भारत में इस्लाम के प्रसार को लेकर प्रचलित ग़ैर-ऐतिहासिक आख्यानों के बीच, मुंशी प्रेमचंद का राजनीतिक लेखन एक महत्वपूर्ण वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। मुख्यतः कहानियों और उपन्यासों के लिए प्रसिद्ध इस साहित्यकार ने, अपने समकालीन हिंदू पुनरुत्थानवादियों से भिन्न दृष्टिकोण अपनाते हुए, इस्लाम को ‘विदेशी’ या ‘आक्रांता’ मज़हब मानने की धारणा को चुनौती दी। उन्होंने विशेष रूप से दलितों और अन्य हाशिये पर स्थित जातियों में इस्लाम की लोकप्रियता को उसकी समानतावादी विचारधारा से जोड़ा, जो जाति-आधारित सामाजिक संरचना के पीड़ितों के लिए “उद्धारक” का माध्यम बनी। इस्लाम के अनुयायियों के बीच औपचारिक समानता और न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को उन्होंने इसकी प्रमुख आकर्षक विशेषता के रूप में रेखांकित किया, साथ ही उस सांप्रदायिक विमर्श को खारिज किया, जिसके अनुसार भारत में इस्लाम का प्रसार ‘बल’ या ‘तलवार’ के भय से हुआ। तथापि, ‘ईदगाह’ जैसी अपनी मशहूर कहानी में, प्रेमचंद ने इस्लाम की धार्मिक समानता और मुस्लिम समाज की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता के बीच विद्यमान अंतर्विरोध को भी सूक्ष्मता से उजागर किया।
मुंशी प्रेमचंद ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत उर्दू से की थी और प्रारंभ में ‘नवाब राय’ के नाम से लेखन करते थे। 1910 में उनकी उर्दू कहानियों का संग्रह ‘सोज़-ए-वतन’ प्रकाशित हुआ, जिसे ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर लिया। इसके बाद वे धीरे-धीरे हिंदी की ओर प्रवृत्त हुए, और हिंदी साहित्य ने उन्हें ‘प्रेमचंद’ के रूप में अंतर्राष्ट्रीय पहचान और प्रतिष्ठा दिलाई। प्रेमचंद की प्रासंगिकता आज इसलिए भी है क्योंकि उन्होंने साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से उन सामाजिक मुद्दों पर कलम उठाई, जिन्हें उनके पहले के अधिकांश (सवर्ण) लेखकों ने नज़रअंदाज़ किया था।
उनके दौर से पहले हिंदी साहित्य में जादू, तिलिस्म और काल्पनिक घटनाओं को प्राथमिकता दी जाती थी[1], और लेखक प्रायः मध्यकालीन राजाओं व मुस्लिम बादशाहों के राजनीतिक संघर्षों को सांप्रदायिक दृष्टिकोण से चित्रित करते हुए किसी एक धार्मिक पक्ष की प्रशंसा करते थे।[2] ‘वीर रस’ के नाम पर साहित्य को कई मौक़ों पर एकपक्षीय और विभाजनकारी स्वरूप में प्रस्तुत किया जाता था। ख़ुद आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक – ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ – जिसे देश के सभी कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में पढ़ाया जाता है, में वीर रस की कविता के बारे में लिखा है कि “जिस समय से हमारे हिंदी साहित्य का अभ्युदय होता है, वह लड़ाई-भिड़ाई का समय था, वीरता के गौरव का समय था। और सब बातें पीछे छूट गईं थीं। वीर रस के साहित्य को सिलेबस में शामिल कर अक्सर ‘मुसलमानों के हमलों’ को निशाने पर लिया जाता है, जो सांप्रदायिक माहौल के लिए ज़मीन तैयार करती है।”[3]
लेकिन जब प्रेमचंद साहित्यिक मंच पर उभरे, तो उन्होंने आम इंसान के दुख-दर्द, गरीबी, अन्याय और सामाजिक यथार्थ को केंद्र में रखते हुए लेखन को जन-सरोकारों से जोड़ा और हिंदी साहित्य में यथार्थवाद तथा सामाजिक चेतना की एक नई धारा की शुरुआत की। उनकी भाषा सरल, सहज और संवेदनशील थी, जो आम लोगों को काफ़ी अपील करती थी। उन्होंने फ़ारसी, अरबी, संस्कृत, अंग्रेज़ी, भोजपुरी और अन्य भाषाओं के प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया। प्रेमचंद ने कभी अपने लेखन को किसी एक भाषा, धर्म या संस्कृति की सीमा में नहीं बांधा और अपने ज़माने के बाक़ी सवर्ण लेखकों से काफ़ी आगे थे। यही व्यापक दृष्टिकोण उनके साहित्य को विशिष्ट बनाता है।
प्रेमचंद ने सांप्रदायिकता और संकीर्ण राष्ट्रवाद का समर्थन नहीं किया[4], बल्कि इसके विपरीत, वे एक धर्मनिरपेक्ष, समावेशी और सामाजिक चेतना पर आधारित राष्ट्रवाद के पैरोकार थे। हालांकि, प्रेमचंद के कुछ लेख, जो 1920 के दशक में छपे, उनमें उन्होंने सांप्रदायिक इतिहास के विमर्श को कई मौक़ों पर जाने-अनजाने अपनी कलम से दुहराया है। उदाहरण के तौर पर, फ़रवरी, 1924 के एक लेख में मुसलमानों को उन्होंने हिंदुओं पर ‘ज़्यादतियां’ करने के लिए क़सूरवार माना है– “हमको यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि इन दोनों संप्रदायों के कशमकश, संदेह और घृणा की जड़ें इतिहास में हैं। मुस्लिम विजेता थे, हिंदू विजित। मुसलमानों की तरफ़ से हिंदुओं पर अक्सर ज़्यादतियां हुईं और यद्यपि हिंदुओं ने मौक़ा हाथ आ जाने पर उनका जवाब देने में कोई कसर नहीं रखी, लेकिन कुल मिलाकर यह कहना होगा कि मुसलमान बादशाहों ने सख़्त से सख़्त जुल्म किए।”[5]
