यूजीसी रेगुलेशन, 2026 के क्रियान्वयन पर सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक रोक लगाने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश कल 28 जनवरी, 2026 को इस संबंध में याचिका दायर करने के ठीक दूसरे दिन आया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जायमाल्या बागची की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि नए नियम अस्पष्ट हैं। पीठ के कहा कि यूजीसी के नए नियमों का दुरुपयोग हो सकता है। साथ ही, यह भी कि पीठ ने इसी के साथ नए नियमों की भाषा को स्पष्ट करने के लिए विशेषज्ञों की जरूरत पर भी जोर दिया।
याचिका में इस बात को लेकर सबसे अधिक आपत्ति व्यक्त की गई थी कि नए नियमों में जाति-आधारित भेदभाव को एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव तक सीमित कर दिया गया है। इस मामले में अब अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।
सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त आदेश से यूजीसी के लागू किए गए रेगुलेशन पर रोक लग गया है, जिसमें भेदभाव के पीड़िताें में पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी शामिल किया गया है।
दरअसल, बीते 13 जनवरी को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2026 की अधिसूचना गजट के माध्यम से जारी की गई। इसके उद्देशिका में एससी, एसटी, ओबीसी के अलावा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की बात भी कही गई है। यह निम्नवत उद्धृत है– “धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिव्यांगजनों अथवा इनमें से किसी के सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव का उन्मूलन करना तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को संवर्धन देना।”
सवर्णों को है इस बात से ऐतराज
सवर्ण जातियों को असल में ऐतराज भेदभाव की परिभाषा से है। यह विनियम कहता है कि “जाति-आधारित भेदभाव” का अर्थ “अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव है”। बताते चलें कि रोहित वेमुला की शहादत के बाद यूजीसी ने रेगुलेशन जारी किया था, जिसके जरिए विश्वविद्यालयों एवं यूजीसी के अधीन सभी उच्च शिक्षण संस्थानों अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं एवं दिव्यांगों के हितों की सुरक्षा से संबंधित प्रकोष्ठ बनाए गए। तब भेदभाव की परिभाषा में अन्य पिछड़े वर्ग को शामिल नहीं किया गया था और इस कारण इस वर्ग के छात्रों के लिए प्रकोष्ठ नहीं बनाए गए।
दरअसल, ऊंची जातियों के लोगों को ऐतराज इस बात से है कि भेदभाव की परिभाषा में ओबीसी को शामिल क्यों किया गया। उन्हें ऐसा लगता है कि ऐसा किए जाने से यह स्थापित हो गया है कि भेदभाव करने वालों में केवल ऊंची जातियाें के लोग हैं और इस विनियम से यह बात अब सांस्थानिक रूप से स्थापित कर दी गई है।
जबकि उन्हें यह बात समझ में आनी चाहिए कि यदि एससी और एसटी के खिलाफ भेदभाव करने वाले ओबीसी भी होंगे तो उनके ऊपर भी यह रेगुलेशन प्रभावी होगा।
समता समिति में अब ओबीसी भी
अब जो नया रेगुलेशन यूजीसी द्वारा लाया गया है, उसके पांचवें अनुच्छेद में कहा गया है कि प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान एक समान अवसर केंद्र स्थापित करेग, जिसका कार्य वंचित समूहों के लिए नीतियों एवं प्रभावी क्रियान्वयन पर नजर रखना, शैक्षणिक, वित्तीय, सामाजिक एवं अन्य मामलों में मार्गदर्शन एवं परामर्श प्रदान करना तथा परिसर में सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित करना होगा। इसी पांचवें अनुच्छेद के पांचवें प्रावधान में कहा गया है कि समान अवसर केंद्र में एक समता समिति होगी, जिसका गठन संस्थान प्रमुख द्वारा केंद्र के कामकाज के प्रबंधन एवं भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच के लिए किया जाएगा। इसके छठवें प्रावधान में इस समता समिति के ढांचे की बात कही गई है। इसके मुताबिक, (1) संस्थान प्रमुख पदेन अध्यक्ष होंगे, (2) उच्च शिक्षा संस्थान के तीन प्रोफेसर/ वरिष्ठ संकाय सदस्य, सदस्य के रूप में, (3) उच्च शिक्षा संस्थान का एक कर्मचारी (शिक्षा के अतिरिक्त), सदस्य के रूप में, (4) व्यावसायिक अनुभव रखने वाले नागरिक समाज के दो प्रतिनिधि, सदस्य के रूप में, (5) दो छात्र प्रतिनिधि, जिनका नामांकन शैक्षणिक योग्यता/खेलों में उत्कृष्टता/सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में प्रदर्शन के आधार पर किया जाएगा, विशेष आमंत्रित के रूप में, (6) समान अवसर केंद्र का समन्वयक पदेन सदस्य-सचिव के रूप में कार्य करेगा।
