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आदिवासी, इकोसिस्टम, पूंजीवाद और नीला कॉर्नफ्लावर

लेखक का उद्देश्य प्रकृति संरक्षण के प्रति सजगता जगाना प्रतीत होता है। आदिवासी जीवन का संघर्ष इस उपन्यास का बायप्रोडक्ट जान पड़ता है। चूंकि लेखक मानवशास्त्री हैं इसलिए उन्हें पता है कि प्रकृति के वास्तविक संरक्षक आदिवासी ही हैं। पढ़ें, अजय कुमार साव की यह समीक्षा

डॉ. वीरेंद्र प्रताप यादव मूलतः मानवशास्त्री हैं। वे महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। ‘नीला कॉर्नफ्लावर’ उनका प्रथम और चर्चित उपन्यास है जो वर्ष 2024 में आधार प्रकाशन, हरियाणा से छपा था। चूंकि उनका संबंध औपचारिक तौर पर भाषा साहित्य के अध्ययन से नहीं रहा है, इसलिए इनकी रचनाओं में विज्ञान, मानव विज्ञान, मनोविज्ञान, तर्क आदि के प्रयोग अधिक मिलते हैं। इसलिए यह उपन्यास हिंदी में एक अनोखा प्रयोग है। यह उपन्यास एथनोग्राफिक शैली में लिखा गया, अमेजन वर्षावन के आदिवासी समूहों (प्रमुखतः हिहो और नुआ आदिवासी समूह) के संघर्ष की कथा है। साथ ही इस पूंजीवादी समय की वीभत्सता का वर्णन है। पूंजीवादी विकसित देश किस प्रकार अविकसित तथा अर्धविकसित देशों (जो प्रकृति की गोद में बसे, प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण हैं) को अपने वर्चस्व का शिकार बनाते हैं, इसका उपन्यास में सजीव उदाहरण मार्टिन का देश सोमेट्र है। साम्यवाद का यूटोपिया लेकर आए शासक भी आज पूंजीवाद के हाथों की कठपुतलियां हैं। सोमेट्र की स्थिति हमें भारत, फिलिस्तीन, यूक्रेन आदि देशों की स्थिति जैसी लगती है, जो पूंजीवाद से त्रस्त हैं। अफगानिस्तान को तबाह करने में पूंजीवादी अमेरिका ने मानवशास्त्र का ही सहारा लिया था।

डॉ. वीरेंद्र के उपन्यास में कुल ग्यारह अध्याय हैं। आरंभिक दस अध्याय यूरोप व अमेजन की नदियों के नाम पर रखे गये हैं, जो उन नदियों के किनारे बसे मानव समूह के संघर्ष का प्रतीक हैं। अध्यायों के नाम निम्नवत हैं– नारोवा, गौजा, पुटूमायों, फीवेल, एम्स, बेनी, मडिरा, नापो, ब्रांको, नेग्रो और पाक्स। उपन्यास का मुख्य पात्र मार्टिन है तथा लक्ष्मी और प्रोफेसर टिम गौण पात्र हैं जो मार्टिन के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कथा का प्रारंभ मार्टिन के अपने गांव बोलोवा के घर से होता है। प्रारंभ में ही मार्टिन को सपनों में संघर्ष करता हुआ दिखाया जाता है। नींद टूटने पर मार्टिन अपने गांव के प्राकृतिक सौंदर्य को देखता है। मार्टिन का गांव एल पर्वत के गोद में बसा हुआ सोमेट्र का एक खूबसूरत गांव था। उनलोगों का मानना था कि देवताओं ने यह गांव बसाया था। उनके देवताओं ने वाइकिंग्स (समुद्री डाकू) से सदैव उनकी रक्षा की है।

