बुद्ध शरण हंस (8 अप्रैल, 1942 – 22 जनवरी 2026)
उत्तर भारत का हिंदी भाषी समाज, जिसे प्रायः काऊ बेल्ट के नाम से संबोधित किया जाता है, सामाजिक संरचना के स्तर पर बड़ी संख्या में एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों से निर्मित है। ऐतिहासिक विडंबना यह रही कि उत्पादन और श्रम से जुड़े ये समुदाय लंबे समय तक भाग्यवाद, ईश्वरीय नियति और ब्राह्मणवादी कर्मकांडों के सबसे बड़े सामाजिक वाहक बने रहे। लेकिन इसी समाज के भीतर अर्जकवादी, फुले-आंबेडकरवादी और बौद्ध चेतना की एक समानांतर धारा भी निरंतर विकसित होती रही, जिसने परंपरागत धार्मिक-सामाजिक संरचनाओं को चुनौती देने का काम किया। हाल ही में दिवंगत हुए हिंदी क्षेत्र के चर्चित आंबेडकरवादी चिंतक, पूर्व प्रशासक, ‘आंबेडकर मिशन’ पत्रिका के संपादक, सावित्रीबाई झोला पुस्तकालय के परिकल्पक, व दर्जनों पुस्तकों के लेखक और आंदोलनकारी बुद्ध शरण हंस को पटना सहित देश के बौद्धिक समाज द्वारा जिस व्यापकता और वैचारिक गंभीरता के साथ याद किया गया, वह बहुजन समाज में विकसित हो रही इसी वैकल्पिक मानवतावादी चेतना का सशक्त उदाहरण बनकर सामने आया।
उनके निधन के बाद उनके परिवार और बिहार के नागरिक समाज ने जिस तरह की सामाजिक-सांस्कृतिक नजीर पेश की, उसने पारंपरिक ब्राह्मणवादी मृत्यु संस्कारों से अलग बहुजन वैचारिकी की स्पष्ट अभिव्यक्ति की। मृत्यु भोज जैसी रूढ़ परंपराओं से अलग बौद्ध रीति से उनका अंतिम संस्कार किया गया तथा भीम रथ यात्रा का आयोजन हुआ। यह केवल श्रद्धांजलि नहीं बल्कि सामाजिक प्रतीकों के पुनर्निर्माण का प्रयास था, जिसने यह संदेश दिया कि बहुजन समाज अपनी वैकल्पिक सांस्कृतिक पहचान गढ़ रहा है।
पटना के गौतम बिहार प्रांगण में आयोजित एक दिवसीय स्मृति-विचार गोष्ठी में दिल्ली, झारखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार के विभिन्न हिस्सों से आये लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षकों और संस्कृतिकर्मियों ने भाग लिया। कार्यक्रम की शुरुआत बुद्ध विहार में आधे घंटे की सामूहिक प्रार्थना से हुई। उसके बाद बुद्ध शरण हंस की प्रतिमा का अनावरण पद्मश्री सुधा वर्गीज, रमाशंकर आर्य, एच.एल. दुसाध, डॉ. सिद्धार्थ रामू, विजय कुमार त्रिशरण, जया यशपाल, अमित पासवान सहित कई प्रमुख हस्तियों ने संयुक्त रूप से किया।
समारोह में केंद्रीय वक्तव्य बहुजन लेखक एच.एल. दुसाध का रहा। उन्होंने कहा कि बुद्ध शरण हंस केवल लेखक या कार्यकर्ता नहीं, बल्कि बिहार में बौद्ध चेतना के पुनर्जागरण के प्रमुख सूत्रधार थे। उन्होंने जाति व्यवस्था को केवल वैचारिक रूप से नहीं, बल्कि अपने निजी जीवन में भी चुनौती दी और अपनी संतानों के विवाह जाति सीमाओं से परे कर सामाजिक उदाहरण प्रस्तुत किया। दुसाध ने कहा कि उनकी पुस्तकों जैसे ‘ब्राह्मणवाद से बचो’, ‘तीन महाप्राणी’ आदि ने हिंदी समाज में तर्क और वैज्ञानिक दृष्टि को मजबूत किया। उन्होंने विशेष रूप से 1977 में प्रकाशित उनकी पुस्तिका ‘शोषितों की समस्या और समाधान’ को बहुजन समाज के आर्थिक सशक्तिकरण का दूरदर्शी दस्तावेज बताते हुए कहा कि हंस ने सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक हिस्सेदारी के प्रश्न को भी केंद्र में रखा। उनके अनुसार बहुजन आंदोलन की बड़ी कमजोरी यह रही कि उसने ब्राह्मणवाद का विरोध तो किया, लेकिन ब्राह्मणवादी अर्थशास्त्र का समुचित प्रतिवाद विकसित नहीं कर सका। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में विविधता, प्रतिनिधित्व और संसाधनों पर समान हिस्सेदारी को सामाजिक परिवर्तन की अनिवार्य शर्त बताया।

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए बुद्ध शरण हंस की पुत्रवधू जया यशपाल ने बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा बहुजन समाज को दी गई वैचारिक और लेखन परंपरा को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि बाबा साहब ने कलम की शक्ति दी, जिसने बहुजनों को बराबरी का अधिकार पाने की चेतना दी। बुद्ध शरण हंस से जुड़े संस्मरण साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उनका पूरा जीवन समाज में आंबेडकरवादी चेतना फैलाने के संघर्ष में बीता।
डॉ. सिद्धार्थ रामू ने इस अवसर पर कहा कि बुद्ध शरण हंस की स्मृतियां, उनका साहित्य, उनका मिशन और उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता आज भी जीवित है। उन्होंने कहा कि उनका सपना था कि शिक्षित होकर बहुजन समाज के बच्चे अपने समाज के वंचित लोगों के लिए काम करें। उन्होंने इस बात पर संतोष जताया कि उनका परिवार उसी मिशन को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
