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चुप्पी से प्रतिरोध तक का मेरा सफ़र

आंबेडकर और फुले के ज़रिए मैंने जाना कि अंधविश्वास किस तरह दमनकारी व्यवस्था को बनाए रखते हैं। पैकपेट से विदा लेते समय मैं बहुत दुखी थी क्योंकि वह पहली ऐसी जगह थी, जहां मुझे समझ में आया है कि अपना घर कैसा होता है। पढ़ें, सूर्या श्री की कहानी उनके ही शब्दों में

हैदराबाद के तेल्लापुर में है फुले-आंबेडकर सेंटर फॉर फिलोसफी एंड इंग्लिश ट्रेनिंग (पीएसीपीईटी/पैकपेट)। इसका संचालन हैदराबाद के एक दलित दंपत्ति कोल्लुरी सथैया और अमृतथाम्मा करते हैं। यह संस्थान एक महीने का निशुल्क कोर्स संचालित करता है, जिसमें महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले और आंबेडकर के लेखन को अंग्रेजी भाषा में पढ़ाकर लड़कों और लड़कियों को इन तीनों महान व्यक्तित्वों के विचारों से परिचित करवाया जाता है। हर महीने 20 लड़कों और इतनी ही लड़कियों को बिना किसी शुल्क के पढ़ाई के साथ-साथ भोजन और रहवास की सुविधा भी उपलब्ध करवाई जाती है। पिछले चार सालों में इस संस्थान ने करीब 1,100 युवाओं को प्रशिक्षित किया है। संस्थान अपने कोर्स को ‘इंग्लिश नेशनलिज्म’ कहता है। पैकपेट ने हाल में ‘लर्निंग इंग्लिश नेशनलिज्म’ शीर्षक से एक पुस्तक प्रकाशित की है, जिसमें संस्थान में प्रशिक्षित लड़कों और लड़कियों के अनुभव संकलित हैं। प्रस्तुत लेख इस पुस्तक में शामिल तमिलनाडु की एक दलित लड़की सूर्या श्री के अनुभवों पर आधारित है। सूर्या संस्थान के 19वें बैच का हिस्सा थीं।

सन् 2024 में मैं 17 साल की थी, तमिलनाडु में रहती थी और अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर चुकी थी। अब कॉलेज में दाखिला लेकर अपने कैनवास को विस्तार देने का समय था। ऐसे मौके पर अधिकांश युवा बहुत रोमांचित महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि वे कॉलेज में अपने पुराने साथियों के साथ तालीम हासिल करेंगे, उन्हें स्कूल के दौर से कहीं अधिक आज़ादी हासिल होगी और वे अपने युवा होने का जश्न मना सकेंगे। लेकिन मेरे जैसे कुछ लोग – विशेषकर लड़कियां – जो जीवन की आपाधापी में फंसे रहते हैं और लगातार यह आकलन करते रहते हैं कि वे सफलता की ओर बढ़ रहे हैं या असफलता की ओर। उनके लिए कॉलेज और कोर्स का चुनाव करना एक कठिन चुनौती होती है।

बारहवीं कक्षा की परीक्षा का नतीजा मेरी आशा के अनुरूप नहीं था। उसी साल, नीट में गड़बड़ियों का खुलासा हुआ। इससे मैं और ज्यादा परेशान हो गई। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं। मेरे बचपन से ही मेरे माता-पिता की इच्छा थी कि मैं एक आईएएस अफसर बनूं। मगर यह सपना हमारे जीवनस्तर को देखते हुए एक सपना ही दिखता था, विशेषकर मेरे जैसे व्यक्ति के लिए जिसे काफी देर से अक्ल आई।

मगर मेरे अप्पा और अम्मा हमेशा जोर देकर मुझे यह समझाते रहे थे कि “हम तुम्हें सोना और हीरे नहीं दे सकते। हम तुम्हें केवल शिक्षा दिलवा सकते हैं और उससे तुम ज्ञान अर्जित कर सकती हो।”

