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कब तक दलित सहते रहेंगे जाति के नाम पर अपमानजनक शब्द?

ऐसी स्थिति में जब अनुसूचित जातियों के लोग उच्च शिक्षित हो रहे हैं, तरक्की कर रहे हैं, ऊंचे ओहदों पर काबिज हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब जाति की बात आती है तो ऐसे लोग भी हीनभावना से ग्रसित हो जाते हैं। बता रहे हैं डॉ. संजीव खुदशाह

भारत की अनुसूचित जातियों के लोग अपनी-अपनी जातियों के नामों को लेकर हमेशा परेशान रहते हैं। उन्हें लगता है कि यह उनके लिए गाली के समान है। दूसरी तरफ अक्सर ऐसा हो रहा है कि अधिकतर दलित जातियों का वास्तविक नाम अलग है और जाति प्रमाण पत्र जिस नाम से बनता है, वह अलग है। यह एक साझी समस्या है, जिसका निदान आवश्यक है। चूंकि अधिकतर जातियां अछूत मानी गईं तो इस कारण आम बोलचाल की भाषा में इन्हे घृणास्पद नामों से पुकारा जाता रहा है। राजस्व अभिलेख में भी वे घृणास्पद नाम ही दर्ज हो गए, इस कारण उन्हीं अपमानजनक नामों से जाति प्रमाण पत्र भी जारी होने लगे।

आज के आधुनिक युग में जब समता और लोकतंत्र की बात की जा रही है, तब जाति कहीं पीछे छूट जा रही है। ऐसी स्थिति में जब अनुसूचित जातियों के लोग उच्च शिक्षित हो रहे हैं, तरक्की कर रहे हैं, ऊंचे ओहदों पर काबिज हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब जाति की बात आती है तो ऐसे लोग भी हीनभावना से ग्रसित हो जाते हैं। जैसे उत्तर प्रदेश के जाटव खुद को चमार कहलाना पसंद नहीं करते। महाराष्ट्र के बौद्ध समाज के लोग अब खुद के लिए महार शब्द का उपयोग नहीं करना चाहते। ऐसे ही छत्तीसगढ़ में सतनामी समाज के लोग चमार शब्द को छोड़ रहे हैं। डोमार, हेला, मखियार, बसोर, धानुक समाज ‘मेहतर’ कहलवाना नहीं चाहते। यह समस्या उन लोगों के लिए ज्यादा है जिन्होंने पढ़-लिखकर अच्छा मुकाम हासिल कर लिया है।

हालांकि सरकार के स्तर पर भी कुछ पहल किए गए हैं। जैसे कि छत्तीसगढ़ सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी आदेश (क्रमांक 9-4/2001/1-3, रायपुर दिनांक 10 जनवरी 2003) में कहा गया कि “भारत सरकार द्वारा राज्य के लिए जारी अनुसूचित जाति की सूची के अनुक्रमांक 14 पर चमार, चमारी, बैरवा, भांबी, जाटव, मोजी, रैगर, नोना, रोहिदास, रामनामी, सतनामी, सूर्यवंशी, सूर्यरामनामी, अहिरवार, चमार, मंगन, रैयदास को शामिल किया गया है। छत्तीसगढ़ राज्य के सतनामी समुदाय संत गुरु घासीदास जी के सिद्धांतों का अनुरसरण करते हुए सामाजिक और शैक्षणिक विकास की ओर अग्रसर हो रहे हैं। उन्हे सतनामी के नाम से जाति प्रमाण पत्र मिलने में हो रही कठिनाइयों पर राज्य शासन द्वारा विचार किया गया है।

“विचारोपरांत निर्णय लिया गया है कि इन समुदाय के लोगों पूर्वजों के राजस्व अभिलेखों में यदि जाति चमार अंकित हो, तो उन्हे उप-समूह सतनामी का जाति प्रमाण पत्र वास्तव में उनके सतनामी होने पर पटवारी तथा सरपंच के प्रमाण पत्रों के आधार पर जारी किया जा सकता है, दोनों शब्द भारत सरकार द्वारा जारी अनुसूचित जाति की सूची में होने के कारण इनके संवैधानिक अधिकारों/प्रावधानों में कोई अंतर नही आएगा।”

जातिगत नामों से हीनभावना के शिकार हो रहे दलित

सनद रहे कि इस तरह के आदेश से केवल एक ही जाति के लोगों को निदान मिला। लेकिन ऐसी अनेक जातियों के लोग हैं, जिन्हें इस तरह का आदेश निकाल कर अपमानजनक नाम से छुटकारा दिलाए जाने का इंतजार है। दरअसल, बहुसंख्यक आबादी एवं पहुंच वाली जातियों को तो ऐसी सुविधा मिल जाती है, लेकिन जो जातियां अब भी विकास के अंतिम पायदान पर हैं, उन जातियों के लोग न तो अपनी बात कह पाते हैं और न ही उन्हें ऐसी सुविधा मिलती है।

