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सामाजिक और राजनीतिक विमर्शों में नीतीश कुमार व उनकी सियासत 

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह दौर वास्तव में ‘सुशासन’ का था, जैसा कि स्थापित मीडिया और सत्ता समर्थक वर्ग बार-बार प्रचारित करते रहे हैं, या फिर यह एक ऐसा राजनीतिक अध्याय था जिसमें सामाजिक न्याय की राजनीति को व्यवस्थित तरीके से कमजोर कर दिया गया? पढ़ें, अरुण आनंद की त्वरित टिप्पणी

राज्यसभा की सदस्यता के लिए 5 मार्च, 2026 को नामांकन दाखिल करते ही नीतीश कुमार ने उन तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया कि सचमुच अब वह अब बिहार की सत्ता से विदा लेने वाले हैं। लेकिन यह घटना केवल एक औपचारिक राजनीतिक कदम भर नहीं है। यह उस लंबे राजनीतिक दौर के मूल्यांकन का भी अवसर है, जिसमें लगभग दो दशकों से अधिक समय तक बिहार की राजनीति एक ही व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती रही।

आज जब उनके शासनकाल को पीछे मुड़कर देखा जाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह दौर वास्तव में ‘सुशासन’ का था, जैसा कि स्थापित मीडिया और सत्ता समर्थक वर्ग बार-बार प्रचारित करते रहे हैं, या फिर यह एक ऐसा राजनीतिक अध्याय था जिसमें सामाजिक न्याय की राजनीति को व्यवस्थित तरीके से कमजोर कर दिया गया?

नीतीश कुमार के पूरे राजनीतिक उभार की बुनियाद एक ही नैरेटिव पर टिकी रही– ‘जंगलराज’। यह नैरेटिव लगातार लालू प्रसाद के शासनकाल के विरुद्ध गढ़ा गया और उसे इस तरह प्रचारित किया गया मानो बिहार की सारी समस्याओं की जड़ वही दौर था। यह केवल राजनीतिक हमला नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय की राजनीति के खिलाफ एक वैचारिक अभियान था। इसी अभियान ने बिहार की राजनीति में सवर्ण प्रभुत्व की वापसी का रास्ता खोला और अंततः भारतीय जनता पार्टी को राज्य की सत्ता में निर्णायक भागीदारी दिलाई।

यानी जिस राजनीतिक उभार के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन खड़ा किया गया, उसी के बहाने बिहार की सत्ता संरचना को पूरी तरह पलट दिया गया।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में बिहार विधान सभा के कार्यालय में राज्यसभा की सदस्यता के लिए नामांकन पत्र जमा करते नीतीश कुमार

नीतीश कुमार के शासनकाल की सबसे बड़ी विशेषता एक अत्यधिक केंद्रीकृत और नौकरशाही-प्रधान शासन मॉडल रहा। राजनीतिक नेतृत्व की जगह नौकरशाही को निर्णायक शक्ति मिलती गई और लोकतांत्रिक जवाबदेही लगातार कमजोर होती गई। बिहार के गांव-कस्बों में शिक्षा, रोजगार, कृषि संकट और पलायन जैसे सवाल जस-के-तस बने रहे। लाखों युवाओं को रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाना पड़ा। लेकिन इन सवालों को उठाने के बजाय राज्य का बड़ा मीडिया तंत्र नीतीश कुमार की चमकदार छवि गढ़ने में लगा रहा।

बिहार की राजनीति लंबे समय तक सामाजिक न्याय के प्रतीकों से प्रेरित रही है। कर्पूरी ठाकुर, जगदेव प्रसाद, और बी.पी. मंडल जैसे नेताओं ने उस सामाजिक चेतना को जन्म दिया जिसने पिछड़े और वंचित समाज को राजनीतिक शक्ति दी। लालू प्रसाद के दौर में इन बहुजन प्रतीकों को सार्वजनिक स्मृति में स्थापित करने की कोशिश दिखाई दी थी। विश्वविद्यालयों, संस्थानों और स्मारकों के माध्यम से। लेकिन नीतीश कुमार के शासनकाल में यह प्राथमिकता बदलती दिखाई दी। राज्य में कई परियोजनाओं और संस्थानों का नामकरण भाजपा से जुड़े नेताओं – जैसे अटल बिहारी वाजपेयी, अरुण जेटली, दीनदयाल उपाध्याय और सुशील कुमार मोदी आदि के नाम पर किया गया। यह बदलाव केवल प्रतीकों का बदलाव नहीं था, बल्कि बिहार की वैचारिक दिशा में भी एक स्पष्ट झुकाव का संकेत था।

