[बात 11 अगस्त, 1987 की है। उस समय बिहार विधान सभा के अध्यक्ष थे शिवचंद्र झा। उन्होंने कर्पूरी ठाकुर को नेता, विरोधी दल के पद से हटाने का नियमन दिया था।
बताते चलें कि 30 जुलाई, 1985 को बिहार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस 324 में से 196 सीटें जीत कर सत्ता में लौटी थी और कांग्रेस के शिवचंद्र झा विधानसभा अध्यक्ष चुने गए और शिवनंदन पासवान उपाध्यक्ष। लोकदल के 46 सदस्य तब विजयी हुए थे। कर्पूरी ठाकुर को लोकदल विधायक दल का नेता चुना गया। इस तरह कर्पूरी ठाकुर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने थे। इस दरमियान एक अभूतपूर्व राजनीतिक घटना घटित हुई।
हुआ यह कि जनवरी, 1989 में कांग्रेस ने आंतरिक विवादों के कारण शिवचंद्र झा को बिहार विधान सभा के अध्यक्ष पद से हटा दिया। इस दौरान शिवनंदन पासवान, जो कि विधान सभा के उपाध्यक्ष थे, कार्यकारी अध्यक्ष बन गए। यह राजनीतिक परंपरा के उलट थी, क्योंकि विधान सभा के अध्यक्ष पद पर सत्तासीन दल के सदस्य ही निर्वाचित होते रहे हैं। शिवनंदन पासवान इस पद पर मार्च 1989 तक रहे। उनके बाद कांग्रेस ने मोहम्मद हिदायतुल्ला खां को बिहार विधान सभा का अध्यक्ष बना दिया।
खैर, जनवरी, 1989 से लेकर मार्च, 1989 के दौरान कार्यकारी अध्यक्ष शिवनंदन पासवान ने जननायक को मरणोपरांत नेता, विरोधी दल के रूप में मान्यता 30 जनवरी, 1989 को अपने नियमन के जरिए दी। जननायक का निधन 17 फरवरी, 1988 को हो गया था। प्रस्तुत है, शिवनंदन पासवान का यह ऐतिहासिक नियमन]
शिवनंदन पासवान, कार्यकारी अध्यक्ष, बिहार विधान सभा
30.1.1989
बिहार विधान सभा में दिनांक 30.1.1989 को कार्यकारी अध्यक्ष द्वारा दिया गया नियमन का मूल पाठ हिंदी में और अनुवाद अंग्रेजी में।
तत्कालीन अध्यक्ष द्वारा 11.8.1987 को श्री कर्पूरी ठाकुर को नेता विरोधी दल के पद से हटाना एवं तत्संबंधी विवरणिका 1699, दिनांक 12 अगस्त 1987 तथ्यों से परे था एवं विधि सम्मत नहीं था।
अतः तत्कालीन अध्यक्ष के उक्त निर्णय को मैं अपने एतद् निर्णय द्वारा रद्द घोषित करता हूं और यह भी घोषणा करता हूं कि माननीय श्री कर्पूरी ठाकुर अपने मृत्युपर्यन्त अर्थात 17.2.1988 के प्रातः काल तक बिहार विधान सभा में विरोधी दल के नेता पद पर बने रहे थे।
माननीय श्री कर्पूरी ठाकुर का व्यक्तित्व असाधारण था। लोकतंत्र मे उनकी अटूट आस्था थी। 1952 से वे लगातार बिहार विधान सभा के सदस्य थे। इस अवधि में वे एक बार उप मुख्यमंत्री तथा दो बार मुख्यमंत्री के पद पर रह चुके थे। तत्कालीन अध्यक्ष के विवादास्पद निर्णय से उन्हें गहरा सदमा पहुंचा था।
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कतिपय माननीय सदस्यों ने, तत्कालीन अध्यक्ष श्री शिवचंद्र झा के द्वारा दिनांक 11.8.1987 को जो आदेश दिया गया जिसके द्वारा माननीय श्री कर्पूरी ठाकुर को बिहार विधान सभा के नेता, विरोधी दल के रूप में मान्यता समाप्त की गई, जिसे 12 अगस्त 1987 के विवरणिका में प्रकाशित की गई, से संबंधित संविधान एवं नियम के उल्लंघन का प्रश्न उठाया है तथा मुझसे उस संविधान एवं नियम के आलोक में पुनर्विचार के लिए आग्रह किया है। यह उल्लेखनीय है कि स्व. कर्पूरी ठाकुर ने भी अपने कई पत्रों के माध्यम से तत्कालीन अध्यक्ष श्री शिवचंद्र झा से उनके द्वारा दिए गये नियमन पर पुनर्विचार हेतु आग्रह किया था।
