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पमरिया : साझा संस्कृति का बोझ और पसमांदा पहचान का बहुजन विमर्श

डॉ. अयुब राईन द्वारा संपादित यह पुस्तक महज़ एक सांस्कृतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि अशराफियत और सामंतवाद के गठजोड़ के खिलाफ एक पसमांदा ‘चार्जशीट’ है। पढ़ें, अब्दुल्लाह मंसूर की यह समीक्षा

डॉ. अयुब राईन द्वारा संपादित पुस्तक ‘पमरिया’ भारतीय लोक संस्कृति के उस उपेक्षित और अनछुए पक्ष को बड़ी आत्मीयता से उजागर करती है, जो मजहब की संकीर्ण सीमाओं को लांघकर लोक-जीवन की साझा और गौरवशाली विरासत का अभिन्न हिस्सा रही है। भारत की उर्वर भूमि पर नाचने-गाने वाली अनेक जातियां फली-फूली हैं, जिनमें नट, बक्खो, मिरासी, कंचनी, बेड़िया, गंधर्व और भाट जैसे नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं, लेकिन पमरिया जाति इन सबसे विशेष और बुनियादी तौर पर भिन्न दिखाई देती है। वस्तुतः पमरिया जाति मिथिला की वह विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर है जिसने इस क्षेत्र में एक अनूठी नृत्य-गान परंपरा का संवहन, संरक्षण एवं संवर्द्धन किया है।

इस समाज की सबसे बड़ी विशेषता इसका वह अनूठा धार्मिक और सांस्कृतिक द्वैत है, जहां ये लोग मजहबी तौर पर तो मुसलमान हैं, लेकिन इनकी पूरी आजीविका और कलात्मक पहचान आज भी हिंदू घरों की प्राचीन ‘जजमानी व्यवस्था’ और हिंदू संस्कारों के अटूट धागों से बुनी हुई है। यही दिलचस्प विरोधाभास पमरिया जाति को भारतीय समाज के सांस्कृतिक ताने-बाने का एक अनिवार्य और जीवंत हिस्सा बनाता है, जिसे समझने के लिए इतिहास की परतों को उघाड़ना आवश्यक है। भारतीय समाज में पुत्र जन्म के अवसर पर गीत गाने की परंपरा अत्यंत प्राचीन और गहरी जड़ों वाली है, और इस मांगलिक घड़ी में सोहर व खिलौना गीतों का प्रचलन आज भी लोक-मानस में रचा-बसा है।

इस पुस्तक में डॉ. अयुब राईन और अन्य लेखकों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि पमरिया जाति के मुस्लिम होने के पीछे गहरे ऐतिहासिक और सामाजिक कारण रहे हैं। डॉ. अयुब राईन के अनुसार, पमरिया जाति पूरी तरह से जमींदारों, रजवारों और नवाबों के शौक की पैदावार है। जमींदारों द्वारा अपने पुत्र के जन्म को यादगार बनाने की खातिर गरीब और बेबस लोगों को महिलाओं वाले वेश में सज-संवर कर नाचने-गाने पर विवश किया जाता रहा, जो कालांतर में एक पेशे और फिर एक जाति के रूप में परिवर्तित हो गया। ऐतिहासिक साक्ष्यों और जनश्रुतियों के अनुसार, यह समुदाय मूलतः बिहार की बहुसंख्यक हिंदू जाति ‘लालदेव’ और ‘बांवरिया’ से धर्म परिवर्तन कर इस्लाम के दायरे में आया। कुमार सुरेश सिंह ने अपनी पुस्तक ‘शेड्यूल्ड कास्ट’ में जिक्र किया है कि हिंदुओं की लगभग सत्रह जातियां गाना-बजाना करने का काम करती हैं, जिनमें से पमरिया समाज का विकास हुआ। चूंकि पमरिया बधाई गीत गाने के बहाने किसी भी घर के अंदर यहां तक कि अंतःपुरों तक आसानी से पहुंच सकते थे, इसलिए राजा-महाराजाओं और बादशाहों ने खुफिया जानकारी जुटाने के लिए उनका इस्तेमाल किया।

