फिल्मों, टीवी सीरियलों, किताबों, लेखों इत्यादि में रमाबाई आंबेडकर (रमाई) को कमज़ोर और दब्बू बताया जाता है। जो अप्रतिम त्याग उन्होंने किए, उनसे कोई इंकार नहीं करता, मगर उनकी भूमिका केवल गृहिणी तक सीमित कर दी जाती है। हमें यह बताया जाता है कि वे एक आज्ञाकारी पत्नी भर थीं। जहां एक ओर बाबासाहेब अपने ऐतिहासिक मुक्तिकामी आंदोलन को आगे बढ़ाने में व्यस्त रहते थे, वहीं रमाबाई घर-गृहस्थी का कुशलतापूर्वक संचालन करती थीं और इस प्रकार अपने पति के आंदोलन में ‘परोक्ष’ भागीदारी करती थीं।
आम तौर पर उनके बारे में यही सब कहा जाता है। उदाहरण के लिए जब्बार पटेल की दिलचस्प फिल्म ‘डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर’ में भी रमाबाई के चरित्र को ऐसा ही दिखाया गया है।
क्या रमाई का यह चित्रण सही है? क्या वे बाबासाहेब की कर्त्तव्यनिष्ठ पत्नी भर थीं? या वे आंबेडकर के मुक्ति संघर्ष में बराबर की साझीदार थीं? क्या वे भी मानव-निर्मित विभाजनों से मुक्त समाज का स्वप्न देखती थीं और उसे साकार करने के लिए सक्रिय और सचेत प्रयास करने को तत्पर रहती थीं? इन प्रश्नों पर विचार करने से पहले मैं यह बताना चाहूंगा कि आंबेडकर स्वयं रमाबाई की विरासत को किस रूप में देखते थे। इससे हमें रमाबाई का आकलन करने में मदद मिलेगी।
सन् 1941 में डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखित ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ प्रकाशित हुई (1945 में इसे ‘पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’ शीर्षक से पुनर्प्रकाशित किया गया)। सन् 1940 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में पारित प्रस्ताव के जवाब में लिखी गई इस पुस्तक ने जल्द ही एक क्लासिक कृति का दर्जा हासिल कर लिया। इस पुस्तक की भूमिका में आंबेडकर लिखते हैं–
“इस पुस्तक के शीर्षक से ऐसा लग सकता है कि यह केवल पाकिस्तान के बारे में है। मगर ऐसा नहीं है। यह पुस्तक भारतीय इतिहास और राजनीति के सांप्रदायिक चेहरे को विश्लेषित करती है। और इसी सिलसिले में यह पाकिस्तान के संदर्भ में कुछ मूलभूत बातें भी बतलाती है। मगर यह केवल पाकिस्तान पर केंद्रित कृति नहीं है। इस पुस्तक में भारत के इतिहास और उसकी राजनीति पर इतनी विस्तृत और विविध सामग्री है कि हम इसे भारतीय राजनाति का ककहरा भी कह सकते हैं।”
यह पुस्तक तत्कालीन विमर्श में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप थी और अचरज नहीं कि बाबासाहेब ने इसे रमाबाई को समर्पित किया था–
“रामू को, उसके हृदय की सुंदरता, बुद्धि की श्रेष्ठता और चरित्र की पवित्रता के प्रति मेरी सराहना के प्रतीक स्वरूप, और इसलिए भी क्योंकि वंचना और चिंताओं से भरे उन दिनों, जो हमारी नियति थे, का उसने धैर्य और दृढ़ता से सामना किया और मेरे साथ कष्ट भोगने को हमेशा तत्पर रही।”[1]
यह लेख अंशतः बाबासाहेब द्वारा रमाई को उक्त समर्पण और अंशतः मेरे मित्र जे.एस. विनय द्वारा मुझे उपलब्ध करवाई गई दिलचस्प जानकारियों से प्रेरित है। विनय के दादा-दादी, आंबेडकर और रमाई के निकट सहयोगी थे। इस लेख का उद्देश्य है समाज सुधार के कार्य में रमाई के भुला दिए गए व्यावहारिक योगदान की याद दिलाना और उनके छोटे-से जीवन के कुछ चुनिंदा पलों का वर्णन करना।
संक्षिप्त परिचय
रमाई का जन्म 1897 में हुआ था। उनका परिवार महाराष्ट्र के दापोली इलाके से था। ऐसा बताया जाता है कि वे जोतीराव फुले के निकट सहयोगी और महार रेजिमेंट में मिलिट्री हवलदार गोपालबाबा वालंगाकर की संबंधी थीं।[2] यह दिलचस्प है कि जोतीराव पूना और उसके आसपास तैनात महार रेजिमेंट के सिपाहियों के समूहों के समक्ष नियमित रूप से व्याख्यान दिया करते थे और उन्हें अपनी पुस्तकों ‘गुलामगिरी’ और ‘शेतकऱ्याचा असूड’ के हिस्से पढ़ कर सुनाया करते थे।[3] संभवतः ऐसे ही किसी आयोजन में आंबेडकर के पिता रामजी मालोजी आंबेडकर की फुले – जिनके प्रति वह बहुत सम्मान रखते थे – से मुलाकात हुई होगी।[4]
सन् 1890 में जोतीराव फुले की मृत्यु के बाद गोपालबाबा ने अछूतों के आंदोलन को आगे बढ़ाया और जब अंग्रेज़ सरकार ने सेना में अछूतों की भर्ती पर रोक लगाई तब उन्होंने इस प्रतिबंध को हटवाने के लिए जी-तोड़ कोशिश की। डॉ. आंबेडकर के पिता, जिनके गोपालबाबा से आत्मीय संबंध थे, भी इस आंदोलन का हिस्सा थे।
