गौहर रज़ा की ‘मिथकों से विज्ञान तक : ब्रह्मांड के विकास की बदलती कहानी’ विज्ञान को समझने की पहली किताब है। इस किताब को बेस्ट सेलर का ख़िताब प्राप्त है, जो 2024 में ‘पेंगुइन स्वदेश’ से प्रकाशित हुई थी। गौहर रज़ा वैज्ञानिक हैं, और उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा वैज्ञानिक सोच को देश भर के लोगों तक पहुंचाने में व्यतीत हुआ है। वह पहले वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने देश में विज्ञान की सार्वजनिक सोच पर शोध की शुरुआत की। वह विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक जर्नल्स के संपादक मंडल में शामिल हैं। वैज्ञानिक संचार पर उनके शोधों, लेखों और किताबों की सूची लंबी है। विज्ञान पर हिंदी में यह उनकी पहली किताब है, जिसे उन्होंने हिंदी में ही लिखा है, इसके बावजूद कि उनकी शिक्षा उर्दू और अंग्रेज़ी में हुई है। यह किताब उन्होंने उन वैज्ञानिकों को समर्पित की है, जो रूढ़िवादियों द्वारा शहीद कर दिए गए।
यह किताब छह अध्यायों में विभाजित है। पहला अध्याय है– ‘विज्ञान क्या है?’ वह कहते हैं, “इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने से पहले हमें इसकी सीमा निर्धारित करनी होगी कि किस ज्ञान को हम विज्ञान मानते हैं। साथ ही यह भी तय करना होगा कि किस तरह का ज्ञान विज्ञान की हद से बाहर है।” उनके अनुसार, “इस सवाल और इसके जवाब की जड़ें इतिहास में कहीं ज़्यादा गहरी हैं। आधुनिक विज्ञान से जुड़े हुए मुद्दों पर बहस की शुरुआत अरब और यूरोप में 13वीं-14वीं शताब्दी में ही हो गई थी। अगली छह शताब्दियों तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी में तेज़ बदलाव आए और साथ ही यह बहस भी जारी रही कि हम किस ज्ञान को विज्ञान कहेंगे और किसको नहीं। 19वीं-20वीं सदी में यह बहस तेज़ होती गई। हालांकि 16वीं-17वीं सदी में, यूरोप में आधुनिक विज्ञान का जन्म हो चुका था।”
इतिहास में विज्ञान की बहस की झलक तब से मिलती है, जब विज्ञान ज्ञान की एक अलग शाखा के रूप में अस्तित्व में भी नहीं आया था। गौहर रज़ा के अनुसार, “चार्वाक (लगभग 600 ईसा पूर्व), सुकरात (470-399 ईसा पूर्व), गौतम बुद्ध (लगभग 400 ईसा पूर्व), अरस्तु (384-322 ईसा पूर्व) और हसन इब्न-अल-हेथम (965-1040 ईस्वी) जैसे कई विद्वान विचारक अपने-अपने तरीक़े से जब ‘ज्ञान क्या है’ के सवाल पर अपनी राय रखते हैं, तो वे वैज्ञानिक जानकारी और उसको परखने के तरीक़ों को परिभाषित करते नज़र आते हैं। ऐसी परिभाषाएं यह भी दावा करती हैं कि एक ख़ास कसौटी पर कसी हुई जानकारी ही ‘सत्य’ होती है।” इसी क्रम में रज़ा साहब लोकायत दर्शन के छह सिद्धांतों का भी उल्लेख करते हैं– “(1) प्रत्यक्ष बोध ही सत्य को स्थापित करने और स्वीकार करने का एकमात्र तरीक़ा है; (2) इंद्रियों द्वारा जो अनुभव किया और समझा नहीं जा सकता, वह मौजूद नहीं है; (3) जो कुछ भी मौजूद है, वह वायु, पृथ्वी, अग्नि और जल के अवलोकनीय तत्वों से बना है; (4) जीवन में परम अच्छाई ख़ुशी है, एकमात्र बुराई दुख और दर्द हैं; (5) सुख प्राप्त करना और दर्द से बचना ही मानव अस्तित्व का एकमात्र उद्देश्य है; और (6) धर्म उस बलवान और चतुर व्यक्ति का आविष्कार है, जो कमज़ोरों का शिकार करता है।”
अरस्तु के सिद्धांत को परिभाषित करते हुए वह लिखते हैं, “अरस्तु का मानना था कि सृष्टि में जो कुछ भी घटता है, उसके पीछे कोई-न-कोई कारण ज़रूर होता है। उनका यह फ़लसफ़ा ‘कारण और प्रभाव’ के सिद्धांत के नाम से आज भी मशहूर है। इसके बावजूद कि विज्ञान को, उस दौर में, दर्शन से अलग नहीं माना जाता था, अरस्तु का ‘कारण और प्रभाव’ का सिद्धांत विज्ञान को परिभाषित करने की दिशा में एक अहम क़दम था। अरस्तु के मुताबिक़, अगर किसी घटना को समझना है, तो यह भी समझना होगा कि उसके पीछे क्या कारण है; दूसरे शब्दों में घटना को चमत्कार, दैवीय शक्ति और भगवान की माया कहना काफ़ी नहीं है।”
इसी तरह वह अल-हसन इब्न अल-हेथम के बारे में लिखते हैं कि “अल-हसन वैज्ञानिक पद्धति की परिभाषा देने वाले पहले वैज्ञानिक माने जाते हैं। उन्होंने ही पहली बार स्पष्ट शब्दों में कहा था कि सच को सच के लिए तलाश किया जाना चाहिए। जो कोई भी सच जानना चाहता है, उसे अपने आप को किसी भी दावे का दुश्मन-आलोचक मानकर उस दावे के हर पहलू पर हमला करना चाहिए, चाहे वह दावा ख़ुद ही क्यों न किया गया हो। अगर वह यह रास्ता अपनाएगा, तो दावे की सारी ख़ामियां और सच ख़ुद ही उजागर हो जाएगा।”
