बीते 14 मार्च, 2026 को इलाहाबाद के सरदार पटेल संस्थान में यूजीसी रेगुलेशंस 2026 के समर्थन में समता सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन का संयोजन डॉ. कमल उसरी ने किया। सम्मेलन का आगाज दशरथ मांझी शिक्षण संस्थान गया, बिहार के सचिव पिंटू मांझी के संबोधन से हुआ। उन्होंने कहा कि आज सबसे ज़्यादा शोषण ओबीसी समाज का हो रहा है। शैक्षणिक संस्थानों में दलित बहुजनों को एनएफएस कर दिया जाता है। किसी तरह हम यहां तक पहुंचते भी हैं तो हमें मानिसक यातना देकर आत्महत्या के लिए मज़बूर कर दिया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि हमें इस मानसिकता से उबरना होगा कि हमारी जाति के लोग राष्ट्रपति हैं, प्रधानमंत्री हैं, मुख्यमंत्री हैं तो हमारा शोषण नहीं होगा या हम इसके ख़िलाफ़ नहीं लड़ेंगे।
यूजीसी एक्ट 2026 बचाओ समता आंदोलन, इलाहाबाद के तत्वावधान में आयोजित सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए पूर्व न्यायाधीश संजीव कुमार ने न्यायपालिका में न्याय करने वाले जज के पदों पर सवर्ण वर्चस्व और दलित बहुजनों की नगण्य भागीदारी को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में आरक्षण की व्यवस्था के बिना हमारा न्याय सुनिश्चित नहीं हो सकता है, क्योंकि सारा मामला आख़िर में जाकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ही फंसता है।
वहीं जे.पी. यूनिवर्सिटी छपरा, बिहार के प्रोफ़ेसर दिनेश पाल ने कहा कि यूजीसी रेगुलेशन-2026 के ख़िलाफ़ मुट्ठी भर लोग सड़क पर उतरे तो मीडिया ने बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। लेकिन जब हमारे समाज ने यूजीसी के समर्थन में व्यापक और विशाल आंदोलन किया तो मीडिया को सांप सूंघ गया। लेकिन फिर जब एक मनुवादी महिला हमारे आंदोलन में घुसी और बवाल किया तो उसे मीडिया ने दिखाया। न्यायपालिका और मीडिया उनके साथ है। उन्हें डर है दलित-ओबीसी के बच्चे पढ़ लेंगे तो उनके खेतों में काम कौन करेगा। अंग्रेज़ हमें शिक्षा देना चाहते थे लेकिन ये मनुवादी नहीं चाहते कि हम शिक्षित हों। ये हमें घोड़ी नहीं चढ़ने देते।
यूट्यूब चैनल ‘नेशनल दस्तक’ के संपादक शंभू कुमार सिंह ने कहा कि यदि 50 प्रतिशत भी दलित बहुजन आबादी शिक्षित है तो उसे अपने अधिकारों के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना होगा, क्योंकि ये सबसे बड़ा टूल है। यही हमारे सारे संवैधानिक अधिकारों को दिलाएगा। इसलिए हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि इसका इस्तेमाल करें। ये लड़ाई हमारे उन भाइयों के लिए है जो पीछे छूट गए हैं।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रोफ़ेसर गंगा सहाय मीणा ने कहा कि इस लड़ाई में हमें एक-दूसरे के मुद्दों को भी समझने की ज़रूरत है। आदिवासी, दलितों के जातीय उत्पीड़न के सवाल को नहीं समझता क्योंकि वो जातीय उत्पीड़न नहीं झेलता। इसी तरह दलित, आदिवासियों के जल, जंगल ज़मीन के सवालों को समझने को तैयार नहीं है। उनकी भाषा, ज़मीन, जंगल उनके अस्तित्व, उनकी पहचान से जुड़ा मुद्दा है। वैसे ही दलितों के लिए गरिमा से जीवन जीने का सवाल है। जयपाल सिंह मुंडा का नाम दलित आंदोलनों में नहीं लिया जाता है। लोग बिरसा मुंडा को आदिवासियों का आंबेडकर कहते हैं। लेकिन जयपाल सिंह मुंडा उच्च शिक्षा के लिए ऑक्सफोर्ड गए। उन्होंने ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व किया और देश के लिए पहला मेडल जीता। उन्होंने संविधान सभा की बैठक में अपनी बातें रखीं।
प्रो. मीणा ने आगे कहा कि यूजीसी रेगुलेशंस-2026 पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा क्यों और कैसे स्टे लगा दिया गया, इस प्रक्रिया को समझना होगा। यह हमारी पूरी सामाजिक व्यवस्था को दिखाता है। सवर्ण समाज के छोटे प्रदर्शनों को मीडिया द्वारा बड़ा करके दिखाया गया। न्यायपालिका को मैनेज किया गया। मीडिया द्वारा बनाये गए दबाव में रोक लगा दी गई। रोहित वेमुला की हत्या के बाद समाज में एक दलित, आदिवासी और पिछड़ों के बीच एकता क़ायम हुई। सरकार समय-समय पर इसी एकता को चेक करती रहती है। एससी-एसटी क़ानून, आरक्षण, 13 प्वाइंट रोस्टर आदि कई मौके हैं, जब सरकार ने इस एकता को चेक किया। आज उत्पीड़ितों का दायरा विस्तृत हो रहा है।

इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर विक्रम हरिजन ने कहा कि हमें ब्राह्मणवाद से ज़्यादा ब्राह्मणों से ख़तरा है। मैं यह बात इसलिए कहता हूं क्योंकि मुझे कम्युनिस्ट पार्टी के आईडिया से परेशानी नहीं है, मुझे कम्युनिस्ट पार्टी के उन ज़्यादातर लीडर से समस्या है जो ब्राह्मण हैं। आप देखिए कि आज़ादी के समय, संविधान निर्माण के समय आर्य समाज की लीडरशिप ब्राह्मणों के पास थी, कांग्रेस की लीडरशिप ब्राह्मणों के पास थी। कम्युनिस्ट पार्टियों की लीडरशीप उनके पास थी। हमें जाति से मुक्ति चाहिए, सिर्फ़ सुधार नहीं चाहिए। हमें इसीलिए ब्राह्मणों से प्रॉब्लम हैं। बाबा साहेब ठीक कहते थे कि प्रोग्रेसिव ब्राह्मण ख़तरनाक होते हैं। आज देश के हर कोने में यूजीसी रेगुलेशंस के समर्थन में प्रदर्शन हो रहे हैं लेकिन प्रोग्रेसिव ब्राह्मण पत्रकार इसके समर्थन में नहीं बोल रहे हैं।
सामाजिक चिंतक और माले कार्यकर्ता मोहम्मद सलीम ने कहा यूजीसी रेगुलेशंस आते ही मीडिया का विलाप शुरू हो गया। सिर्फ़ तीन दिन में ही सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर इस पर रोक लगा दिया कि समाज का एक हिस्सा इससे प्रभावित होगा। जबकि धारा 370, एनआरसी, सीएए, ज्ञानवापी, आदि मसअले पर कोर्ट के कानों पर महीनों तक जूं नहीं रेगती है। उन्होंने कहा कि मैं ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ खड़ा हूं। गवई साहेब के ऊपर जूता चल जाता है, इससे ज़्यादा शर्मिंदगी की कोई और बात नहीं है। इनको पहचानना होगा। इनके राजनीतिक दर्शन को समझना होगा। इसे समझे बिना कोई स्थायी और लंबी लडाई नहीं हो सकती है। ये फ़ासिस्ट हैं।

राजद प्रवक्ता डॉ. कंचना यादव ने आरक्षण और संघर्ष के इतिहास का विस्तृत ब्यौरा साझा करते हुए कहा कि यूजीसी बिल 2026 के पीछे छुपकर लोग तमाम धारणाएं बनाने में लगे हैं। वे कह रहे हैं आरक्षण पर हमला करने के लिए अभी का माहौल ठीक है। लेकिन वे नहीं जानते कि 1990 में मिले ओबीसी आरक्षण के पीछे 110 साल का लंबा संघर्ष है। इसी भेदभाव के चलते जोतीराव फुले ने हंटर कमीशन के आगे दलित समाज के लिए अलग से स्कूल बनाने की मांग रखी थी। उन्होंने आगे कहा कि आज आप किसी भी शैक्षणिक संस्था में चले जाइए, आपको वहां 27 प्रतिशत ओबीसी नहीं मिलेंगे। वहां आरक्षण की चोरी होती है, इसीलिए भेदभाव होता है।
अध्यक्षीय संबोधन करते हुए के.सी. सरोज ने कहा कि जाति व्यवस्था की बुनियाद मनुस्मृति है। इससे पहले राजद की प्रवक्ता प्रियंका भारती ने अपने संबोधन में कहा कि हम कैसे किसी जाति के ख़िलाफ़ हो सकते हैं, हम जातिवाद के ख़िलाफ़ हैं। राहुल सांकृत्यायन की किताब ‘तुम्हारी क्षय हो’ को दिखाते हुए उन्होंने कहा कि इनसे बड़ा हीरा और कौन हो सकता है। कोई भी व्यक्ति हो जो हमारे साथ है उसे साथ लेकर चलना पड़ेगा। हम किसी के ख़िलाफ़ नहीं जा सकते। इसीलिए जोतीराव फुले ने कहा था कि जो आपकी लड़ाई में आपके साथ है उनसे उनकी जाति मत पूछिए। आप उनके साथ खड़े होइए। कोई भी व्यक्ति हो तोड़ने की नहीं जोड़ने की बात होनी चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि विनय यादव नाम के एक छात्र का पिछले साल पीएचडी में एडमिशन के लिए आधे घंटे का इंटरव्यू किया गया और रिजल्ट में दिखाया गया कि वे अनुपस्थित थे। इसी तरह हमें संस्थानों से अनुपस्थित कर दिया जाता है। हमें देश के संसाधनों से ग़ायब कर दिया गया है। हमें हर जगह से एनएफएस कर दिया गया है। वे किस मेरिट की बात करते हैं। यदि ज्ञान की बात है तो जो बुनकर समाज है वो ज्ञानी नहीं है क्या? मछुआरों का मछली मारने का ज्ञान ज्ञान नहीं है क्या? फूलों की माला बनाने वालों को उसका ज्ञान नहीं होता है क्या? भवन का निर्माण करने वाले मज़दूर के पास अपने क्षेत्र का ज्ञान नहीं होता है क्या? जो खेती-किसानी करता है वो बिना ज्ञान के करता है क्या?
(संपादन : नवल/अनिल)
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