शाहनवाज़ आलम ने हाल ही में फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित अपने लेख ‘भाजपा चाहती है कि मुसलमान, हिंदू पिछड़े और दलित नागरिक की तरह न सोचें’ में कई महत्वपूर्ण सवालों को उठाया है। इसमें उठाए गए मुद्दों पर गंभीर विमर्श की भी जरूरत है। जैसे कि इस लेख में उन्होंने लिखा है कि “आज मुसलमानों की बदहाली की बड़ी वजह उनका नागरिक की तरह न सोच पाना है…।” आगे इसी लेख में वह एक जगह लिखते हैं कि “हिंदुत्ववादी राजनीति को मुसलमानों के मुसलमानों की तरह सोचने से कोई दिक्कत नहीं है। उसे दिक़्क़त बस मुसलमानों के नागरिक की तरह सोचने से है…।” मुझे लगता है कि आज के समय में इस बात पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि क्या देश का मुसलमान नागरिक चेतना से दूर जा रहा है एवं क्या मुस्लिम सोच और नागरिक चेतना में कोई बुनियादी अंतर्विरोध है?
मैं अपनी बात की शुरुआत मुजफ्फरनगर जिले (उत्तर प्रदेश) के एक ऐसे गांव से कर रहा हूं, जो उच्च जाति के मुसलमानों का गांव है और यहां जमीन पर अधिकांश मिल्कियत इन्हीं उच्च जाति के मुस्लिम समाज के पास है। यह गांव मुजफ्फरनगर में 2013 में हुई सांप्रदायिक हिंसा से सीधे प्रभावित नहीं था, हालांकि हिंसा के बाद बड़ी संख्या में मुस्लिम पीड़ित इस गांव के विभिन्न इलाकों में आकर बसे। मात्र एक हफ्ते पहले ही मेरी मुलाकात इस गांव के एक मुस्लिम नौजवान से हुई, जो उच्च जाति से आते हैं और जिन्होंने दिल्ली की एक मशहूर पब्लिक यूनिवर्सिटी से मास मीडिया की डिग्री हासिल की है। वह अभी वैकल्पिक मीडिया के एक प्रतिष्ठित संस्थान में नौकरी कर रहे हैं। इस नौजवान ने मुझे अपने जीवन से जुड़ा एक रोचक वाक्या बताया कि 2019 से पहले वह दिल्ली में एक वामपंथी संगठन में सक्रिय थे और रोजा-नमाज़ या मुस्लिम पहचान से उन्होंने अपने आपको दूर करके रखा हुआ था। वर्ष 2019 के आस-पास संगठित तरीके से होने वाली मुस्लिम विरोधी मॉब लिंचिंग या अन्य घटनाओं ने उन्हें सोचने के लिए मजबूर कर दिया। इसके बाद उन्हें महसूस हुआ कि उनका नाम उर्दू में होने की वजह से, वह अपनी मुस्लिम पहचान को जाहिर करने से बच रहे हैं। इसलिए उन्होंने बड़ी-सी दाढ़ी रखना, टोपी पहनना और नियमित नमाज़ पढ़ना शुरू किया। उस नौजवान के ‘मुस्लिम’ हो जाने को किस तरह से देखा जाना चाहिए?
जाहिर है कि कई लोग इस बदलाव को मुस्लिम समाज पर क्रमिक रूप से बढ़ते हमले और इसके तत्पश्चात मुस्लिम समाज का दीन की तरफ उन्मुखीकरण के तौर पर भी देख सकते हैं। कई प्रगतिशील इसे एक प्रतिक्रियावादी परिघटना के बतौर भी चिह्नित कर सकते हैं। लेकिन उस नौजवान से हुई बातचीत के आधार पर मैं इसे, उस नौजवान के द्वारा अपनी दीनी (मुस्लिम) पहचान के लिए दावेदारी करने के रूप में भी देखे जाने की वकालत करता हूं, क्योंकि भारतीय संविधान ने हर व्यक्ति को यह अधिकार प्रदान किया है कि कोई भी व्यक्ति अपनी मजहबी पहचान को सार्वजनिक करते हुए, आजादी के साथ अपना जीवन जी सकता है। यानि कोई हिंदू तिलक और कलावा या फिर कोई मुस्लिम दाढ़ी या टोपी पहनकर पब्लिक स्पेस में कहीं भी आ-जा सकता है।
यदि जिस मुस्लिम पहचान की वजह से मुसलमानों के ऊपर हमले हो रहे हैं और इस बात से सजग रहने वाला कोई मुसलमान अगर मुस्लिम सोच या पहचान के साथ जीना चाहता है, तो क्या इसे हमें एक प्रकार के प्रतिरोध या प्रोटेस्ट के रूप में नहीं देखना चाहिए? वह मुस्लिम नौजवान जो खुद देश के एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान में नौकरी कर रहा है और जिसने दिल्ली के मशहूर पब्लिक यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है, क्या वह अचानक से दीनी पहचान रख लेने की वजह से अपने नागरिक अधिकारों के प्रति बेपरवाह हो जाएगा?