संतोष बहुजन ने बुद्ध शरण हंस के जीवन दर्शन पर केंद्रित आलेख का पाठ करते हुए कहा कि ‘दलित पासवान’ नाम से पहचाने जाने वाले हंस का शुरुआती जीवन सामाजिक अपमान और संघर्षों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने इन्हीं अनुभवों को वैचारिक ऊर्जा में बदला। उनके लिए लेखन केवल बौद्धिक कर्म नहीं बल्कि जनजागरण का आंदोलन था। इसलिए वे अपनी पुस्तकों को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए स्वयं संघर्ष करते थे।
वैशाली से आये रंजीत पासवान ने उन्हें बौद्ध प्रचारक, ‘झोला पुस्तकालय’ आंदोलन के जनक और ‘आंबेडकर मिशन’ पत्रिका के संपादक के रूप में याद करते हुए कहा कि उन्होंने अत्यंत सरल भाषा में समाज को जागृत किया और जहां भी गए, जनता की भाषा में संवाद स्थापित किया।
पटना विश्वविद्यालय के पूर्व प्राचार्य रमाशंकर आर्य ने उनके साथ बिताए अनुभव साझा करते हुए कहा कि बौद्ध धर्म विश्व के 65 देशों में फैल चुका है, लेकिन भारत में ब्राह्मणवादी शक्तियों ने इसे कमजोर करने का प्रयास किया। उन्होंने बुद्ध शरण हंस को बौद्ध धर्म के वैज्ञानिक और मानवकेंद्रित स्वरूप का समर्पित प्रचारक बताया और कहा कि उनकी अनेक पुस्तकें सामान्य पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गईं।
वहीं शारदा उपासक ने कहा कि बुद्ध शरण हंस समाज को अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने वाले मिशनरी आंबेडकरवादी थे, जिन्होंने बुद्ध के धम्म को जन-जन तक पहुंचाने के लिए जीवन समर्पित किया।
प्रसिद्ध आंबेडकरवादी लेखक विजय कुमार त्रिशरण ने उन्हें ‘इनलाइटनमेंट पर्सन’ बताते हुए कहा कि उन्होंने शिक्षा को निजी उन्नति नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाया। उन्होंने कहा कि समाज के कमजोर लोग शिक्षा के अभाव में शोषण झेलते हैं, जबकि फुले और आंबेडकर की तरह हंस ने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का हथियार बनाया। उन्होंने उन्हें जी.आर. जाटव, एस.आर. बाली और एल. सागर जैसी आंबेडकरवादी परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी बताया।
पूर्व विधायक ललन पासवान ने कहा कि आंबेडकरवादी आंदोलन का एक बड़ा परिवार यहां मौजूद है और सभी को उनके मिशन को आगे बढ़ाने तथा उनकी जयंती नियमित रूप से मनाने का संकल्प लेना चाहिए।
युवा एक्टिविस्ट अमित पासवान ने कहा कि बुद्ध शरण हंस का सपना बहुजन लेखकों की ऐतिहासिक डायरी तैयार करना था, जो अधूरा रह गया। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालयों में दलित समुदाय के बैकलॉग पदों की बहाली जैसे परिवर्तन भी ऐसे आंदोलनों की ही देन हैं।
केदार पासवान ने कहा कि दलित समाज का बड़ा हिस्सा संघर्ष करते हुए जीवन बिताकर समाप्त हो जाता है, लेकिन बुद्ध शरण हंस ने अपने संघर्षों को समाज की बेहतरी में रूपांतरित किया। उन्होंने कहा कि मान्यवर कांशीराम के बाद हिंदी क्षेत्र में आंबेडकरवादी आंदोलन की गति को आगे बढ़ाने में हंस की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
समारोह में डॉ. रामसूरत, डॉ. कमल बौद्ध, डॉ. संजीव, वीरेंद्र, शिव शंकर दास, हुलास मांझी, पी.एल. आर्या, राजेश्वर, नागेंद्र, वेद प्रकाश, मीरा यादव, इंद्रजीत चंदापुरी, अभिषेक, सन्नी यादव, दिलीप यादव, जयप्रकाश, गौतम, इंजीनियर विश्वनाथ चौधरी, पंचरत्न कुमारी, रंजीत राज अंबेडकर, भागवत वैश्यंत्री और डॉ. बिनोद पाल सहित अनेक सामाजिक-शैक्षणिक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। इन सभी लोगों को ‘आंबेडकर मिशन’ पत्रिका, बुद्ध शरण लिखित ‘चार खूंटे’ और मिशन गमछा दिया गया। पूरे समारोह में चाय, पानी और दाल, भात, सब्जी की भी व्यवस्था थी। समारोह में पंडाल और कुर्सियां भी लगी थीं। पूरे समारोह में लगभग चार सौ लोगों ने शिरकत की।
कुल मिलाकर यह आयोजन मात्र श्रद्धांजलि सभा नहीं था, बल्कि बहुजन समाज में विकसित हो रही वैकल्पिक, तर्कसम्मत, वैज्ञानिक और मानवतावादी सांस्कृतिक चेतना की सार्वजनिक अभिव्यक्ति के रूप में सामने आया। बुद्ध शरण हंस का जीवन और विचार यहां एक व्यक्ति की स्मृति से आगे बढ़कर सामाजिक परिवर्तन की निरंतर चलती परियोजना के रूप में उपस्थित दिखाई दिया।
(संपादन : नवल/अनिल)
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