यह भी हो सकता है कि इसी मित्रता के चलते आंबेडकर के पिता को अपने पुत्र के लिए रमाई के रूप में एक आदर्श जीवनसाथी मिली हों। भीम और रमाबाई का विवाह सन् 1907 के आसपास बंबई में हुआ। उनकी पांच संतानों में से केवल एक – यशवंत भीमराव आंबेडकर (1912-1977) – जिंदा बची। उनके जो बच्चे असमय ही काल के गाल में समा गए, उनके नाम थे– गंगाधर, रमेश, इंदु और राजरत्न।
सामाजिक–राजनीतिक क्षेत्र में रमाबाई की सक्रियता
जे.एस. विनय को उनके दादा-दादी ने बताया था कि रमाई ने ही बाबासाहेब को दलितों के लिए संस्थाओं का निर्माण करने का अनुरोध किया था। जे.एस. विनय के अनुसार, “उनका कहना था कि हमारे लोगों के पास पढ़ने-लिखने के लिए खुद की संस्थाएं होनी चाहिए और शिक्षा हासिल करने के लिए उन्हें दूर जाने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। हो सकता है कि आंबेडकर को शिक्षा हासिल करने में जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा, उनके परिप्रेक्ष्य में वे ऐसा कहती रही हों।”
रमाई अछूतों में सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता बढ़ाने के लिए भी काम करती थीं। उदाहरण के लिए उन्होंने ‘डिप्रेस्ड क्लासेज विमेंस एसोसिएशन’ के संचालन में महती भूमिका निभाई।
‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में 1931 में प्रकाशित एक खबर (जिसकी ओर मेरे दोस्त निखिल बागड़े ने मेरा ध्यान आकर्षित किया) कहती है– “दमित वर्गों की महिलाओं की एक बैठक इतवार को पोयबावड़ी इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट की चाल में हुई। इस बैठक में करीब 500 महिलाएं मौजूद थीं, जिनमें शामिल थीं– श्रीमती रमाबाई आंबेडकर, श्रीमती वीनूबाई शिवतारकर, श्रीमती सुभद्राबाई आनंद कसारे, कुमारी अनुस्या, कुमारी जानकी के. चांदोरकर और श्रीमती शिवबाई गायकवाड़। श्रीमती सावित्रीबाई बोराड़े ने बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में तय हुआ कि बंबई में डिप्रेस्ड क्लासेज वीमेंस एसोसिएशन का गठन किया जाए … बैठक में नासिक में चल रहे मंदिर सत्याग्रह का समर्थन और सहायता करने और महिलाओं को राजनीतिक हक़ दिलवाने के लिए डॉ. आंबेडकर द्वारा हिम्मत से लड़ी जा रही लड़ाई से जुड़ने के प्रस्ताव भी पारित किए गए।”[5]
डिप्रेस्ड क्लासेज वीमेंस एसोसिएशन के गठन से पूर्व भी रमाई सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय थीं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1918 से 1935 (जिस साल रमाई की मृत्यु हुई) के बीच आंबेडकर के मुक्तिकामी आंदोलन ने कई अहम पड़ाव पार किए, जिनमें शामिल थे– बहिष्कृत हितकारिणी सभा का गठन, महाड़ सत्याग्रह की शुरुआत, वतन अधिनियम से जुड़े विधायी संघर्ष आदि। इन आंदोलनों को आकार देने में रमाई का बौद्धिक और सामाजिक योगदान रहा होगा।

डॉ. आंबेडकर की यह पक्की मान्यता थी कि महिला नेतृत्व की भागीदारी से मुक्तिकामी आंदोलन मज़बूत होगा। और अपनी मान्यता के अनुरूप उन्होंने हाशियाग्रस्त जातियों की महिलाओं को सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक आंदोलनों में भाग लेने की सीख दी और उन्हें इसके लिए प्रेरित किया। रमाई की मृत्यु के कुछ साल बाद, सन् 1942 में नागपुर में आयोजित आल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज वीमेंस कांफ्रेंस के दौरान करीब 25,000 महिलाओं की सभा को संबोधित करते हुए आंबेडकर ने कहा–
“आपको संबोधित करते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है। दमित वर्गों की उन्नति में रूचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति को यहां उपस्थित महिलाओं को देखकर भारी हर्ष का अनुभव होगा। आज से दस साल पहले यह कल्पना करना भी कठिन था कि 20,000-25,000 की इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं इस तरह के आयोजन में एकत्रित हो सकती हैं। महिलाओं के संगठनों की ताकत में मेरा गहरा भरोसा है। मैं जानता हूं कि अगर वे ठान लें तो समाज की बेहतरी के लिए कितना कुछ कर सकती हैं। मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूं कि महिलाओं ने सामाजिक बुराईयों के उन्मूलन में अहम् भूमिका निभाई है। मैंने जब से दमित वर्गों की बीच काम करना शुरू किया है तभी से मैंने पुरुषों के अलावा महिलाओं को भी अपने साथ लेने की भरपूर कोशिश की है। यही कारण है कि हमारे सम्मेलनों में महिला और पुरुष दोनों भाग लेते हैं। मैं महिलाओं की उन्नति को किसी भी समुदाय की उन्नति का मानक मानता हूं। और इसलिए इस सभा को देखकर मैं प्रसन्न हूं और इससे मुझे यह भरोसा हुआ है कि हम आगे बढ़े हैं।”[6]