आगे गौहर रज़ा कहते हैं कि “इसके लगभग एक सदी बाद थॉमस कुहन की किताब ‘द स्ट्रक्चर ऑफ़ साइंटिफ़िक रिवोल्यूशंस’ में विज्ञान को एक नई नज़र से देखा गया। कुहन ने कहा कि विज्ञान को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। एक, जिसे हम साधारण या आम विज्ञान कह सकते हैं, जो एक निर्धारित प्रतिमान के तहत आता है। दूसरा क्रांतिकारी विज्ञान, जो प्रतिमान में भी परिवर्तन लाता है। जब प्रतिमान बदलता है, तो सोच के सारे पैमाने बदल जाते हैं।” इन दोनों विज्ञानों में जो अंतर है, उसे स्पष्ट करते हुए रज़ा साहब लिखते हैं कि “आम विज्ञान को इस तरह समझा जा सकता है कि जैसे धरती स्थिर है और सूरज, चांद, तारे उसका चक्कर लगा रहे हैं। यह प्राकृतिक घटनाओं को समझने का एक मॉडल था। पर इस मॉडल में कई अनसुलझी गुत्थियां थीं, जैसे ग्रहण कैसे लगता है, और अगला ग्रहण कब लगेगा या कुछ पिंड अलग गति से क्यों चलते हैं, या चांद और सूरज पृथ्वी से कितनी दूर हैं – इन तथ्यों का अनुमान लगाना, इन गुत्थियों को सुलझाना कुहन के हिसाब से साधारण विज्ञान है।’ लेकिन ‘क्रांतिकारी विज्ञान’, कुहन के अनुसार, ‘वह है, जो पुरानी समझ और सोच, दोनों के ढांचे को तोड़कर एक नया ढांचा खड़ा करता है। इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि कीटाणु और वायरस की खोज ने एक ऐसा इंकलाब पैदा किया, जिसने पुराने विचारों, खोज के तरीक़ों को देखने की दृष्टि को पूरी तरह बदल दिया। अगर हमें यह पता न चलता कि आंखों से न दिखाई देने वाला एक पूरा ब्रह्मांड मौजूद है, तो न तो हम आज की मेडिकल साइंस तक पहुंच पाते और न ही डार्विन के विकास के सिद्धांत की पुख़्ता तरीक़े से पुष्टि हो पाती। डार्विन का विकास का सिद्धांत ख़ुद क्रांतिकारी विज्ञान का उदाहरण है। डार्विन के सिद्धांत ने जीवन की उत्पत्ति के सारे पुराने मॉडल, सारे पुराने किस्से ध्वस्त कर दिए।”
विज्ञान परिवर्तनवादी है। वह एक धारणा या एक मान्यता पर स्थिर नहीं है। गौहर रज़ा कहते हैं कि विज्ञान की शोध रुकती नहीं है, वह अपने निष्कर्षों को बार-बार परखता है। इस परख में विज्ञान अपने पुराने निष्कर्ष को निरस्त भी करता है। वह लिखते हैं कि बीसवीं सदी के मध्य तक विज्ञान ने लाखों ऐसे कीटाणु और कीड़ों की पहचान कर ली थी, जिनके कारण फ़सलों, जानवरों और इंसानों में बीमारियां फैलती थीं। इन्हें रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने 1939 में डीडीटी की खोज कर ली थी। डीडीटी का प्रयोग दुनिया भर में हुआ, और इसने ज़्यादातर जगह मलेरिया और टाईफ़स जैसी बीमारियों पर क़ाबू पाने में मदद भी की। कुछ दशकों बाद वैज्ञानिकों ने फिर अनुसंधान किया और यह पाया कि डीडीटी का प्रयोग इंसानों और जानवरों के लिए बहुत ख़तरनाक है और इसका उत्पादन बंद कर देना चाहिए, और ज़्यादातर देशों ने उत्पादन बंद भी कर दिया।
अध्याय के अंत में रज़ा साहब लिखते हैं, “हमें अगर विज्ञान की परिभाषा तलाश करनी है, तो काफ़ी संघर्ष करना होगा। उन सारी जटिलताओं से गुज़रना होगा, जिनसे हाेकर विज्ञान गुज़रा है। धर्म और विज्ञान के रिश्ते में जो बदलाव आए हैं, उन पर भी नज़र डालनी होगी। विज्ञान के इतिहास के पन्ने भी पलटने होंगे और दर्शन के भी।”
दूसरा अध्याय : ‘आम नागरिक की नज़र में विज्ञान’
दूसरे अध्याय में गौहर रज़ा ने इलाहाबाद में होने वाले कुंभ मेले के दौरान लगातार तीस साल तक किए जाने वाले एक सर्वे के हवाले से लिखा है कि कुंभ में आने वाले लोगों से जब यह पूछा गया कि “आप विज्ञान को उन्नति का रास्ता मानते हैं या विनाश का, तो इस सवाल के जवाब में 75 प्रतिशत लोगों का कहना था कि वे विज्ञान को उन्नति का रास्ता मानते हैं, लेकिन जिन लोगों ने यह कहा कि वे विज्ञान को विनाश का रास्ता मानते हैं, उनकी संख्या 3.8 प्रतिशत थी। और जब यह सवाल पूछा गया कि आप वैज्ञानिकों को आदर की नज़र से देखते हैं या घृणा से, तो 74.5 प्रतिशत लोगों का कहना था ‘आदर से’ और 1.9 प्रतिशत ने कहा घृणा से। यह सर्वे हमें बताता है कि देश के आम नागरिक का वैज्ञानिक जानकारी का स्तर भी लगातार बढ़ रहा है।”
वह इस बात को मानते हैं कि “आम नागरिक की विचार-संरचना में धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों तरह के विचार पनपते हैं। सोच के इस ढांचे में अंधविश्वासों के बसने की भी एक जगह होती है, और उसे इन विपरीत विचारों में कोई द्वंद्व या विरोधाभास नहीं महसूस होता। अपनी दिनचर्या में वह लगातार तर्कवादी होता है, पर कुछ ख़ास हालात में धार्मिक, आध्यात्मिक, यहां तक कि अंधविश्वासी भी हो जाता है।” यहां वह एक मार्के की बात कहते हैं कि “कोई तांत्रिक या मौलवी दूसरों से किसी दूसरों की बलि भले ही दिलवा दे, पर वह अपनी बलि कभी नहीं देता। यह भी हो सकता है कि किसी तांत्रिक या मौलवी की आस्था अंविश्वास में न हो, पर वह अंधविश्वास का बाज़ार गर्म रखता है।”