यहां प्रेमचंद यह देखने में नाकाम रहे कि जो राजनीतिक लड़ाइयां हिंदू राजा और मुस्लिम बादशाह के बीच हुईं, उनका हिंदू और मुस्लिम समाज के आम लोगों से कुछ लेना-देना नहीं था। दूसरी बात यह भी है कि अंग्रेज़ी इतिहासकार जेम्स मिल ने भारत के इतिहास को धार्मिक आधार पर बांट दिया और प्राचीन भारत को ‘हिंदू’ दौर, जबकि मध्यकाल को ‘मुस्लिम’ दौर कहा। जेम्स मिल ने भारत की विविधता को नज़रअंदाज़ करते हुए इसे धार्मिक चश्मे से देखा और सांप्रदायिक विमर्श को फैलाने में बड़ी भूमिका अदा की।[6] ऐसा लगता है कि बाद के दिनों में प्रेमचंद के इस्लाम और हिंदू-मुस्लिम एकता के सवाल पर विचारों में परिवर्तन होने लगे। इसके पीछे शायद इलाहाबाद स्कूल और अन्य संस्थानों से सेक्युलर इतिहास का प्रसार एक बड़ी वजह हो सकती है। प्रेमचंद भी राजनीतिक झगड़ों से दूर इतिहास को सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से देखने लगे।
हालांकि प्रेमचंद की और भी सीमाएं हैं। विशेष रूप से दलितों और मुसलमानों के प्रतिनिधित्व और उनके सत्ता में हिस्सेदारी जैसे मुद्दों को वे पूरी तरह समझ नहीं सके।[7] कई अवसरों पर उन्होंने गांधीवादी राष्ट्रवाद की भाषा अपनाई है और रिजर्वेशन की जगह ‘योग्यता’ की बात की– “नौकरियों के लिए भी जाति या संप्रदाय की क़ैद नीति के विरुद्ध है। यहां तो योग्यता को ही प्रधानता मिलनी चाहिए।”[8]
प्रेमचंद का यह आयाम एक जटिल मामला है, जिस पर अलग से गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। प्रेमचंद के ऊपर वंचित समाज की ओर से यह भी आरोप लगता है कि उनकी लेखनी गांधीवादी नज़रिए से लिखी गई है, जो दलितों के संघर्ष के विभिन्न पहलुओं पर अक्सर बात नहीं करती। प्रेमचंद पर वंचित समाज द्वारा उठाए गए कई सवाल गंभीर हैं, मगर इस पर यहां विस्तृत चर्चा करना मुमकिन नहीं है।[9] इन सीमाओं के बावजूद, प्रेमचंद की हिंदू सांप्रदायिकता के विरोध के पहलू को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अपनी लेखनी में वे हिंदू महासभा और दूसरे कट्टर हिंदुत्ववादी विचारधाराओं के घोर विरोधी रहे। प्रेमचंद ने धर्म अथवा मज़हब के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव की स्पष्ट आलोचना की और इस्लाम सहित सभी धर्मों की मानवीय और नैतिक शिक्षाओं का सम्मान किया। अपने लेखन से उन्होंने मज़हबी संकीर्णता का विरोध किया और सर्व-धर्म समभाव की भावना को प्रोत्साहित किया।
इस्लाम और प्रेमचंद
बीसवीं सदी के आते-आते, सांप्रदायिक शक्तियां राजनीतिक लाभ के लिए इस्लाम को ‘हिंसा’ और ‘कट्टरता’ से जोड़कर प्रस्तुत करती थीं। लेकिन प्रेमचंद ने इस प्रकार के कम्युनल प्रोपेगेंडा को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि इस्लाम तलवार के बल पर नहीं फैला। नवंबर, 1931 में उन्होंने लिखा कि “तलवार के बल से कोई धर्म नहीं फैलता, और कुछ दिनों के लिए फैल भी जाए, तो चिरंजीवी नहीं हो सकता।”[10]
तलवार के सिद्धांत[11] को खारिज करते हुए, प्रेमचंद ने भारत में इस्लाम के फैलाव को जातिवादी सामाजिक व्यवस्था से जोड़ा, जिसमें निचली जातियों के लोगों को लगातार शोषण और अपमान का सामना करना पड़ता था। यही वजह थी कि निचली जातियों ने इस्लाम में अपनी मुक्ति की राह देखी। इस बिंदु पर उन्होंने लिखा कि “भारत में इस्लाम के फैलने का कारण, ऊंची जातिवाले हिंदुओं का नीची जातियों पर अत्याचार था। बौद्धों ने ऊंच-नीच का, भेद मिटाकर नीचों के उद्धार का प्रयास किया, और इसमें उन्हें अच्छी सफलता मिली, लेकिन जब हिंदू धर्म ने फिर ज़ोर पकड़ा, तो नीची जातियों पर फिर वही पुराना अत्याचार शुरू हुआ, बल्कि और ज़ोरों के साथ। ऊंचों ने नीचों से उनके विद्रोह का बदला लेने की ठानी। नीचों ने बौद्ध काल में अपना आत्मसम्मान पा लिया था। वह उच्चवर्गीय हिंदुओं से बराबरी का दावा करने लगे थे। उस बराबरी का मज़ा चखने के बाद, अब उन्हें अपने को नीच समझना दुस्सह हो गया। यह खींच-तान हो रही थी कि इस्लाम ने नए सिद्धांतों के साथ पदार्पण किया। वहां ऊंच-नीच का भेद न था। छोटे-बड़े, ऊंच-नीच की क़ैद न थी। इस्लाम की दीक्षा लेते ही मनुष्य की सारी अशुद्धियां, सारी अयोग्यताएं मानो धुल जाती हैं। वह मस्जिद में इमाम के पीछे खड़ा होकर नमाज़ पढ़ सकता था, बड़े-से-बड़े सैयद-ज़ादे के साथ एक दस्तरख़ान पर बैठकर भोजन कर सकता था। यहां तक कि उच्चवर्गीय हिंदू की दृष्टि में भी उसका सम्मान बढ़ जाता था। हिंदू अछूत से हाथ नहीं मिला सकता, पर मुसलमानों के साथ मिलने-जुलने में उसे कोई बाधा नहीं होती। वहां कोई नहीं पूछता, कि अमुक पुरुष कैसा, किस जाति का मुसलमान है। वहां तो सभी मुसलमान हैं। इसलिए नीचों ने इस नए धर्म का बड़े हर्ष से स्वागत किया, और गांव के गांव मुसलमान हो गए। जहां वर्गीय हिंदुओं का अत्याचार जितना ही ज़्यादा था, वहां यह विरोधाग्नि भी उतनी ही प्रचंड थी, और वहीं इस्लाम की खूब तबलीग़ भी हुई। कश्मीर, आसाम, पूर्वी बंगाल आदि इसके उदाहरण हैं। आज भी नीची जातियों में ग़ाज़ी मियां और ताज़ियों की पूजा बड़े श्रद्धा के साथ की जाती है। उनकी दृष्टि में इस्लाम विजयी शत्रु नहीं, उद्धारक था।”[12]
