गत 19 मार्च, 2026 को यूजीसी रेगुलेशंस-2026 को लेकर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई टाल दी गई। बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में कुछ मामलों में हुई लंबी सुनवाई के कारण ऐसा किया गया। संभावना व्यक्त की जा रही है कि अब अगली सुनवाई अप्रैल माह में होगी।
बताते चलें कि 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026 पर रोक लगा दी। खंडपीठ ने 13 जनवरी को अधिसूचित इन विनियमों को लेकर विवाद खड़ा हो गया था क्योंकि इन्हें सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ कथित तौर पर ‘अन्यायपूर्ण’ बताया गया था।
दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा रोक लगाए जाने के बाद देश के अनेक हिस्सों में दलित-बहुजनों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की तथा सड़कों पर उतरे। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 19 मार्च निर्धारित किया था, इसलिए गत 18 मार्च को उत्तर प्रदेश और बिहार के कई शहरों में दलित-बहुजन सड़कों पर उतरे। इस मार्च में बिहार के विभिन्न जिलों, पटना, बक्सर, छपरा, सिवान, भोजपुर, अरवल, भागलपुर, जहानाबाद, बेगूसराय, रोहतास, समस्तीपुर, पूर्णिया, मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, दरभंगा, मधुबनी, गया, मुजफ्फरपुर सहित अन्य इलाकों से हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए।
ध्यातव्य है कि 18 मार्च, 1974 को संपूर्ण क्रांति का आंदोलन प्रारंभ हुआ था। इसकी वर्षगांठ के मौके पर बिहार की राजधानी पटना में यूजीसी रेगुलेशंस 2026 के समर्थन और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों, अति पिछड़ा वर्ग और पिछड़ा वर्गों के लिए 65 प्रतिशत आरक्षण लागू करने, संसद से रोहित एक्ट का निर्माण करने इत्यादि मांगों को लेकर ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी के बैनर तले गांधी मैदान से राजभवन मार्च आयोजित किया गया, जिसमें हजारों की संख्या में छात्र-नौजवान, सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता और विभिन्न जिलों से आए लोगों ने भाग लिया।
बिहार के इतिहास में यह पहला मौका था जब प्रदर्शनकारियों ने अपने हाथों में जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले, रामासामी पेरियार, डॉ. आंबेडकर, जगदीश मास्टर, जगदेव प्रसाद, रामनरेश राम सहित अनेक दलित-बहुजन नायकों की तस्वीर ले रखी थी।

यह मार्च पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से शुरू होकर जेपी गोलंबर को पार कर डाक बंगला चौराहा तक पहुंचा, जहां पर कुछ प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस ने धक्कामुक्की की और कुछेक लोगों को गिरफ्तार किया गया, हालांकि आंदोलनकारियों के दवाब में सबको छोड़ना पड़ा। मार्च डाक बंगला चौराहा पर सभा में तब्दील हो गया। मार्च की मुख्य मांगाें में उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करना, जातिगत भेदभाव व उत्पीड़न के खिलाफ यूजीसी के नए रेगुलेशन को लागू करने, बिहार में विधानसभा से पारित अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अत्यंत पिछड़ा वर्ग व पिछड़ा वर्गों के लिए 65 प्रतिशत आरक्षण को लागू करने, कोलेजियम सिस्टम को खत्म करने, संविधान विरोधी ईडब्ल्यूएस को खत्म करने, गरीब विरोधी नई शिक्षा नीति 2020 को वापस लेने की मांग शामिल थी।
इस मौके पर वक्ताओं ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों को शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण और भेदभावपूर्ण नीतियों को छोड़कर समावेशी और न्यायपूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। सभा का संचालन फोरम के राज्य संयोजक रिंकु यादव ने किया तथा सभा को संबोधित करते हुए काराकाट सांसद राजाराम सिंह ने कहा कि सड़क की इस आवाज को संसद में मजबूती से उठाएंगे। इस बार सामाजिक न्याय की जो लड़ाई छिड़ी है वो निर्णायक मंजिल तक पहुंचेगी। बिहार फिर से सामाजिक न्याय और लोकतंत्र के लड़ाई के अग्रिम चौकी के बतौर खड़ा होगा।

पूर्व विधायक अमरजीत कुशवाहा, पालीगंज विधायक संदीप सौरभ, सामाजिक न्याय आंदोलन के राज्य सचिव सुबोध यादव, आरवाईए के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजीत कुशवाहा, फोरम के मनजीत आनंद साहू, विजय पासवान, संतोष आर्या, पूर्व विधायक मनोज मंजिल, आइसा के राष्ट्रीय महासचिव प्रसेनजीत कुमार, भीम आर्मी राज्य अध्यक्ष अमर ज्योति, जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष धनंजय, पटना विश्वविद्यालय के छात्र नेता सबा आफरीन, फोरम से विश्वा यादव, मुख्तार, निशांत यादव, एआईएसएफ के राज्य अध्यक्ष सुधीर, सोनल नारायण, कुमुद पटेल, आइसा के राज्य अध्यक्ष प्रीति आदि ने संबोधित किया।
(संपादन : नवल/अनिल)
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