वह एक कार्यशाला का उल्लेख करते हैं, जिसमें उन्होंने प्रतिभागियों से यह लिखने को कहा कि विज्ञान शब्द सुनकर उनके दिमाग़ में क्या-क्या चित्र उभरते हैं? उन्हें जवाब में जो शब्द मिले, वे हैं– डीएनए, माइक्रोस्कोप, टेलीस्कोप, राकेट, बम, रसायन, दाढ़ी और बिखरे बालों वाला आदमी, फ़िल्टर, कीटनाशक, फ़ैक्ट्री से निकलता धुआं, इत्यादि। इसका अर्थ है कि हर व्यक्ति अपने दायरे में विज्ञान की आंशिक समझ रखता है और उसी के आधार पर अधूरे और कभी-कभी निरर्थक निष्कर्ष भी निकालता है। इसका कारण है विज्ञान में रुचि का न होना। इसलिए वह कहते हैं कि देश में दसवीं कक्षा तक सब बच्चों को विज्ञान पढ़ना ज़रूरी होना चाहिए।
इस संबंध में गौहर रज़ा ब्राज़ील के दार्शनिक पाउलो रेग्लुस नेवस फ्रायरे की किताब ‘पेडेगोजी ऑफ़ द औप्रेस्ड’ (शिक्षा का बैंकिंग मॉडल) का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि “शिक्षा का यह तरीक़ा किस काम का कि ‘जानकारी दिमाग़ों में जमा कर दो और परीक्षा देते वक़्त निकाल लो। ऐसी शिक्षा नागरिक के व्यक्तित्व का विकास नहीं कर सकती। इस शिक्षा का आसपास की घटनाओं से और सामाजिक बदलाव लाने से कोई रिश्ता नहीं रहता। शिक्षा की यह पद्धति हमारे देश में, ख़ास तौर से विज्ञान पढ़ने वालों पर, थोपी जाती है।” वह कहते हैं, “देश के आम नागरिकों को क्या कहें, वैज्ञानिक और विज्ञान के शोधकर्ता भी अंधविश्वास के रास्ते पर चलते हुए दिखाई देते हैं। आज भी ऐसे वैज्ञानिक हैं, जो ग्रहण के वक़्त खाना नहीं खाते, अपने यंत्रों का प्रयोग शुरू करने से पहले नारियल फोड़ते हैं, दुआएं पढ़ते हैं, स्वस्तिक का निशान बनाते हैं। ‘इसरो’ आज भी राकेट और सैटेलाइट के मॉडल को, प्रक्षेपण से पहले ‘तिरुपति’ भेजता है। स्कूलों तक में दिन की शुरुआत धार्मिक वंदना से होती है।” इस तरह वह लिखते हैं कि “विज्ञान न नागरिकों की सोच में है और न उनके रोज़मर्रा के जीवन में है। अगर है भी तो हमारी चेतना के एक छोटे-से कोने में ही सिमट जाता है।”
विज्ञान और प्रौद्योगिकी दो अलग-अलग चीज़ें हैं। गौहर रज़ा इसको स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि ज़्यादातर लोग इन दोनों में फ़र्क़ नहीं कर पाते। उनके अनुसार, प्रौद्योगिकी से मतलब ऐसी जानकारी और क्रिया से है, जो वैज्ञानिक खोज से पैदा होती है और जो जीवन में बदलाव लाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। इनमें ऐसी मशीनें भी शामिल हैं, जो शोध और खोजबीन के लिए इस्तेमाल होती हैं। वह कहते हैं कि प्रौद्योगिकी का असल लक्ष्य इंसानी क्षमता को बढ़ाना होता है। वह यह भी स्पष्ट करते हैं कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी का धर्म के साथ हमेशा टकराव नहीं होता, लेकिन जब होता है, तो बेहद भयानक होता है। वह कहते हैं कि धर्म और प्रौद्योगिकी की दोस्ती पुरानी है। उदाहरण के लिए, अफ़ग़ानिस्तान में जब तालिबान ने क़ब्ज़ा कर लिया, तो टीवी देखने पर पूरा प्रतिबंध लगा दिया गया, कोई नागरिक अगर टीवी देखता पाया गया, तो वह वाजिब-उल-क़त्ल ठहराया गया। लेकिन तालिबान के नेताओं को दुनिया भर में अपनी बात पहुंचाने के लिए टीवी का इस्तेमाल करने में कोई परेशानी नहीं थी। तस्वीर खींचना और खिंचवाना गैर-इस्लामिक क़रार दिया गया, मगर तालिबानी नेताओं पर यह प्रतिबंध नहीं था। वह तस्वीरों के माध्यम से ही अपने इंटरव्यू देते थे। गौहर रज़ा आगे कहते हैं कि धर्म की विज्ञान से दोस्ती नहीं है, बल्कि धर्म का प्रचार करने वाले लोगों द्वारा विज्ञान का प्रचार करने वालों को बंदी बनाया गया, ज़िंदा जलाया गया और क़त्ल करवा दिया गया। उनके अनुसार, धर्म की राजनीति सत्ता के ऐसे ढांचे को खड़ा करने में मदद करती है, जिसमें सवाल पूछने, तर्क-वितर्क करने और विरोध करने की गुंजाइश ख़त्म हो जाए। गौहर रजा लिखते हैं–
“अगर इस वैज्ञानिक जानकारी पर कि धरती की उम्र बस 4.5 बिलियन वर्ष है, यक़ीन हो तो सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग इन चारों युगों पर से लोगों का विश्वास उठ जाएगा, इस बात से भी विश्वास उठ जाएगा कि किसी महाशक्ति (परमेश्वर) ने सारी सृष्टि को सात दिन में रचा था। अगर यह वैज्ञानिक जानकारी कि ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है, लोगों के विश्वास का हिस्सा बन जाए, और लोग यह जान लें कि सात आसमान नहीं हैं, तो स्वर्ग और नर्क पर से लोगों का यक़ीन उठ जाएगा। अगर यह बात कि मानव ही क्या, जीवन का हर रूप किसी और प्रजाति से उत्पन्न हुआ है, सामाजिक सोच बन जाए, तो कोई कैसे यक़ीन करेगा कि कोई जाति ब्रह्मा के सर से पैदा हुई है, कोई भुजा से, कोई पेट से तो कोई पैरों से पैदा हुई है। इस जानकारी और विश्वास से जाति-व्यवस्था के ढांचे के ध्वस्त होने का ख़तरा पैदा हो जाएगा।”