पमरिया जाति के ऐतिहासिक मूल को लेकर लेखकों में दो मुख्य धाराएं दिखती हैं। पहली धारा इन्हें क्षत्रियों से जोड़ती है। पुस्तक में डॉ. पुष्पम नारायण अपने लेख ‘मिथिला का पमरिया नृत्य : एक परिचय’ और डॉ. शंकरदेव झा अपने लेख ‘मिथिला की पमरिया-जाति : एक इतिहास, एक कला परंपरा’ में लिखते हैं कि ‘पमरिया’ शब्द की उत्पत्ति ‘पमार’ या ‘परमार’ राजपूतों से हुई है। माना जाता है कि शुरुआत में ये लोग परमार क्षत्रियों की वीरगाथाएं (पमारा) गाने वाले दरबारी गायक थे। इसी वजह से इनका नाम पमरिया पड़ा। जब परमारों का राजनीतिक प्रभाव कम हुआ, तो ये कलाकार आम जनता के बीच चले गए और मिथिला की लोकगाथाओं को अपना लिया। दूसरी धारा, जिसका उल्लेख डॉ. अयुब राईन ने किया है। उसके मुताबिक, एक ‘अरबीकरण’ या ‘अशराफीकरण’ की कहानी कहती है। इस जाति के कुछ लोग खुद को सऊदी अरब के मदीना के ‘सकीब कबीला’ और ‘अबुल-आस-बिनन-अब्बास’ से जोड़ते हैं, जिन्होंने पैगंबर साहब के मदीना आने पर दफ और रबाब बजाकर उनका स्वागत किया था। इसलिए इस जाति के लोग अपने नाम के साथ अब्बासी लगाते हैं। लेकिन डॉ. शंकरदेव झा इसे एक गढ़ी हुई कहानी मानते हैं, जो संभवतः इस जाति ने खुद को इस्लाम की मूल धारा से जोड़ने और ‘नचनिया’ कहलाने की आत्महीनता से बचने के लिए बनाई होगी।

पमरिया कला की सबसे अनूठी विशेषता इनका ‘जजमानी’ संबंध है। हिंदू समाज में बच्चा पैदा होने पर पमरिया का आना शुभ माना जाता है। ऐसे मौके पर पमरिया बधाई और सोहर गाते हैं। अनिल पतंग अपने लेख ‘पुत्र जन्मोत्सव, बधावा और पमरिया’ में लिखते हैं कि विभिन्न जातियों के लोग जिसे पौरिया या पौनिया-पसारी कहा जाता है के कार्य क्षेत्र बंटे होते हैं, जिसमें पुरोहित, नाई, धोबी, कुम्हार, डोम, चमार आदि के निर्धारित जजमानों के यहां दूसरों का प्रवेश अवैधानिक माना जाता है। ये जातियां आवश्यक होने पर अपने क्षेत्रों को बेचते हैं या अपने बेटियों को दहेज के रूप में भी देते हैं। पमरिया का भी दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश को अनाधिकृत माना जाता है। डॉ. मोजीर अहमद आजाद अपने लेख ‘पमरिया : जीवन एवं यथार्थ’ में लिखते हैं कि “अब्बासी पमरिया की हालत भी मुलसमानों के बीच अच्छी नहीं है। मुसलमान विशेषकर अमीर मुसलमान जो दान देने योग्य हैं या जो बेटे की पैदाइश पर खुशीपूर्वक खर्च कर सकते हैं, अब इस परंपरा को गलत मानते है। कभी-कभी तो इसे अशुभ माना जाता है। इसलिए पमरिया का काम मुस्लिम समुदाय में प्रायः समाप्त है। मैंने अपने लड़कपन में अपने यहां भतीजा के जन्म के बाद पमरिया को देखा था जो मिथिला दीप से आए थे। अब तो हम सब के यहां गीत गान का प्रचलन केवल शादी-ब्याह में ही रह गया है। इस अवसर पर गीत गायन के रिवाज को पीढ़ी-दर-पीढ़ी महिलाएं और लड़कियां कायम रखे हुई हैं। अलबत्ता गीत का रंग-रूप और भाषा बिल्कुल बदल गई है। पमरिया अब गांव में शायद ही किसी संभ्रांत के यहां आते हों। अब मुस्लिम परिवारों में बधाई गीत को लेकर धार्मिक रूप से भ्रम की स्थिति है, कट्टर मुसलमान इसे गैर-इस्लामी मानते हैं, इसलिए पमरियों के मुख्य जजमान आज भी हिंदू परिवार ही हैं। यही वजह है कि इनके गीतों में हिंदू देवी-देवताओं और दंत कथाओं की प्रधानता रहती है।”