सेक्युलर इतिहास-लेखन
प्रेमचंद के विचारों में आए इस बदलाव के पीछे सेक्युलर इतिहासकारों का हस्तक्षेप भी एक वजह हो सकती है। सन् 1920 के दशक के उत्तरार्ध में, इतिहासकार ताराचंद ने अपने निबंधों के माध्यम से यह तर्क प्रस्तुत किया कि भारत में इस्लाम का प्रवेश शांतिपूर्ण तरीक़े से हुआ था। उनका मानना था कि इस्लाम दक्षिण में ‘शांतिपूर्वक’ और सिंध व उत्तर-पश्चिम में ‘बलपूर्वक’ प्रवेश करता है। उनके शब्दों में, “प्रथम काल [आठवीं से तेरहवीं शताब्दी तक] में इस्लाम ने दक्षिण भारत में शांतिपूर्वक और सिंध व उत्तर-पश्चिम में बलपूर्वक प्रवेश करना शुरू किया, और द्वितीय काल [तेरहवीं से अठारहवीं शताब्दी तक] में यह लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में प्रमुख शक्ति बन गया।”[13]
प्रोफेसर ताराचंद की तरह, इलाहाबाद स्कूल के अन्य इतिहासकारों ने सांप्रदायिक दृष्टिकोण को अस्वीकार किया और यह तर्क दिया कि मुस्लिम शासक, जिनमें मुगल भी शामिल थे, आक्रमणकारी नहीं थे, बल्कि उन्होंने भारत के राजनीतिक एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रेमचंद के लेख में प्रोफेसर मोहम्मद हबीब के शोध का उद्धरण भी मिलता है। यह संभव है कि प्रेमचंद धीरे-धीरे सेक्युलर इतिहासकारों के नए शोध से अवगत हो रहे हों। सेक्युलर विमर्श की ताक़त का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 1930 के आख़िरी दशक तक इतिहास को धार्मिक दृष्टिकोण से देखने के तरीक़ों पर गंभीर सवाल उठने लगे। हालांकि यह दूसरी बात है कि सेक्युलर नज़रिए से इतिहास को देखने का विमर्श ज़मीन पर नहीं उतर पाया और सांप्रदायिकता बढ़ती चली गई।

उस दौर में भारत में इस्लाम के प्रति मौजूद पूर्वाग्रहों को बौद्धिक चुनौती देने में मार्क्सवादी सिद्धांतकार एम.एन. रॉय का भी अहम योगदान रहा। हालांकि, रॉय से पहले प्रेमचंद और अन्य लेखकों ने ‘हिंसक’ इस्लाम के विमर्श के ख़िलाफ़ काफ़ी कुछ लिख दिया था, मगर रॉय का काम अधिक शोधपरक था। साल 1937 में उन्होंने इस्लाम पर एक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने यह तर्क दिया कि इस्लाम न तो भारत के लिए विदेशी था और न ही यह यहां हिंसक तरीक़े से आया। रॉय इस तथ्य की आलोचना करते हैं कि भारत में मुस्लिमों की संख्या इस्लामी देशों से अधिक है, फिर भी उन्हें ‘विदेशी’ कहा जाता है, जबकि वे सदियों से भारत में रह रहे हैं।
रॉय ने इस सवाल का भी जवाब दिया कि आख़िर इस्लाम भारत में इतनी तेज़ी से कैसे फैला? अपने शोध के माध्यम से रॉय ने इस सिद्धांत को खारिज किया कि इस्लाम कट्टरता के कारण फैला। इसके विपरीत, उन्होंने कहा कि इस्लाम ने उस समय निराशाजनक स्थिति में जनता को आशा दी, जब प्राचीन सभ्यताएं — यूनानी, रोमन, चीनी और भारतीय — पतन की ओर थीं। इसके साथ-साथ, उन्होंने इस्लाम को ‘सैन्य’ दृष्टिकोण से देखने की आलोचना करते हुए कहा कि अरब न तो बर्बर थे, न कट्टर, न हिंसक। विजय का काल अल्पकालिक था और उसके बाद खलीफ़ाओं के अधीन ज्ञान और संस्कृति का लंबा उत्कर्ष काल आया। एम.एन. रॉय के शब्दों में– “इस्लाम का उदय एक अभिशाप नहीं, बल्कि मानवजाति के लिए एक वरदान के रूप में सामने आता है।”[14] आगे वह कहते हैं कि भारत की मुस्लिम विजय को स्वदेशी कारकों ने भी सुगम बनाया। मुस्लिम भारतीय जनता की सहानुभूति और रज़ामंदी प्राप्त करने में सफल रहे। ब्राह्मणवाद ने बौद्धों को सताया था और उन्होंने मुस्लिमों के आगमन का स्वागत किया। इस तरह रॉय इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि भारत में इस्लाम का प्रसार शक्ति के कारण नहीं, बल्कि प्रगतिशील इस्लामी आस्था के कारण हुआ। उनके शब्दों में— “भारत में मुस्लिम सत्ता का सुदृढ़ीकरण आक्रमणकारियों की तलवार की वीरता से उतना नहीं हुआ, जितना कि इस्लामी आस्था के प्रसार और इस्लामी कानूनों के प्रगतिशील महत्व के कारण।”[15]
जाति-प्रथा और इस्लाम