अध्याय के अंत में गौहर रज़ा का निष्कर्ष है कि “अगर कोई ज्ञान वैज्ञानिक विधि के ज़रिए हासिल न किया गया हो तो उसे विज्ञान के दायरे में नहीं रखा जा सकता। सिर्फ़ अनुभव या अभ्यास के द्वारा हासिल किया गया ज्ञान, तब तक विज्ञान के दायरे से बाहर होता है, जब तक कि वह वैज्ञानिक विधि की कसौटी पर परख न लिया जाए। इसी परख को हम वैज्ञानिक विधि कहते हैं।”

अध्याय 3 : ब्रह्मांड और सृष्टि की उत्पत्ति को समझने की कोशिशें
तीसरे अध्याय में लेखक ने ब्रह्मांड और सृष्टि की उत्पत्ति के प्रश्न पर चर्चा की है। आम तौर से धर्मगुरु और धर्मग्रंथ हमें यही बताते हैं कि ब्रह्मांड की रचना ईश्वर, अल्लाह या गॉड ने की है और वह ही इस सृष्टि को चला रहा है। किंतु अगर किसी भौतिकवादी ने यह पूछ लिया कि ईश्वर, अल्लाह या गॉड को किसने बनाया है, तो उसे नास्तिक और शैतान कहकर तिरस्कृत किया गया।
इस अध्याय में लेखक ने ब्रह्मांड और सृष्टि की उत्पत्ति के संबंध में अफ़्रीक़ा, भारत और अन्य देशों की जनजातियों में प्रचलित कहानियों और मिथकों का उल्लेख किया है। लेखक का मानना है कि सभ्यता के उदय से बहुत पहले इंसान ने सवाल पूछने और उनके जवाब तलाशने शुरू कर दिए थे। ब्रह्मांड के निर्माण की प्रक्रिया के संबंध में विभिन्न जनजातियों और आदिवासियों के अलग-अलग विचार हैं। इन कहानियों में कहीं सृष्टि का निर्माता साकार है, तो कहीं निराकार। कुछ का मानना है कि ईश्वर ने पहले सूरज, चांद, आसमान और स्वर्ग बनाया, फिर उसने पृथ्वी, उसके बाद मनुष्य और सबसे अंत में जानवर, पौधे और अन्य जीव बनाए। गौहर रज़ा कहते हैं कि इन लोककथाओं में हमें संगठित धर्मग्रंथों में लिखे सृष्टि के सिद्धांत की जड़ें मिलती हैं। लेकिन साथ ही ये हमें आदिकाल के समाज और इंसान के ख़यालात का भी पता देती हैं।
वह कहते हैं, “इतिहासकार हमें बताते हैं कि मानव सभ्यता का इतिहास लगभग दस हज़ार साल पुराना है। कृषि क्रांति और सभ्यता का उदय मानव इतिहास में एक बड़ा मोड़ था, जिसने मानवता के विकास की नई राहें खोल दीं। कृषि के साथ-साथ नदियों के किनारे शहर बसने लगे और कई जगहों पर अब तक घूम-घूम कर ख़ुराक खोजने और शिकार करने वाले कुछ क़बीलों ने स्थायी बस्तियों की शुरुआत की। यह बिना कृषि के संभव नहीं। सभ्यता का आगमन पौधों के जीवन-चक्र की खोज पर आधारित है। इस खोज ने न सिर्फ़ इंसानों और धरती के रिश्तों को बदल दिया, बल्कि मानव समाज में एक ऐसा इंक़लाब पैदा कर दिया, जिसे हम कृषि क्रांति के नाम से जानते हैं।”
गौहर रज़ा एक महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं कि “भूमध्य सागर के पूर्व में एक इलाक़े को उपजाऊ अर्द्धचंद्र कहा जाता है। यहां प्राचीन मेसोपोटामिया में छह हज़ार साल पहले ‘उरुक’ जैसे नगर-राज्यों का उदय हुआ था। इन शहरों को ‘सभ्यता का पालना’ कहा जाता है। उरुक के निवासियों ने ही सबसे पहले लिखने का तरीक़ा इजाद किया था। उस वक़्त यह लिखाई मिट्टी की तख़्तियों पर की जाती थी। पुरातत्व विशेषज्ञों को जो तख़्तियां मिली हैं, उनमें उस वक़्त के लिखे कई ग्रंथ शामिल हैं। इनमें सृष्टि की रचना का भी उल्लेख है। इनमें माना गया है कि देवता और ब्रह्मांड हमेशा से मौजूद थे और बहुत साल पहले आकाश और पृथ्वी एक थे, बाद में अलग हो गए। इसके बाद अगले कुछ सौ वर्षों में लिखी गई कविताओं में भी सृष्टि के रचे जाने का उल्लेख मिलता है। अनेक कविताओं में मानव की उत्पत्ति का कारण देवताओं की सेवा करना बताया गया है। ज़ाहिर है कि इस धारणा का जन्म उभरती हुई राजशाही और मंदिरों में दौलत के जमा होने पर ही हो सकता है। यह ख़याल उसी समाज में पैदा हो सकता था, जिसमें काम, संपत्ति और जातियों का विभाजन हो चुका था।”
वह आगे कहते हैं, “राज्य और शासक वर्ग के उदय ने मनुष्यों की उत्पत्ति की एक और धारणा को जन्म दिया। यह धारणा सुमेरियन कहानी ‘एनकी और निम्मा’ में मिलती है। इस कहानी के अनुसार, मनुष्यों में जब ऊंच-नीच का उदय हुआ, तो देवता भी जातियों में बंट गए। पर नीच जातियों के देवताओं ने अपने ऊपर काम के बोझ की शिकायत आदिम माता निम्मा से की। इस कहानी से यह साबित होता है कि उस समाज में जब इंसान ही इंसान का दमन करने लगा था, तो इस दमन के ख़िलाफ़ संगठित आवाज़ें भी उठने लगी थीं। उसी समय मिस्र सभ्यता का भी उदय हो रहा था। मिस्र के मिथकों में ये कहानियां बदलती हुई दिखाई देती हैं। उनमें ईश्वर की एक कल्पना नहीं है, बल्कि अनेक देवता हैं। कुछ कहानियों में पूरा ब्रह्मांड हमेशा से था, और कुछ में इसकी रचना एक लंबे काल में हुई। मिस्र की सभ्यता की कहानियों में हमें पुनर्जन्म और वर्तमान जीवन के बाद के दूसरे जीवन के सिद्धांत में विश्वास भी दिखाई देता है। चीन की सभ्यता में ब्रह्मांड से जुड़ी कहानियों में भी एक भगवान की कल्पना नहीं है। इसी तरह की कहानियां हमें ग्रीक सभ्यता के मिथकों में मिलती हैं। रोमन सभ्यता ने भी अपने मिथक और कहानियां ग्रीक सभ्यता से लीं। हालांकि सारी सृष्टि को बनाने और चलाने वाले एक शक्तिशाली ईश्वर की कल्पना के विस्तार की कोशिश की शुरुआत तो मिस्र में हो चुकी थी, परंतु इसे बड़े पैमाने पर कामयाबी यहूदी मत के संगठित होने पर ही मिली।”