शाहनवाज़ आलम का इस तरह का दृष्टिकोण मुस्लिम सोच और नागरिक पहचान के बीच एक कृत्रिम द्विआधारी विभाजन (बाइनरी) स्थापित करता है, जो मुझे सरलीकृत प्रतीत होता है, क्योंकि ये दोनों पहचानें एक-दूसरे के साथ सह-अस्तित्व में रह सकती हैं। ठीक इसी प्रक्रिया को हम जाटव समाज के संदर्भ में भी देख सकते हैं, क्योंकि जाटवों का जाटवों की तरह सोचना और अपने नागरिक अधिकारों के प्रति सजग होने में किसी प्रकार के अंतर्विरोधों को तलाशना शायद सही नहीं होगा। जब हम मुस्लिम सोच या पहचान के संदर्भ में बात कर रहे हैं तो हमें इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि गैर-मुस्लिम समाजों की तरह मुस्लिम समाज भी एकाश्म नहीं है। मुस्लिम सोच या पहचान का जाति और वर्ग की श्रेणियों के साथ भी घनिष्ठ संबंध है। मुस्लिम पहचान के संदर्भ में अपनी बात को और बेहतर तरह से स्पष्ट करने के लिए कुछ और घटनाओं का जिक्र करना यहां जरूरी समझता हूं।

वर्ष 2013 में मुजफ्फरनगर और शामली जिलों में सांप्रदायिक हिंसा की अधिकांश घटनाएं उन हिंदू जाटों के गांवों में हुई थीं, जहां मुसलमानों की संख्या 1 फीसदी से 10 फीसदी के आसपास थी और प्रत्यक्ष हिंसा के शिकार आम तौर पर शिल्पकार, मजदूर या पसमांदा मुसलमान थे। हिंसा के बाद लगभग 50 हजार मुसलमानों ने राज्य से मिलने वाली सुरक्षा के अभाव के चलते मुजफ्फरनगर और शामली के मुस्लिम बाहुल्य गांव या कस्बों की तरफ पलायन किया था। सांप्रदायिक हिंसा के बाद इन दोनों जिलों में कई सारी नई कालोनियां बसीं, जहां ये विस्थापित होकर रह रहे हैं। कई नई कॉलोनियों को बसाने में इस्लामिक संगठनों जैसे जमीयत उलेमा-ए-हिंद, जमात-ए-इस्लामी और दक्षिण भारत की इस्लामिक संस्थाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। दो कॉलोनियों में मकान बनाने के लिए सीपीआईएम ने भी पीड़ितों को 1 लाख रुपए की आर्थिक मदद प्रदान की थी। सांप्रदायिक हिंसा के तेरह साल के बाद इन बस्तियों में रहने वाले लोग किन हालात में रह रहे हैं, यह जानने के लिए मैं बीस से अधिक बस्तियों में गया और वहां रह रहे परिवारों से बात की। मैं उन कॉलोनियों में विशेष रूप से गया, जिन्हें बसाने में इस्लामिक संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। ऐसा मैंने सचेतन रूप से इसलिए भी किया क्योंकि गुजरात (2002) की हिंसा के बाद रुबीना जसानी (2008) ने अपने शोध में इस बात को सामने लाने की कोशिश की थी कि गुजरात में इस्लामिक संगठन न केवल पुनर्वास के काम को कर रहे थे, बल्कि विस्थापित समुदाय के अंदर इस्लामिक सुधार की परियोजना को भी आगे बढ़ा रहे थे। इसलिए मेरे लिए यह जानना जरूरी था कि विस्थापितों की वे कॉलोनियां, जिन्हें इस्लामिक संगठनों के द्वारा बसाने में मदद दी गई, क्या वहां पर भी गुजरात के पैटर्न को दोहराया गया।
इसलिए ऐसी बस्तियां, जिन्हें लोगों ने अपने प्रयास से बसाया और कई जिन्हें इस्लामिक संगठनों के द्वारा बसाया गया था, मैंने इन दोनों ही तरह की 20 से अधिक कॉलोनियों में जाकर परिवारों से बात की। इन कॉलोनियों में रहने वाले अधिकांश परिवार मजदूर और शिल्पकार तबकों से हैं। जिसमें फेरी करने वाले, लुहार, नाई, बुनकर, भट्टे में काम, निर्माण मजदूर, राजमिस्त्री, खेत मजदूर आदि रहते हैं। इन दोनों तरह की बस्तियों में मुझे 45 साल तक की उम्र का एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला, जिसे देखकर यह पता लगाना संभव हो कि वह हिंदू है या मुसलमान। यानि कोई भी व्यक्ति ‘मुस्लिम’ पहचान जैसे दाढ़ी या टोपी में नहीं दिखा। अपवाद स्वरूप कुछ बुजुर्गों को छोड़कर, जो अब उम्र बढ़ने की वजह से लगभग काम करना बंद कर चुके हैं और घर पर ही रहते हैं।