रॉय से पहले, प्रेमचंद ने इस्लाम के भारत में आगमन के पीछे हिंसा के तर्क को ख़ारिज करते हुए उसके समानतावादी सामाजिक ढांचे की सराहना की। दूसरी तरफ़, प्रेमचंद जाति-प्रथा पर आधारित हिंदू समाज की ग़ैर-बराबरी से पूरी तरह वाक़िफ़ थे। उन्होंने अपनी कहानियों के ज़रिए दलित उत्पीड़न और ऊंची जातियों के भेदभाव को एक हद तक चित्रित किया है। जब वह हिंदू समाज की स्थिति की तुलना मुस्लिम समाज और इस्लामी तालीम से करते थे, तो दोनों के बीच का अंतर काफ़ी स्पष्ट नज़र आता था। इसी कड़ी में, प्रेमचंद ने इस्लाम को दलित मुक्ति का एक माध्यम तथा देश में सामाजिक बराबरी की लड़ाई में सहयोगी माना। प्रेमचंद ने कहा कि “जिन्हें [मुसलमानों को] हम अपना शत्रु समझते थे, उन्होंने वास्तव में दलितों का उद्धार किया है। हमारे जात-पांत के कठोर बंधनों को सरल किया है, और हमारी सभ्यता के विकास में सहायक हुए हैं।”[16]
हालांकि, दलित-बहुजन चिंतक डॉ. बी.आर. आंबेडकर और इरोड वेंकट रामासामी पेरियार ने हिंदू समाज के अंदर मौजूद ग़ैर-बराबरी पर जमकर लिखा और प्रेमचंद से कई क़दम आगे जाते हुए वंचित तबके को धर्म-परिवर्तन की भी सलाह दी। 8 अगस्त, 1929 को सत्यामंगलम में पैगंबर मुहम्मद के यौम-ए-विलादत [जयंती] के मौक़े पर पेरियार ने दलितों से अपील की कि वे इस्लाम धर्म क़बूल कर लें। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि “यह चांडालों [दलितों] का उद्धार कर सकता है। जिन लोगों को हम चांडाल कहकर ठुकराते हैं, उन्होंने मुस्लिम समाज में शरण पाई है और उन्हें सभी अधिकार दिए गए हैं… आज हमारे देश में यदि साढ़े छह करोड़ अछूत इस्लाम अपना लें, तो मैं दृढ़ता से कह सकता हूं कि अगले ही दिन भारत के हित में आवश्यक सरकार अस्तित्व में आ जाएगी…”[17]।
उन्हीं दिनों डॉ. आंबेडकर भी धर्म-परिवर्तन के बारे में संजीदगी से सोच रहे थे। 1935 तक आते-आते उन्होंने यह बात स्पष्ट कर दी थी कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था में दलितों को सामाजिक और नागरिक अधिकार नहीं मिलेंगे। हालांकि बौद्ध धर्म को अपनाने से पहले उन्होंने लगभग दो दशकों तक विचार और शोध किया। बंधुत्व की भावना के अभाव के कारण आंबेडकर दलितों के लिए धर्म-परिवर्तन को मुक्ति की राह मानते थे। आंबेडकर की जीवनी और उनके आंदोलन पर शोध करने वाली प्रख्यात इतिहासकार एलेनोर ज़ेलियट ने लिखा है कि “1929 में, नासिक और नागपुर के बीच रेलवे लाइन पर स्थित जलगांव नगर में, उन्होंने [आंबेडकर] कहा कि यदि अछूतों की सामाजिक बाधाएं दूर नहीं की जातीं, तो उन्हें अन्य धर्म अपनाने चाहिए। और एक महीने के भीतर, क्षेत्र के बारह महारों ने इस्लाम अपना लिया।”[18]
ईदगाह
प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ की प्रासंगिकता इस बात में निहित है कि वे इस्लाम द्वारा प्रतिपादित धार्मिक समानता और रोज़मर्रा के जीवन में व्याप्त सामाजिक-आर्थिक असमानता के बीच का तीखा विरोधाभास कितनी संवेदनशीलता से उजागर करते हैं। कहानी पांच वर्षीय हामिद की है। एक अनाथ बच्चा जो अपनी वृद्ध और निर्धन दादी अमीना के साथ रहता है। ईद के दिन, अमीना बड़ी मशक्कत से इतना प्रबंध कर पाती है कि खाने के लिए कुछ बना सके और हामिद को तीन आने दे सके ताकि वह ईदगाह मेले में जा सके। प्रेमचंद की सूक्ष्म दृष्टि का कमाल यह है कि ईदगाह में हर तबके के मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर नमाज़ पढ़ते हैं। यह दृश्य एकता और समानता का प्रतीक है, लेकिन यह समानता केवल क्षणिक साबित होती है। नमाज़ खत्म होते ही गरीबी और अमीरी की गहरी खाई फिर सामने आ जाती है। मेले में हामिद के संपन्न मित्र खिलौने और मिठाइयां ख़रीदते हैं, जबकि हामिद अपनी सीमित साधनों के कारण कुछ भी ख़रीद पाने में असमर्थ रहता है। त्रासदी तब और गहरी हो जाती है, जब बहुतायत में होने के बावजूद उसके मित्र भूखे और गरीब हामिद के साथ कुछ भी बांटने से इंकार कर देते हैं।
ईदगाह में मुसलमानों की धार्मिक-संस्कारगत एकता को प्रेमचंद ने इन शब्दों में चित्रित किया है– “यहां कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं।” प्रेमचंद ने गरीब हामिद, जिसके पास न जूते हैं और न मिठाई खाने के लिए पैसे, का वर्णन अमीर और भ्रष्ट अफ़सरों के साथ तुलना करते हुए किया है कि “शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरों के बग़ीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ो में आम और लीचियां लगी हुई हैं।”[19]