“मार्टिन का बचपन बोलोवा में ही बीता था। वह न केवल बोलोवा अपितु अपने राष्ट्र सोमेट्र की बेचैनी भरी राजनीतिक अस्थिरता में बड़ा हुआ था। पिछली एक सदी से सोमेट्र कभी भी पूर्ण रूप से स्वतंत्र न रह पाया था। सोमेट्र की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि कभी पूरब तो कभी पश्चिम से दमनकारी उस पर शासन चला रहे थे। सोमेट्र का स्वर्णिम अतीत केवल वहां की दंतकथाओं में ही जीवित था। कथाओं के अनुसार वह देवों की स्थली थी। वहीं से देवता पूरी धरती को संचालित करते थे। सत्ता को लेकर देवताओं में विवाद हो गया। सभी देवता स्वयं सर्वोपरि होना चाहते थे। उनमें से कुछ पश्चिम तो कुछ पूर्व की दिशा से जा मिले। उन्होंने सोमेट्र के मुख्य देवता को ग्लेशियर पर खदेड़ दिया। वे सभी आज तक सोमेट्र पर कब्जे को लेकर उलझे हुए हैं। पूर्वी और पश्चिमी दिशाओं ने अपना असली रूप दिखाते हुए सोमेट्र को अपने अधीन करना शुरू कर दिया। सोमेट्र जो देवताओं का स्थल था, अब वहां कब्जा करने के लिए दिशाएं आपस में लड़ रही हैं, जिसका खामियाजा सोमेट्रवासियों को भुगतना पड़ रहा है।”

सोमेट्र की राजनीतिक अस्थिरता के कारण मार्टिन के माता-पिता उसके भविष्य को लेकर चिंतित रहते थे। चूंकि मार्टिन के माता-पिता संपन्न वर्ग के थे, एक दिन उनलोगों ने निर्णय लिया कि हमलोग तो अपनी मिट्टी छोड़कर नहीं जा सकते, इसलिए मार्टिन को पढ़ने के लिए बाहर भेज दिया– “मार्टिन के पिता ने अच्छी खासी रकम खर्च कर पढ़ाई के लिए उसे नीदरलैंड भेज दिया। उनके परिचित फूलों के एक बड़े ग्राहक ने मार्टिन के लिए फेलोशिप का इंतजाम करवा दिया और उसका दाखिला ग्रोनिंगन विश्वविद्यालय में करवा दिया। ‌‌… उसने पहली बार बाल्टिक सागर पार किया था।” दूसरे देश की भाषा, समाज, संस्कृति भिन्न होने के कारण उसे काफी संघर्ष करना पड़ा। सोमेट्र से बाहर जाकर ही वह अपने देश को जान पाया– “… विश्वविद्यालय का पुस्तकालय जहां उसे सोमेट्र संबंधी न केवल साहित्य मिल गया था, बल्कि सोमेट्रियन से डच भाषा का शब्दकोश भी मिल गया।”

नीला कॉर्नफ्लावर फूल जो उसे अपने गांव की याद दिलाती थी, इसी पुष्प के कारण वह पहली बार लक्ष्मी से मिला। मार्टिन की लक्ष्मी से दूसरी मुलाकात प्रोफेसर टिम के मानव विज्ञान की कक्षा में हुई। दोनों मानव विज्ञान की पढ़ाई कर रहे थे। कक्षा में लक्ष्मी एक डच लड़के की श्रेष्ठतावादी प्रवृत्ति को चुनौती देती हुई कहती है, “या तो आपको जानकारी नहीं या फिर आपने अपनी आंखें बंद कर रखी हैं। आदिम समाजों को सभ्य बनाने के नाम पर आप और बाकी के गोरे लोगों ने अफ्रीका और एशिया के सीधे-साधे लोगों को न सिर्फ गुलाम बनाया, बल्कि अमेरिका के मूल निवासियों का कत्ल कर समाप्त ही कर दिया।” लक्ष्मी की इस मुखरता ने मार्टिन को उसकी ओर आकर्षित किया। आकर्षण का एक और कारण संभव है कि दोनों डच नहीं थे और अपनी-अपनी संस्कृतियों का सम्मान करते थे। लक्ष्मी भारतीय मूल की लड़की थी। उसके पिताजी बंधुआ मजदूर के रूप में डचों द्वारा वेस्टइंडीज के किसी द्वीप पर लाए गए थे। इसी कारण लक्ष्मी को कई बार रंगभेद का शिकार होना पड़ता है। उपन्यास में कई जगह लक्ष्मी अपनी पीड़ा को अभिव्यक्त करती है– “मेरे मानने या न मानने से क्या होगा? जब यहां के लोग ही मुझे न स्वीकार करें तो क्या कर सकती हूं?”