उपरोक्त विषय पर निर्णय लेने के पूर्व निम्नलिखित तथ्यों को उद्धृत करना आवश्यक है। 52वां संविधान संशोधन अधिनियम 1985 भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची के रूप में जोड़ा गया जो दिनांक 1.3.85 को प्रभावी हुआ।

उक्त संविधान संशोधन के पश्चात् बिहार विधान सभा का गठन हुआ। उसके अनुसार निर्वाची पदाधिकारी द्वारा प्राप्त सूचना के आधार पर सभा अध्यक्ष के आदेश से निर्वाचित सदस्यों की दलगत सूची (रजिस्टर) मार्च 1985 में प्रकाशित की गई, जिसके अनुसार लोकदल के सदस्यों की संख्या 46 है। उसके पश्चात समय-समय पर अध्यक्ष के आदेश से दलगत सूची प्रकाशित की गई। सभा अध्यक्ष द्वारा विवादास्पद निर्णय के पूर्व अंतिम दलगत सूची जुलाई, 1987 में प्रकाशित हुई, जिसमें लोकदल के सदस्यों की संख्या 46 बतायी गई है। लोकसभा द्वारा प्रकाशित ‘दी जर्नल आफ पार्लियामेंट्री इन्फोरमेशन’ में भी लोकदल के सदस्यों की संख्या 46 ही बतायी गई है। बिहार विधान सभा में लोकदल विधायक दल के सदस्यों की संख्या प्रारंभ में 46 थी जो कि निर्वाचन आयोग के प्रकाशन में भी अंकित है। किशनपुर उपचुनाव के बाद उक्त दल के सदस्यों की संख्या 47 हो गई। परंतु कोंच उप चुनाव के हार जाने के फलस्वरूप उक्त दल के सदस्यों की संख्या पुनः 46 रह गई।
सभा अध्यक्ष ने सभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित विवरणिका संख्या 1688, दिनांक 12.8.87 में श्री कर्पूरी ठाकुर को विरोधी दल के नेता पद से हटाए जाने के निम्नलिखित 3 कारण बताए हैं :
(1) लोकदल ने बिहार विधान सभा में विधायक दल के सदस्यों के रूप में अपनी मान्यता के लिए संवैधानिक कार्रवाई नहीं की है और न उसे औपचारिक रूप से दल के रूप में मान्यता ही मिली है,
(2) मात्र 19 विधायक ही इस दल में हैं जो अपने को लोकदल विधायक दल के रूप में घोषित करते हैं,
(3) दल के नेता ने अपने संवैधानिक कर्त्तव्यों का अनुपालन नहीं किया है।
माननीय कर्पूरी ठाकुर ने सभा अध्यक्ष से उन कागजातों की लिखित रूप से मांग की कि उन सारे कागजातों को उपलब्ध कराएं जिसके आधार पर उन्होंने (सभा अध्यक्ष ने) उक्त निर्णय लिया है। उनके मृत्युपर्यन्त के सभी अभिलेख जिसके आधार पर तत्कालीन सभा अध्यक्ष ने उपर्युक्त विवादास्पद निर्णय लिया था, उपलब्ध नहीं कराया गया। मात्र तत्कालीन विधान सभा सचिव ने अपने पत्रांक 1793 दिनांक 21.8.1987 द्वारा श्री ठाकुर को सूचित किया कि उनका पत्र अध्यक्ष महोदय के कार्यालय में संबंधित संचिका के साथ भेज दिया गया है, अध्यक्ष महोदय के आदेशोपरांत तत्काल उन्हें सूचित किया जायेगा।
सभा सचिवालय में उपलब्ध अभिलेखों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने के पश्चात् मैं निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुंचता हूं–
(क) तत्कालीन अध्यक्ष द्वारा श्री कर्पूरी ठाकुर के संबंध में नियमन देने के पूर्व भारतीय संविधान के 52वें संविधान संशोधन का पालन नहीं किया गया है। यह उल्लेखनीय है कि संविधान के 52वें संशोधन के संबंध में निर्णय लेते समय विधायिका के पीठासीन पदाधिकारी का स्वरूप एक अर्द्ध न्यायिक प्राधिकार के रूप में हो जाता है और वैसी स्थिति में न्यायपालिका द्वारा अपनायी जाने वाली प्रक्रिया का अनुसरण करना पीठासीन पदाधिकारी के लिए अनिवार्य है। उपलब्ध अभिलेख से यह भी स्पष्ट है कि जिन पत्रों पर तत्कालीन अध्यक्ष द्वारा नियमन दिया गया वे तथाकथित आवेदन पत्र संविधान के 52वें संशोधन एवं उनके अंतर्गत बने नियमों के अनुरूप नहीं था क्योंकि नियम 6 के अनुसार यह स्पष्ट है कि कोई भी आवेदन पत्र जो सदस्य द्वारा अध्यक्ष को दिया जाएगा, उसके तथ्य का सत्यापन सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 में अधिसूचित रीति से किया जाएगा। ऐसा न करने पर नियम 7 के मुताबिक वैसे आवेदन पत्रों को अध्यक्ष रद्द कर देगा। उपर्युक्त बातों से यह भी स्पष्ट है कि तथाकथित पत्र अनुकूल नहीं था।