मैं बहुत समझदार बच्ची नहीं थी। मगर मुझे मालूम था कि मुझे अपने माता-पिता की समझदार लड़की बनना है क्योंकि उन्होंने मेरी खातिर खूब मेहनत की है, कष्ट भोगे हैं और कुर्बानियां दी हैं।

मुझे याद नहीं कि 10 से 14 साल की उम्र के बीच एक दिन भी मैं स्कूल से वापस आने के बाद घर में रहीं हूं। मैं अपनी छोटी-सी साइकिल उठा कर मोहल्ले का चक्कर लगाने निकल जाती थी। मुझे लगता था कि मैं एक छोटी-सी राजकुमारी हूं – आज़ाद, निडर और खुश।

फिर अचानक एक दिन सब कुछ बदल गया। वे उसे रजस्वला होना कहते थे।

शुरुआत में तो मुझे वह बहुत अच्छा लगा। मुझे करीब दो हफ़्तों तक स्कूल से मुक्ति मिल गई। मैं केवल टीवी देखती और अपने चचेरे-ममेरे भाई-बहनों के साथ खेलती। खाना, सोना, गप्पें मारना और हंसना-हंसाना – बस यही मेरा काम था। सात दिन बाद फिर वही होता था। मेरी ख़ुशी का पारावार न था।

मगर मुझे यह समझ में नहीं आया कि दरअसल वह मुझे कैदी बनाने का उत्सव था। एक बच्चे को सोने के पिंजरे में बंद करने का उपक्रम। उसके बाद लोगों – विशेषतः मर्दों – का मुझे देखने का नजरिया बदल गया। चाहे बारिश हो या तूफ़ान; या फिर सर्दी – पूरे पांच दिन तक मुझे घर से बाहर रहना पड़ता था। मैं ज़मीन पर सोती थी, जहां कीड़े-मकोड़े मेरे साथी होते थे। मुझे लगातार दर्द होता – एक नए किस्म का दर्द जिसे मैंने इसके पहले अनुभव नहीं किया था। मेरे बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी गई। मैं अब घर के नजदीक की दुकानों पर भी नहीं जा सकती थी। मुझसे कहा गया कि मुझे लड़कों से बात नहीं करनी हैं – अपने चचेरे-ममेरे भाइयों से भी नहीं। मुझसे अपेक्षा यह थी कि मैं हमेशा अपनी माता-पिता की नज़रों के सामने रहूं।

धीरे-धीरे समाज ने मुझे समझाया कि एक ‘अच्छी लड़की’ कैसी होती है।

उसके बाद से मेरे अंदर की बच्ची ने एक मुखौटा पहन लिया – ऐसा मुखौटा, जो दुनिया को भला लगे। मैं वही करने लगी जो लोग मुझे करते देखना चाहते थे। वही बोलने लगी जो लोग मुझसे सुनना चाहते थे। मैं अपने परिवार की सबसे आज्ञाकारी लड़की बन गई।

मगर मेरे आसपास की सभी लड़कियां ऐसी नहीं थीं। कुछ ने हिम्मत से कह दिया कि वे यह सब नहीं करेंगीं। लेकिन मैंने उनका विरोध किया। मैंने यह साबित करने की भरपूर कोशिश की कि एक ‘अच्छी लड़की’ को यह सब करना चाहिए।

फिर इस दमन का घेरा और चौड़ा हो गया। उसमें अब लिंग के साथ जाति भी थी।

एक बार मैं एक जिला-स्तरीय हॉकी प्रतियोगिता में खेलने गई। हमारी टीम जीत गई। अपने स्कूल लौटते समय हम लोग थोड़ी देर के लिए कहीं रुके। मैंने अपने सीनियर्स को बताया कि मुझे लग रहा है कि मेरा मासिक धर्म शुरू होने वाला है। “हे भगवान, अगर मैं अभी घर गई तो मैं तो जीत का जश्न भी नहीं मना पाऊंगी। मुझे पांच दिन तक घर के बाहर रहना होगा।”

मेरी एक सीनियर ने कहा कि उसकी भी वही स्थिति है। फिर उसने एक प्रश्न पूछा, जिसने मुझे अंदर तक हिला दिया। “तुम किस जाति की हो?”