“मानो तो पूरी दुनिया ही मेरा देश है और न मानो तो इस पृथ्वी पर जमीन का कोई टुकड़ा नहीं, जिसे मैं देश कह सकूं।”

“मानवता पुरानी है और राष्ट्र एवं नागरिकताएं नई अवधारणाएं हैं।”

“… यह सच है कि मेरा जन्म नीदरलैंड में हुआ है और वैधानिक रूप से मैं यहां की नागरिक हूं। किंतु मैं यहां की मूल निवासी नहीं हूं। मेरे बाबा भारतीय थे। जहां से वे वेस्ट इंडीज के एक द्वीप पर गन्ना मजदूर के रूप में आ गए थे। उस समय वह द्वीप डच कॉलोनी थी। उन्होंने वहां नारकीय जीवन बिताया। … खैर, वक्त के साथ उस द्वीप के निवासियों ने डचों के खिलाफ जन आंदोलन किया। किसी भी आंदोलन की तरह उसे भी दबाने का भरसक प्रयास किया गया। आमजन का इस तरह कत्लेआम हुआ कि समुद्र भी लाल हो गया था। किंतु स्वतंत्रता की अभिलाषा मृत्यु से अधिक शक्तिशाली होती है। अंत में डचों ने उस कॉलोनी को स्वतंत्र कर दिया। द्वीप पर स्थापित किए गए गन्ना मजदूरों को यह विकल्प दिया गया कि वे चाहे तो वहीं रह सकते हैं या नीदरलैंड आ सकते हैं, जहां उन्हें नागरिकता दे दी जाएगी। मेरे बाबा और उनके कई साथियों ने नीदरलैंड की नागरिकता ग्रहण कर ली और अपने परिवारों के साथ यहां आ गए। … किंतु जहां सबसे अधिक उम्मीद होती है, वहीं निराशा मिलती है। … डच हमें माना नहीं गया, कैरेबियन हम हो नहीं पाए और भारतीय हम रहे नहीं।”

उपन्यासकार डॉ. वीरेंद्र प्रताप यादव व समीक्षित उपन्यास का मुख पृष्ठ

विश्वविद्यालय से डिग्री पूरी करने के पश्चात् मार्टिन लैटिन अमेरिकी एक्सपीडिशन दल का सदस्य बन गया। जहां उसे लैटिन अमेरिका के मध्य में घने अमेजन वर्षावन में बसे ‘हिहो’ आदिवासी समूह पर अध्ययन करने का अवसर मिला। मार्टिन के मन में अपने देश सोमेट्र के लिए एक तड़प थी। अपने आप को व्यस्त रखने के उद्देश्य से उसने इस तरह के शोध कार्य में प्रवेश किया था। कागजी कार्रवाई पूरी कर अपने दल के साथ वह अमेजन की ओर निकल पड़ा। आदिवासी बस्ती में पहुंचने से पहले ही, स्थानीय मजदूरों के ज्ञान ने उसे अचंभित कर दिया था, आगे और भी आश्चर्य उसकी प्रतीक्षा में थे– “मार्टिन ने गौर किया कि मजदूर चलते हुए रास्ते में पड़ने वाले एक खास किस्म के पेड़ के पत्तों को चबाते और उसका रस हथेलियों पर मसलकर अपने शरीर, जो कि कमर के ऊपर नग्न था, पर लगा रहे थे। उसने उत्सुकता के साथ गाइड से इसके बारे में पूछा। गाइड ने जवाब दिया, “ये लोग एंडीरोबा की पत्तियों को शरीर पर रगड़ रहे हैं। इसकी गंध से मच्छर और दूसरे खून पीने वाले कीड़े दूर रहते हैं।” मार्टिन के लिए ये सभी जानकारियां किसी खजाने से कम नहीं थीं। उसने मन ही मन सोचा कि ये लोग जो कि आधुनिक दुनिया से पूरी तरह कटे हुए हैं, कितने ज्ञानी हैं। यदि एक झटके में सारा विज्ञान, बिजली, मशीनें आदि काम करना बंद कर दें, हम तो कुछ ही दिनों में समाप्त हो जायेंगे, लेकिन इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उसे उनके ज्ञान पर ताज़्जुब के साथ ही गर्व भी हो रहा था।”