गौहर रज़ा के अनुसार, यहूदी, ईसाई और इस्लाम – ये तीनों अब्राहमिक धर्म कहलाते हैं। ये तीनों धर्म एक ईश्वर की अवधारणा में विश्वास करते हैं, और उसी को सृष्टि का रचयिता मानते हैं। ये कहते हैं कि रब ने आसमानों और ज़मीन को छह दिन में बनाया। सबसे ज़्यादा भेद हिंदू धर्म की मान्यताओं में है। ऋग्वेद (10/129) में ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसके निर्माता पर ही संदेह किया गया है, तो ब्रह्मा के शरीर से मनुष्यों की उत्पत्ति भी बताई गई है। लेकिन पुराणों और महाभारत तक आते-आते सृष्टि की रचना के कुछ और नए आयाम जुड़ जाते हैं। भगवद्गीता में सृष्टि का निर्माण विराट पुरुष ने किया है और वह विराट पुरुष स्वयं कृष्ण हैं।
इसके बाद गौहर रज़ा जैन और बौद्ध धर्मों का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि “यह कमाल की बात है कि भारत की सभ्यता ने दो ऐसे धर्मों को जन्म दिया, जो इस सृष्टि, ब्रह्मांड, जीव-जंतु और इंसान के किसी एक रचनाकार, या रचनाकार शक्ति, या कई रचनाकारों में विश्वास नहीं रखते। कुछ विशेषज्ञ तो इन दोनों धर्मों को नास्तिक धर्म मानते हैं।” लेकिन वह शेरी ई. फ़ोहर को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि जैन धर्म आत्माओं के पुनर्जन्म को मानता है। बौद्ध धर्म भी पुनर्जन्म की धारणा को मानता है। मगर पुनर्जन्म का विचार जैन और बौद्ध धर्मों से नहीं निकला है, बल्कि यह उनके समय से कई शताब्दियों पहले से भारत में मौजूद था।
अंत में गौहर रज़ा अपने निष्कर्ष में कहते हैं कि इन मिथकों ने समाज की सोच और ढांचे को ढालने में अहम भूमिका निभाई है। जब ये मिथक और कहानियां धर्मों और मान्यताओं का हिस्सा बन जाती हैं, तो यह हमेशा के लिए सच के रूप में मानी जाती हैं। अगर कोई इनका विरोध करता है, तो उसे धर्म और अस्मिता पर आघात माना जाता है। धर्म-युद्ध, क्रूसेड, रिलिजियस वार, मज़हबी जंग जैसे शब्द इसी मानसिकता की देन हैं। इस विषय पर विज्ञान की क्या राय है, इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने चौथे अध्याय में दिया है।
अध्याय 4 : आधुनिक विज्ञान की नज़र में ब्रह्मांड की उत्पत्ति
इस अध्याय में गौहर रज़ा ने पहला प्रहार धर्म के मानने वालों के इस दावे पर किया है कि उनके धर्मग्रंथों में सारा ज्ञान मौजूद है, और यह ज्ञान असीमित है। वह कहते हैं कि “यह दावा इसलिए ग़लत है, क्योंकि किसी एक किताब, या दस या सौ किताबों में सारा ज्ञान समा ही नहीं सकता।”
वह तर्क करते हैं कि कोई वैज्ञानिक ऐसा दावा कभी नहीं करता। धर्म में यदि आप आस्तिक हैं, तो आपको मूल ग्रंथ पर ही निर्भर रहना होगा। लेकिन विज्ञान में हर पुस्तक और हर दावे पर सवाल उठाया जा सकता है। विज्ञान के पास अगर किसी प्रश्न का जवाब न हो, तो वैज्ञानिक अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हैं, और कहते हैं, “अभी नहीं मालूम, खोज जारी है, शायद अगली नस्लें इस गुत्थी को सुलझा लें।” यानी, गौहर साहब कहते हैं, “धर्म वक़्त की रेखा पर जमा हुआ सच है, जो बदलता नहीं, जो सारे सवालों के जवाब दे चुका है।”
वह कहते हैं कि मानवता ने विज्ञान से यह सवाल बार-बार पूछा है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई, और वैज्ञानिकों ने अलग-अलग जवाब दिए हैं। विज्ञान की कहानी और तर्क को समझने में जो परेशानियां आती हैं, उन पर प्रकाश डालते हुए गौहर रज़ा लिखते हैं, “वैज्ञानिक तर्क और निष्कर्षों को समझने के लिए कुछ बुनियादी आंकड़ों, तर्कों और सिद्धांतों को समझना ज़रूरी होता है। उदाहरण के लिए, एक गेंद या पत्थर को तो सीधी रेखा में ऊपर उछाला जा सकता है, पर राकेट का प्रक्षेपण कभी सीधी रेखा में नहीं हो सकता। राकेट गुरुत्वाकर्षण के कारण हमेशा ही गोलाकार रास्ते से ही धरती का चक्कर लगाते हुए आकाश में जाता है। राकेट का प्रक्षेपण अंतरिक्ष की ओर एक सीधी रेखा में किया ही नहीं जा सकता। यह बात हमारे सहज अनुभव के ख़िलाफ़ है, क्योंकि पटाखों वाले राकेट सीधी रेखा में ही ऊपर जाते दिखाई देते हैं। ऐसा गुरुत्वाकर्षण के नियम के कारण होता है।”
वह एक इंकलाबी खोज का, जो 1927 में जार्जेस लेमेले ने की थी, उल्लेख करते हुए लिखते हैं, “उनके शोध के हिसाब से ब्रह्मांड स्थिर नहीं है, बल्कि लगातार फैल रहा है। यह बेहद चौंकाने वाली बात इसलिए थी कि उस वक़्त तक सारे वैज्ञानिक यह मानते थे कि ब्रह्मांड असीमित और स्थिर है। वह न फैल रहा है और न सिमट रहा है, हमेशा से ऐसा था और हमेशा ऐसा ही रहेगा। यह मानना मुश्किल था कि अंतरिक्ष फैल रहा है और मंदाकिनियां एक-दूसरे से दूर जा रही हैं।”