इस सम्मेलन में बहुपत्नी प्रथा के उन्मूलन, तलाक को कानूनी दर्जा, महिलाओं – विशेषकर कामकाजी महिलाओं – की माली हालत में बेहतरी, मिलों में महिला सुपरवाइजरों की नियुक्ति और प्रांतीय व केंद्रीयय विधानमंडलों में दमित वर्गों की महिलाओं को अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करते हुए एकमत से प्रस्ताव पारित किए गए। इससे यह पता चलता है कि उस दौर में भी आंबेडकर की राजनीति कितनी परिवर्तनकामी, प्रगतिशील और दूरदृष्टि वाली थी।
रमाई का धारवाड़ से जुड़ाव
धारवाड़ क्षेत्र 1800 के दशक की शुरुआत में बंबई प्रेसीडेंसी का हिस्सा बना। सन् 1956 में उसे मैसूर प्रांत में शामिल कर दिया गया। फिर सन् 1973 में मैसूर का नाम बदलकर कर्नाटक कर दिया गया।
ऐसा लगता है कि आंबेडकर ने 1920 के दशक में धारवाड़ की यात्रा की थी। वे एक ऐसे व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाना चाहते थे, जिसने 1850 के दशक में सभी वर्गों के लिए शिक्षा की वकालत की थी। एन. दिनेश नायक लिखते हैं–
“डॉ. आंबेडकर का धारवाड़ से जुड़ाव 1920 के दशक में शुरू हुआ। उन्हें पता चला कि उस इलाके के एक अछूत व्यक्ति ने दशकों पहले, 1856 में, दलित बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलवाया था। जब धारवाड़ के एक स्कूल ने इस व्यक्ति (जिसे बंबई सरकार के दस्तावेजों में केवल ‘धारवाड़ का महार’ कहा गया है) के लड़के को उसकी जाति के कारण दाखिला देने से इंकार कर दिया तो उसने बॉम्बे नेटिव एजुकेशन सोसाइटी के मुखिया एडवर्ड एल्फिन्स्टन से संपर्क किया। एल्फिन्स्टन ने उसकी शिकायत ईस्ट इंडिया कंपनी को पहुंचाई। इसके बाद अंग्रेज़ सरकार ने सभी जातियों के बच्चों को स्कूलों में दाखिला देने का आदेश जारी किया।
… इस व्यक्ति के बारे में और जानने और उसके परिवार की तलाश करने की इच्छा से आंबेडकर 1927 में धारवाड़ पहुंचे। वे उनकी तलाश तो नहीं कर सके, परंतु इस यात्रा से इस शहर से उनका जुड़ाव बना। आंबेडकर जिस व्यक्ति की तलाश में थे, उसका पता आज तक नहीं चला है।”
कुछ समय बाद आंबेडकर, रमाई के साथ धारवाड़ गए ताकि उनकी पत्नी को स्वास्थ्य लाभ करने के लिए उपयुक्त वातावरण मिल सके। धारवाड़ आने के कुछ समय बाद ही आंबेडकर और रमाई ने इलाके के विद्यार्थियों के लिए हॉस्टल और अछूतों के लिए सहकारी साख समितियां स्थापित कीं। यह भी हो सकता है कि ये सब कदम आंबेडकर की उस अज्ञात अछूत के प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप हों, जिसने धारवाड़ में मानवाधिकारों की लड़ाई शुरू की थी। जैसा कि एन. दिनेश नायक लिखते हैं–
“सन् 1929 में आंबेडकर और उनकी पत्नी न केवल कुछ महीनों तक धारवाड़ में रहे वरन् यहीं से उन्होंने दलितों की बेहतरी के अपने प्रयासों को दक्षिण भारत में विस्तार देने की शुरुआत की … धारवाड़ में अपने रहवास के दौरान डॉ. आंबेडकर ने जिन संस्थाओं की स्थापना की उनमें से एक थी दलितों की सहकारी समिति।
“… सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मण बकई के अनुसार, माचीगर सहकारी साख समिति की स्थापना उनके दो अनुयायियों परुशराम एन. पवार एवं यलप्पा होंगल ने की थी। ये दोनों मोची का काम करते थे। ऐसा बताया जाता है कि इन दोनों ने आंबेडकर के नेतृत्व में चले महाड़ सत्याग्रह में हिस्सा लिया था। यह दिलचस्प है कि इस समिति के सभी शुरुआती सदस्य अनपढ़ मोची थे। परंतु आंबेडकर ने उनकी हिम्मत बढ़ाई और उन्हें मार्गदर्शन दिया। यह समिति अपने काम में जबरदस्त सफल रही और जब उसका अपना भवन बना तो डॉ. आंबेडकर उसका उद्घाटन करने धारवाड़ आए।
“… धारवाड़ क्षेत्र में अपने रहवास के दौरान आंबेडकर ने धारवाड़ और आसपास के इलाकों के दलित नौजवानों को शिक्षा हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया। उनकी मदद के लिए आंबेडकर ने धारवाड़ के कोपाडकेरी में दमित वर्गों के विद्यार्थियों के लिए एक छात्रावास का निर्माण करवाया। आंबेडकर ने जिला कलेक्टर से संपर्क कर हॉस्टल के लिए दो एकड़ भूमि आवंटित करवाई।”[7]
