अभी इसी हफ्ते, गेल ऑम्वेट और भरत पाटणकर पर बनाई गयी डॉक्यूमेंट्री ‘गेल एंड भरत’ देखी। यह डॉक्यूमेंट्री गेल ऑम्वेट और भरत पाटणकर के साझा जीवन और संघर्षों को दिखाती है। ‘चैत्यभूमि’ और ‘बैटल ऑफ़ भीमा-कोरेगांव’ जैसी महत्वपूर्ण डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले सोमनाथ वाघमारे ने इसे बनाया है।
गेल ऑम्वेट 1970 के दशक में जोतीराव फुले और सत्यशोधक समाज पर शोध करने भारत आई थीं। बाद के वर्षों में दलित, किसान और दलित स्त्री आंदोलन की प्रमुख स्वर बनकर उभरीं। जिस दलित-आंबेडकरवादी आंदोलन ने कभी बाहरी नेतृत्व को स्वीकार नही किया, वहां गेल के लिए हमेशा पलक-पावड़े बिछे रहे। हालांकि, यह जगह इस प्रक्रिया पर विचार करने की नही है, मगर यह कह देना समुचित होगा कि गेल का इस आंदोलन से जुड़ना दलितों की उदारता से ज्यादा उनका त्याग, परिश्रम, समर्पण और उससे भी अधिक मानवतावादी नजरिया था। मगर, दिखते हुए आंदोलन और निकलते हुए परिणामों के पीछे गेल का जीवन कहीं पीछे छूट गया। निजी जीवन भले ही सामने ना दिखता हो, पर इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है कि निजी जीवन से उपजा साहस ही आंदोलनों एवं संघर्ष में उत्साह भरता है। इसलिए नायकों के निजी जीवन की पड़ताल भी आवश्यक हैं। पर, किसी दलित-नायक का जीवन इस दृष्टिकोण से कभी बड़े पर्दे पर नही दिखा। मेनस्ट्रीम कहे जाने वाला सिनेमा संसार कभी इन नायकों के घरों पर दस्तक नहीं देता। सोमनाथ ने ‘गेल एंड भरत’ के माध्यम से इसी कमी को पूरा करने की कोशिश की है।
इस डॉक्यूमेंट्री की शुरुआत भरत और गेल के गांव ‘कासेगांव’ से होती है। एक छोटा-सा घर, दंपति की दैनिक दिनचर्या और कुछ मिनटों में आपको लगता हैं कि यहां सिर्फ भरत और गेल का जीवन ही आएगा, जहां वे अपनी नाती से खेल रहे हैं, फोन पर मिशनरी साथियों से बात कर रहे हैं। मगर, आगे बढ़ती हुई डॉक्यूमेंट्री गेल-भरत के जीवन, दलित-मजदूर आंदोलन और गेल के शोध-कार्यों का ऐसा त्रिकोण रचती है, जिसके हर सिरे पर गेल और भरत, एक-दूसरे का हाथ थामे दिखाई देते हैं।

ऐसे ही दो दृश्य हैं। एक स्थानीय आंदोलन का, जहां भरत गेल का हाथ पकड़कर मंच की तरफ ले जाते है। दूसरा, सावित्रीबाई फुले यूनिवर्सिटी का, जहां गेल के समाजशास्त्रीय-योगदानों पर चर्चा के दौरान गेल एक कुर्सी पर बैठी हैं और लोगों से मिल रही हैं। भरत हर समय उनके साथ खड़े हैं। डॉक्यूमेंट्री का एक हिस्सा है, जहां भरत, गेल के बारे में बात कर रहे हैं। भरत, जिस धैर्य और चाव से गेल से अपनी पहली मुलाकात का किस्सा सुनाते हैं, आप बिना मुस्कराए नहीं रह पाते। गेल और भरत से निकलकर उनकी बेटी तक पहुंचते-पहुंचते यह डॉक्यूमेंट्री विस्तार पाना शुरू करती है। प्राची का अपनी दादी को याद करना, ननिहाल (अमेरिका) जाने की याद, पिता के सामाजिक जुड़ाव के कारण उपजे आर्थिक-संकट और गेल की व्यस्तताएं – वो खिड़कियां हैं, जहां से इस दंपति के साझा संघर्ष और सामजिक प्रतिबद्धता के अतीत को साफ़ तौर पर देखा-महसूस किया जा सकता हैं।
इसके बाद अगले कुछ समय के लिए यह वृतचित्र गेल का वह रूप दिखाता है, जिसे हम सब देखने के आदी रहे हैं। एक्टिविस्ट गेल एक मंच से कह रही हैं– “हम लड़ रहे हैं, हमे लड़ते रहना चाहिए।” वही गेल, दूसरे मंच से रोजा पार्क्स के बस आंदोलन को याद कर रही हैं। तीसरे मंच से एक अकादमिक लेख पढ़ते हुए गेल, पूंजीवाद और जाति के संबंधों पर गहन ढंग से विचार कर रही हैं। तीनों दृश्य अलग-अलग भूमिकाओं के साथ कहने, समझने और समझाने का मुहावरा लिए हुए हैं, जिससे पता चलता है कि गेल को संवाद में किस कदर महारत हासिल थी।