वह कहते हैं कि हर नई खोज से सब कुछ बदल जाता है। क्रांतिकारी खोज या आविष्कार सदियों में हो, या अचानक, सीढ़ी-दर-सीढ़ी ही होता है। यह बात हर वैज्ञानिक जानता है। उनके अनुसार, “ब्रह्मांड की उत्पत्ति की जो समझ आज आधुनिक विज्ञान के पास है, उसकी पृष्ठभूमि भी कई सदियों पहले तैयार होने लगी थी। निकोलस कोपरनिकस ने सोलहवीं सदी में ही साबित कर दिया था कि धरती सूरज के चारों ओर घूमती है। गैलीलियो ने उसके सौ साल बाद टेलिस्कोप की मदद से यह बता दिया था कि धरती ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है। पर अभी तक यह नहीं मालूम था कि स्थिर दिखाई देने वाले ब्रह्मांड को किस बल ने बांध रखा है। न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत ने ब्रह्मांड के पूरे अस्तित्व को अलौकिक शक्ति से मुक्त कर दिया। लेकिन जहां इन वैज्ञानिकों ने अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाया, वहां नए सवाल भी खड़े कर दिए। कुछ अरसे बाद आइंस्टीन ने लेमेले का मज़ाक़ उड़ाया और उसकी इस खोज को मानने से इनकार कर दिया कि ब्रह्मांड फैलता है। लेकिन कुछ ही वर्षों बाद आइंस्टीन ने इसे अपने जीवन की सबसे बड़ी ग़लती माना।”
गौहर रज़ा के अनुसार आने वाली नस्लों ने यह भी साबित कर दिया कि ब्रह्मांड न केवल फैलता जा रहा है, बल्कि उसके फैलने की गति भी लगातार बढ़ रही है। लगातार फैलते हुए ब्रह्मांड की कहानी कुछ इस तरह शुरू होती है कि “एक वक़्त ऐसा भी था, जब ‘वक़्त’ भी पैदा नहीं हुआ था। यह 13.8 बिलियन वर्ष पहले की बात है। तब कुछ भी इसलिए नहीं था, क्योंकि पूरे ब्रह्मांड की सारी ऊर्जा एक बिंदु पर सिमटी हुई थी। उस बिंदु का कोई आकार नहीं था। अचानक, कुछ ऐसा हुआ कि इस बिंदु में क़ैद ऊर्जा ने फैलना शुरू किया, और तब वक़्त, अंतरिक्ष, गुरुत्वाकर्षण और तीन फ़ंडामेंटल फ़ोर्सेज़ (मूलभूत बल) को जन्म मिला। शुरुआत के इस पल को प्लैंक युग के नाम से जाना जाता है। इसके बाद के पल को वैज्ञानिकों ने महान एकीकरण युग का नाम दिया। इस युग की ख़ास बात यह थी कि हम जिन चार बलों – प्रबल नाभिकीय बल, विद्युत चुंबकीय बल, दुर्बल नाभिकीय बल, और गुरुत्व बल – में से पहले तीन बल अभी अलग नहीं हुए थे। इस युग के खत्म होते ही वह युग शुरू हुआ, जिसे हम ‘फैलाव का युग’ कहते हैं। इसके बाद के युग को वैज्ञानिक ‘अंधेरे का युग’ कहते हैं। इसका कारण यह था कि लगभग 370 हज़ार वर्ष से एक मिलियन वर्ष तक ब्रह्मांड में प्रकाश का कोई स्रोत नहीं बचा था और इसकी वजह यह थी कि ब्रह्मांड फैलकर इतना ठंडा हो चुका था कि इसमें ऊर्जा की तरंगें उत्पन्न करने की शक्ति ख़त्म हो गई थी।”
वह लिखते हैं, “अंधेरे का युग शुरू होने के लगभग 200 से 400 मिलियन (एक मिलियन=दस लाख) वर्षों के अंदर ही, पहले सितारे उत्पन्न हो गए थे, और इनके समूहों ने, 300 मिलियन वर्ष बाद उस वक़्त की मंदाकिनियों को जन्म देना शुरू कर दिया था। आज लगभग 13.8 बिलियन साल बाद जब इंसान जिस दृश्य ब्रह्मांड का पता लगा पाया है, वह लगभग 93 बिलियन प्रकाश वर्ष व्यास में फैला हुआ है।”
सौर मंडल की उत्पत्ति कैसे हुई? इसकी कहानी बताते हुए गौहर रज़ा लिखते हैं, “जहां आज सौर मंडल है, वहां कभी बस गैस, धूल और ब्रह्मांड की आतिशबाज़ी के कूड़े का एक बड़ा बादल-सा था। अनुमान है कि कहीं इस बादल के क़रीब आकाशगंगा का सदस्य एक ऐसा तारा, जिसे सुपरनोवा कहते हैं, फटा। यह विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि उसकी शॉकवेव से यह बादल सिमटने लगा। गुरुत्वाकर्षण के कारण बादल के कण क़रीब आए और एक धुरी के चारों ओर घूमने लगे। जैसे-जैसे बादल सिमटता गया, उसके घूमने की गति भी तेज़ होती गई और उसने घूमती हुई चकरी का रूप धारण कर लिया। गुरुत्वाकर्षण अपना काम करता रहा और इस बादल के अंदर समाए लगभग 99.86 प्रतिशत पदार्थ ने सिमटकर सूरज का रूप धारण कर लिया।”
धरती कैसे अस्तित्व में आई, इस संबंध में गौहर रज़ा कहते हैं कि “इसकी कहानी हर उस नागरिक ने कई बार पढ़ी है, जिसने दसवीं तक विज्ञान की शिक्षा हासिल की है। अब से लगभग 4.6 बिलियन वर्ष पहले यह धरती बेहद गर्म उबलते हुए लावे का एक गोला थी, जो तेज़ी से ठंडी होती गई। वैज्ञानिकों के अनुसार, अंतरिक्ष में सूरज के चारों ओर घूमता यह ख़ूबसूरत गोला, यानी हमारी पृथ्वी चार बड़े युगों से गुज़री है। ये हैं– हेडियन युग, आर्कियन युग, प्रोटेरोज़ोइक युग और फैनेरोज़ोइक युग।”