समीक्षित किताब का मुख पृष्ठ

डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन अपने लेख ‘पमरियों के नाच’ में लिखते हैं कि पमरिया दाढ़ी नहीं रखते। वे हिंदू यजमानों के यहां मुख्य रूपेण गाने, बजाने और नाचने के कारण हिंदू देवी-देवताओं का मंगलाचरण ही प्रथमतः गाते हैं। अतः वे उर्दूभाषी मुसलमानों से भिन्न कोटि के हैं। इसकी भाषा मैथिली है। संभवतः वे हिंदुओं के अछूत ग्रुप से धर्मपरिवर्तन के बाद मध्यकालीन परिवेश में मुसलमान बन गए हैं। बक्खो, डफाली आदि की तरह आज वे मुसलमानों के अरजाल समूह (पूर्व के अछूत) में गिने जाते हैं। लेकिन वे भाषिक दृष्टि से मैथिली भाषी हैं तथा ‘रइया रणपाल’ और ‘घुघली घटमा’ जैसी मैथिली लोकगाथाओं का गायन एवं नर्तन करते हैं। डॉ. शंकरदेव झा अपने लेख ‘मिथिला की पमरिया जाति : एक इतिहास, एक कला परंपरा’ में लिखते हैं कि “सच में कहा जाए तो ये पमरिया जाति चाहे मिथिला के निवासी हों या फिर अन्य क्षेत्रों के, ये सभी धर्म परिवर्तन कर हिंदू से मुसलमान बने हैं। इन्होंने अपनी आस्था जरूर बदली लेकिन अपनी परंपराओं एवं पेशा में कोई परिवर्तन नहीं किया। मुसलमान होते हुए भी पमरिया जाति के लोग दाढ़ियां नहीं रखते हैं। व्यवस्थित किंतु एक विशेष अंदाजवाली वेश-भूषा, कंधों पर झूलते हुए सीटे हुए बाल, चुस्त जमा एवं चपकन या मिरजई का पहनावा, सर पर विशेष प्रकार से बांधे गये मुरेठा जिसे समला कहते हैं, कांधे पर तह किया हुआ दुपट्टा। यही इस जाति के कलाकारों का एक सामान्य स्वरूप होता है। पमरिया कलाकारों की यह वेश-भूषा और परिधान मध्यकालीन राजपूती दरबारों में रहनेवाले चारणों एवं विद्यावंतों के स्वरूप से काफी मेल खाते हैं।”

डॉ. पुष्पम नारायण अपने लेख ‘मिथिला का पमरिया नृत्य : एक परिचय’ में लिखते हैं कि “पमरिया कलाकारों की एक निश्चित टोली होती है जिसमें तीन मुख्य पात्र होते हैं– अगुआ, शागिर्द और पछुआ। अगुआ दल का मुखिया होता है जो गीत शुरू करता है और नाचता है। जब अगुआ का दम टूटने लगता है, तो पछुआ गीत की कड़ी पकड़ लेता है। जैसे-जैसे अगुआ कहता है, पछुआ उसका अनुसरण करता है। पछुआ का काम सबसे दिलचस्प है; वह गीत के अंत में ऊंचे स्वर में ‘हां जी, हां जी’ या ‘भले जी’ कहकर सुर मिलाता है। मिथिला में ‘पमरियाक तेसर’ (पमरिया का तीसरा यानी पछुआ) एक प्रसिद्ध कहावत भी है। शागिर्द यह अगुआ एवं पछुआ दोनों का अनुसरण करने वाला होता है। साधारणतः ढोलकी यही टोली में बजाता है।”