प्रेमचंद ने हामिद की बेवा दादी की ग़रीबी का ज़िक्र कर मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद आर्थिक विषमता को संवेदनशील तरीक़े से कुछ यूं पेश किया है कि “अमीना का दिल कचोट रहा है। गांव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है! उसे कैसे अकेले मेले में जाने दे? उस भीड़-भाड़ से बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यूं न जाने देगी। नन्हीं-सी जान! तीन कोस चलेगा कैसे! पैर में छाले पड़ जाएंगे। जूते भी तो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद में ले लेगी; लेकिन यहां सेवैइयां कौन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते-लौटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती। यहां तो घंटों चीज़ें जमा करते लगेंगे। मांगे ही का तो भरोसा ठहरा। उस दिन फ़हीमन के कपड़े सिले थे। आठ आने पैसे मिले थे। उस अठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए, लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गई तो क्या करती! हामिद के लिए कुछ नहीं है, तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही। अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में, पांच अमीना के बटवे में। यही तो बिसात है और ईद का त्यौहार, अल्लाह ही बेड़ा पार लगाए। धोबन और नाइन ओर मेहतरानी और चूड़ीहारिन सभी तो आएंगीं। सभी को सेवैइयां चाहिए और थोड़ा किसी को आंखों नहीं लगता। किस-किस से मुंह चुराएगी? और मुंह क्यों चुराए? साल भर का त्यौहार है। ज़िंदगी ख़ैरियत से रहे, उसकी तक़दीर भी तो उसी के साथ है। बच्चे को ख़ुदा सलामत रखे, दिन भी कट जाएंगे।”[20]
इस तरह हम पाते हैं कि प्रेमचंद की समग्र रचनाओं में इस्लाम के अंदर निहित बराबरी के पैग़ाम के प्रति आकर्षण भी है, और वे इसे स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं कि इस्लाम अपनाने के बाद लोगों को सामाजिक बराबरी का अनुभव हुआ। मगर, इसके साथ ही, वे मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद आर्थिक और सामाजिक ग़ैर-बराबरी को भी ईमानदारी से उजागर करते हैं कि धार्मिक सिद्धांतों की समानता की भावना वास्तविक जीवन में अक्सर सामाजिक-आर्थिक विषमता के सामने कमजोर पड़ जाती है।
साझी संस्कृति
जहां एक ओर डॉ. आंबेडकर और पेरियार ने धर्म-परिवर्तन की अहमियत पर ज़ोर दिया, वहीं प्रेमचंद ने अतीत में दलितों और अन्य वंचित समुदायों के दिलों में इस्लाम के प्रति मौजूद आकर्षण की बात दोहराई। ऐसा महसूस होता है कि प्रेमचंद का मुख्य उद्देश्य कट्टरपंथी और सांप्रदायिक शक्तियों के इस्लाम-विरोधी विमर्श को काटकर साझी विरासत के पहलुओं को रेखांकित करना था। प्रेमचंद के शब्दों में– “इस्लाम तलवार के बल से नहीं, बल्कि अपने धर्म-तत्वों की व्यापकता के बल से फैला। इसलिए फैला कि, उसके यहां मनुष्यमात्र के अधिकार समान हैं।”[21] हिंदू और मुस्लिम एकता की पैरवी करते हुए प्रेमचंद ने यह दावा भी किया कि “कर्बला के संग्राम में कुछ हिंदू योद्धाओं ने भी हज़रत हुसैन का पक्ष लेकर प्राणोत्सर्ग किए थे”।[22] इस तरह के तथ्यों के ऐतिहासिक प्रमाण मिलना कठिन है, मगर ऐसे विमर्श को सांप्रदायिक माहौल का मुक़ाबला करने के लिए कई बार सेक्युलर ताक़तें उपयोगी मानती हैं।
उस दौर में, जब हिंदुओं और मुसलमानों को दो अलग-अलग ‘राष्ट्र’ बताकर सांप्रदायिक राजनीति का ज़हर फैलाया जा रहा था, प्रेमचंद ने इसके विपरीत हिंदू-मुस्लिम साझा संस्कृति पर ज़ोर दिया। उन्होंने लिखा कि “हमें तो हिंदू और मुस्लिम संस्कृति में कोई ऐसा मौलिक भेद नहीं नज़र आता। अगर मुसलमान पाजामा पहनता है, तो पंजाब और सीमांत प्रांत के सारे हिंदू स्त्री-पुरुष पाजामा पहनते हैं।”[23]
प्रेमचंद के दौर में गांधी और अन्य धर्मनिरपेक्ष-राष्ट्रवादी नेता, इतिहासकार और समाजशास्त्री भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त करते रहे। उन्होंने देश की मिली-जुली सांस्कृतिक एकता पर बल देते हुए कहा कि विभिन्न धर्मों के मानने वाले लोग स्वभावतः एक-दूसरे के विरोधी नहीं होते। ‘हिंद स्वराज’(1910) में लिखते हुए गांधी – जिनका प्रभाव प्रेमचंद पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है – ने तर्क दिया कि “हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई, जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं एक-देशी, एक-मुल्की हैं, वे देशी-भाई हैं, और उन्हें एक-दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा। दुनिया के किसी भी हिस्से में एक राष्ट्र का अर्थ एक-धर्म नहीं किया गया है; हिंदुस्तान में तो ऐसा था हीं नहीं।”[24] धर्म के आधार पर हो रहे झगड़े को ख़ारिज करते हुए, गांधी आगे कहते हैं कि “बहुतेरे हिंदुओं और मुसलमानों के बाप-दादे एक ही थे, हमारे अंदर एक ही खून है। क्या केवल धर्म बदल जाने से हम आपस में दुश्मन बन गए? धर्म तो एक ही जगह पहुंचने के अलग-अलग रास्ते हैं। हम दोनों अलग-अलग रास्ते लें, इससे क्या हो गया? उसमें लड़ाई काहे की?”[25]
