मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला पांचवी अनुसूची क्षेत्र में शामिल है। यह प्राकृतिक रूप से बहुत समृद्ध है। इस क्षेत्र में खनन की जा रही है, जिसके कारण यहां पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ा है। इसे देखते हुए स्थानीय आदिवासी खनन का विरोध करते हैं। ऐसी ही एक खनन परियोजना का विरोध स्थानीय आदिवासी कर रहे हैं। इसका नाम दादरटोला-दादर बॉक्साइट ब्लॉक परियोजना है।
यह परियोजना खनन क्षेत्र बालाघाट के बेहर तहसील के गांव पचामा में है। इसका कुल क्षेत्रफल 60.230 हेक्टेयर है। इसका प्रस्तावक मध्य प्रदेश राज्य खनिज निगम है। इसी आधार पर पांच वर्षों की अवधि के लिए अधिकतम उत्पादन क्षमता 1,03,870.00 टन प्रति वर्ष प्रस्तावित की गई है। इस खदान की अनुमानित आयु 17 वर्ष है। हालांकि कहा जा रहा है कि 5.46 करोड़ रुपए की लागत से परियोजना प्रस्तावित अवधि के दौरान खनन काल में लगभग 30,84 पौधे लगाए जाएंगे, ताकि पर्यावरण को नुकसान न हो।
लेकिन स्थानीय आदिवासी इससे संतुष्ट नहीं हैं। मसलन, बमनी गांव के 52 वर्षीय धरम सिंह उईके कहते हैं कि “बॉक्साइट परियोजना के बारे में ग्राम सभा की सहमति नहीं ली गई है। जिस जंगल को उजाड़ा जा रहा है, हम उसी पर आश्रित हैं। हमारे देवी-देवता भी उसी जंगल में बसते हैं। परियोजना के कारण हम अपने जंगल से वंचित हो जाएंगे। हमारे जंगल की जैव-विविधता खत्म हो जाएगी। इसलिए अपना जंगल बचाने के लिए हम एक सामूहिक दावा आपत्ति प्रशासन के समक्ष पेश करने की भी तैयारी कर रहे हैं।”
धरम सिंह उईके संभावित विस्थापन को लेकर भी चिंतित होते हैं। वे कहते हैं कि “हम गांव वालों के मन में इस वक्त डर समाया है कि कहीं सरकार हमें अपने गांव से बाहर न कर दे। हमलोग आजीविका के लिए भी मुख्यत: जंगल पर निर्भर है। मैं खुद एक सीजन में महुआ से करीब 15 हजार, तेंदू पत्ता से लगभग 10 हजार और आचार से करीब 5 हजार रुपए की कमाई करता हूं। ऐसे ही अन्य ग्रामीण भी जंगलों के उत्पादों पर निर्भर हैं। घूमने जाने से लेकर मवेशी चराने तक के लिए हम जंगल पर निर्भर हैं। यह निर्भरता बनी रहे तो हमारे जीवन की सुख-शांति बनी रहेगी।”

करीब 42 वर्ष के दुलीचंद परते कहते हैं कि “देश में महंगाई और बेरोजगारी दो ऐसे मुद्दे हैं जो लोगों को जकड़ते जा रहे हैं। ऐसे में हम ग्रामीण क्षेत्र में जंगलों पर खाने-पीने और आय के लिए निर्भर रहते हैं। यदि यही हमारे हाथ से चला गया तब हम खाने और कमाने के लिए पलायन के शिकार हो जाएंगे।”
इसके बाद वह कहते हैं कि “बालाघाट की कई बॉक्साइट परियोजनाओं में स्थानीय लोगों को बहुत कम रोजगार मिला है। अधिकतर रोजगार बाहरी लोगों को मिला है। ऐसे में इस परियोजना से हमें कोई सम्मानजनक रोजगार मिलेगा, इसकी कोई उम्मीद नहीं। हम जंगल से पत्तल बनाने का भी काम करते हैं। पत्तलों को हम शहर में बेचते हैं। अब हमारा यह काम भी प्रभावित हो जाएगा।”
बमनी गांव की निवासी ज्योति बतलाती हैं कि “अभी मैं पचामा दादर के जंगल में महुआ बीनने के काम में जुटी हूं। पचामा के जंगल में झरना भी है। पानी के लिए हम उस झरने पर ही आश्रित हैं। झरने से हम परिवार और मवेशियों के लिए पानी सिर पर ढो कर लाते हैं। इस जंगल को बचाना हमारे लिए असलियत में अपने अस्तित्व को बचाना है।”
फिर वह नम आंखों से कहती हैं कि “यदि हमारा जंगल उजड़ गया तब हम प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों से दूर हो जाएंगे। इसके साथ कोई भी हमारे प्रकृति के साथ जीने के संबंध को स्थापित नहीं कर पाएगा। हमारे देवी-देवता का वास भी जंगल में ही है, जहां हम तीज-त्योहार के मौके पर बाटियां बनाने और पूजा करने जाते हैं।”

बमनी की ही सुंदरा टेकाम करीब 50 वर्ष की होंगी। वह कहती हैं कि “हम सालों से जंगल के पास बसे हुए हैं। जंगल हमें घर बनाने की मिट्टी से लेकर खाने के लिए खाना तक देता है। जंगल छीनना वास्तव में हमारी निर्भरता को चोट पहुंचाना है। हम इस परियोजना से सहमत नहीं हैं। अगर सहमति की कोई गुंजाइश बनती भी है तब भी हमारे लिए समस्त मूलभूत सुविधाओं और हमारे विकास की संभवनाओं की व्यवस्था सरकार को करनी होगी।”
इस परियोजना के खिलाफ स्थानीय आदिवासियों ने एक ज्ञापन भी दिया है, जिसमें खनन के पूर्व जन सुनवाई की मांग की गई है। यह भी कहा गया है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तब स्थानीय जनसमुदाय, जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठन, एवं जनसंगठनों के संयुक्त तत्वाधान में विशाल जनांदोलन चक्काजाम करने मजबूर होना पड़ेगा।
इस परियोजना के संबंध में स्थानीय विधायक संजय उईके कहते हैं कि “हम बहुत शांतिपूर्ण ढंग से इस परियोजना में वनाधिकार कानून के विभिन्न बिंदुओं और ग्राम सभा का पालन करने का ज्ञापन प्रशासन को दे चुके हैं। साथ में हमने शांतिपूर्ण ढंग से परियोजना के विरोध में चक्काजाम किया है। परियोजना क्षेत्र पर्यावरणीय दृष्टि से समृद्ध है। इस क्षेत्र से आदिवासी संस्कृति जुड़ी है। साथ में परियोजना क्षेत्र के लोग जीविका के लिए वन उत्पादों पर भी निर्भर हैं। ऐसे में इस परियोजना में इन खास पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।”
(संपादन : नवल/अनिल)
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