बाद में आंबेडकर गोलमेज सम्मेलनों से जुड़ी गतिविधियों में व्यस्त हो गए। उन्होंने रमाई से अनुरोध किया कि वे धारवाड़ जाएं और वहां स्वास्थ्य लाभ करने के अलावा हॉस्टल की देखभाल भी करें। मगर जब वे धारवाड़ पहुंचीं तो उन्हें उस हॉस्टल की बदहाली देखकर बहुत धक्का लगा, जिसे उन्होंने बाबासाहेब के साथ मिलकर शुरू किया था। वहां रह रहे विद्यार्थियों की दयनीय स्थिति को देखकर वे इतनी द्रवित हो गईं कि उन्होंने अपने सोने के गहने बेचकर हॉस्टल के लिए आवश्यक चीजें खरीदीं। वे स्वयं विद्यार्थियों के लिए खाना पकाती थीं।[8]

सन् 1935 में अपनी मृत्यु तक रमाई ने हॉस्टल की देखभाल की। उनकी तबियत ठीक नहीं रहती थी मगर इसके बावजूद वे अंतरजातीय भोजों और अन्य ऐसे कार्यक्रमों में भाग लेती थीं जिनका उद्देश्य अछूत समुदाय की विभिन्न जातियों के बीच एकता स्थापित करना था।[9] यह था हाशियाग्रस्त समुदायों के प्रति रमाई का प्रेम और उनकी बेहतरी के प्रयासों के प्रति उनका समर्पण और प्रतिबद्धता।
यह सचमुच अक्षम्य है कि नारीवादियों और अध्येताओं ने रमाई के योगदानों को पूरी तरह नजरअंदाज किया। रमाई के कार्यों और उनकी विरासत को मान्यता देने और संजोने की बजाए उन्होंने इस नॅरेटिव को आकार दिया कि रमाई एक कर्तव्यनिष्ठ गृहिणी से ज्यादा कुछ नहीं थीं। ऐसा लगता है कि ये लोग खैरमोड़े द्वारा फैलाए गए झूठ पर भरोसा करते रहे। खैरमोड़े ने आंबेडकर के बारे में दुष्प्रचार से कई ग्रंथ भर डाले हैं। अध्येता डॉ. भगवान ढांडे ने अपनी पुस्तक ‘बाबासाहेबच्या बदनामिचा महाप्रकल्प’ (बाबासाहब को बदनाम करने की विशाल परियोजना) में खैररमोड़े के झूठ के पुलिंदे का पर्दाफाश किया है। मगर इसके बाद भी अपनी अकादमिक रचनाओं में खैरमोड़े को उद्धृत करने वाले लेखकों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।
संतानों की मौत
जैसा कि हमने शुरू में बताया कि आंबेडकर की पांच संतानों में से केवल यशवंत भीमराव आंबेडकर (1912-1977) जीवित बचे। एक के बाद एक अपनी चार संतानों की अकाल मृत्यु ने आंबेडकर दंपति को तोड़ दिया। अपने सबसे छोटे लड़के की मौत के बाद दत्तोबा पवार को लिखे एक पत्र में आंबेडकर कहते हैं, “यह ढोंग करना बेकार होगा कि मैं और मेरी पत्नी हमारे पुत्र की मौत के सदमे से उबर गए हैं। और मुझे नहीं लगता कि हम कभी भी इससे उबर पाएंगे। हमने कुल मिलाकर चार प्यारे बच्चों को दफन किया है, जिनमें से तीन लड़के और एक लड़की थी। ये सभी बच्चे खुशमिजाज और आकर्षक थे। उनकी मौत के बारे में सोचना अपने आप में अत्यधिक विषादजनक है। और यह सोचकर और बुरा लगता है कि अगर वे जिंदा रहते तो उनका भविष्य कैसा होता। हम लोग बस किसी तरह दिन काट रहे हैं।”
ईसा मसीह के गहन-गंभीर शब्दों को उद्धृत करते हुए बाबासाहेब आगे लिखते हैं– “हमारे बच्चों को खो देने से हमारे जीवन का नमक चला गया है। जैसा कि बाइबिल (मत्ती 5:13) कहती है– ‘तुम पृथ्वी के नमक हो, लेकिन यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए तो वह फिर किस वस्तु से नमकीन किया जाएगा।’ … मुझे इन पंक्तियों का सच मेरे रिक्त जीवन में लगातार महसूस होता रहता है। मेरा आखिरी लड़का एकदम अद्भुत था। उसके जैसे बच्चे मैंने बहुत कम देखे हैं। उसकी मृत्यु के साथ मेरा जीवन मानों खर-पतवार से भरा एक बगीचा हो गया है। अब और कुछ कहने को नहीं है। मैं अब आगे कुछ भी लिखने की स्थिति में नहीं हूं।”[10]
दुख के इस पहाड़ से लड़ने में रमाई ने बाबासाहेब की मदद की। जे.एस. विनय, कदाचित अपने दादा-दादी के हवाले से, बताते हैं–
“बाबासाहेब अपने पुत्र राजरत्न की मौत से बहुत दुखी थे। राजरत्न उनके बहुत करीब था। रमाई ने उन्हें हिम्मत बंधाई। उन्होंने बाबासाहेब से कहा, “जो लोग हमेशा दुख में डूबे रहते हैं, वे जीवन में कुछ हासिल नहीं कर पाते। अगर आप अपने इस दुख पर जीत हासिल करेंगे, तो इससे समाज का भला होगा…” रमाई ने अपनी चार संतानों की मौत देखी। मगर वे लंबे समय तक ग़म में डूबी नहीं रहीं। उनका मानना था कि उनके दुख और तकलीफें, अछूत और अन्य वर्गों की महिलाओं के दुखों से कम हैं। वे हमेशा बाबासाहेब के साथ चट्टान की तरह खड़ी रहीं, एक सच्चे साथी की तरह … रमाई सिर्फ त्याग की प्रतिमूर्ति नहीं थीं। वे ताकत थीं, वे साथी थीं, वे कामरेड थीं, वे समाज सुधारक थीं!”