प्रेमचंद ने अपने विचारों को मज़बूत करने के लिए इतिहास की शोध-आधारित व्याख्या का सहारा लिया। उन्होंने प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर मोहम्मद हबीब के कार्यों का हवाला[26] देते हुए यह स्पष्ट किया कि मध्यकाल की लड़ाइयां सामूहिक तौर पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नहीं थीं। उन्होंने उदाहरण दिया कि अफ़गानों ने राय पृथ्वीराज के पक्ष में युद्ध लड़ा, मराठों ने पानीपत की लड़ाई में मुसलमानों की मदद की, और यह नहीं भूलना चाहिए कि 1857 की क्रांति में हिंदू और मुसलमान मिलकर बहादुर शाह ज़फ़र को अपना नेता मानकर लड़े थे। प्रेमचंद ने इस विचार को भी ख़ारिज किया कि उर्दू किसी एक धर्म की भाषा है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि उर्दू की उन्नति में हिंदू और मुसलमान दोनों लेखकों का योगदान है। उन्होंने उर्दू को सांप्रदायिक चश्मे से देखने की प्रवृत्ति की आलोचना की। इसी तरह, उन्होंने गोहत्या के नाम पर होने वाली मुस्लिम-विरोधी राजनीति की भी आलोचना की और स्पष्ट शब्दों में कहा– “हमें अख़्तियार है, हम गौ की पूजा करें, लेकिन हमें यह अख़्तियार नहीं है, कि हम दूसरों को भी गउ-पूजा के लिए बाध्य कर सकें।”[27]
सेक्युलर राष्ट्रवाद
सेक्युलर राष्ट्रवादी आंदोलन धर्म पर आधारित संकीर्ण और उग्र राष्ट्रवाद का विरोधी रहा है। जहां दो-राष्ट्र के सिद्धांत की बात करने वाले धार्मिक पहचान पर ज़ोर देते हैं और एक धार्मिक समुदाय के अंदर मौजूद ग़ैर-बराबरी पर पर्दा डाल देते हैं, वहीं सेक्युलर राष्ट्रवाद धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर नागरिकों के बीच समानता की बात करता है। सेक्युलर राष्ट्रवाद के पैरोकार प्रेमचंद को इस बात की आशा थी कि “सांप्रदायिकता बहुत थोड़े दिनों की मेहमान है। भारत के सिवा कदाचित् संसार में उसे और कहीं शरण नहीं मिल सकती, इसीलिए वह निराशाजनित शक्ति के साथ इस आधार को पकड़े हुए है। आनेवाला युग आर्थिक संग्राम का युग होगा। हिंदू कौन है, मुसलमान कौन है, इसे कोई पूछेगा भी नहीं।”[28] मगर ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि सांप्रदायिकता आज भी समाज के सामने एक गंभीर ख़तरा बनी हुई है। कुछ इसी तरह का दृष्टिकोण भारत की मार्क्सवादी विचारधारा में भी देखने को मिलता है, जहां जाति के सवाल को इस आधार पर नज़रअंदाज़ किया गया कि आर्थिक असमानताओं के समाप्त हो जाने पर जातिगत भेदभाव अपने आप समाप्त हो जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। राष्ट्रीयता और राष्ट्र-निर्माण के नाम पर अक्सर वंचित तबकों के अधिकारों की अनदेखी की गई, और समाज में मौजूद जातीय, वर्गीय व लैंगिक विषमताओं को दूर किए बिना दक्षिणपंथी शक्तियों का प्रभाव कम नहीं किया जा सका।
जो सीमाएं सेक्युलर राष्ट्रवाद में दिखाई देती हैं, वैसी ही कुछ सीमाएं प्रेमचंद के विचारों में भी मौजूद हैं। यह विमर्श अक्सर राष्ट्र के नाम पर और भारतीयता की पहचान की आड़ में सामाजिक न्याय के सवाल को पीछे धकेल देता है। डॉ. आंबेडकर और अन्य दलित-बहुजन चिंतकों के स्वाधीनता आंदोलन के नेताओं से मतभेद का मुख्य कारण भी यही था। जहां बहुजन नायक राष्ट्र के भीतर वंचित तबकों की हिस्सेदारी को लेकर चिंतित थे, वहीं राष्ट्रीय आंदोलन के नेता सत्ता-परिवर्तन को ही अपना मुख्य उद्देश्य मान बैठे थे। उनके नज़दीक जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी पर सवाल उठाना, राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के बराबर समझा जाता था।
जहां एक ओर प्रेमचंद हिंदू-मुस्लिम एकता की वकालत करते नहीं थकते थे, वहीं ब्रिटिश हुकूमत द्वारा दलितों और मुसलमानों को दिए गए सांप्रदायिक मताधिकार को वे नकारात्मक दृष्टि से देखते थे। 22 अगस्त, 1932 को प्रकाशित अपने एक लेख में प्रेमचंद ने लिखा कि “कंज़र्वेटिव गवर्नमेंट की सांप्रदायिक मताधिकार विषयक विज्ञप्ति ने हिंदुओं को बहुत असंतुष्ट कर दिया है”। इतना ही नहीं, उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के उस दृष्टिकोण पर भी घोर आपत्ति जताई, जिसमें, उनके अनुसार, वह भारत को सांप्रदायिक नज़र से देखती है। प्रेमचंद के शब्दों में– “सांप्रदायिक भेद की नीति ही आपत्तिजनक है। गवर्नमेंट भारत को राष्ट्र नहीं समझती। हम अपने व्यवहार से उसे ऐसा समझने का अवसर भी नहीं देते। वह भारत को संप्रदायों की दृष्टि से देखती है”।[29] वहीं, आंबेडकर इस बात को मानने को तैयार नहीं थे कि भारत जैसे देश में, समाज जातिगत ग़ैर-बराबरी और गहरे पूर्वाग्रह पर आधारित है, कोई भी व्यक्ति – जो किसी-न-किसी जाति से संबंध रखता है – अपने जातिगत हितों से ऊपर उठकर सभी के कल्याण की बात करेगा। आज़ादी मिलने से ठीक पहले, डॉ. आंबेडकर ने अखिल भारतीय अनुसूचित जाति परिसंघ की ओर से संविधान सभा को प्रस्तुत एक ज्ञापन (जो बाद में “राज्य और अल्पसंख्यक” नामक पम्फलेट के रूप में प्रकाशित हुआ) में साफ़ तौर पर कहा था कि “भारत जैसे देश में जहां अधिसंख्य लोग सांप्रदायिक वृत्ति के हैं, यह आशा करना कठिन है कि जो लोग सत्ता में होंगे, उन लोगों के साथ समान व्यवहार करेंगे जो उनके संप्रदाय के नहीं हैं”।