आगे उसने कहा, “मैं एमबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) हूं। हमारी जाति में भी यही होता है। अगर तुम मेरी जाति की हो तो हो सकता है कि हममें कोई रिश्ता हो।”

मैंने जवाब दिया, “अक्का, मैं एक एससी (अनुसूचित जाति) हूं।” मुझे अंदाज़ा नहीं था कि मैं कोई बहुत बड़ी बात कह रही हूं। मुझे पता नहीं था कि मेरा इस जाति का होना, समाज की निगाह में एक गुनाह था।

इसके तत्काल बाद उन लोगों का मेरे प्रति नजरिया बदल गया। मुझे मेरी जाति के कारण घेरा जाने लगा – उन साथियों द्वारा भी जो मेरे बहुत नज़दीक थे। उन्हें हमारे आपसी रिश्ते याद नहीं रहे। याद रहीं तो मेरी जाति से संबंधित धारणाएं जो उनके मन में बैठी हुई थीं।

पैकपेट द्वारा जारी एक विज्ञापन

मेरे माता-पिता ने अंतरजातीय विवाह किया था। उन्होंने अपने प्रेम के खातिर समाज और परिवार द्वारा खड़ी की गई दीवारों को तोड़ा था। मगर शायद वे मुझे इतना मज़बूत न बना सके थे कि मैं इस तरह के निर्णय के नतीजों को झेल सकूं। मैं अपनी जाति छुपाने लगी। मैंने अपनी दूसरी पहचान – पिछड़ी जाति – को अपना लिया। मेरे माता-पिता को समाज, परिवार और यार-दोस्तों का जबरदस्त प्रकोप झेलना पड़ना था। अब मेरे हिस्से भी वही आ गया था। मैं उसका शिकार नहीं बनना चाहती थी। इसलिए मैंने प्रतिरोध करने के बजाय, चुपचाप सब कुछ स्वीकार करने की राह चुन ली। 

मैंने चुप्पी ओढ़ ली। मैं अपने ही घर में कैद हो गई। मैं खुल कर हंसती भी नहीं थी। मैंने ज़िदंगी का आनंद लेना बंद कर दिया। मैं वही कहने लगी जो लोग मुझसे सुनना चाहते थे। मैं बहुत सावधानी से व्यवहार करने लगी ताकि कोई मेरी मां के बारे में कुछ बुरा-भला न कहे। अंततः मैंने पूरी तरह समर्पण कर दिया। मैंने ‘अच्छी लड़की’ का लबादा ओढ़ लिया ताकि मुझे ‘अच्छी लड़की’ न होने के नतीजे न भोगने पड़ें। 

मैं अंतर्मुखी हो गई। 

मैंने अंग्रेजी, कला व पढ़ाई-लिखाई में प्रवीणता हासिल करने पर अपने को फोकस कर लिया। मैंने अनुशासन से जीना सीख लिया। यह मेरे लिए सबसे अहम् साबित हुआ। मैं समाज से दूर हो गई। मेरा अनुशासित जीवन मेरे लिए ख़ुशी का एकमात्र स्रोत बन गया। मेरे परिवार को जिस तरह के अपमान का सामना पड़ा था और हमारी जो आर्थिक और सामाजिक स्थिति थी वह हमेशा मेरे दिमाग में रहती थी और इसलिए मैंने शिक्षा हासिल करने लिए अथक प्रयास करने शुरू कर दिए।

जब भी परीक्षाओं में मैं अच्छे अंक हासिल करती, मेरे शिक्षकों, माता-पिता और रिश्तेदारों की निगाहों में मेरी इज्ज़त बढ़ जाती। यह इज्ज़त ‘अच्छी लड़की’ की मेरी छवि को और मज़बूत करती और मैं उसे बनाए रखने के लिए और मेहनत करती। अंततः मैंने अपनी बोर्ड परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया। इससे मुझमें आत्मविश्वास जागा और मुझे लगा कि मैं अब पहले से थोड़ी ज्यादा आज़ाद हूं।