वायलिन, मीठा पान और आनंद के कुछ क्षण
वनस्पति दुरगट का परिवार मूलतः उस इलाके से था जो आज हरियाणा का हिस्सा है। घोर निर्धनता से जूझ रहा यह परिवार काम की तलाश में बंबई पहुंचा। उन्होंने कुछ अंग्रेजों के घर पर काम किया, मगर अंततः वे खड़ी होती इमारतों में मजदूरी करने लगे। सन् 1920 के दशक के अंत में वे बंबई में आंबेडकर के मकान – जिसे बाद में राजगृह का नाम दिया गया – के निर्माण में मजदूरी करने लगे। उस समय वनस्पति दुरगट 12 साल की थी। रमाई बच्चों के प्रति बहुत स्नेह भाव रखती थी। रमाई ने वनस्पति पर स्नेह की भरपूर बरसात की और यह छोटी-सी लड़की उनके बहुत नज़दीक आ गई। वनस्पति ने रमाई को याद करते करते हुए लिखा–
“मैं अधिकांश समय रमाबाई के साथ बिताती थी। वे पान चबाने के आदी थीं और उनके पास चांदी का एक पानदान हुआ करता था। एक दिन उन्हें पान चबाते देख मैंने उनसे एक पान की फरमाईश की। मगर उन्होंने मुझे मना कर दिया– “पोरी तू लहन आहे आजुन, सग्ड़े दाता किदुल जात।” (बेटी तुम बहुत छोटी हो, तुम्हारे सारे दांत गिर जाएंगे)[11]
राजगृह में रमाई के साथ घूमते–फिरते, वनस्पति, बाबासाहेब से भी टकरा जाती थी– “वे (बाबासाहेब) मुझसे बहुत कम बात करते थे। मगर वे हमेशा ‘कैसी हो’, यह ज़रूर पूछते थे। वे घर जाते समय मेरे गालों और सिर को थपथपाते थे … उन दिनों वे अपनी गैलरी में वायलिन बजाना सीख रहे थे। मुझे वायलिन का संगीत बहुत अच्छा लगता था। एक दिन मैं वायलिन की धुन पर नाचने लगी। रमाबाई को मुझे नाचते देख बहुत मज़ा आया और उसके बाद से यह मेरी आदत बन गई।”

अपनी व्यस्तताओं के बावजूद आंबेडकर और रमाई रिलैक्स करने के लिए समय निकाल लेते थे। सन् 1927 में आंबेडकर दंपति ने अमरीका में गुलामी प्रथा पर बनी फिल्म ‘अंकल टॉम्स कैबिन’ देखी।[12]
बाबासाहेब और रमाई ने फिल्म देखने के बाद आपस में क्या चर्चा की होगी? जब आंबेडकर दंपत्ति यह फिल्म देख रहे थे, तब तक डॉ. आंबेडकर के न्यूयॉर्क प्रवास से दस वर्ष गुज़र चुके थे। क्या उन्होंने रमाई को बताया होगा कि अमरीका, और विशेषकर न्यूयॉर्क, में उन्होंने अफ्रीकी-अमरीकियों को किस तरह का संघर्ष करते देखा था? क्या उन्होंने अश्वेत अमरीकियों और भारत के अछूतों की स्थिति की तुलना की होगी? दुखद यह कि आंबेडकर दंपति के बीच इस विषय पर संवाद का कोई ब्यौरा उपलब्ध नहीं है।
‘अंकल टॉम्स केबिन; ऑर लाइफ अमंग द लोली’ श्वेत अमरीकी लेखिका हेरिएट बीचर स्टोव द्वारा लिखित एक लोकप्रिय उपन्यास है। कई लोग इस उपन्यास के प्रशंसक इसलिए हैं क्योंकि उनका मानना है कि उसने अमरीकियों को गुलामी प्रथा के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया था। ऐसा कहा जाता है कि हेरिएट बीचर स्टोव जब अब्राहम लिंकन से मिलने गईं तब राष्ट्रपति ने उनका अभिवादन करते हुए कहा, “ओह, तो आप हैं वह महिला जिसकी किताब के कारण यह बड़ा युद्ध शुरू हुआ।” (बड़ा युद्ध अर्थात अमरीका में 1861 से लेकर 1865 तक चला गृहयुद्ध)
दूसरी ओर अश्वेत चिंतक और लेखक इस पुस्तक के आलोचक हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता टोनी मोरीसन के अनुसार यह पुस्तक गुलामी प्रथा का रुमानिकरण करती है और उस पर एक चमकदार मुलम्मा चढ़ाकर अपने श्वेत पाठकों के समक्ष पेश करती है। वे लिखती हैं, “हेरिएट बीचर स्टोव ने ‘अंकल टॉम्स केबिन’ टॉम या क्लोई आंटी या किसी भी अश्वेत पाठक के लिए नहीं लिखी थी। उनके पाठक श्वेत लोग थे जो यह रुमानिकरण चाहते थे, उसकी उन्हें ज़रूरत थी और वह उसका मज़ा ले सकते थे।”[13]
अब्राहम लिंकन के आलोचकों की भी कमी नहीं है। आंबेडकर ने अश्वेतों की मुक्ति के इतिहास का गहराई से अध्ययन किया था और उनके अनुसार गुलामी प्रथा समाप्त करने के पीछे राष्ट्रपति लिंकन का ‘असली उद्देश्य’ कुछ और था। सन् 1862 में होरेस ग्रीली की चिट्ठी के जवाब में लिंकन ने जो पत्र लिखा था, बाबासाहेब उसकी कुछ पंक्तियां उद्धृत करते हैं–