“हालांकि, इन चारों युगों के बारे में विस्तार से गौहर साहब की किताब में पढ़ना ही पाठकों के लिए ज़्यादा दिलचस्प होगा। विस्तार के भय से यहां इनका विस्तृत वर्णन संभव नहीं है। संक्षेप में पहले युग में पृथ्वी ठंडी हो रही थी और पानी अस्तित्व में आ रहा था। दूसरे युग में पृथ्वी के महाद्वीप बनने लगे और पहले पानी की सतह के नीचे जीवन अस्तित्व में आया, और फिर धीरे-धीरे शुष्क स्थानों पर फैला। तीसरे युग में वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा तेज़ी से बढ़ी। इससे ज़िंदगी के विकास का चौथा युग आरंभ हुआ। पिछले दस लाख वर्ष में जीवन ने अपने को नई-नई शक्लों में ढाला है। विकास के इस क्रम में अंत में एक अद्भुत प्राणी का जन्म हुआ, जिसे हम मानव या इंसान कहते हैं।”
अध्याय 5 : बुद्धिमान मानव का सफ़र
पांचवें अध्याय में लेखक बेहद दिलचस्प सवाल उठता है कि “विज्ञान यह दावा नहीं कर सकता कि उसने सभी सवालों के जवाब दे दिए। विज्ञान में यह विशेषता है कि उसमें नई खोज पिछली खोज को गलत साबित कर सकती है।” लेखक के अनुसार, “उन्नीसवीं सदी में फ्रांस के वैज्ञानिक लैमार्क ने दो चीजें खोजीं। एक यह कि ब्रह्मांड चार तत्वों से बना है, और दूसरी यह कि जीवन के विकास पर किसी भी जीव के जीवन काल में पर्यावरण के प्रभाव से जो बदलाव आते हैं, उनका प्रभाव विकास की दिशा को निर्धारित करता है। लेकिन आगे चलकर डार्विन हुए, जिन्होंने दोनों सिद्धांतों को नकार दिया। डार्विन ने सिद्ध किया कि हर प्रजाति में उसके सदस्य एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। यह भिन्नता उन्हें पिछड़ी पीढ़ी से मिलती है। पर्यावरण के अनुकूल गुणों वाले जीव जीवित रहने की अधिक संभावना रखते हैं, जबकि विपरीत गुणों वाले जीव विकास नहीं कर पाते। डार्विन का विकास का सिद्धांत यह भी बताता है कि जीवन की सारी शक्लें, सारी प्रजातियों में न सिर्फ़ संबंध है, बल्कि वे सब जीवन के एक सरल रूप से विकसित भी हुई हैं।”
गौहर रज़ा एक और रोचक बात कहते हैं कि “डार्विन ने ऐसा कहीं नहीं कहा कि इंसान बंदर, ओरंगगुटान या गोरिल्ला से पैदा हुआ है। इस विचार के फैलने में सबसे बड़ा दोष उस कार्टून का है, जो डार्विन की किताब ‘मनुष्य का अवतरण’ के छपने के एक साल बाद छपा था। डार्विन का प्रजातियों के क्रमिक विकास का सिद्धांत इतना मज़बूत विचार था कि इसने पिछली क़रीब दो शताब्दियों में सामाजिक विचारधाराओं को बदला, नई विचारधाराएं पैदा कीं, विज्ञान में नए शोध के रास्ते खोले और नए अध्ययन के कई विषयों को जन्म दिया।” इस सिद्धांत से संबंधित कुछ जिज्ञासाओं और सवालों का भी गौहर रज़ा ने तर्क संगत जवाब दिया है। वह बंदर वाले प्रश्न पर कहते हैं, “जब करोड़ों सालों में जीवन की वह शाखा फूटी, जिसे हम स्तनधारी जीव कहते हैं, तो इनमें से भी दो बड़ी शाखाएं फूट निकलीं। एक शाखा खुर वाले जानवरों की थी, जो धरती पर ही रहते थे, और दूसरी थी प्राइमेट्स की। ये वे स्तनधारी जीव थे, जिन्होंने पेड़ों पर रहना सीख लिया था। इनके मस्तिष्क का आकार उनके शरीर के आकार की तुलना में बड़ा था। इनमे से गिबन्स, ओरंगगुटान, गोरिल्ला व चिंपाजी हमारे सबसे क़रीबी रिश्तेदार हैं। विज्ञान की भाषा में ये शाखाएं होमिनिडे, होमिनिने और होमिनिन थीं। इनमें से होमिनिन ने लगभग छह-सात मिलियन वर्ष पहले दो पैरों पर खड़े होना और चलना सीख लिया था। पर इसे पूरी तरह विकसित होने में एक मिलियन से ज़्यादा साल का समय और लगा। आधुनिक शोध हमें यह भी बताती है कि मस्तिष्क और बोली के विकास का चोली-दामन का साथ है। यही दौर है, जब मानव ने डर, ख़ुशी और संभोग की ध्वनि के अलावा भी, आवाज़ों को अर्थ देना शुरू किया, जिनको क़बीले के सारे सदस्य समझ सकें।”
अध्याय 6 : विज्ञान और धर्म के सवालों में अंतर
किताब के अंतिम छठे अध्याय में गौहर रज़ा ने ज्ञान के लिए या जीवन के क्षेत्र में ‘सवाल’ की अहमियत पर वैज्ञानिक दृष्टि से चर्चा की है। वह लिखते हैं, “सवाल कुछ इस तरह हमारी परवरिश, रहन-सहन और ज़िंदगी का हिस्सा हैं कि हम इनके बारे में गहराई से सोचने की न ज़रूरत महसूस करते हैं और न ही यह किसी गंभीर और संजीदा बहस का हिस्सा बनते हैं। लेकिन अगर विज्ञान और धर्म के अंतर की बात हो, तो ‘सवाल’ के सवाल पर एक नज़र डालना ज़रूरी है।” वह आगे कहते हैं, “मिस्र के सौ से ज़्यादा पिरामिडों में ‘उनास फ़िरौन’ (24वीं शताब्दी ईसा पूर्व) का पिरामिड इसलिए मशहूर है कि उन पर लिखे गए 283 मंत्रों में सवालों का इस्तेमाल किया गया है। उदाहरण के लिए 16वें मंत्रमें कहा गया है, ‘कौन है, जो उसके नाम के विरुद्ध बोलता है?’ या 141वें मंत्र में लिखा है, ‘कोई देवता नहीं है, जो एक साथी के बिना सितारा बन गया है। क्या मैं तुम्हारा साथी बनूं?’ इसी तरह मानव के लिखे पहले महाकाव्य ‘गिलगमेश’ में भी सवालिया वाक्य कहे गए हैं। उदाहरण के लिए गिलगमेश द्वारा भेजा गया शिकारी एनकीडु से कहता है, तुम्हें देवता के समान होना चाहिए, तो तुम मैदान के पशुओं के साथ क्यों सोते हो?’ या एक और प्रश्न है, ‘तुम्हारा पति तम्मूज कहां है, जो सदा ज़िंदा रहने वाला था?’ ये सवाल देने का बस इतना ही मक़सद है कि हम समझ सकें कि लिपि की शुरुआत से पहले ही सवाल पूछना और उनके जवाब देना मानव सभ्यता में आम जीवन का हिस्सा बन चुका था।।”