यूजीसी ने अपने इसी विनियम में सातवां प्रावधान यह किया है कि समता समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित जति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इसे अनिवार्य बना दिया गया है।

याद करिए साल 2006
यूजीसी नया रेगुलेशन लेकर यूं ही नहीं आया है। बताते चलें कि डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने 2006 में 93वें संशोधन के माध्यम से अधिनियमित भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15(5) जोड़ा था, जो राज्य को अल्पसंख्यक संस्थानों को छोड़कर, निजी संस्थानों सहित, शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार देता है।
दरअसल, 20 अगस्त, 2025 को संविधान के अनुच्छेद 15(5) के क्रियान्वयन के संबंध में एक रिपोर्ट दोनों सदनों में पेश की गई। इस रिपोर्ट में कहा गया कि अब तक इस प्रावधान का कार्यान्वयन असंतोषजनक रहा है। रिपोर्ट में निजी क्षेत्र के शैक्षणिक संस्थानों को भी शामिल किया गया और कहा गया कि इन संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों का वर्तमान में प्रतिनिधित्व बेहद कम है।
संसदीय समिति की अनुशंसा पर किया गया बदलाव
शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति की इस रिपोर्ट में भारत सरकार को निजी उच्चतर शिक्षण संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के छात्रों के लिए क्रमश: 15 प्रतिशत, 7.5 प्रतिशत और 27 प्रतिशत आरक्षण संबंधी प्रावधान करने का परामर्श दिया गया तथा इन वर्गों के छात्र-छात्राओं के साथ भेदभाव न हो, इसके लिए प्रावधान करने की बात कही गई।
इस संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह हैं। उनके अलावा राज्यसभा के अन्य सदस्यों में बिकास रंजन भट्टाचार्य, सुष्मिता देव, डॉ. सिकंदर कुमार, सुनेत्रा अजीत पवार, रेखा शर्मा, डॉ. भीम सिंह, हरभजन सिंह, घनश्याम तिवारी और संगीता यादव शामिल हैं। वहीं इस समिति में लोकसभा के सदस्यों में बृजमोहन अग्रवाल, अंगोमचा बिमॉल अकोइजम, रचना बनर्जी, शोभनाबेन महेंद्रसिंह बरैया, दर्शन सिंह चौधरी, जितेंद्र दोहरे, एकनाथ गायकवाड़, अभिजीत गंगोपाध्याय, डॉ. हेमांग जोशी, अमर शरदराव काले, कालिपद सरेन खेरवाल, डीन कुरियाकोस, डॉ. संबित पात्रा, रविशंकर प्रसाद, डॉ. डी. पुरंदेश्वरी, राजीव राजय, जिया उर रहमान, करण भूषण सिंह, बांसुरी स्वराज, कामाख्या प्रसाद तासा, और डॉ. टी. सुमति उर्फ तामिझाची थंगापंडियन शामिल हैं।
क्या होगा जब सरकार मान लेगी निजी क्षेत्र में आरक्षण संबंधी अनुशंसा भी?
बहरहाल, यूजीसी का रेगुलेशन एससी, एसटी व ओबीसी वर्गों के छात्र-छात्राओं के हितों की रक्षा के संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा उठाया गया एक मामूली कदम है, जो इन वर्गों के छात्र-छात्राओं के साथ भेदभाव को एड्रेस करता है। जबकि इनके सामने ‘नॉट फाऊंड सुटेबिल’ और बैकलॉग के रिक्त पदों का सवाल है। इसके अलावा केंद्र सरकार ने दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली समिति के इस परामर्श पर ध्यान नहीं दिया है, जिसके मुताबिक, संविधान के अनुच्छेद 15(5) का प्रावधान शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करने का प्रयास करता है, जो सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता के लिए महत्वपूर्ण उपकरण है, जिससे समावेशिता को बढ़ावा मिलता है और अवसरों में असमानता कम होती है। लेकिन वर्तमान में संसद ने ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया है जो अनुच्छेद 15(5) को लागू करे और निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय के छात्रों के लिए आरक्षण अनिवार्य बनाए।
सवाल यह है कि केवल ‘भेदभाव’ की परिधि में ओबीसी को शामिल करने भर से जब ऊंची जातियों के लोग पूरा आसमान सिर पर उठाकर बवाल काट रहे हैं तब जिस दिन निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय के छात्रों के लिए आरक्षण अनिवार्य कर दिया जाएगा तब ये क्या करेंगे?
(संपादन : अनिल)
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