हिहो बस्ती पहुंच कर मार्टिन के संग आया गाइड हिहो के सरदार से उनलोगों का उनके साथ कुछ दिन रहने की अनुमति मांगता है। एक तरह से अनुमति मिलने पर मार्टिन का दल कुछ दिनों तक उनके साथ रहते हैं। मार्टिन हिहो लोगों की हर छोटी-बड़ी क्रियाकलापों को बारीकी से अपनी डायरी में नोट करता है। उनका खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा, झोपड़ियों की संरचना, रीति-रिवाज, शिकार के तरीके, उनके साथ रहने वाले पशु-पक्षी, उनका पुरखा ज्ञान आदि को ध्यान से ऑब्जर्व कर नोट करता है। वह भूखे रह लेते थे पर किसी मादा गर्भवती पशु का शिकार नहीं करते थे। इनके यहां सुअर के प्रजाति का एक पशु टपिर को नहीं मारा जाता था। हिहो का सरदार भले एक पुरुष था, किंतु वह राजा की तरह नहीं था। उनके यहां कोई भी निर्णय सामूहिक निर्णय होता था तथा स्त्रियां भी निर्णय में हस्तक्षेप करती थीं। वहां स्त्री-पुरुष का दर्ज़ा बराबर था। वहां बच्चे, बूढ़े, स्त्रियां सबके काम बंटे हुए थे।

अमेजन वर्षावन के हिहो आदिवासियों के यहां से लौटने के बाद से ही मार्टिन पूरी तरह अपनी रिपोर्ट लिखने में व्यस्त हो गया। तीन माह बाद ही उसे शिकागो में अंतर्राष्ट्रीय मानव वैज्ञानिक संस्था के सम्मेलन में शामिल होना था। मार्टिन ने इस सम्मेलन में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसे दुनिया भर के प्रतिष्ठित विद्वानों ने पसंद किया। इसके बाद एक दिन उसे अपने पिता का जवाबी पत्र मिला। उसके पिता ने सोमेट्र की राजनीतिक अस्थिरता को स्पष्ट किया और उसे सोमेट्र आने से मना किया। किंतु पत्र पढ़कर चिंतित मार्टिन सोमेट्र के लिए रवाना हो गया। लेकिन वह सोमेट्र को बचा नहीं पाया। सोमेट्र तबाह कर दिया गया था। उसके सामने उसकी पूरी दुनिया उजड़ चुकी थी। वह कुछ न कर सका था। सोमेट्रवासियों के कुछ शवों को दफनाते हुए वह उनके ऊपर अपना नाम लिख देता था। इस तरह उसने खुद को कई बार दफना चुका था।

मार्टिन की निराशा देख पीटर (जो मार्टिन को बोलोवा ले आया था) कहता है, “जब तुम और तुम्हारे जैसे बच्चे अपनी मां के गर्भ में थे तभी पूर्वजों ने तुमलोगों को सारा का सारा सोमेट्र दे दिया। उन्होंने अपना काम कर दिया और वे आश्वस्त हैं कि जब तक अंतिम व्यक्ति, जिनकी रगों में नीले कॉर्नफ्लावर की महक दौड़ती रहेगी, तब तक सोमेट्र ज़िंदा रहेगा।” इसके बाद मार्टिन सोमेट्र को अपनी यादों में बसाए ग्रोनिंगन विश्वविद्यालय लौट आया।

