डॉ. ओबेद मानवटकर की पुस्तक “ए टेल ऑफ टू महात्माज : महात्मा फुले एंड महात्मा गांधी – अ क्रिश्चियन एनालिसिस” ऐसी किताब है, जिसे पढ़ते हुए बार-बार महसूस होता है कि भारत के दो बड़े सामाजिक-नैतिक व्यक्तित्वों को एक ही तराजू पर तौलने के बजाय उनकी सामाजिक स्थितियों, वैचारिक स्रोतों और मुक्ति की अवधारणाओं को अलग-अलग समझना कितना जरूरी है। पुस्तक का मूल सवाल बेहद महत्वपूर्ण है कि जब हम जाति, पितृसत्ता और स्त्री मुक्ति की बात करते हैं तो जोतीराव फुले और गांधी की विरासतों में से कौन-सी विरासत अधिक गहरे सामाजिक परिवर्तन की संभावना पैदा करती है?
भारत की सार्वजनिक स्मृति में गांधी का विराट स्थान है, लेकिन फुले की भूमिका को अक्सर समाज सुधारक के सीमित खांचे में रख दिया जाता है। मानवटकर इस सीमा को तोड़ते हुए फुले को जाति-विरोध, स्त्री शिक्षा, बहुजन अस्मिता, तर्कवाद और धार्मिक सत्ता की आलोचना के एक व्यापक विचारक के रूप में सामने रखते हैं। पुस्तक का तर्क है कि फुले केवल सुधार नहीं चाहते थे, बल्कि उस सामाजिक संरचना की बुनियाद को चुनौती दे रहे थे जिसने जन्म के आधार पर मनुष्य की गरिमा निर्धारित कर रखी थी।
मेरे लिए पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष फुले और सावित्रीबाई के शिक्षा आंदोलन को जाति-विरोधी राजनीति से जोड़कर देखना है। लड़कियों का स्कूल खोलना महज शिक्षा का काम नहीं था; वह उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध प्रत्यक्ष विद्रोह था जो ज्ञान पर कुछ जातियों का एकाधिकार बनाए रखना चाहती थी। पुस्तक इस बात को रेखांकित करती है कि फुले के लिए ‘स्त्री मुक्ति’ और ‘जाति मुक्ति’ दो अलग-अलग परियोजनाएं नहीं थीं।
यहीं से फुले की तुलना गांधी से निर्णायक रूप से दिलचस्प हो जाती है। गांधी ने महिलाओं को राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका दी, अस्पृश्यता का विरोध किया और नैतिक आत्मशुद्धि को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना। लेकिन यह पुस्तक सवाल उठाती है कि क्या अस्पृश्यता का विरोध जाति-व्यवस्था के विनाश के बराबर है? क्या सामाजिक सद्भाव उस समय संभव है जब स्वयं सामाजिक ढांचा जन्म आधारित ऊंच-नीच पर टिका हुआ हो? पुस्तक के अनुसार, गांधी का वर्णाश्रम संबंधी चिंतन इस प्रश्न पर फुले की तुलना में अधिक सुधारवादी और कम संरचनात्मक है।

बहुजन दृष्टि से यह प्रश्न बेहद गंभीर है। किसी भी व्यवस्था में केवल अत्याचार के सबसे क्रूर रूप का विरोध पर्याप्त नहीं होता; उस व्यवस्था की वैचारिक और धार्मिक वैधता को भी चुनौती देनी पड़ती है। फुले की ताकत यहीं दिखाई देती है। वे पूछते हैं कि आखिर किसी मनुष्य को जन्म के आधार पर ऊंचा या नीचा बनाने का अधिकार किसे मिला? धर्म, परंपरा और शास्त्र यदि असमानता को पवित्र बना दें तो फुले उनके सामने तर्क और मानव गरिमा को खड़ा करते हैं। पुस्तक इस फुलेवादी हस्तक्षेप को बहुत मजबूती से सामने लाती है।
पुस्तक का एक और उल्लेखनीय पक्ष उसका ईसाई धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण है। लेखक फुले के ईसा, बलिराजा, समानता, बंधुत्व और उत्पीड़ितों की मुक्ति संबंधी विचारों को एक व्यापक मुक्ति-धर्मशास्त्र से जोड़ते हैं। यह दृष्टिकोण भारतीय बहुजन विमर्श में एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक पाठ प्रस्तुत करता है। फुले के लिए धर्म यदि मनुष्य को मुक्त नहीं करता, बराबरी नहीं देता और अन्याय के विरुद्ध खड़ा नहीं होता, तो उसकी नैतिक उपयोगिता पर प्रश्न उठना चाहिए।