[30] यही कारण था कि आंबेडकर, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा को लोकतंत्र की सफलता का असली पैमाना मानते थे। उनका स्पष्ट मत था कि वंचित समाज को प्रभावी और अनुपातिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। इसके विपरीत, प्रेमचंद और राष्ट्रीय आंदोलन के अन्य सवर्ण नेताओं का एक बड़ा वर्ग, अल्पसंख्यकों के लिए दिए गए विशेष प्रावधानों को संदेह की नज़र से देखता था और उन्हें मज़बूत राष्ट्र-निर्माण में बाधा मानता था।
हालांकि यह भी सत्य है कि बतौर साहित्यकार प्रेमचंद ने समाज और समाज में होने वाले बदलावों काे दर्ज किया। विशेषकर, 1932 के बाद अपनी रचनाओं में वे जिस समाज का चित्रण करते हैं, उसकी बुनियाद में सेक्युलरिज्म तो रहा ही, जातिवाद की बेड़ियों में जकड़े समाज की अंतहीन पीड़ा भी रही। उनकी रचना ‘गोदान’ (1936) इसका मुकम्मल उदाहरण है, जिसमें जाति से मुक्ति की लालसा है और ऐसा प्रतीत होता है कि इसे प्रेमचंद राष्ट्र-निर्माण के लिए सबसे अधिक अनिवार्य मानने लगे थे।
निष्कर्ष
इस्लाम के बारे में प्रेमचंद के विचार विशेष महत्व रखते हैं, क्योंकि उनके समय में ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ की सांप्रदायिक आग तेजी से भड़क रही थी। हिंदू समाज के सांप्रदायिक नेता भारत के प्राचीन काल को ‘स्वर्ण युग’ कहकर उसका महिमामंडन करते थे और उसे हिंदू धर्म से जोड़कर देखते थे, जबकि उनके दृष्टिकोण में मुस्लिम शासन का दौर एक ‘अंधकार युग’ था। वे अंग्रेज़ी शासन को अपना उद्धारक मानते थे, क्योंकि उनके अनुसार अंग्रेज़ों ने उन्हें मुस्लिमों के ‘अत्याचारों’ से मुक्ति दिलाई थी। दूसरी ओर, मुस्लिम समाज के सांप्रदायिक तत्व स्वयं को ‘हुक्मरान क़ौम’ समझते थे, क्योंकि वे अपनी पहचान को मुस्लिम सल्तनत से जोड़कर गौरव का अनुभव करते थे।
हालांकि, ज़मीनी सच्चाई इन दोनों सांप्रदायिक कथाओं से बिल्कुल अलग थी। भारत केवल हिंदुओं और मुसलमानों का देश नहीं है, बल्कि यह जैन, बौद्ध, ईसाई, पारसी और कई अन्य धर्मों के अनुयायियों का भी घर है, जिसका इतिहास जितना आर्य या इस्लामी प्रभाव से जुड़ा है, उतना ही यह तमिल, द्रविड़ और आदिवासी सभ्यताओं का भी इतिहास है। इस देश के आदिवासियों की अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराएं और पहचान हैं। लेकिन अक्सर मुख्यधारा के धार्मिक समुदायों की नज़र में वे हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं और उनकी अस्मिता को मान्यता तक नहीं मिलती। सांप्रदायिक लेखक और नेता प्रायः राजनीतिक इतिहास को अनावश्यक रूप से प्राथमिकता देते हैं, जबकि सामाजिक और आर्थिक इतिहास को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, और यहीं प्रेमचंद अपने समकालीन लेखकों से अलग और आगे नज़र आते हैं, क्योंकि उन्होंने समाज को न केवल राजनीतिक या धार्मिक चश्मे से, बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से देखा, और यही दृष्टिकोण उन्हें हिंदी साहित्य में प्रगतिशील चिंतन की आधारशिला रखने वाला साहित्यकार बनाता है।
संदर्भ :
[1] 1936 में लखनऊ में आयोजित ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की पहली बैठक में प्रेमचंद ने अध्यक्षीय भाषण दिया, जिसका शीर्षक था “साहित्य का उद्देश्य”। इस भाषण में उन्होंने लेखकों से सामाजिक मुद्दों पर लिखने का आग्रह करते हुए कहा कि “साहित्य उसी रचना को कहेंगे जिसमें कोई सच्चाई प्रगट की गई हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित एवं सुंदर हो और जिसमें दिल और दिमाग़ पर असर डालने का गुण हो। और साहित्य में यह गुण पूर्ण रूप से उसी अवस्था में उत्पन्न होता है, जब उसमें जीवन की सच्चाइयां और अनुभूतियां व्यक्त की गई हों। तिलस्माती कहानियों, भूत-प्रेत की कथाओं और प्रेम वियोग में आख्यानों से किसी ज़माने में हम भले ही प्रभावित हुए हुए हों, पर अब उनमें हमारे लिए बहुत कम दिलचस्पी है।”
[2] मध्यकाल के इतिहास को सेक्युलर तरीक़े से समझाने के लिए प्रोफेसर सतीश चंद्र का काम काफ़ी अहम है। उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की है कि मध्यकाल में जो झगड़े धार्मिक दिखते थे, उनके तार सामाजिक और आर्थिक पहलुओं से जुड़े हुए थे। देखे, सतीश चंद्र, हिस्ट्री ऑफ़ मीडीवल इंडिया, ओरिएंट ब्लैकस्वान, हैदराबाद, 2019.
[3] आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ, 35-36.