इनके गीतों के प्रकारों पर डॉ. लालती कुमारी और स्वयं संपादक डॉ. अयुब राईन ने विस्तार से लिखा है। इनके मुख्य गीत ‘बधैया’, ‘सोहर’, ‘पमारा’, ‘समदाउन’ (विदाई गीत), ‘खिलौना’ एवं ‘बधावा’ का स्थान प्रमुख हैं। खिलौना गीतों में ननद अपनी भाभी से कहती है– “सब केओ अयथिन हलुआ खोअयबनि, ननदीक छोलनी चटयबनि हो बालम।” इसका अर्थ है कि भाभी अपने पति से मजाक में कहती है कि वह सभी मेहमानों को तो स्वादिष्ट हलुआ खिलाएगी, लेकिन अपनी ननद को केवल वह छोलनी (चम्मच) चटाएगी जिससे हलुआ बना है। यह ननद-भाभी के बीच की पारंपरिक नोक-झोंक को दर्शाता है। ऐसी हंसी-ठिठोली ग्रामीण समाज के आपसी संबंधों को प्रगाढ़ करती थी। इसके विपरीत, सोहर के कुछ अंश अत्यंत हृदयविदारक भी होते हैं, जिसमें एक नारी की पीड़ा का वर्णन मिलता है, जिसे ‘बांझ’ कहकर समाज से बहिष्कृत कर दिया गया। पमरिया जब गाते हैं– “सासु मोरा ताना मारे, ननद गरियाबइ, दुलहा हमरा बाझिन कहके घरसं भगाबइ”, तो यह केवल गीत नहीं रह जाता, बल्कि तत्कालीन समाज की कुरूपता का दस्तावेज बन जाता है। ऐसे ही गीतों के माध्यम से वे दिखाते हैं कि कैसे वह दुखी नारी पीपल के पेड़ के नीचे जाकर विनती करती है, तो वहां से भी उसे दुत्कार मिलती है– “यहां से चल जो बझिनियां पीपल गाछ सूख जैत!” (यहां तुम चली जाओ बांझ, तुम्हारे यहां रहने से पीपल का पेड़ सूख जाएगा) यह करुणा पमरिया कलाकारों के अभिनय और स्वर में इस कदर उतर आती है कि सुनने वाला भावुक हो उठता है।

डॉ. अमित कुमार सिन्हा अपने लेख ‘पमरिया जाति : एक ऐतिहासिक अवलोकन’ में इस समाज की विशिष्ट दृश्य पहचान और उनके वाद्य यंत्रों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं। उनके अनुसार, पमरियों की वेश-भूषा मूलतः मुगलकालीन राजदरबारी संस्कृति से प्रभावित रही है, जिसमें वे चपकन, सिर पर विचित्र ढंग की पगड़ी और पाजामे के ऊपर घाघरा पहनकर अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। यद्यपि समय के साथ उनके पहनावे में काफी गिरावट आई है और अब वे साधारण कुर्ते-पाजामे या धोती में नजर आते हैं, किंतु उनके विशिष्ट केश विन्यास जो गर्दन के चारों ओर लटकते हैं और चेहरे के पास कटे होते हैं आज भी उनकी पुरानी पहचान को जीवित रखे हुए हैं। सिन्हा यह भी स्पष्ट करते हैं कि पमरिया नृत्य की आत्मा उनके घुंघरू और विशिष्ट ‘ढोलकी’ (एकतलिया) में बसी है; यह मिट्टी से बनी सुराहीनुमा ढोलकी, जिसके पेंदे पर चमड़ा मढ़ा होता है, अपनी बनावट और बजाने की शैली में अद्वितीय है, जिसे कलाकार या तो हाथ में पकड़कर या गर्दन में लटकाकर अपनी उंगलियों की थाप से जीवंत करते हैं।