गौहर रज़ा बताते हैं, “सवाल दो तरह के होते हैं। एक आम सवाल, जैसे तुम कहां जा रहे हो? या चाभी कहां रखी है? इत्यादि। इन सवालों की अवधि कम होती है। जवाब मिले, न मिले। ये सवाल ज़्यादा देर तक नहीं रहते। लेकिन दूसरी श्रेणी उन सवालों की है, जिनको मानवता ने विकास का रास्ता तय करते हुए लगातार पूछा है। जैसे, धरती और ब्रह्मांड का क्या आकार है? इसे किसने रचा है? मृत्यु कैसे होती है? मौसम कैसे बदलते हैं? या बारिश कैसे होती है? या पहाड़ कैसे बने? इत्यादि। धर्म और धार्मिक गुरु इन सवालों के जवाब अलग-अलग तरीक़े से देते हैं। लेकिन विज्ञान का जवाब कुछ और ही होता है। इस तरह के सवालों को हम सोफ़िक या मेटा की श्रेणी में रख सकते हैं। मेटा सवाल दो तरह के होते हैं। एक जो ‘क्यों’ से शुरू होते हैं, और दूसरे जो ‘कैसे’ से शुरू होते हैं। ‘क्यों’ से शुरू होने वाले सवाल हमें भगवान, दैवीय शक्ति, सृजन के सिद्धांत या बुद्धिमान डिज़ाइन की कल्पना और उन पर यक़ीन करना सिखाते हैं।”
गौहर साहब कहते हैं कि जहां तक ज्ञान की सीमा है, वहां तक भगवान नहीं है। पर जैसे ही लोगों के ज्ञान की सीमा समाप्त होती है, उन्हें भगवान याद आ जाता है कि ‘भगवान की मर्जी’ या ‘भगवान जाने।’ “हम तो इतना ही जानते हैं, आगे भगवान ही जानता है, जिसने इस सृष्टि को रचा है।”
वह कहते हैं, “अगर इन्हीं सवालों को ‘कैसे’ से शुरू किया जाए, तो ये हमें असीमित विज्ञान की ओर ले जाते हैं। ऐसा कैसे है कि सूरज रोज़ निकलता है? धरती गोल कैसे बनी? ब्रह्मांड में तारे कैसे बिखरे हुए हैं? कोई कैसे पैदा होता है? मृत्यु कैसे हो जाती है? इन सवालों में से एक मुश्किल सवाल ले लेते हैं– ‘मृत्यु कैसे हो जाती है?’ इसके आसान जवाब हैं– ‘आत्मा का शरीर को छोड़ने से, या अगर फेफड़े काम करना बंद कर दें, तो मृत्यु हो जाती है’, आदि। ये सारे जवाब कभी विज्ञान के जवाब थे, पर वैज्ञानिकों ने इस सवाल को बार-बार पूछा, और मृत्यु के बारे में हमारे ज्ञान की सीमा बढ़ती चली गई, आज भी बढ़ रही है। जब आत्मा का प्रमाण नहीं मिला, तो इस सिद्धांत को ख़ारिज कर दिया गया। हां, ‘सांस रुकने से’, ‘दिल की धड़कन रुकने से’, ‘अगर हमारा दिमाग़ काम करना बंद कर दे – ये मृत्यु हो जाने के प्रमाण थे। धीरे-धीरे यह बात साफ़ होने लगी कि दिल और फेफड़े काम करना बंद कर दें, तो भी इंसान को जिंदा रखा जा सकता है और दिमाग़ में ख़राबी आ जाए, तो भी ‘कोमा’ के दौरान इंसान जिंदा रह सकता है। इस खोज के दौरान यह पता लग गया था कि जीवन की इकाई शरीर नहीं, वे कोशिकाएं हैं, जिनसे हमारा शरीर बना है। और आज का विज्ञान यह कहता है कि जीवन की इकाई कोशिका नहीं, डीएनए और आरएनए है। इस समझ तक पहुंचने में हमें सदियां लगी हैं, और अब भी बहुत सारे अनसुलझे सवाल हैं, जिनकी खोज जारी है।”
गौहर रज़ा अध्याय के अंत में कहते हैं, “विज्ञान में ज्ञान का विकास क्रमिक तौर पर हुआ है और होता रहेगा। यह ज्ञान का ऐसा भंडार है, जो बढ़ता रहेगा और इसकी सीमा हमेशा फैलती रहेगी। इसके विपरीत ग़ैर-वैज्ञानिक ज्ञान का दावा है कि वह तो पूरा का पूरा प्राचीन काल में ही प्रकट हो गया था और यह सारा ज्ञान धार्मिक ग्रंथों और प्रवचनों में समाया हुआ है। विज्ञान में दैवीय शक्ति और आस्था की कोई गुंजाइश नहीं, जबकि ग़ैर-वैज्ञानिक ज्ञान का आधार ही आस्था या अलौकिक अनुभव होता है। विज्ञान, ज्ञान हासिल करने का ऐसा रास्ता है, जिसमें कोई गुरु नहीं होता, जिसके आगे सर झुकाया जाए। कोई छोटा वैज्ञानिक भी किसी बड़े वैज्ञानिक को चुनौती दे सकता है और अगर उस वैज्ञानिक का दावा सही साबित हुआ, तो विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक को भी अपनी ग़लती मानने में कोई आपत्ति नहीं होती।”
अंत में लेखक का निष्कर्ष है, “ऐसा हर समाज, जो हिंसा के रास्ते पर चल रहा हो, ज़्यादा देर तक विज्ञान के रास्ते पर नहीं चल सकता। हिंसा, नफ़रत और युद्ध विज्ञान के रास्ते की सबसे बड़ी बाधाएं हैं। वैज्ञानिकों को कोई भी समाज, जो सबसे बड़ा तोहफ़ा दे सकता है, वो है डर से निजात और सुकून। डर से निजात इसलिए, कि वह बेबाक सवाल पूछ सके और सुकून इसलिए, कि वो इन बेबाक सवालों के जवाब तलाश कर सके।”
(संपादन : नवल/अनिल)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in