[4] प्रेमचंद ने हिंदू महासभा द्वारा जाति के सवाल को नज़रअंदाज़ करने की आलोचना की है। उन्होंने हिंदू महासभा के दिल्ली अधिवेशन के बाद लिखा कि “देश के सामने इस समय सबसे बड़ा प्रश्न समाज से ऊंच-नीच, छूत-अछूत के भेद को मिटाना है। आज आवेश में कुछ मंदिर खोल दिये गये, और दो-एक जगह भेद-रहित भोज कर दिये गये, इससे यह कदापि न समझना चाहिए कि यह भाव हिंदू समाज से निकल गया। अभी तो केवल बीज पड़ा है। फल-फूल लगने तक बड़े-बड़े साधन करने पड़ेंगे, गोड़ना, सींचना, जानवरों से बचाना यह सभी क्रियाएं पड़ी हुई हैं। ज़रा भी बेपरवाही या असावधानी हुई और पौधा सूखा। हिंदू महासभा ने इस महत्वपूर्ण विषय को स्पर्श तक नहीं किया”। स्रोत : प्रेमचंद, ‘हिंदू-महासभा की निष्क्रियता’, 5 अक्टूबर, 1932, प्रेमचंद के विचार, खंड 1, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृष्ठ 371.
[5] प्रेमचंद, मनुष्य का अकाल, जमाना, फ़रवरी 1924, प्रेमचंद के विचार, खंड 1, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृष्ठ 342.
[6] रोमिला थापर, हरबंस मुखिया और बिपन चंद्र, कम्युनलिज़्म एंड द राइटिंग ऑफ़ इंडियन हिस्ट्री, पीपल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 1977
[7] जया चटर्जी, बंगाल डिवाइडेड: हिन्दू कम्युनलिज़्म एंड पार्टिशन 1932-1947, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, कैम्ब्रिज, 2025.
[8] प्रेमचंद, ‘राष्ट्रीयता की विजय’, 26 जून 1932, प्रेमचंद के विचार, खंड 1, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृष्ठ 378.
[9] कुछ दलित लेखकों ने प्रेमचंद के कार्य की आलोचना इस आधार पर की है कि उसमें दलित दृष्टिकोण का अभाव है, क्योंकि उनके पास दलित होने का व्यक्तिगत अनुभव नहीं था। इन मुद्दों की संक्षिप्त पड़ताल के लिए देखें, सारा बेथ हंट, हिंदी दलित लिटरेचर एंड द पॉलिटिक्स ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेशन, राउटलेज, न्यू दिल्ली, 2014.
[10] प्रेमचंद, प्रेमचंद के विचार, खंड 1, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृष्ठ 364
[11] इतिहासकार रिचर्ड ईटन ने तलवार या बल प्रयोग से इस्लाम के प्रसार के मिथक को खारिज किया है। अधिक जानकारी के लिए देखें—
रिचर्ड एम. ईटन, ‘एप्रोचेज़ टू द स्टडी ऑफ कन्वर्ज़न टू इस्लाम इन इंडिया’ इन रिचर्ड सी. मार्टिन एड., एप्रोचेज़ टू इस्लाम इन रिलीजियस स्टडीज़, यूनिवर्सिटी ऑफ एरिज़ोना प्रेस, टक्सन, 1985, पृ. 106-123.
[12] प्रेमचंद, प्रेमचंद के विचार, खंड 1, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृष्ठ 364-365.
[13] ताराचंद, इन्फ्लुएंस ऑफ इस्लाम ऑन इंडियन कल्चर, इंडियन प्रेस, इलाहाबाद, 1963, पृष्ठ xiv
[14] एम.एन. रॉय, द हिस्टोरिकल रोल ऑफ इस्लाम: एन एसे ऑन इस्लामिक कल्चर, वोरा एंड को. पब्लिशर्स लि., बॉम्बे, 1937, पृष्ठ 75.
[15] वही, पृष्ठ 104
[16] प्रेमचंद, प्रेमचंद के विचार, खंड 1, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृष्ठ 366.
[17] एस. अनवर, ‘तमिल मुस्लिम्स एंड द द्रविडियन मूवमेंट: अलायंस एंड कॉन्ट्राडिक्शन्स, विनोद के. जैराथ (संपादित), फ्रंटियर्स ऑफ एम्बेडेड मुस्लिम कम्युनिटीज इन इंडिया, रूटलेज, नई दिल्ली, 2011, पृष्ठ 207-217.
[18] एलेनोर ज़ेलियट, अम्बेडकर’स वर्ल्ड: द मेकिंग ऑफ बाबासाहेब एंड द दलित मूवमेंट, नवयाना, नई दिल्ली, 2013, पृष्ठ 145
[19] प्रेमचंद, ‘ईदगाह’, मानसरोवर, खंड 1, लोकभारती पेपरबैक, नई दिल्ली, 2020.
[20] वही
[21] प्रेमचंद, प्रेमचंद के विचार, खंड 1, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृष्ठ 365.
[22] प्रेमचंद, ‘कर्बला’, माधुरी, 1 जनवरी 1925, प्रेमचंद के विचार, खंड 1, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृष्ठ 347.
[23] प्रेमचंद, प्रेमचंद के विचार, खंड 1, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृष्ठ 365.
[24] एम.के. गांधी, हिन्द स्वराज, नवजीवन पब्लिकेशन, अहमदाबाद, 2006, पृष्ठ 42-27.
[25] वही
[26] पॉलिटिक्स एंड सोसाइटी ड्यूरिंग द अर्ली मीडीवल पीरियड: कलेक्टेड वर्क्स ऑफ प्रोफेसर मोहम्मद हबीब, एडिटेड बाय खालिक अहमद निजामी, इन टू वॉल्यूम्स (न्यू दिल्ली, पीपल्स पब्लिशिंग हाउस, वॉल्यूम 1 इन 1974 एंड वॉल्यूम 2 इन 1981)
[27] प्रेमचंद, प्रेमचंद के विचार, खंड 1, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृष्ठ 366.
[28] प्रेमचंद, ‘राष्ट्रीयता की विजय’, 26 जून 1932, प्रेमचंद के विचार, खंड 1, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृष्ठ 378.
[29] प्रेमचंद, प्रेमचंद के विचार, खंड 1, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृष्ठ 369.
[30] बी.आर. अंबेडकर, ‘राज्य और अल्पसंख्यक’, बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर: संपूर्ण वाङ्मय, खंड 2, डॉ. अंबेडकर प्रतिष्ठान, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, नई दिल्ली, पृष्ठ 178
(संपादन : नवल/अनिल)
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