नीतीश कुमार की राजनीति में सहयोगियों के साथ व्यवहार भी लगातार विवाद का विषय रहा है। उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत जिन नेताओं के साथ हुई, उनके साथ संबंधों का अंत अक्सर कड़वाहट में हुआ।

जॉर्ज फर्नांडीस, शरद यादव और अली अनवर जैसे नेताओं का राजनीतिक हाशियाकरण आज भी राजनीतिक विश्लेषण का विषय बना हुआ है। इसके अलावा जदयू के संगठनात्मक ढांचे में भी नेतृत्व को लेकर कई सवाल उठते रहे। पार्टी की कमान अलग-अलग समय में आरसीपी सिंह, राजीव रंजन सिंह और संजय झा जैसे नेताओं को सौंपे जाने पर यह आरोप लगा कि इससे व्यापक सामाजिक आधार से नए नेतृत्व के उभरने की संभावनाएं सीमित हो गईं।

नीतीश कुमार की राजनीति का सबसे विवादास्पद अध्याय उनकी शराब नीति रही है। एक दौर में राज्य के गांव-गांव में शराब की दुकानों का विस्तार हुआ, लेकिन अचानक पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी गई। इस नीति को नैतिक निर्णय के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी तस्वीर अलग दिखाई देती है। आज बिहार में अवैध शराब का समानांतर नेटवर्क खड़ा हो चुका है और राजस्व का बड़ा हिस्सा भी खत्म हो गया है। यह नीति एक ऐसे प्रशासनिक विरोधाभास का उदाहरण बन गई है जिसमें कानून कड़ा है, लेकिन उसका पालन कमजोर। इसका शिकार सबसे अधिक दलित और पिछड़े वर्गों के लोग हो रहे हैं। इस कानून के उल्लंघन के मामले में सबसे अधिक मुकदमे इन्हीं समुदायों के खिलाफ दर्ज किए गए हैं।

यह भी सच है कि नीतीश कुमार के शासनकाल में महिलाओं और अति पिछड़े वर्गों के लिए कुछ योजनाएं शुरू की गईं। जैसे कि पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण और साइकिल योजना। इन पहलों ने सामाजिक भागीदारी को बढ़ाने में कुछ भूमिका निभाई। लेकिन इन सीमित उपलब्धियों के सहारे पूरे शासनकाल को आदर्श बताने की कोशिश वास्तविकता को छिपाने जैसा है।

बिहार के सरकारी कार्यालयों में अक्सर गांधीजी के सात सामाजिक पापों वाले आदर्श वाक्य टंगे दिखाई देते हैं, जिनमें सिद्धांतों के बिना राजनीति को सबसे बड़ा पाप बताया गया है। लेकिन बिहार की राजनीति में जिस तरह बार-बार गठबंधन बदले गए और सत्ता के लिए लगातार समझौते किए गए, वे इन आदर्शों के बिल्कुल विपरीत प्रतीत होते हैं।

आज नीतीश कुमार को लेकर दो तरह की छवियां मौजूद हैं। एक वह जो मीडिया और सत्ता प्रतिष्ठान ने गढ़ी, और दूसरी वह जो जमीनी अनुभवों और राजनीतिक आलोचनाओं से बनती है। समय के साथ जब बिहार की नई पीढ़ियां इस दौर को देखेंगी, तो संभव है कि वे इस शासनकाल को केवल सुशासन के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक प्रयोग के रूप में भी याद करेंगी, जिसमें सत्ता की स्थिरता के बदले सामाजिक न्याय की राजनीति को धीरे-धीरे कमजोर किया गया।

बहरहाल, इतिहास जब अंतिम फैसला सुनाता है तो वह प्रचार से नहीं, परिणामों से तय होता है। और तब शायद नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को लेकर बहस और भी तीखी हो जाएगी।

(संपादन : नवल/अनिल)

 

लेखक के बारे में

अरुण आनंद

लेखक पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं

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