विश्वविद्यालय में प्रोफेसर टिम उसे खोजते हुए उसके पास पहुंचे। प्रोफेसर टिम को सोमेट्र के बारे में जानकारी मिल चुकी थी। वह उसकी ठहरी हुई ज़िंदगी को पुनः गतिमान करने के लिए आशा की एक किरण बनकर पहुंचे थे। प्रोफेसर टिम ने मार्टिन के सामने अमेरिकी सरकार का एक प्रस्ताव रखा। अमेरिकी सरकार, लैटिन अमेरिका के अमेजन के घने जंगलों में बसे आदिवासियों का अध्ययन करना चाहती है। प्रोफेसर टिम मार्टिन से कहते हैं, “तुम्हें इस प्रस्ताव पर आवेदन भेज देना चाहिए, इससे तुम्हारे जीवन को गति मिलेगी।” प्रोफेसर टिम से ही मार्टिन को जानकारी मिली कि लक्ष्मी हिंदुस्तान चली गई है। थोड़ी देर बाद मार्टिन प्रस्ताव को पढ़ने लगता है। उस प्रस्ताव में दिए आदिवासियों के नाम में हिहो भी थे जिनपर वह कार्य कर चुका था। साथ ही वह नुआ का नाम पढ़कर आश्चर्यचकित हुआ। इनका जिक्र हिहो बार-बार करते थे। उपन्यास में हिहो और नुआ समुदाय के मध्य मौन विनिमय को दिखाया गया है। जो आज भी कुछ आदिवासी समूहों में प्रचलित है। अगले दिन मार्टिन ने प्रोफेसर टिम को बताया कि वह नुआ आदिवासियों पर काम करने के लिए तैयार है। प्रोफेसर टिम ने उसे एक बात से सचेत करते हुए कहा, “अमेरिकन सरकार पूंजीपतियों की सरकार है और उसका ध्येय मुनाफा कमाना है। तुम इस बात को हमेशा याद रखना कि कभी भी ऐसा कुछ तुम्हारे कारण न हो कि किसी समाज या संस्कृति की बर्बादी का जाने-अनजाने तुम जिम्मेदार बनो।”

कुछ दिनों बाद मार्टिन का प्रस्ताव अमेरिकी सरकार ने स्वीकार कर लिया। वह अमेरिका जाकर आवश्यक कागजी कार्रवाई के उपरांत इस बार अकेले ही हिहो बस्ती में पहुंच गया। हिहो सरदार ने ससम्मान उसका स्वागत किया। वह लगभग एक महीने तक हिहो के बीच के बीच रहकर नुआ के बारे में सारी जानकारी जुटाने लगा। उसे पता चला कि नुआ किसी भी बाहरी को अपने क्षेत्र में बर्दाश्त नहीं करते। मार्टिन की जिद्द और निष्ठा ने एक दिन दुर्घटनावश उसे नुआ के बीच उनकी बस्ती में पहुंचा दिया। उसे बुलेट चींटियों ने काट लिया था। नुआ लोगों ने उसका इलाज किया। स्वस्थ होने के बाद वह नुआ के बीच ही रहने लगा। नुआ उसे देवदूत मानते थे। मार्टिन लगभग चार वर्षों तक नुआ के बीच रहा। इस दौरान उसने उनकी भाषा-व्यवहार, रहन-सहन, वेश-भूषा, रीति-रिवाज, शिकार के तरीके, अनुष्ठान, प्रकृति से संबंध आदि सबकुछ लगभग सीख-समझ गया। नुआ के बारे में बर्बरता और नरभक्षी जैसी जो अफवाहें फैली थी, उसका एक कारण यह था कि नुआ लोग लाल/गेरूआ रंग का कोई लेप अपने शरीर को सजाने के लिए लगाते थे। जिसे लोग खून समझते थे। लेकिन यह अन्नाटो होता था। यह सिंदूरी रंग नुआ स्त्री-पुरुष खुद को सजाने के लिए लगाते थे। (इससे हम यह अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जो सिंदूर की परंपरा है वह आदिवासियों की देन है, जो बाद में विकृत रूप में उपयोग होने लगी।) मार्टिन इन सब बातों को अपनी डायरी में नोट करता जाता था। नुआ में मातृवंशीय प्रणाली थी।