उस समय मैं यह मानती थी कि अगर मैं समाज की अपेक्षानुरूप ‘अच्छी लड़की’ बनी रहूंगी, तो मैं अपने जीवन में जीत हासिल कर पाऊंगी। 

फिर एक नया मुद्दा सामने आया। मैं मानविकी में आगे पढ़ाई करना चाहती थी, मगर मुझ पर जीवविज्ञान थोप दिया गया। मैंने इसे भी स्वीकार कर लिया। मैंने यह सोच कर अपने मन को समझाया कि मेरे जिले में एक भी ऐसा स्कूल नहीं है, जिसमें मानविकी विषय पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षक उपलब्ध हों। ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षाओं में मैं ठीक वैसी ही लड़की थी जैसा समाज चाहता था।

मेरी पक्की मान्यता थी कि जातिगत ऊंच-नीच एकदम स्वाभाविक है और यह भी कि हर व्यक्ति की सामाजिक स्थिति वही है जिसके वो लायक है। मैं किसी भी कीमत पर कुलीन वर्ग के मेरे आंध्र शिक्षकों की स्वीकार्यता हासिल करना चाहती थी। मैंने अपने आपको पूरी तरह बदल लिया। मैंने अपनी आदतें बदल लीं, मैंने अपना व्यवहार बदल लिया और शाकाहार अपना लिया। वे परीक्षाओं में मेरे रैंक की, मेरे व्यवहार की और अंग्रेजी बोलने में मेरी कुशलता की तारीफ़ करते थे। मैं उनका बहुत सम्मान करने लगी। मुझे अब वे अध्यापक अच्छे नहीं लगते थे जो सबको समान दृष्टि से देखते थे। 

और फिर मेरे अंतर्मन और मेरे मतिभ्रम के बीच संघर्ष शुरू हुआ। 

जो सच था, वह नंगा था, सबके सामने था। जातिगत असमानता समाज के रंगमंच के केंद्र में थी और सब कुछ उसके आसपास घूम रहा था। और इस असमानता की जड़ें उससे कहीं अधिक गहरी थीं जितनी मैं सोचती थी। 

नीट और बोर्ड परीक्षाओं के नतीजों ने मेरी सपनों की दुनिया को ढाह दिया। मेरे पास बचे थे केवल आंसू, पछतावा और दर्द। मैं आईएएस अधिकारी बनने के पुराने लक्ष्य पर लौट आई। मैंने काउंसलिंग के ज़रिए कई आर्ट्स कॉलेजों में भर्ती होने के लिए आवेदन दाखिल किए। 

काेयंबटूर में, तमिलनाडू के दूसरे रैंक के आर्ट्स कॉलेज में काउंसलिंग के दौरान बोर्ड के एक सदस्य ने मुझसे पूछा, “आपकी जाति क्या है?”

मुझे लगा कि वे आरक्षण के प्रावधानों के संदर्भ में यह जानना चाहते हैं। मगर फिर मुझे पता चला कि एससी, एसटी और कथित कुलीन जातियों की हॉस्टल अलग-अलग हैं। यह जानकारी मेरे लिए एक सदमा के समान थी। मैं कई सालों से अपने घर में कैद थी और शायद इसलिए भी मुझे यह सब बहुत अजीब और मर्मभेदी लगा। 

बहरहाल, किसी तरह मैंने एशिया के लड़कियों के सबसे बड़े कॉलेज में प्रवेश पा लिया और उसके बाद तो मेरे जीवन में एकदम से उलट-पलट हो गया। 

