डाॅ. राममनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर की समाजवादी जमीन बिहार बेटा-बेटीवाद का नया अखाड़ा बन गया है। हालांकि पहले से ही यहां परिवारवाद, वंशवाद फल-फुल रहा था। लोग उसे स्वीकार भी कर रहे थे। लेकिन नीतीश कुमार इस वंशवाद के खिलाफ आडंबर गढ़ते रहे थे। अपनी पार्टी में नेताओं के बेटा-बेटी को टिकट दे रहे थे, मंत्री बना रहे थे। लेकिन वे लालू यादव के वंशवाद के खिलाफ आग उगल रहे थे। इस बीच भाजपा ने भी पूर्व विधायक नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के पुत्र नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। इसके साथ ही भाजपा का शीर्ष नेतृत्व ही वंशवाद को अभिशप्त हो गया।
समाजवाद और वंशवाद दो अलग-अलग अवधारणाएं है। समाजवाद का संबंध विचारधारा से है और वंशवाद का संबंध रक्तसंबंध से है। अब रक्तसंबंध के पक्ष या विपक्ष की राजनीति अपने अवसान के दौर पहुंच गई है। यह कोई मुद्दा नहीं रह गया है। लेकिन विचारधारा आज भी प्रासंगिक है।
समाजवाद एक विचारधारा से अनुप्राणित है। इसमें समाज की बहुसंख्यक आबादी के सामाजिक सम्मान, रानजीतिक प्रतिनिधित्व और वैचारिक प्रवाह को प्रमुखता दी जाती रही है। डाॅ. लोहिया इसी विचारधारा के प्रणेता थे। इसी विचारधारा के आधार पर उन्होंने भारतीय राजनीति को कई दशकों तक प्रभावित किया। आज भी आरएसएस के खिलाफ वैकल्पिक धारा समाजवाद को ही माना जा रहा है।
अब हम लौटते हैं बिहार पर। बिहार समाजवादी विचारधारा का मजबूत गढ़ रहा है। यहां पिछले 35 वर्षों से समाजवाद से प्रभावित नेताओं का राज रहा है। लालू यादव और नीतीश कुमार इसके उदाहरण हैं। लेकिन सत्ता की चाशनी में डूबा समाजवाद कब परिवारवाद में तब्दील हो गया, यह पता ही नहीं चला। डाॅ. लोहिया और कर्पूरी ठाकुर से प्रभावित नेता अपने परिवारवाद को ही समाजवाद बताने लगे। यह स्थिति जनता दल से निकले सभी दलों में हो गई। नीतीश कुमार इस मामले में थोड़ा ज्यादा ईमानदार रहे और उन्होंने अपने इकलौते पुत्र निशांत को राजनीति में नहीं आने दिया। लेकिन अब उन्होंने भी परिवारवाद के आगे घुटना टेक दिया है। राज्यसभा के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने यानी एक तरह से बिहार की सत्ता से विदाई के बाद गत 6 फरवरी, 2026 को अपने दल के विधायकों के साथ बैठक में उन्होंने अपने बेटे को राजनीति में आने को लेकर सहमति दे दी।

खैर, इस बीच भाजपा के माध्यम से आरएसएस बिहार की समाजवादी जमीन को दीमक की तरह चाटने की शुरुआत कर चुका था। भाजपा ने नीतीश कुमार को सत्ता की मलाई का ऐसा स्वाद चटाया कि सांप्रदायिक शक्तियों के लिए वे हथियार बन गए। नीतीश ने केंद्र से लेकर बिहार तक हर जगह भाजपा को फलने-फुलने का मौका उपलब्ध कराया। धीरे-धीरे नीतीश कमजोर होते गए और भाजपा ताकतवर होती गई। सत्ता के हर सोपान पर जदयू से भाजपा भारी होती गई। यह नीतीश कुमार भी समझ रहे थे, लेकिन अपनी कुर्सी की लालसा में भाजपा की हर साजिश उन्हें जायज लग रही थी। इस बीच भाजपा ने अपने सवर्ण नेताओं को जदयू में शिफ्ट किया। प्रशांत किशोर से लेकर संजय झा तक इसके उदाहरण हैं। नीतीश ने जब प्रशांत किशोर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था तो कहा था कि अमित शाह के कहने पर उपाध्यक्ष बनाया है। संजय झा भाजपा के ही कैडर थे, जिन्हें नीतीश की जमीन में मट्ठा डालने के लिए भाजपा ने जदयू में भेजा था। वे आज जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।
इस तरह भाजपा ने चारों ओर से नीतीश को घेरने का पूरा इंतजाम कर लिया था। नीतीश कुमार के दिमागी हालत को भी भाजपा ने हथियार की तरह इस्तेमाल किया। धीरे-धीरे नीतीश सवर्णों पर आश्रित होते गए, जो न वैचारिक रूप से उनके साथ थे, न सामाजिक रूप से। इन सबका काम नीतीश कुमार को अपमानित और कमजोर करना था। रहा-सहा काम प्रचंड बहुमत ने पूरा कर दिया।
प्रचंड बहुमत ने नीतीश कुमार को भाजपा का बंधक बना दिया। सरकार का भविष्य भाजपा के हाथों में था। नीतीश अब पाला बदलने की स्थिति में भी नहीं थे। इस स्थिति का भरपूर लाभ भाजपा ने उठाया। पहले नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री स्वीकार किया और फिर राज्यसभा का रास्ता दिखा दिया। उन्हें भी शिवेश राम और रामनाथ ठाकुर की लाईन में खड़ा कर दिया।
दरअसल अब बिहार में समाजवाद की कब्र पर भगवा झंडा लहराने वाला है। नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार जदयू में शामिल होंगे और पार्टी का नेतृत्व करेंगे। यह सबकुछ नीतीश कुमार के सत्ता में रहते और उनकी आंखों के सामने हो रहा है। यह सब नीतीश कुमार की स्वेच्छा या स्वविवेक से नहीं हो रहा है। यह सब भाजपा के राजनीतिक हित और फायदे के लिए किया जा रहा है। अब नीतीश वही काम कर रहे हैं, जिससे भाजपा को लाभ हो और सत्ता का मार्ग प्रशस्त हो। नीतीश कुमार समाजवाद का पुतला ही सही, लेकिन दिख रहे थे। अब पुतला भी मटियामेट हो गया है। अब समाजवाद की कब्र पर नीतीश कुमार खुद भगवा झंडा लहरायेंगे। नीतीश कुमार की दिली इच्छा थी मिट्टी में मिल जाने की। भाजपा ने उनकी इस इच्छा को पूरा कर दिया है और मिट्टी में मिला दिया है।
(संपादन : नवल/अनिल)