वैसे अस्पृश्यता अपराध अधिनियम-1955 एवं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 में भी इन अपमानजनक शब्दों के प्रयोग की मनाही की गई है। लेकिन आज न केवल इन शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है, बल्कि इन नामों से जाति प्रमाण पत्र भी जारी हो रहे हैं।

भारत आज समानता, गरिमा और लोकतंत्र की बात करता है, लेकिन एक बुनियादी सवाल अब भी अनुत्तरित है कि क्या हम अपने नागरिकों को उनकी पहचान के साथ सम्मान दे पा रहे हैं? अनुसूचित जातियों से जुड़े अपमानजनक जाति नाम इस प्रश्न को बार-बार हमारे सामने खड़ा कर देते हैं।

समस्या नई नहीं है। सदियों की सामाजिक संरचना ने कुछ समुदायों को न केवल हाशिए पर रखा, बल्कि उन्हें ऐसे नाम भी दिए जो उनके श्रम, पेशे या सामाजिक स्थिति को हीन रूप में परिभाषित करते थे। समय बदला, संविधान आया, कानून बने — लेकिन वे नाम, जो कभी अपमान के औज़ार थे, आज भी सरकारी कागज़ों में जीवित हैं।

विडंबना देखिए कि जिन शब्दों को सार्वजनिक रूप से कहना कानूनन अपराध हो सकता है, वही शब्द जाति प्रमाण पत्रों में वैध पहचान बनकर दर्ज हैं। अस्पृश्यता अपराध अधिनियम-1955 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 जैसे कानून में अपमानजनक संबोधनों के प्रयोग प्रतिबंधित हैं, लेकिन प्रशासनिक तंत्र अब भी पुराने ढांचे में जकड़ा हुआ है।

इसका असर केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहता है। जब कोई शिक्षित युवा, जो अपनी मेहनत से ऊंचे पद तक पहुंचा है, अपने जाति प्रमाण पत्र में एक ऐसा नाम देखता है, जिसे समाज अपमानजनक मानता है, तो इससे उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है। यह केवल पहचान का नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा का भी प्रश्न है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में इस समस्या के समाधान की झलक मिलती है। छत्तीसगढ़ में सतनामी समुदाय को उनके सामाजिक नाम से प्रमाण पत्र देने की पहल हो या उत्तर प्रदेश में “जाटव” नाम की स्वीकृति – ये उदाहरण बताते हैं कि बदलाव संभव है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी कहा था कि सामाजिक समानता केवल कानून से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से आती है। यह चेतना अब प्रशासनिक नीतियों में भी दिखनी चाहिए।

असल समस्या यह है कि प्रशासनिक व्यवस्था सामाजिक बदलाव की गति से पीछे चल रही है। जिन नामों को समाज बदल रहा है, उन्हें सरकारी रिकॉर्ड अब भी ढो रहे हैं। नतीजा यह कि एक ही व्यक्ति की दो पहचानें : एक सम्मानजनक सामाजिक पहचान, और दूसरी अपमानजनक आधिकारिक पहचान कायम हो जाती हैं।

इस स्थिति को बदलने के लिए आधे-अधूरे उपाय नहीं, बल्कि व्यापक नीति की जरूरत है। सबसे पहले, अनुसूचित जातियों की सूची की पुनर्समीक्षा होनी चाहिए। जिन नामों को समुदाय स्वयं अस्वीकार करता है, उन्हें हटाकर उनके स्वीकृत और सम्मानजनक नामों को शामिल किया जाना चाहिए। “सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन” यानी व्यक्ति की स्वयं की पहचान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

दूसरा, स्थानीय प्रशासन को यह अधिकार और दिशा-निर्देश मिलने चाहिए कि वे वास्तविक सामाजिक पहचान के आधार पर जाति प्रमाण पत्र जारी कर सकें।

तीसरा, यह समझना होगा कि नाम बदलना केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह गरिमा का प्रश्न है। जब तक किसी व्यक्ति को उसके नाम के कारण हीन महसूस कराया जाएगा, तब तक समानता का दावा अधूरा रहेगा।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

संजीव खुदशाह

संजीव खुदशाह दलित लेखकों में शुमार किए जाते हैं। इनकी रचनाओं में "सफाई कामगार समुदाय", "आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग" एवं "दलित चेतना और कुछ जरुरी सवाल" चर्चित हैं

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