मार्टिन की मित्रता मिचाऊ नाम की एक नुआ लड़की से हो गई थी, जो नुआ शमन की पुत्री थी। मिचाऊ के साथ वह जंगल घूमता, बातें करता। एक बार मिचाऊ पूछती है कि ‘तुम्हारी शादी हो गई?’ तो मार्टिन बताता है कि लड़की शादी से पहले ही उसे छोड़कर चली गई (यहां वह लक्ष्मी को याद करता है)। नुआ लोग सूअर, हमिंग बर्ड और कोंडोर (बाज की प्रजाति का पक्षी) का शिकार नहीं करते थे। वे लोग मादा गर्भवती जानवरों का भी शिकार नहीं करते थे। वे लोग हमिंग बर्ड और कोंडोर को देवदूत मानते थे जिसे वर्षावन की रक्षा के लिए धरती पर उनके देवता ने भेजा है। अद्भुत बात यह है कि जिस सोने के पीछे दुनिया बौराई रहती है, वह नुआ को तनिक भी लुभा नहीं पाती। नुआ सोने को अभिशापित मानते हैं। अमेजन के वर्षावन में बहने वाली नदियों में सोना बहता है। वहां की मिट्टी में सोना है। लेकिन नुआ उसे छूते तक नहीं। वह बस इसकी रक्षा करते हैं और बाहरी लोगों से इसे बचाते हैं। इसके कारण वह बाहरी दुनिया से संपर्क नहीं रखते। उनका मानना है कि जिस दिन यह इस वन से बाहर गई इस वन का और पूरे धरती का विनाश हो जायेगा।

बूढ़ा नुआ शमन कहता है कि चमकीली या चटख वस्तुओं से दूर रहना चाहिए। नुआ अमेजन वर्षावन से बहुत प्रेम और श्रद्धा करते हैं। मिचाऊ कहती है, “यहां का हर पेड़ और हर जीव हमारे पूर्वजों की आत्मा है। हम वर्षावन से ही बने हैं और मरने के बाद पुनः वर्षावन ही बन जायेंगे। वर्षावन का हर जीव, हर पौधा, यहां तक कि नदी, मिट्टी, अंधेरा सभी हमारे पूर्वजों की आत्मा है।” सभ्य दुनिया में नुआ लोगों की बर्बरता को लेकर जो अफवाहें फैली हैं, उसके बारे में मिचाऊ कहती है, “हमारा आक्रामक होना मजबूरी है। वर्षावन का हर पेड़, हर पौधा और हर जीव हमें बचाए रखने में अपना योगदान देता है। यदि किसी को भी खत्म कर दिया जाएगा तो पूरा वर्षावन समाप्त हो जायेगा। और अगर वन समाप्त हो गया, तब सारी दुनिया ही समाप्त हो जायेगी।”

चार वर्ष तक नुआ समूह के बीच रहकर उन पर किए अपने गहन शोध के बाद वह वापस लौटना चाहता था (हालांकि नुआ के बीच रहते हुए मार्टिन निरंतर उनसे प्रभावित होता था तथा अपने किताबी ज्ञान और अपने आने के उद्देश्य को भूलता जाता था। वह स्वयं को उन्हीं का सदस्य समझने लगा था।)। उसकी डायरी एक पुस्तक का रूप ले चुकी थी। परियोजना के दबाव में वह लौट गया। अमेरिका लौटने पर उसने अपनी रिपोर्ट को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाना चाहा। इसके पीछे उसकी अर्थ और यश की अभिलाषा भी थी। पुस्तक के लिए वह मोनोग्राफ तैयार करने लगा। सात माह की परिश्रम के बाद उसने मोनोग्राफ का अंतिम ड्राफ्ट तैयार कर लिया। कई रातों से वह जगा था। अंतिम ड्राफ्ट के बाद जब वह सोने गया तब उसे सपने में अमेजन वर्षावन के दृश्य नज़र आने लगें। वर्षावन तबाह हो चुका था। उसके मोनोग्राफ बड़ी-बड़ी मशीनें बनकर वर्षावन को खोद रहे थे। सारे नुआ मारे जा चुके थे। गोरे लोगों ने स्वर्ण के लिए मार्टिन की पुस्तक के सहारे पूरे वर्षावन को नष्ट कर दिया। हमिंग बर्ड सपने में इस तबाही का जिम्मेदार मार्टिन को ठहराती है। नुआ ने इसपर भरोसा किया और इसने …?

