के अभाव में 11 जनवरी, 2026 से झारखंड के लाखों मजदूरों का कुल 503.2 करोड़ रुपए की मजदूरी का भुगतान लंबित है। वहीं 12 मार्च, 2026 से राज्य के मनरेगा कर्मी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं। मनरेगा के 20 सालों में पहली बार ऐसा हुआ है जब मजदूरों की मजदूरी 1 अप्रैल से बढ़ाने संबंधी मंत्रालय ने कोई अधिसूचना जारी नहीं की। दूसरी ओर 17 मार्च, 2026 को झारखंड विधानसभा ने वीबीग्राम-जी कानून के विरुद्ध प्रस्ताव पारित कर केंद्र को स्पष्ट कर दिया है कि झारखंड में मनरेगा ही संचालित की जाएगी।

राज्य में मनरेगा में पंजीकृत परिवारों की कुल संख्या 75.76 लाख है, जिसमें श्रमिकों की कुल संख्या 1.06 करोड़ है। इसमें सभी मजदूर मनरेगा योजनाओं में कार्य नहीं करते हैं। इस कारण पंजीकृत कार्डधारकों की एक और श्रेणी है जिन्हें सक्रिय रोजगार कार्ड धारक कहा जाता है। झारखंड में इनकी संख्या 30.95 लाख परिवार और 35.95 लाख श्रमिक हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 में इनमें से 22.79 लाख परिवारों अथवा 26.06 लाख मजदूरों ने कार्य किए थे।

झारखंड में हर वक्त मजदूरों के सवालों को आदिवासी व दलित सहित तमाम वंचित वर्गों और उसमें महिलाओं के नजरिए से देखा जाना बेहद आवश्यक है। राज्य सरकार के अपने आंकड़े कहते हैं कि 11 लाख से अधिक मजदूर मज़बूरी में दूसरे राज्यों के बड़े शहरों में पलायन कर जाते हैं। गांवों में अधिकांशत: महिलाएं, छोटे बच्चे और बुजुर्ग ही रह जाते हैं।

इन तमाम विसंगतियों के बारे में सामाजिक कार्यकर्त्ता और झारखंड नरेगा वाच के संयोजक जेम्स हेरेंज कहते हैं कि केंद्र और राज्य के मध्य राजनीतिक टकराव के दौर में झारखंड के श्रमिकों का भविष्य क्या होगा, यह आंकलन करना भी आसान नहीं है। वीबीग्राम-जी कानून लागू करने के लिए इस वर्ष के बजट में सरकार ने कोई प्रावधान नहीं किया है, क्योंकि केंद्र के गजट अधिसूचना के अभाव में राज्य को जो 40 प्रतिशत फंड आवंटन निर्धारण करना है, उसकी कोई राशि ही निर्धारित नहीं है। हालांकि वे कहते हैं कि अनिश्चितता के इस दौर में झारखंड सरकार को चाहिए कि जब केंद्र की योजनाओं को सफल करने के लिए राज्य को 40 फीसदी का योगदान करना ही है तो उसके स्थान पर राज्य सरकार को खुद का ‘राज्य रोजगार गारंटी बिल’ पारित करना चाहिए।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

विशद कुमार

विशद कुमार साहित्यिक विधाओं सहित चित्रकला और फोटोग्राफी में हस्तक्षेप एवं आवाज, प्रभात खबर, बिहार आब्जर्बर, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, सीनियर इंडिया, इतवार समेत अनेक पत्र-पत्रिकाओं के लिए रिपोर्टिंग की तथा अमर उजाला, दैनिक भास्कर, नवभारत टाईम्स आदि के लिए लेख लिखे। इन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तन के लिए काम कर रहे हैं

संबंधित आलेख

मध्य प्रदेश के बालाघाट में बॅाक्साइट खनन के विरोध में स्थानीय आदिवासी
बमनी की सुंदरा टेकाम करीब 50 वर्ष की होंगी। वह कहती हैं कि “हम सालों से जंगल के पास बसे हुए हैं। जंगल हमें...
कागज़ बनाम आदिवासी : जीतू मुंडा प्रकरण का ऐतिहासिक अर्थ
जीतू मुंडा की यह घटना कोई बेचारगी भरी अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। आदिवासी पूर्वजों की वही ऐतिहासिक चेतावनी, जो हमें याद दिलाती...
भाजपा चाहती है कि मुसलमान, हिंदू पिछड़े और दलित नागरिक की तरह न सोचें
हिंदुत्ववादी राजनीति को मुसलमानों के मुसलमानों की तरह सोचने से कोई दिक्कत नहीं है। उसे दिक़्क़त बस मुसलमानों के नागरिक की तरह सोचने से...
‘बॉडी काउंट’ : लैंगिक असमानता के खिलाफ नए तेवर की शार्ट फिल्म
एक सवाल से अगर स्त्री के बॉडी काउंट एक से अधिक हुए तो उसके चरित्र पर धब्बा लग जाता है और वहीं पुरुष का...
रांची में स्टेन स्वामी की जयंती पर एसआईआर और परिसीमन का विरोध
अपने संबोधन में डॉ. परकला प्रभाकर ने कहा कि असम में जहां केवल स्पेशल रिवीजन (एसआर) हुआ, वहां सीमित स्तर पर नाम हटे, लेकिन...