पमरियों की वर्तमान स्थिति की बात करें तो यह कला और जाति दोनों संकट में हैं। डॉ. राजीव कुमार ने इनके आर्थिक क्रियाकलापों पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि अब जजमानी व्यवस्था कमजोर हो रही है। पहले इन्हें अनाज, कपड़े और पशु दान में मिलते थे, लेकिन अब केवल थोड़े-बहुत रुपयों से काम चलाना पड़ता है। डॉ. अयुब राईन दर्ज करते हैं कि नई पीढ़ी अब ‘पमारा’ नहीं जानती। पुराने उस्ताद मर चुके हैं और उनके पास लिखित कुछ भी नहीं था। आज के पमरिया अपनी आजीविका बचाने के लिए फिल्मी गानों की पैरोडी और बाजारू कव्वालियों का सहारा ले रहे हैं। राजनीतिक रूप से भी इस जाति की भागीदारी नगण्य है, हालांकि पंचायत चुनावों में आरक्षण के कारण कुछ सुधार की आहट मिली है।

वर्तमान में पमरिया समाज एक गहरे संकट से गुजर रहा है। वैश्वीकरण और मनोरंजन क्रांति के आधुनिक दौर ने पमरियों के गीत-नृत्य को अप्रासंगिक बना दिया है। इनकी व्यवसायिक उदासीनता का लाभ उठाकर अब किन्नर इनके पारंपरिक पेशे में सेंध लगा रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी इस पेशे से विमुख हो रही है क्योंकि इसमें न तो पैसा बचा है और न ही सामाजिक सम्मान। केवल कुछ वृद्ध कलाकार, जिनके पास कोई और विकल्प नहीं है, वे ही इसे ढो रहे हैं। डॉ. नूर हसन आजाद जैसे विद्वान, जो स्वयं इसी बिरादरी से आते हैं, इस समाज के भीतर जागृति लाने के लिए प्रयासरत हैं। उन्होंने नारा दिया है– ‘नाम बदलो, काम बदलो’। यह नारा दरअसल उस हीन भावना के खिलाफ एक युद्ध है जो सदियों से इस जाति के लोगों के मन में बिठा दी गई है। लेखक इस कड़वे सच को भी उजागर करते हैं कि कैसे इस जाति के लोग जब शिक्षित होकर सरकारी पदों पर पहुंचते हैं, तो समाज के डर से अपनी मूल पहचान छुपाकर ‘शेख’ या ‘खान’ जैसी उच्च जातियों का सरनेम अपना लेते हैं। यह एक गहरी सामाजिक विडंबना है कि जो कलाकार दूसरों के आंगन में खुशियां बांटता रहा है, वह अपने खुद के वजूद को लेकर इतना असुरक्षित है।

मधुबनी के ‘दीप’ जैसे गांवों में आज भी पमरिया समाज की कुछ आबादी शेष है, जहां शिक्षित युवा सम्मानजनक रोजगार के अभाव में अपने इस पुश्तैनी काम को ढोने के लिए मजबूर हैं।

बहरहाल, डॉ. अयुब राईन द्वारा संपादित यह पुस्तक महज़ एक सांस्कृतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि अशराफियत और सामंतवाद के गठजोड़ के खिलाफ एक पसमांदा ‘चार्जशीट’ है। यह चीख-चीख कर संदेश देती है कि यदि इस ‘अरज़ाल’ समाज को मंडल आयोग की मूल भावना और सामाजिक न्याय की मुख्यधारा से नहीं जोड़ा गया, तो ‘जुग जुग जीबओ’ की ये तानें सिर्फ खामोश नहीं होंगी, बल्कि एक समतामूलक समाज के हमारे दावों पर सवालिया निशान लगा देंगी।

समीक्षित पुस्तक का नाम : पमरिया
​संपादक : डॉ. अयुब राईन
​प्रकाशक : शशि प्रकाशन
​मूल्य : 375 रुपए

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अब्दुल्लाह मंसूर

लेखक पेशे से शिक्षक हैं और ‘पसमांदा डेमोक्रेसी’ नामक यूट्यूब चैनल के संचालक हैं

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