मैं अपने माता-पिता के पैसों का उपयोग बहुत किफ़ायत से करती थी। मैं नहीं चाहती थी कि एक भी पैसा बेकार की चीज़ों पर खर्च हो। ऐसे में, मेरी पढ़ाई पर होने वाले खर्च ने मुझे अपराधबोध से ग्रस्त कर दिया। 

राजनीति शास्त्र विभाग में अपना नाम लिखाते समय मुझे एक सीनियर के बारे में पता चला जिसे हैदराबाद में 30 दिन के गहन अंग्रेजी शिक्षा पाठ्यक्रम के लिए चुना गया था। विभागाध्यक्ष और हमारे दूसरे सीनियर्स इससे बहुत गौरवान्वित नज़र आ रहे थे। तभी मैंने तय कर लिया कि यही मेरा पहला लक्ष्य होगा। 

मगर कॉलेज में मेरा पहला साल और उसमें भी पहला सेमेस्टर बहुत निराशाजनक रहा। पढ़ाई की गुणवत्ता बहुत ख़राब थी और हमें नाममात्र का भी मार्गदर्शन नहीं मिलता था। हर टर्म में फीस जमा करने के तकादे होते थे मगर हमारे ज्ञान में न तो कोई बढ़ोत्तरी हो रही थी और न ही सुधार। बल्कि हमें तो ऐसा लग रहा था कि हमारे ज्ञान का स्तर गिर रहा है। 

मैंने अपने सहपाठियों से जुड़ने का प्रयास किया। उनके साथ बातचीत और चर्चा करने की कोशिश की। मगर सब बेकार। हमारे सीनियर्स ने हमें सांत्वना देने की कोशिश की। उन्होंने हमें बताया कि कॉलेज में रहते हुए भी कुछ नया सीखने के अवसर मौजूद हैं। 

उन अवसरों में से एक मुझे सबसे बढ़िया लगा – पैकपेट।

कई सीनियर्स ने पैकपेट के बारे में बताया मगर एंजेल अक्का और जना अक्का ने जो कहा उसने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया। उन्होंने केवल वहां के भोजन, संस्कृति और अध्यापकों की बात नहीं की – उन्होंने यह भी बताया कि पैकपेट ने उनमें किस तरह के बदलाव लाए, किस तरह दुनिया को देखने का उनका नजरिया बदला। दूसरे सेमेस्टर में मैंने पैकपेट के 19वें बैच में दाखिले के लिए आवेदन दे दिया। 

फिर एक रविवार को मेरे पास तेलंगाना से मणिकांता सर का फ़ोन आया। उन्होंने मुझसे राजनीति विज्ञान, आंबेडकर और पेरियार के बारे में कुछ प्रश्न पूछे। ईमानदारी की बात तो यह है कि इन सबके के बारे में मुझे उतना ही पता था जितना मैंने अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ा था। मगर न जाने कैसे उन्होंने मुझे चुन लिया।

मैं बहुत खुश थी क्योंकि यह मेरी मेरे घर से दूर, अकेले पहली यात्रा होने वाली थी। मेरे माता-पिता जो सामान्यतः किसी चीज़ पर बहुत प्रतिक्रिया नहीं देते थे, सचमुच आशान्वित नज़र आ रहे थे। उन्होंने मुझे बहुत आशा और विश्वास से विदा किया। शायद उन्हें लग रहा था कि मैं एक आईएएस अधिकारी के तौर पर लौटूंगी।

किसी दूसरे राज्य की मेरी यह पहली यात्रा बहुत लुभावनी थी। मेरा असबाब बहुत भारी मगर मन बहुत हल्का था।

मुझे अकेलापन बहुत भाने लगा था और इस अर्थ में पैकपेट में मेरा अनुभव बहुत सुखद और अविस्मरणीय था।

सब कुछ एकदम नया, एकदम अलग लग रहा था। मैंने देखा कि वहां महिला और पुरुष एक बराबर काम कर रहे थे। वहां व्याख्यान सुनकर मुझे अहसास हुआ कि मैं जिंदगी और असली दुनिया के बारे में कितना कम जानती थी। वहां मेरी मुलाकात ऐसे लोगों से हुई जिनके लिए किताबें एक खजाना थीं। और मैंने मन को अशांत करने वाले कई जीवन अनुभव सुने।