इस डॉक्यूमेंट्री की शूटिंग 2017 में शुरू की गई। तब तक गेल को कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं ने घेर लिया था। इसलिए एकबारगी डॉक्यूमेंट्री देखते हुए लग सकता है कि इसमें भरत के एक्टिविज्म को उतना स्थान नहीं मिला, जितना मिलना चाहिए था। मगर, 2018 में भरत का महालक्ष्मी मंदिर, कोल्हापुर में अम्बामाई के गर्भ-गृह में जाकर पूजा करने के अधिकार की मांग का दृश्य भरत की निर्भीकता और विचारशीलता को प्रतिबिंबित करता है। परंपरा के तर्क के बाद जब वे मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर यह कहते हैं कि “हे माता! तू हमारी माता है, मगर यह दुष्ट और पापी मुझे तुझ तक नही आने दे रहे” तब दर्शक हंस पड़ते हैं। यह दृश्य अपने अधिकारों के लिए उन्हें साहस भी देता है।
लेकिन ऐसा नहीं है कि डॉक्यूमेंट्री महज आंदोलनों और भरत को बात करते हुए दिखाती है। इसी डॉक्यूमेंट्री की शुरुआत में गेल और भरत बॉलीवुड का एक गाना गुनगुना रहे है। गाना है– “कैसे वो लोग थे, जिनको प्यार के बदले प्यार मिला …।” यह गाना सुनते हुए लगता है कि दो लोग सिर्फ इसलिए नजदीक नहीं आ जाते, क्योंकि वो सामाजिक रूप से एक जैसा सोचते हैं। उनका साथ आना उससे थोड़ा-सा आगे की बात है। यही आगे की बात आपको तब दिखाई पड़ती है, जब भरत, गेल को नाश्ता करवा रहे हैं। नाश्ता हो चुकने के बाद उनके कपड़े साफ़ कर रहे हैं। उनका बहुत मुलायमता से कहना कि “कम ऑन गेल, स्टैंड अप”, आपके अंदर बसे प्यार को थोड़ा और प्यारा बना जाता है।
इसके साथ एक और दृश्य है, जिसे इस डॉक्यूमेंट्री का केंद्रीय दृश्य कहा जा सकता है। इस दृश्य में भरत और गेल, एक-दूजे का हाथ थामे चल रहे हैं। इसे देखते हुए लगता है जैसे दोनों का भूत, वर्तमान और भविष्य कुछ मिनटों में बिना कुछ कहे दिखा दिया गया है। लगता है कि साथ-साथ चलते भरत-गेल एक-दूसरे से कुछ कह रहे हैं और दर्शकों को भी कुछ सीखा देना चाहते हैं।
सोमनाथ ने इस डॉक्यूमेंट्री को बनाते हुए नहीं सोचा होगा कि इसका अंत गेल की अंतिम विदाई से होगा। गेल की मृत देह रखी है। लोग आ रहे हैं और पुष्पांजलि अर्पित कर रहे हैं। उस दृश्य में एक अधेड़ उम्र की ग्रामीण महिला का प्रवेश होता है। गेल के पैर छूते हुए वह इस कदर भावुक होती हैं कि उनकी भावुकता दर्शकों की आंखों से टपकती है। अंतिम यात्रा में भरत गेल के देह के पास बैठे हैं– अंतिम बार। ‘कामरेड गेल को लाल सलाम, जय भीम, लाल सलाम’ से शुरू हुई विदाई बौद्ध मंत्रों के सामूहिक-पाठ के साथ पूर्ण होती है। इस तरह पूरी होती डॉक्यूमेंट्री बताती है कि हमें हमारे नायकों के निजी जीवन को मुड़-मुड़कर याद करना चाहिए। उन्हें सेलिब्रिट किया जाना चाहिए।
सोमनाथ की इस डॉक्यूमेंट्री में बस एक कमी अखरती है कि पूरी डॉक्यूमेंट्री में आंदोलन के जमीनी साथी कहीं भी गेल और भरत के बारे में स्वतंत्रता से बात करते नहीं दिखते। मगर इस कमी के बावजूद, आठ साल की मेहनत और बिना किसी सरकारी सहयोग व ग्रांट के गेल और भरत के जीवन पर डॉक्यूमेंट्री बनाना सराहनीय काम है। देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इसकी स्क्रीनिंग जारी है। उम्मीद है कि बड़ी आबादी गेल और भरत के साझा सामाजिक-बेहतरी के प्रयासों से परिचित-प्रेरित होगी और सीखेगी।
(संपादन : नवल/अनिल)
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