बिहार विधानसभा में ‘ब्राह्मण’ असंसदीय शब्द है और ‘भूमिहार ब्राह्मण’ संसदीय। मतलब यह कि कोई ‘ब्राह्मणवाद’ का उपयोग नहीं कर सकता है। लेकिन वह चाहे तो ‘भूमिहार ब्राह्मण’ जैसा जातिसूचक शब्द बड़े आराम से कह सकता है और उसे सदन की कार्यवाही से बाहर नहीं निकाला जाएगा।
यह विडंबना ही है कि बिहार विधानसभा में यह घटना गत 20 फरवरी, 2026 को तब घटित हुई जब भाकपा माले विधायक संदीप सौरभ ने कार्यस्थगन प्रस्ताव किया। प्रस्ताव पेश करते हुए उन्होंने कहा कि जनवरी, 2026 में यूजीसी द्वारा इक्विटी गाइडलाइन लागू करने की घोषणा की गई, लेकिन मजबूती से लागू करने की जगह ब्राह्मणवादी मानसिकता से प्रायोजित आंदोलनों के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे स्थगित कर दिया गया। उन्होंने मांग की कि इसे बिहार में लागू किया जाए।
सनद रहे कि संदीप सौरभ ने ‘ब्राह्मणवादी मानसिकता’ की बात कही थी, लेकिन सदन में मौजूद सत्ता पक्ष के लोगों को यह नागवार गुजरा। उन्होंने ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द के उपयोग को ‘ब्राह्मण’ के ऊपर हमला माना।
दिलचस्प यह कि ‘ब्राह्मणवादी मानसिकता’ शब्द युग्म पर आपत्ति उठाने वाले विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार रहे, जो स्वयं अति पिछड़ा समुदाय से आते हैं। उन्होंने बिना एक पल की देरी किए आदेश दिया कि ‘ब्राह्मण’ शब्द को प्रोसिडिंग से हटा दिया जाए। उन्होंने कहा कि सदस्य संदीप सौरभ ने गलत कहा है। सदन में जातिसूचक शब्दों का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।

बात यहीं खत्म नहीं हुई। सदन में मौजूद उपमुख्यमंत्री सह भूमि सुधार व राजस्व मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने संदीप सौरभ द्वारा ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द का उपयोग किए जाने पर विरोध करते हुए कहा कि हम लोग संविधान में विश्वास करते हैं तो इस तरह की भाषा का उपयोग कतई उचित नहीं है। ये लोग कहते हैं कि इनको संविधान पर विश्वास है, लेकिन ये लोग संवैधानिक संस्थाओं के विश्वास पर सवाल उठा कर विरोध कर रहे हैं। यह मानसिकता झलकती है कि ये जहर घोलनेवाले लोग हैं।
विजय कुमार सिन्हा ने यूजीसी इक्वीटी रेगुलेशन का विरोध करते हुए कहा कि जब वे मुजफ्फरपुर में तकनीकी शिक्षा ले रहे थे तब उनके साथ रैगिंग कराई गई। उन्हें हॉस्टल से निकलने के लिए विवश किया गया। और अंत में उन्होंने यह भी कहा कि वे भी तो ब्राह्मण भूमिहार समाज से आते हैं।
लेकिन इस बार सभा के अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने ‘ब्राह्मण भूमिहार’ शब्द को सदन की कार्यवाही से बाहर निकालने का आदेश नहीं दिया।
इससे पहले गत 19 फरवरी को भी जातिसूचक शब्दों का खूब जमकर उपयोग तब हुआ जब अतरी विधानसभा क्षेत्र के विधायक रोमित कुमार ने यह प्रश्न उठाया था कि 1931 की जनगणना में भूमिहार ब्राह्मण की आबादी नौ लाख दर्ज थी। लेकिन 2023 में हुए जातिगत सर्वेक्षण में शामिल 215 जातियों की सूची में इस भूमिहार ब्राह्मण का नाम हटा दिया गया। रोमित कुमार जीतनराम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के टिकट से चुनकर आए हैं। उनके सवाल में यह भी शामिल था कि क्या राज्य सरकार अभिलेखों और दस्तावेजों से ‘भूमिहार ब्राह्मण’ शब्द हटा देगी।
उनके सवाल का जवाब देते हुए राजस्व व भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि राजस्व संबंधी सरकारी दस्तावेजों से ‘भूमिहार ब्राह्मण’ के नाम नहीं हटाए जाएंगे। इसे लेकर विभाग की ओर से आदेश जारी कर दिया गया है। उन्होंने घोषणा की कि राजस्व भूमि सुधार विभाग के अभिलेख में पहले की तरह भूमिहार ब्राह्मण लिखा रहेगा। इसमें किसी तरह का कोई सुधार नहीं किया जाएगा।
हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब भूमिहार खुद को भूमिहार ब्राह्मण कहलाने की बात करते रहे हैं। स्वामी सहजानंद ने अपनी पुस्तक ‘ब्रह्मर्षि वंश का विस्तार’ में लिखा है कि किन कारणो से भूमिहारों को ‘भूमिहार ब्राह्मण’ कहा जाता है। इसके अलावा यह भी कि भूमिहार समाज के लोग स्वयं को ब्रह्मर्षि वंश का वंशज बताते हैं।
उल्लेखनीय यह कि जब विजय कुमार सिन्हा ‘भूमिहार ब्राह्मण’ की बात कर रहे थे तब भी विधानसभा की अध्यक्षता डॉ. प्रेम कुमार कर रहे थे और उन्होंने न तो इसे जातिसूचक माना और न ही सदन की कार्यवाही से बाहर निकालने का आदेश दिया।
बिहार विधानसभा के पूर्व उप सचिव रामेश्वर चौधरी असंसदीय शब्दों के बारे में बताते हैं कि समय-समय पर उन शब्दों की सूची प्रकाशित की जाती है, जिन्हें आसन के द्वारा असंसदीय कहा जाता है। उनके मुताबिक, “मेरी स्मृति में ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद दोनों असंसदीय शब्द नहीं रहे हैं। लेकिन कल जब विधानसभा के अध्यक्ष ने इसे असंसदीय घोषित कर दिया तब इन्हें असंसदीय शब्दों की सूची में शामिल कर लिया जाएगा। यही परंपरा रही है।”
वर्ष 2005 से लेकर 2010 तक बिहार विधान सभा के सदस्य रहे एन.के. नंदा इस पूरे प्रसंग को दूसरे निगाह से देखते हैं। उनके मुताबिक, “जब मैं विधायक था तब ब्राह्मण या ब्राह्मणवाद शब्द को लेकर इस तरह की बातें नहीं होती थीं। तीखी से तीखी बहस होती थी। स्वयं मेरे और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच बहसें हुईं। आप देखिए कि उस दौर में नीतीश कुमार बौद्ध धर्म से जुड़े स्थलों का निर्माण करवा रहे थे। लेकिन वे आज उस स्थिति में नहीं रह गए हैं। वे भाजपा के चंगुल में या कहिए कि ऊंची जातियों के चंगुल में फंस गए हैं। ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद शब्द पर इस तरह घटना का होना इसका ही प्रमाण है।”
(संपादन : अनिल)
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