पैकपेट में छात्रों व शिक्षकों का एक समूह चित्र

एक बातूनी लड़की एकदम चुप हो गई। पैकपेट में पढ़ने के लिए जिस तरह का ज्ञान अपेक्षित था, उसका बोझा उठाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था। वहां मेरी मुलाकात ऐसे लोगों से हुई जो ईमानदारी और निडरता से सच बोलते थे। जब वे सामाजिक असमानता के बारे में बात करते तो मुझे उनकी आंखों में आग और दर्द दिखता था।

उनके संघर्षों के बारे में सुन कर मुझे एक कटु सत्य का अहसास हुआ – वह यह कि उनकी समस्याओं के आगे मेरी समस्याएं कुछ भी नहीं हैं। मुझे यह भी अहसास हुआ कि जिस समाज में मैं रहती थी उसकी, और उसकी राजनीति कि मुझे बहुत मामूली समझ थी। 

पैकपेट में मैंने खुद से प्रश्न पूछने शुरू किए–

मैं कौन हूं? मेरे जीवन के क्या मायने हैं? मैं अन्याय होते देख कर भी चुप क्यों रही? मैं कथित ‘अच्छी लड़की’ क्यों बनी?

एक बात मुझे बहुत साफ़-साफ़ और बहुत अच्छी तरह से समझ में आ गई।

“दमनकर्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि यही होती है कि वह दमित को यह भरोसा दिलवा देता है कि उसकी जो स्थिति है वह सामान्य है, उचित है।”

मैं समझ गई कि परोक्ष रूप से दरअसल मैं अनजाने में कई तरह की सामाजिक संरचनाओं की गुलाम हूं।

जैसा कि मणि सर अक्सर कहते हैं–

“सुनना, लोकतंत्र और सीखने दोनों के लिए ज़रूरी है।”

पहली बार लोग मेरी बातें सुन रहे थे। वे मेरे विचारों पर प्रश्न उठाते थे, मगर मेरा मजाक उड़ाने के लिए नहीं, बल्कि मेरी मदद करने के लिए।

मैंने जाति, सामाजिक न्याय, राष्ट्रवाद, स्तरीकृत असमानता, धर्मनिरपेक्षता और जाति के उन्मूलन पर व्याख्यान सुने। उस समय मुझे सब कुछ समझ में नहीं आता था। मगर मैंने वहां कुछ अनोखा देखा – मैंने पाया कि वहां लोग दूसरों की सफलता पर दिल से खुश होते थे।

हम सीखने की बात करते हैं। मगर जो सीखा हुआ है उसे भुलाना और उसकी जगह कुछ नया सीखना, मेरे लिए नया था। मैं जो सीख चुकी थी वह सचमुच बहुत ज़हरीला था। मुझे वहां समझ में आया कि आत्मसम्मान का असली मतलब क्या होता है।

आंबेडकर और फुले के ज़रिए मैंने जाना कि अंधविश्वास किस तरह दमनकारी व्यवस्था को बनाए रखते हैं। पैकपेट से विदा लेते समय मैं बहुत दुखी थी क्योंकि वह पहली ऐसी जगह थी, जहां मुझे समझ में आया है कि अपना घर कैसा होता है।

इसके आठ महीने बाद, मैंने अपने नवअर्जित आत्मज्ञान से ये पंक्तियां लिखीं–

“सरस्वती नहीं बल्कि सावित्रीबाई को लोगों के अंतर्मन में जगह मिलनी चाहिए।”

इसके करीब एक साल बाद मैंने सामाजिक-राजनीतिक दीवारों के पीछे के सच का विश्लेषण करना शुरू किया। मैंने लिखना शुरू किया। अब तक मैं करीब 75 छोटे निबंध लिख चुकी हूं – यह मेरी पहली सफलता है।