पुस्तक में गांधी की आलोचना भी महत्वपूर्ण है, लेकिन यहीं इसकी कुछ सीमाएं भी दिखाई देती हैं। पुस्तक का वैचारिक झुकाव फुले की ओर इतना स्पष्ट है कि कुछ स्थानों पर गांधी की जटिलता और उनके विचारों में समय के साथ आए परिवर्तनों के लिए अपेक्षित पर्याप्त जगह नहीं बचती। गांधी को केवल वर्णाश्रम, रामराज्य, ब्रह्मचर्य और नैतिक सुधार के संदर्भ में पढ़ने से उनकी राजनीति और सामाजिक हस्तक्षेप की पूरी जटिलता पकड़ना कठिन हो सकता है। स्वयं पुस्तक गांधी की विरासत को पूरी तरह खारिज नहीं करती और उनकी अहिंसा तथा स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका के वैश्विक प्रभाव को स्वीकार करती है।
फिर भी, गांधी के निजी जीवन और ब्रह्मचर्य प्रयोगों पर पुस्तक द्वारा उठाए गए प्रश्नों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेखक इन प्रसंगों को महिमामंडित गांधी-छवि के भीतर मौजूद नैतिक प्रश्नों की पड़ताल के रूप में देखते हैं और सहमति, स्वायत्तता तथा शक्ति-संबंधों को सामने लाते हैं। यह पुस्तक की उन जगहों में से है जहां पाठक को असहमति के बावजूद गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

मेरी दृष्टि में इस पुस्तक का सबसे बड़ा योगदान गांधी को छोटा करना नहीं, बल्कि फुले को बड़ा करके पढ़ने की जरूरत को सामने रखना है। भारतीय सामाजिक न्याय की परंपरा को यदि केवल राष्ट्रवादी आंदोलन के इतिहास से पढ़ेंगे तो जोतीराव फुले, सावित्रीबाई, सत्यशोधक समाज और बहुजन प्रतिरोध की केंद्रीय भूमिका पीछे छूट जाएगी। फुले की परियोजना हमें याद दिलाती है कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक हो सकती है जब सामाजिक स्वतंत्रता, जाति-विनाश और स्त्री की समान नागरिकता उसके केंद्र में हों।
हालांकि इस पुस्तक को पढ़ते समय पाठक को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह कोई तटस्थ इतिहास-पुस्तक नहीं है। स्वयं शीर्षक इसे ‘अ क्रिश्चियन एनालेसिस’ कहता है और लेखक का घोषित उद्देश्य बहुजन मुक्ति और ईसाई धर्मशास्त्र के बीच संवाद स्थापित करना है। इसलिए इसके निष्कर्षों को एक विशिष्ट धार्मिक-दार्शनिक दृष्टिकोण से निकला हुआ पाठ मानकर पढ़ना अधिक उचित होगा। पुस्तक की शक्ति भी यहीं है और उसकी सीमा भी।
मेरे लिए इस पुस्तक का केंद्रीय संदेश यही है कि महात्मा की उपाधि से अधिक महत्वपूर्ण यह देखना है कि वह मनुष्य किसके पक्ष में खड़ा था, किस व्यवस्था को चुनौती दे रहा था और उसकी मुक्ति की कल्पना में सबसे आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति का स्थान कहां था। इस कसौटी पर फुले की विरासत आज भी असाधारण रूप से प्रासंगिक दिखाई देती है।
डॉ. ओबेद मानवटकर ने एक जरूरी बहस को अंतरराष्ट्रीय और अंतर्धार्मिक संदर्भ में सामने रखा है। इस पुस्तक को पढ़ना इसलिए जरूरी है कि यह हमें गांधी और फुले में से किसी एक को चुनने की सरल राजनीति से आगे जाकर यह पूछने के लिए बाध्य करती है कि समानता कैसी होगी, मुक्ति किसकी होगी और सामाजिक न्याय की शुरुआत आखिर कहां से होगी?
समीक्षित पुस्तक : ए टेल ऑफ टू महात्माज : महात्मा फुले एंड महात्मा गांधी – अ क्रिश्चियन एनालिसिस
लेखक : डॉ. ओबेद मानवटकर
प्रकाशक : वेस्टबो प्रेस
मूल्य : 297.36 रुपए (किंडल संस्करण)
(संपादन : नवल/अनिल)
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