हालांकि यह भी सवाल उठाया जा सकता है कि फेरी करने के लिए अन्य प्रदेशों में जाने वाले अपनी सुरक्षा की वजह से मुस्लिम पहचान से दूरी बनाकर या व्यापार करने के लिए एक स्ट्रैटजी के तहत ऐसा करते हैं। मुझे कई सारे फेरी वालों ने खुद बताया कि पिछले कुछ वर्षों में हिमाचल, उत्तराखंड, हरियाणा और राजस्थान के कुछ हिस्सों और अब उड़ीसा में जगह-जगह उनकी आईडी, गांव के लोगों के द्वारा चेक की जाती है। हिमाचल और उत्तराखंड में इन फेरी वालों को किसी इलाके में फेरी करने के लिए थाने से एक प्रमाण पत्र बनवाना पड़ता है। इस प्रमाण पत्र को लेने के बाद ही वे इन प्रदेशों के अलग-अलग गांवों में फेरी का काम कर सकते हैं। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में कुछ गांव के एंट्री पॉइंट पर ही बोर्ड लगे हैं, जिनमें लिखा है कि “चेतावनी– गैर-हिंदू/रोहिंग्या मुसलमानों व फेरी वालों का गांव में व्यापार करना/घूमना वर्जित है।”
मैं एक ऐसे फेरी वाले से भी मिला जिसने मुझे बताया कि उसके पास हिमाचल के 17 थानों के प्रमाण पत्र हैं, क्योंकि किसी भी नए इलाके में जाने से पहले थाने का प्रमाण पत्र लेना, गांव के कुछ लोगों की तरफ से अनिवार्य कर दिया गया है और इन दोनों प्रदेशों के गांवों के लोग आधार या वोटर आइडी को वैलिड प्रमाणपत्र नहीं मानते। कई फेरी वालों के पास थाने का प्रमाण पत्र होने के बावजूद भी गांव से भगा दिया जाता है। मैं एक ऐसे फेरी वाले से भी मिला, जिसे अभी हाल ही में हरियाणा के एक गांव में ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ के द्वारा मारा-पीटा गया। फेरी वालों में से अधिकांश ने उत्तराखंड तो पहले से ही जाना बंद कर दिया था और अब वे हिमाचल में कांग्रेस की सरकार होने के बाद भी, अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं। फेरी वालों ने यह भी बताया कि इस तरह की घटनाएं दस साल के पहले तक बिल्कुल नहीं होती थीं।
मैं फेरी वालों के बीच व्याप्त असुरक्षा पर विस्तार से इसलिए भी बात कर रहा हूं क्योंकि उनकी मोबिलिटी, मेहनतकश मुस्लिम समाज में सबसे ज्यादा है और जाहिरा तौर पर उनमें असुरक्षा भी ज्यादा होगी। लेकिन असुरक्षा, मोबिलिटी और व्यापार की स्ट्रैटजी की वजह से उनका मुस्लिम पहचान से दूर रहने का तर्क भी वाजिब प्रतीत नहीं होता है। वजह यह कि विस्थापितों की बस्तियों में रहने वाले सभी मेहनतकश पुरुष चाहे वे किसी भी काम को करते हों, उन्होंने अपने आपको मुस्लिम पहचान से दूर रखा हुआ है। ये लोग 2013 की सांप्रदयिक हिंसा से पहले जब वे, हिंदू जाटों के गावों में रहते थे और अब जब वे, मुस्लिम बाहुल्य बस्तियों में रह रहे हैं, उन्होंने तब से लेकर आज तक अपने आपको मुस्लिम पहचान से दूर रखा हुआ है।