(ख) उक्त नियमन देने के पूर्व श्री कर्पूरी ठाकुर को कोई भी अवसर प्रदान नहीं किया गया जिसके द्वारा वे अपने पक्ष को रख सके और इस तरह तत्कालीन अध्यक्ष द्वारा दिया गया उक्त नियमन नैसर्गिक न्याय का हनन है। साथ ही संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार का भी उल्लंघन है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि नैसर्गिक न्याय नियम सिद्धांत पर निहित है।
(ग) उक्त नियमन तथ्य से भी परे है क्योंकि तत्कालीन अध्यक्ष बिहार विधान सभा ने दिनांक 4.4.1985 से श्री कर्पूरी ठाकुर को विरोधी दल के नेता के रूप में मान्यता प्रदान की एवं बाद में इसकी घोषणा सभा अध्यक्ष द्वारा सदन में भी की गई। उक्त आधार पर संसदीय कार्य विभाग, बिहार, पटना से सचिवालय के पत्रांक 503 दिनांक 4.4.1985 के अनुसरण में महालेखाकार, बिहार, पटना को अपने पत्रांक 264 दिनांक 19-4-1985 द्वारा यह लिखा कि बिहार विधान सभा में विपक्ष के सभी दलों की संख्या से अधिक श्री कर्पूरी ठाकुर, स०वि०स० के नेतृत्व वाले दल की संख्या 46 है जो गणपूर्ति के निर्धारित संख्या से अधिक है। 4.4.1985 एवं 11.8.87 के बीच में ऐसा कोई भी अभिलेख उपलब्ध नहीं है जिससे यह स्पष्ट हो कि दलगत सूची में कोई परिवर्तन हुआ। ऐसी परिस्थिति में विवरणिका संख्या 1699 दिनांक 12.8.1987 में यह उल्लेख करना कि मात्र 19 विधायक ही लोकदल के विधायक दल के रूप में घोषित हैं, तथ्यहीन, आधारहीन एवं भ्रामक है।
उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर मैं इस निर्णय पर पहुंचता हूं कि तत्कालीन अध्यक्ष द्वारा 11.8.1987 को श्री कर्पूरी ठाकुर को नेता विरोधी दल के पद से हटाना एवं तत्संबंधी विवरणिका 1699 दिनांक 12 अगस्त, 1987 तथ्यों से परे था एवं विधि सम्मत नहीं था। अतः तत्कालीन अध्यक्ष के उक्त निर्णय को मैं अपने एतद् निर्णय द्वारा रद्द घोषित करता हूं और यह भी घोषणा करता हूं कि माननीय श्री कर्पूरी ठाकुर अपने मृत्युपर्यन्त दिनांक 17.2.1988 के प्रातः काल तक बिहार विधान सभा में विरोधी दल के नेता पद पर बने रहे थे।
माननीय श्री कर्पूरी ठाकुर का व्यक्तित्व असाधारण था। लोकतंत्र में उनकी अटूट आस्था थी। 1952 से वे लगातार बिहार विधान सभा के सदस्य थे। इस अवधि में वे एक बार उप मुख्यमंत्री तथा दो बार मुख्यमंत्री के पद पर रह चुके थे। तत्कालीन अध्यक्ष के विवादास्पद निर्णय से उन्हें गहरा सदमा पहुंचा था।
अंत में मैं भारत के महामहिम राष्ट्रपति से भी विनम्र निवेदन करना चाहता हूं कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत संविधान के 52वें संशोधन (10वीं अनुसूची) के संबंध में विधायिका के पीठासीन पदाधिकारियों के अधिकार के संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय से राय मांगने की कृपा करें क्योंकि यह एक अति लोक महत्व का विषय है जिसको लेकर कई विधायिकाओं के सामने समस्या उत्पन्न हुई है और भविष्य में भी उपस्थित हो सकती है।
(बिहार विधान सभा, पटना द्वारा प्रकाशित एवं जयश्री प्रेस (प्रा.) लि. बुद्ध कॉलोनी, पटना द्वारा मुद्रित)
(संपादन : नवल/अनिल)
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