“मेरा सबसे बड़ा उद्देश्य है यूनियन को बचाना – न कि गुलामी को बचाना या समाप्त करना … अगर मैं एक भी गुलाम को मुक्त किए बगैर यूनियन को बचा सकता हूं तो मैं वैसा ही करूंगा। और अगर यूनियन को बचाने के लिए मुझे सारे गुलामों को मुक्त करना पड़े तो मैं वह भी करूंगा – और अगर मैं कुछ गुलामों को मुक्त करके और कुछ को मुक्त न करके यह कर सकता हूं, तो मैं वह भी करूंगा।
लिंकन के जवाब को उद्धृत करने के बाद बाबासाहेब लिखते हैं–
“नीग्रो लोगों की गुलामी और यूनियन के सवाल से उसके रिश्ते पर राष्ट्रपति लिंकन के ये विचार थे। इनसे नीग्रो के मुक्तिदाता माने जाने वाले इस व्यक्ति के चरित्र पर एक अलग ही रौशनी पड़ती है। सच यह है कि वे नीग्रो लोगों की मुक्ति को परम आवश्यक नहीं मानते थे। यह साफ़ है कि जिस व्यक्ति ने गेटिसबर्ग के अपने प्रसिद्ध भाषण में जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिए सरकार की बात की थी उसे कोई परेशानी नहीं होती अगर नीग्रो लोगों की सरकार, श्वेत लोगों द्वारा श्वेत लोगों के लिए चलायी जाती – बशर्ते यूनियन बची रहती।”[14]
धैर्यवान और दृढ़
आंबेडकर ने एक बार कहा था कि भारत में यदि किसी व्यक्ति से सबसे ज्यादा नफरत की जाती है, तो वह व्यक्ति वे हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि जाति प्रथा में आस्था रखने वाले उन्हें आस्तीन का सांप मानते हैं। बाबासाहेब ने जाति व्यवस्था को चुनौती दी, उसके जड़ों पर तीखे प्रहार किए और उसे हासिल धार्मिक मान्यता पर प्रश्नचिह्न लगाए। जाहिर है कि इसके चलते उन्हें हिंदुओं के जबदरस्त कोप का सामना करना पड़ा। उन्हें समय-समय पर धमकी भरे पत्र मिलते थे। पूना समझौते पर चर्चा जब चरम पर थी, उस समय धमकियां और गालियां देते हुए पत्र उन्हें बड़ी संख्या में मिलते थे। आंबेडकर रमाई के धैर्य और दृढ़ता की सराहना करते समय शायद वे उस दौर को याद कर रहे थे जब रमाई ने भावनात्मक परिपक्वता का परिचय दिया था।
रमाई की मृत्यु
19 अप्रैल, 1935 को आंबेडकर को बंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज का प्राचार्य नियुक्त किया गया। यह एक बैरिस्टर, जिसे अपनी जाति के कारण वकालत करने में असंख्य परेशानियों का सामना करना पड़ा था, के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। यह नियुक्ति डॉ. आंबेडकर की चमत्कृत करने वाली मेधा और कानूनी व संवैधानिक मसलों की उनकी गहरी समझ की बढ़ती मान्यता को भी रेखांकित करती थी।
मगर इस नियुक्ति के एक महीने के भीतर आंबेडकर को गहरा धक्का तब लगा जब लंबी बीमारी के बाद 27 मई, 1935 को रमाई का देहांत हो गया। हाशियाकृत तबकों के लोगों, सामाजिक आंदोलनों से जुड़े आंबेडकर के मित्रों और वकीलों ने बड़ी संख्या में आंबेडकर के निवास पहुंचकर रमाई को श्रद्धांजलि दी।

मेरे मित्र जे.एस. विनय, डॉ आंबेडकर के एक पत्र, जिसे नीचे दिया गया है, से उद्धृत करते हुए बताते हैं–
“उन्होंने (आंबेडकर) रमाई की मृत्यु पर शोक संदेश भेजने वाले सभी लोगों को अत्यंत सहृदयता पूर्वक व्यक्तिगत रूप से पत्र भेजकर धन्यवाद ज्ञापित किया। एक पत्र में बाबासाहेब ने लिखा– मेरी पत्नी की दुखद मृत्यु पर आपका शोक संदेश मिला। मैं आपको बताना चाहूंगा कि आपकी सहानुभूति के लिए मैं आपका अत्यंत आभारी हूं।”[15]
रमाबाई की मृत्यु के बारे में लिखते हुए डॉ. सविता आंबेडकर कहती हैं–
“सन् 1935 में डॉ. आंबेडकर को एक और विपत्ति का सामना करना पड़ा। उस साल की 27 मई को उनकी पत्नी रमाबाई, जो काफी समय से बीमार थीं, चल बसीं … वे टी.बी. से पीड़ित थीं और कई महीनों से बिस्तर पर थीं। डॉ. आंबेडकर ने कई विशेषज्ञ डॉक्टरों से उनका इलाज करवाया, लेकिन उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। इस त्रासद घटना ने आंबेडकर के मानस पर गहरा प्रभाव डाला। वे अकेले हो गए। रमाबाई की मौत के पहले वे चार बच्चे खो चुके थे– तीन लड़के और एक लड़की। सन् 1935 में उनकी पत्नी के देहांत के बाद वे पारिवारिक जीवन और उसकी खुशियों से पूरी तरह महरूम हो गए। सन 1935 के बाद से उनके जीवन में गहरा अकेलापन घर कर गया। उसके बाद से मेरे उनके जीवन में आने तक, उनके पास ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं था जिससे उनकी तनिक भी आत्मीयता हो। दिल्ली में भी वे अकेले ही थे।”[16]
यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा कि रमाई को खोने के दुख से आंबेडकर कभी उबर न सके। कई मौकों पर वे उन्हें याद कर सुबकने लगते थे। इस सिलसिले में आंबेडकर के बारे में नामदेव निमगड़े की यादों को उद्धृत करना समीचीन होगा। चूंकि यह उद्धरण विवाह, बच्चों और समुदाय के बारे में भी है, इसलिए मैं इसे पूरा उद्धृृत करना चाहूंगा। डॉ. निमगड़े लिखते हैं–
“बाबासाहेब से मेरे लड़के की मुलाकात बहुत सुखद नहीं थी। हीरा और मैं हमारे पुत्र के साथ बाबासाहेब के घर पहुंचे और हमने अपने बालक को उस महान व्यक्ति के चरणों में डाल दिया। बाबासाहेब ने बच्चे को देखा और फिर बोले– ‘तुम लोगों की अभी–अभी शादी हुई है और तुम अब इस बच्चे को ऐसे लेकर आए हो मानो तुमने कोई ट्राफी जीत ली हो। अब तुम्हारी आगे की शिक्षा का क्या होगा? तुम उसी जाल में फंस गए हो, जिसमें हमारे समुदाय के सभी लोग फंसे हुए हैं। तुम लोग थोड़ी–बहुत तालीम हासिल करते हो। फिर कोई छोटा–मोटा काम पा लेते हो। क्या तुम्हें यह पता नहीं है कि किसी बच्चे की परवरिश कितना बड़ा काम होता है। आपको बच्चे के साथ पूरा दिन बिताना होता है। आपको सुबह अपने बच्चे के साथ खेलना होता है। फिर काम पर जाना होता है और फिर दौड़–भाग कर वापस घर पहुंचकर बच्चे की देखभाल करनी होती है। हमारा समुदाय आखिर कब तक …’ यह सब सुनने के बाद मैंने बाबासाहेब से वायदा किया, ‘मैं लगातार आगे शिक्षा हासिल करने के लिए प्रयास करता रहूंगगा। यही अब मेरे जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है। मैंने अपने लड़के का नाम भीमराव रखा है ताकि मेरे जीवन के अंतिम क्षणों तक आपका नाम मेरी जुबान पर रहे।’”
बाबासाहेब के उत्तर को उद्धृत करते हुए डॉ. निमगड़े लिखते हैं–
“विदेशों में लोग बच्चे के पैदा होने के पहले ही उसके लिए कपड़े और स्वेटर तैयार कर लेते हैं। लेकिन यहां गरीबी के चलते हम बच्चों के जन्म के बाद भी उनकी देखभाल नहीं कर पाते। मैं अपना खुद का अनुभव आपसे साझा करना चाहूंगा। मैंने भी कई साल गरीबी में बिताये हैं। मैं विदेश से कानून में डिग्री हासिल कर यहां आया। मगर जातिगत भेदभाव के कारण मुझे वकालत करने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। मैं केवल कनकी (भात) खा पाता था और इसलिए मैं कमज़ोर होता चला गया। मेरा अपना बच्चा बीमारी के कारण चल बसा। मैं इतना कमज़ोर था कि मैं उसे दफना तक न सका। मेरे पास पहनने के लिए केवल वे सूट थे, जिन्हें मैं विदेश से लाया था। मगर वे सब ऊनी थे (भारत के मौसम के लिए बहुत गर्म)। वकालत का मेरा काम धीरे–धीरे बढ़ने लगा, मगर फिर किस्मत ने एक और प्रहार किया। मेरी पत्नी रमा गंभीर रूप से बीमार हो गई। डॉक्टर ने चेतावनी दी कि अगर उसने एक और संतान को जन्म दिया तो वह निश्चित रूप से मर जाएगी। उसे जिंदा रखने के लिए हम लोगों ने यौन–संयम का पालन किया।
“बाबासाहेब अपनी यादों में खो गए। ‘वो बहुत कमज़ोर हो गई थी। उसे बचाने के लिए जो कुछ मैं कर सकता था, मैंने किया। हर तरह की दवाएं उसे दी गईं, हर तरह के इंजेक्शन लगाये गए। मैंने कुछ भी बाकी नहीं छोड़ा। फिर भी वह इस धरती को छोड़ कर चली गई। वह मुझे छोड़ गई।’ उनकी आवाज़ खरखराने लगी और फिर उनकी आंखों से एक आंसू टपका। वे बच्चों की तरह रोने लगे। यह देखकर कमरे में मौजूद सभी लोग रूआंसे हो गए। मैंने इसके पहले उन्हें कभी रोते नहीं देखा था।
“वह व्यक्ति जो अपने दमित लोगों की खातिर अपने राजनीतिक विरोधियों से शेर की तरह लड़ा था, वह अब एकदम आम आदमी नज़र आ रहा था … अपनी मृत पत्नी को याद करते हुए वह एकदम असहाय दिख रहा था … मैं बाबासाहेब की यह स्थिति देखकर चकित था। उन्हें देखकर मुझे यह समझ में आया कि वे अपनी पत्नी से कितना प्यार करते थे। हम लोग भारी मन से अपने-अपने घर लौटे।”[17]