यहां मैं कुछ और घटनाओं के माध्यम से अपनी बात को और स्पष्ट करने की कोशिश करता हूं। शामली जिले के कांधला स्थित विस्थापितों की एक कॉलोनी में मैं मस्जिद के इमाम साहब की पत्नी से मिला। इमाम साहब तीन दिन के लिए जमात में गए हुए थे। मैंने इमाम साहब की पत्नी से पूछा कि अगर इमाम साहब जमात करने के लिए गए हैं, तो मस्जिद में नमाज़ कौन पढ़ता है। उन्होंने बताया कि यहां के लोगों को पांच टाइम की नमाज़ के लिए वक्त निकालना बड़ा मुश्किल होता है क्योंकि सभी लोग सुबह काम के लिए निकलते हैं और शाम को ही घर वापस आते हैं। उन्होंने बताया कि कई लोगों को तो मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए इमाम साहब को ही बार-बार बुलाना पड़ता है।
बच्चों की दीनी तालीम को लेकर भी जब एक अन्य कॉलोनी में मैंने बच्चों के पिता से पूछा कि बच्चों को दीनी तालीम कहां से मिलती है, तो उन्होंने बताया कि मस्जिद में इमाम साहब ही बच्चों को दीनी तालीम दे रहे हैं। जब मैंने बच्चों से इस बारे में पूछा कि आप लोग मस्जिद में आजकल क्या पढ़ रहे हैं, तो उन्होंने बताया कि इमाम साहब गांव छोड़कर जा चुके हैं। तो मैंने उन बच्चों से पूछा कि अभी आप लोग कहां पढ़ रहे हैं तो उन्होंने बताया कि पास वाले घर में, पास के एक दूसरे गांव के एक इमाम साहब पढ़ाने आते हैं। जब मैंने उनके पिता से इस बारे में जानने की कोशिश की तो वह इस बात से अनभिज्ञ थे कि बच्चे मस्जिद में न जाकर पास के ही किसी दूसरे घर में पढ़ रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जब से यहां पर हम लोगों की मस्जिद बनी है, कई सारे इमाम साहब जा चुके हैं क्योंकि इस बस्ती के लोग उन्हें कुल 6 से 7 हजार रुपए ही दे पाते हैं, इतने कम में उनका गुजारा हो पाना काफी मुश्किल है। ये परिवार ईंट-भट्टे में काम करते हैं और ईंट-भट्टे में काम करने वाले परिवारों को लगभग पांच से छह महीने तक पूरे परिवार के साथ, जिसमें बच्चे भी शामिल होते हैं, भट्टों में ही रहना पड़ता है। इससे उनकी दीनी और दुनियावी दोनों तरह की तालीम प्रभावित होती है। शायद यही वजह है कि इन परिवारों के लोग बच्चों की दीनी तालीम को लेकर उतना फिक्रमंद नहीं दिखते, जितना कि वे लोग, जिन्होंने सांप्रदायिक हिंसा के बाद अपनी आर्थिक स्थिति को थोड़ा बेहतर कर लिया है।
इन पीड़ित या विस्थापित परिवारों से बात करने पर जो एक चीज कॉमन थी वह यह कि इन सभी को देश का नागरिक होने की वजह से न्याय की उम्मीद थी, लेकिन वह नहीं मिला। राज्य से इंसाफ की ललक और उसे न पाने की निराशा को उनके मायूस चेहरों से समझा जा सकता है।
यहां तफ़सील के साथ इन घटनाओं को जिक्र करने का आशय यह है कि एक उच्च जाति और खेती की जमीन पर मिल्कियत रखने वाले मुसलमान के लिए मुस्लिम पहचान और मजदूर या पसमांदा तबके से आने वाले मुसलमान के लिए मुस्लिम सोच या पहचान के मायने एक जैसे नहीं हो सकते हैं। मैंने ऊपर जो घटनाएं साझा की हैं वह इस ओर इशारा करती हैं कि उच्च जाति और उच्च वर्गीय मुसलमानों के लिए दाढ़ी, टोपी और दीनी तालीम का महत्वपूर्ण होना और साथ में नागरिक अधिकारों से लैस होने में कहीं कोई विरोधाभास नहीं हो सकता है। इसी प्रकार कामगार या पसमांदा मुसलमानों के लिए दाढ़ी, टोपी, नमाज़ या दीनी तालीम के प्रति बेफ़िक्री होने के बाद भी, सांप्रदायिक हिंसा से पीड़ित होने की वजह से और एक नागरिक होने के नाते वे न्याय पाने की उम्मीद कर सकते हैं। यहां यह बात जरूर ध्यान में रखी जानी चाहिए कि मुस्लिम पहचान या सोच को वर्ग और जाति की श्रेणियों के साथ अंतरसंबंधों के नजरंदाज किए जाने की सूरत में सरलीकरण की संभावना बढ़ सकती है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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