उपन्यासकार डॉ. वीरेंद्र अपने पात्र मार्टिन को सपने के माध्यम से उसके पुस्तक द्वारा भविष्य में होने वाले दुष्परिणामों को दिखाते हैं। अंत में जब उसकी नींद खुलती है तब वह इन दुष्परिणामों को रोकने तथा आत्मग्लानि से बचने के लिए मोनोग्राफ को अंगीठी के हवाले कर देता है।

वस्तुतः इस उपन्यास का अंत सुखांतक होता है। अंतिम अध्याय ‘पाक्स’ का अर्थ भी शांति या सुकून है जो मार्टिन को अपने निर्णय से मिलता है।

इस तरह से पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से रचित यह उपन्यास सुखांतक है। लेकिन वास्तविकता में अब भी पूंजीवादी ताकतों द्वारा विकास के नाम पर निरंतर वन कटाव जारी है। भारत में भी विकास के नाम पर पूंजीपतियों को कौड़ी के भाव में जंगल और जमीनें दे दी जा रही हैं। हसदेव जंगल इसका उदाहरण है। गत 19 अगस्त, 2025 गुवाहाटी हाइकोर्ट की ये पंक्तियां है कि असम सरकार ने एक आदिवासी जिले का आधा हिस्सा कॉर्पोरेट को दे दिया सीमेंट फैक्टरी के लिए। मूलतः लेखक का उद्देश्य प्रकृति संरक्षण के प्रति सजगता जगाना प्रतीत होता है। आदिवासी जीवन का संघर्ष इस उपन्यास का बायप्रोडक्ट जान पड़ता है। चूंकि लेखक मानवशास्त्री हैं इसलिए उन्हें पता है कि प्रकृति के वास्तविक संरक्षक आदिवासी ही हैं।

प्रस्तुत उपन्यास के आकर्षण का केंद्र इसका कथ्य है। इसकी भाषा बहुत अच्छी और सहज है, किंतु यह तकनीकी या कार्यालयी हिंदी के अधिक करीब है। चूंकि लेखक साहित्यिक पृष्ठभूमि के नहीं हैं तथा मानव विज्ञान में प्रोफेसर है, संभवतः इसी कारण भाषा का प्रवाह कई जगह अवरुद्ध हैं। तत्सम शब्दों का प्रयोग संभवतः सायास किया गया है। ऐसा लगता है कि गैर-हिंदी शब्दावली (लैटिन अमेरिकी शब्दों को छोड़कर) के प्रयोग से बचा गया है। लेखक का गैर-आदिवासी होना भी बेजोड़ कथ्य के बावजूद भाषा में अधूरापन प्रतीत होता है। लेखक ने चित्रात्मक और प्रतीकात्मक शब्दों का बखूबी प्रयोग किया है। इसी के सहारे पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं, आदिवासियों की दिनचर्या सहित वर्षावन की खूबसूरती का वर्णन किया गया है। लेखक की कल्पनाशीलता (जो सपनों के द्वारा प्रकट की गई है) में नैसर्गिकता का अभाव-सा लगता है। उपन्यास का अंत, हालांकि नायक के बहुत अंतर्द्वंद्व के बाद परिणति पाता है, वह अंत में सामान्यतः अपेक्षित लगता है।

अंत में, ‘नीला कॉर्नफ्लावर’ शीर्षक के पीछे लेखक का यह मंतव्य ज्ञात हुआ कि उन्हें लैटिन अमेरिका व बाल्टिक सागर के तरफ की ही कथावस्तु को दर्शाना था। नीला कॉर्नफ्लावर एस्टोनिया नामक देश का राजकीय फूल भी है तथा नीला रंग यूरोप में दुख का प्रतीक है और भारत में यह ज्ञान का प्रतीक है। ध्यातव्य है कि नीला रंग बुद्ध का रंग है। दलित आंदोलन, अस्मितावादी आंदोलनों का रंग है। बुद्ध ज्ञान के प्रतीक हैं। लेकिन यहां रोचकता यह है कि मशीनी ज्ञान से जो पृथ्वी पर तबाही मची है, उस तबाही से उपजा दुख का प्रतीक है यह उपन्यास। पूंजीवाद की शोषक ज्ञान परंपरा से प्रकृति को बचाना ही इस उपन्यास का लक्ष्य प्रतीत होता है।

समीक्षित पुस्तक – नीला कार्नफ्लावर

लेखक – वीरेंद्र प्रताप यादव

प्रकाशक – आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा

मूल्य – 195 रुपए

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

अजय कुमार साव

लेखक तेजपुर विश्वविद्यालय, असम में हिंदी साहित्य के शोधार्थी हैं

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