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नफरत भरे भाषण : लोकतंत्र और सामाजिक एकता के लिए बढ़ता खतरा

कुल दर्ज घटनाओं में से 98 प्रतिशत भाषण मुसलमानों के खिलाफ थे। इनमें 1,156 मामलों में मुसलमानों को सीधे तौर पर और 133 मामलों में मुसलमानों के साथ ईसाइयों को भी निशाना बनाया गया। ईसाइयों के खिलाफ नफरत भरे भाषणों की संख्या 2025 में बढ़कर 162 हो गई, जो 2024 की तुलना में 41 प्रतिशत अधिक है। बता रहे हैं फ़ैयाज आलम

भारत विविधताओं का देश है। यहां अलग-अलग धर्म, भाषा, संस्कृति और समुदाय मिलकर समाज की पहचान बनाते हैं। लेकिन वर्ष 2025 की ‘हेट स्पीच इवेंट्स इन इंडिया’ रिपोर्ट एक चिंताजनक तस्वीर सामने रखती है। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ 1318 नफरत भरे भाषणों की घटनाएं दर्ज की गईं, जो न केवल सामाजिक सौहार्द के लिए खतरा हैं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।

वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज़्ड हेट की परियोजना इंडिया हेट लैब ने अपनी 2025 की वार्षिक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 में भारत के 21 राज्यों, एक केंद्र शासित प्रदेश और दिल्ली एनसीटी में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ 1,318 प्रत्यक्ष नफरत भरे भाषण दर्ज किए गए। यह संख्या 2024 की तुलना में 13 प्रतिशत और 2023 की तुलना में 97 प्रतिशत अधिक है। 

कुल दर्ज घटनाओं में से 98 प्रतिशत भाषण मुसलमानों के खिलाफ थे। इनमें 1,156 मामलों में मुसलमानों को सीधे तौर पर और 133 मामलों में मुसलमानों के साथ ईसाइयों को भी निशाना बनाया गया। ईसाइयों के खिलाफ नफरत भरे भाषणों की संख्या 2025 में बढ़कर 162 हो गई, जो 2024 की तुलना में 41 प्रतिशत अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार नफरत भरे भाषणों की घटनाएं देश के कई हिस्सों में घटित हुई हैं, लेकिन कुछ राज्य और शहरी क्षेत्र ऐसे रहे, जहां इनकी संख्या अपेक्षाकृत अधिक रही। बड़े शहरों, राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्यों और चुनावी माहौल वाले क्षेत्रों में इस तरह की घटनाएं अधिक दर्ज की गईं। सार्वजनिक सभाओं, रैलियों, धार्मिक आयोजनों और सोशल मीडिया मंचों पर दिए गए भड़काऊ बयानों ने इन घटनाओं को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। 

वर्ष 2025 में सबसे ज्यादा नफरती बयान देने वाले शीर्ष दस राजनेता

क्रमनामसंक्षिप्त परिचयनफरती बयानों की संख्या
1पुष्कर सिंह धामीमुख्यमंत्री, उत्तराखंड71
2प्रवीण तोगड़ियाप्रमुख, अंतर्राष्ट्रीय हिंदू परिषद46
3अश्विनी उपाध्याय भाजपा नेता व वकील35
4नीतेश राणे बंदरगाह विकास मंत्री, महाराष्ट्र28
5टी. राजा सिंहपूर्व भाजपा नेता व विधायक, तेलंगाना27
6अमित शाह केंद्रीय गृह मंत्री27
7मनोज कुमारअध्यक्ष, राष्ट्रीय बजरंग दल26
8काजल हिंदुस्तानी कट्टर दक्षिपंथी इंफ्लूएंसर23
9योगी आदित्यनाथमुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश22
10यति नरसिंहानंद सरस्वतीप्रमुख, दासना मंदिर, उत्तर प्रदेश20

(स्रोत : ‘हेट स्पीच इवेंट्स इन इंडिया’, 2025)

रिपोर्ट के अनुसार, करीब 88 प्रतिशत घटनाएं उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुईं, जहां भाजपा या उसके नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में हैं। मसलन, उत्तर प्रदेश में 266, महाराष्ट्र में 193, मध्य प्रदेश में 172, उत्तराखंड में 155 और दिल्ली में 76 घटनाएं दर्ज की गईं, जो कुल मामलों का 65 प्रतिशत हैं।

अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा पर प्रभाव

नफरत भरे भाषण महज़ शब्द नहीं होते, बल्कि वे समाज के मन में डर, असुरक्षा और अविश्वास की गहरी छाप छोड़ जाते हैं। जब किसी विशेष समुदाय को बार-बार निशाना बनाया जाता है, तो यह न केवल उस समुदाय को आहत करता है, बल्कि पूरे समाज में असहिष्णुता और असुरक्षा की भावना को जन्म देता है। ऐसे भाषण लोगों को ‘हम’ बनाम ‘वे’ के खांचे में बांट देते हैं, जिससे आपसी संवाद और सह-अस्तित्व की भावना कमजोर होती है। यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि इसका सीधा और गहरा प्रभाव युवाओं की सोच पर पड़ता है। वही युवा, जिनके हाथों में कल का समाज होगा, अगर आज नफरत और विभाजन की भाषा से प्रभावित होंगे, तो भविष्य की सामाजिक एकता और मानवीय संवेदनाओं पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, जिन्होंने वर्ष 2025 में सबसे अधिक 71 नफरती बयान दिए

मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता गहरा असर

यह केवल सामाजिक असहिष्णुता को ही नहीं बढ़ाता, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर और दीर्घकालिक प्रभाव डालता है। लगातार अपमानजनक भाषा सुनना और स्वयं को निशाने पर महसूस करना भय, चिंता, तनाव और अवसाद जैसी समस्याओं को जन्म देता है। कई लोग स्वयं को असुरक्षित, अलग-थलग और बेबस महसूस करने लगते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास और आत्मसम्मान कमजोर होता है।

बिहार के कटिहार ज़िले के निवासी मोहम्मद ज़ामीन का कहना है कि “इस तरह के नफरत भरे भाषण उन्हें और उनके जैसे अनेक लोगों को भीतर तक आहत करते हैं। उनके अनुसार, जब सार्वजनिक मंचों और सामाजिक माध्यमों पर बार-बार किसी समुदाय के खिलाफ ज़हरीली भाषा का प्रयोग किया जाता है, तो अल्पसंख्यक समुदाय के लोग स्वयं को अपने ही देश में द्वितीय दर्जे का नागरिक महसूस करने लगते हैं। यह भावना केवल असुरक्षा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे उनके आत्मसम्मान और भरोसे को भी कमजोर कर देती है।”

मोहम्मद ज़ामीन का यह अनुभव एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन हज़ारों अभिव्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है जो अक्सर डर या उपेक्षा के कारण सामने नहीं आ पातीं।

नफरत के भाषण और लोकतंत्र पर मंडराता खतरा

नफरत भरे भाषण लोगों के मन में यह सवाल खड़ा कर देते हैं कि क्या समानता और न्याय के संवैधानिक वादे वास्तव में सभी के लिए हैं? ऐसे माहौल में न केवल सामाजिक एकता टूटती है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा भी आहत होती है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज संवेदनशीलता और समझदारी के साथ आगे बढ़े, ताकि हर नागरिक स्वयं को सम्मानित, सुरक्षित और समान अधिकारों वाला महसूस कर सके। अल्पसंख्यक समुदायों के युवा डर और असुरक्षा के माहौल में पलते हैं, जबकि बहुसंख्यक समुदाय के कुछ युवा नफरत और विभाजन की भाषा को सामान्य मानने लगते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि भविष्य का समाज संवेदनशीलता, करुणा और एकता की बजाय संदेह और टकराव की ओर बढ़ने लगता है, जो किसी भी लोकतांत्रिक और मानवीय समाज के लिए अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है। हेट स्पीच इवेंट्स इन इंडिया, 2025 रिपोर्ट यह स्पष्ट संकेत देती है कि नफरत भरे भाषण केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने वाला एक गंभीर खतरा हैं। आवश्यक है कि सरकार, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज मिलकर ऐसे भाषणों पर सख्त कार्रवाई करें। साथ ही, आपसी संवाद, संवेदनशील शिक्षा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरूकता के माध्यम से एक समावेशी और सुरक्षित समाज का निर्माण किया जाए, जहां हर नागरिक बिना डर के सम्मान के साथ जी सके।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

फ़ैयाज़ आलम

लेखक हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद में हिंदी (स्नातकोत्तर) के छात्र हैं

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