मैंने वे फिल्में देखनी शुरू की जिनसे पहले मैं दूर रहती थी और मुझे समझ में आया कि वे ‘जाति-आधारित फिल्में’ नहीं थीं, बल्कि उनका आधार जाति-विरोधी नैरेटिव थे।

मीडिया में प्रकाशित समाचारों के असली निहितार्थ सोच कर मुझे रोना आता था। मैं पहली बार हमदर्दी का मतलब समझ पाई। मुझे लगा कि मुझे समाज में सार्थक भूमिका अदा करनी चाहिए।

मणि सर ने मुझे अपनी क्षमताओं पर अविश्वास पर जीत हासिल करने और हमदर्दी से न डरना सिखाया। सुदर्शन सर, कांचा सर, और मणि सर की सामाजिक बदलाव के प्रति प्रतिबद्धता से मैंने जाना कि केवल दूसरों के विचारों को प्रस्तुत करना काफी नहीं है, स्वयं सोचना भी आवश्यक है।

मेरे सरोकार अब केवल मुझ तक सीमित नहीं थे। मैंने अपने भाई को जातिगत और वर्गीय संघर्षों के बारे में समझाया। अपने सीनियर्स के साथ मैंने आज़ादी, बराबरी और भाईचारे के मूल्यों की वकालत की। हमने अपने कार्यक्रम आयोजित किए। हमें अपमानित होना पड़ा, मगर हम डटे रहे।

पैकपेट में पढ़ने के बाद मैंने भाषण प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया और कई प्रथम पुरस्कार जीते। मैंने केवल एआई पर निर्भर रहने की बजाय किताबें पढ़ना शुरू किया। मैंने वर्तमान घटनाक्रम पर अपने बैचमेट्स से चर्चा करनी शुरू की।

सबसे महत्वपूर्ण यह कि मैंने यह तय किया कि वही कहूंगी जो मैं चाहती हूं। मैंने अपने माता-पिता को बताया कि–

मैं यह हूं। मैंने अपने लिए यह ज़िंदगी चुनी है। यह वह क्रांति है जिसका मैं हिस्सा बनना चाहती हूं।

मुझे यह अहसास हुआ कि आईएएस अफसर बनना लक्ष्य नहीं हो सकता, बल्कि वह बदलाव लाने का औजार भर है।

आज मेरे लिए मेरा आत्मसम्मान सबसे अहम् है। मैं केवल अपने लिए सपने नहीं देखती। मैं अपने लोगों के लिए भी सपने देखती हूं।

पैकपेट ने मुझे एक मूल सत्य सिखाया।

“कोई समुदाय ऐसा नहीं है जिसका जन्म ही ज्ञानार्जन के लिए हुआ हो।”

सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए स्वानुभूति ज़रूरी है, सहानुभूति नहीं। पैकपेट ने मुझे अपने जीवन को बदलने का मौका दिया – डॉ. बी.आर. आंबेडकर के विचाधारात्मक ढांचे के अंदर मेरे जीवन को फिर से संवारने का।

यहां मैं अपनी बात समाप्त करती हूं।

साल गुज़रते जाएंगे मगर हमारी दृष्टि और विरासत हमेशा बनी रहेगी।

उसे आप एक स्थान कहें या संस्था – मेरे लिए तो एक विश्वविद्यालय है।

मैं हमेशा गर्व से स्वयं को पैकपेट का विद्यार्थी कहती रहूंगी।

(यह आलेख पूर्व में पैकपेट द्वारा ‘लर्निंग इंग्लिश नेशनलिज्म’ शीर्षक से प्रकाशित एक पुस्तक में संकलित व वेब पत्रिका काउंटरकरेंट्स डॉट ओआरजी द्वारा प्रकाशित है। यहां इसका हिंदी अनुवाद पैकपेट की अनुमति से प्रकाशित। अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सूर्या श्री

लेखिका विवेकानंद कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज फॉर वीमेन, तमिलनाडु में राजनीति विभाग की छात्रा हैं

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