यह था आंबेडकर का रमाई के प्रति असीम प्रेम। वे आंबेडकर को बंबई की एक चाल में रहने वाले साधारण लड़के से भारत के संविधान के निर्माता के रूप में बदलते नहीं देख सकीं, वे यह नहीं देख सकीं कि आंबेडकर ने अकेले दो दिन के भीतर 10 लाख लोगों को बौद्ध धर्म का वरण करवाया। यह एक ऐसा काम था जो अतीत में किसी धर्म का संस्थापक, कोई पैगंबर नहीं कर सका था।
मुझे याद है कि सोशल मीडिया पर किस तरह तथाकथित नारीवादियों ने आंबेडकर – जो कि स्त्रियों के अधिकारों के सबसे बड़े पैरोकार थे – पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने अपनी पत्नी को जानते-बूझते अशिक्षित बनाए रखा और उसे अपने घर की चहारदीवारी तक सीमित रखा। इस तरह की बातों को कचरे के डिब्बे में डाल दिया जाना चाहिए।
बहरहाल हमें रमाई की विरासत को केवल बलिदान और त्याग तक सीमित न रखते हुए उनके उच्च आदर्शों को और सामाजिक आंदोलन में उनके महती योगदान को याद रखना चाहिए।
[1] https://baws.in/books/baws/EN/Volume_08/pdf/22
[2] के.एन. कदम, ‘डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर एंड द सिग्निफिकेंस ऑफ़ हिज मूवमेंट: ए क्रोनोलॉजी’, संगम बुक्स, 1991
[3] रोसालिंड ओ हेनलोन, ‘कास्ट, कनफ्लिक्ट एंड आइडियोलॉजी: महात्मा जोतीराव फुले एंड लो कास्ट प्रोटेस्ट इन नाइनतींथ सेंचुरी वेस्टर्न इंडिया’, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1984
[4] के.एन. कदम, ‘डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर एंड द सिग्निफिकेंस ऑफ़ हिज मूवमेंट: ए क्रोनोलॉजी’, संगम बुक्स, 1991; https://www.youtube.com/watch?v=5cRzcvCxt3o पर उपलब्ध वीडियो भी देखें जिसमें मैंने जोतिबा फुले और डॉ आंबेडकर (व महाराज सयाजीराव गायकवाड़) के बीच जुड़ाव पर विस्तार से चर्चा की है।
[5] ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ 26 अक्टूबर, 1936 (इस महत्वपूर्ण जानकारी को साझा करने के लिए मेरे मित्र निखिल बागड़े को हार्दिक धन्यवाद)
[6] https://baws.in/books/baws/EN/Volume_17_03/pdf/306
[7] https://www.thehindu.com/news/national/karnataka/following-babasahebs-footprints-in-dharwad/article7101462.ece#google_vignette
[8] वही
[9] https://www.thehindu.com/news/national/karnataka/dharwad-to-celebrate-its-connection-with-ambedkar-on-his-birthday-in-april/article69140254.ece
[10] देखें, प्रोफेसर सुनीता सावरकर का लेख : “स्त्रीयांचे प्रेरंस्तान: रमई’ सकाळ, 26 जनवरी, 2014 (लेख का अनुवाद करने के लिए मैं अपने मित्र मिलिंद पाटिल का धन्यवाद करता हूं)
[11] https://indianexpress.com/article/cities/mumbai/babasaheb-played-the-violin-i-danced-childhood-memories-at-86/
[12] अपने जीवनकाल में बाबासाहेब आंबेडकर ने कौन-कौन सी फिल्में देखीं उनकी संपूर्ण सूची, और फिल्म, थिएटर और संगीत के क्षेत्रों की किन हस्तियों से उनका संपर्क-संवाद हुआ इसे जानने के लिए इस लिंक पर उपलब्ध मेरा लेख देखें : https://www.theculturecafe.in/p/an-unexplored-side-of-dr-ambedkar
[13] टोनी मोरीसन. ‘द ओरिजिन ऑफ़ अदर्स’, द चार्ल्स इलियट नॉर्टन लेक्चर्स, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2016
[14] https://baws.in/books/baws/EN/Volume_09/pdf/300 – इस लिंक में आंबेडकर द्वारा लिंकन और गांधी की तुलना का विवरण भी उपलब्ध है, जिसमें उन्होंने बताया है कि लिंकन किस तरह गांधी से बेहतर थे।
[15] व्ही.व्ही. को पत्र (जून 1935)
[16] सविता आंबेडकर, ‘बाबासाहेब: माई लाइफ विथ डॉ. आंबेडकर’, पेंगुइन, 2024
[17] नामदेव निमगड़े, ‘इन द टाइगर्स शैडो: दि ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ एन आंबेडकरइट’, नवायन, 2011
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)
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