[गत 25 जुलाई, 2026 को फारवर्ड प्रेस द्वारा आरक्षण दिवस (26 जुलाई, 1902) की पूर्व संध्या पर ऑनलाइन गोष्ठी आयोजित की गई। इसका विषय था–‘मौजूदा आरक्षण के संदर्भ में फुले का बलिराज और शाहूजी महाराज की विरासत’। गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. भरत पाटणकर ने की। इसमें मुख्य वक्ता डॉ. लता प्रतिभा मधुकर और डॉ. सिद्धार्थ रामू रहे। फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार ने इसका संचालन किया। प्रस्तुत है डॉ. लता प्रतिभा मधुकर का संबोधन]
सभी साथियों को जय भीम, जय जोती, जय सावित्री, जय फ़ातिमा, उलगुलान, जय जोहार, जय संविधान!
आज का दिन इतिहास में बहुत अजरावर (अजर-अमर/हमेशा याद किया जाने वाला) दिन है। आज हम आरक्षण दिवस की पूर्व संध्या पर बैठे हैं और आज हमारे देश में शिक्षा की क्रांति का एक कदम उठाया गया। आज केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। आज जो शिक्षा को लेकर माहौल इस देश में बना है वह अचानक से नहीं हुआ है। शाहूजी के काल से पहले, महात्मा जोतीराव फुले ने 1848 में जब स्कूल खोला था तब किसी को नहीं पता था कि एक दिन बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर जैसा कोई इंसान शिक्षित होकर आगे बढ़ेगा और संविधान लिखेगा तथा हमारे देश की सामाजिक सांस्कृतिक धरोहर को अंतिम इंसान तक पहुंचाएगा। इस तरीके की शिक्षा की शुरुआत हुई थी।
आज फिर से शिक्षा का ऐसा दौर चला है जब शिक्षा पर केवल ब्राह्मणवादियों ने कब्जा कर लिया है या फिर ऊंचे वर्ग के लोगों ने कब्जा किया है। ऐसे में आम लोगों के बच्चों को बिल्कुल अवसर नहीं मिलता। ऐसे समय में नीट का पेपर लीक होना और 22 युवाओं का सुसाइड करना बहुत ही भयानक बात थी।
कल का दिन यानी 26 जुलाई का दिन तो उसी के लिए हम मनाते आ रहे हैं कि उन सारे बच्चों को शिक्षा मिले, जो वंचित तबकों और समाजों से आते हैं। शाहूजी ने 26 जुलाई, 1902 को अपनी रियासत कोल्हापुर में आरक्षण लागू किया था। यह देश में आरक्षण की शुरुआत थी।
यह बातें कहते हुए मुझे लग रहा है कि 22 युवाओं को न्याय दिलाने की जो लड़ाई युवाओं ने छेड़ी। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने देश के युवाओं को कॉकरोच कह दिया था। उन्हें यह कहना बहुत महंगा पड़ा। यह देश भर के युवाओं ने सड़क पर उतर कर दिखा दिया।
आज की परिचर्चा के विषय के संबंध में जब मैं सोच रही थी कि जब महात्मा फुले ने स्कूल खोले होंगे तब उस समय गुस्से में लोगों ने उन्हें क्या-क्या कहा होगा। आज इन बच्चों को जेन-जी के नाम के नाम से जाना जाता है, उस समय फुले जी को क्या कहा गया? यह कहा गया होगा कि यह आदमी खुद को क्या समझता है? ये कौन होता है बोलने वाला? शिवाजी के बारे में यह कैसे लिख रहा है? ये कौन है जो ‘गुलामगिरी’ के बारे में लिख रहा है? हमने कौन-सी गुलामगिरी कभी की?
उस समय जब 1848 में जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले ने स्कूल शुरू किया था तब उनकी उम्र क्रमश: 20 और 17 साल थी। तो इस तरह से देखें तो इस देश में युवाओं ने जो परिवर्तन किया, उसकी एक मिसाल फुले दंपत्ति भी रहे।
रही बात बलिराज की कहानी की तो इसे महात्मा फुले ने जरूर लिखा, लेकिन यह लोगों के पास मौखिक इतिहास के रूप में पहले से थी। बलिराजा एक मिथकीय पात्र के रूप में सामने आते हैं। दीवाली के समय यह मौखिक इतिहास बार-बार दुहराया जाता रहा है।
देखिए कि बलिराजा की हत्या के जश्न में ब्राह्मणवादी दीवाली मनाने लगे। लेकिन आप देखिए कि जो किसान थे, शिल्पकार थे, सब बलिराजा को मानते थे। उनकी परंपरा को मानते थे। अगर हम आज से तुलना करें तो हमारे आदिवासियों के जो जंगल और ज़मीन है या फिर सभी किसानों के पास जमीनें हैं, उसी तरह बलि के राज में लोगों के पास ज़मीनें थीं, उनके जंगल थे। यह बहुत समृद्ध परंपरा थी।
आज की परिचर्चा के लिए आपने बहुत ही अच्छा विषय चुना है। आज अंबानी और अडानी ने जिस तरीके से जमीनों पर कब्जा किया है, अडानी ने जिस तरीके से हसदेव के जंगल पर कब्ज़ा कर लिया है बिलकुल उसी तरीके से वामन ने बलिराजा के समय उनकी जमीन पर कब्जा किया था। बलिराजा बहुत उदार और दानी थे। इसका फायदा वामन ने उठाया। आज देखिए कि हम दानी नहीं हैं, लेकिन हमारे ऊपर जीएसटी थोप दिया गया है। आदिवासियों का दमन किया जा रहा है, उनकी जमीनें छीनी जा रही हैं। बिलकुल ऐसी ही कहानी बलिराजा की भी है। महात्मा फुले की किताब में इसका संदर्भ मिलता है।
जब हम कोल्हापुर जाते हैं तो रत्नागिरी आती है। बलिराजा के राज में नौ खंड थे, जो रत्नागिरी से लेकर पूरा फैला हुआ था। बलिराजा के साम्राज्य को भट्ट वामन ने नष्ट करने की कोशिश की।
बलिराजा कौन थे, इस संबंध में हिरण्यकशिपू से जुड़ी हुई एक कहानी है। प्रहलाद का बेटा था विरोचन और विरोचन के बेटे थे बलिराजा। बलिराजा प्रहलाद के नाती थे। जिस तरीके की प्रहलाद की कहानी ब्राह्मणों ने गढ़ रखी है, उसके उलट कहानी महात्मा फुले ने लिखी है। उन्होंने तो यह लिखा है कि प्रहलाद नशे में चूर रहता था।
विष्णु द्वारा नरसिंह रूप धर हिरण्यकशिपू की हत्या के बाद जाकर प्रहलाद को होश आया कि ये जो विप्र हैं, द्विज हैं, ब्राह्मण हैं, हमारा धन लूट लेंगे। इसलिए उसकी सोच में बदलाव आया। प्रहलाद के बाद उसके पुत्र विरोचन ने उसके राजपाट को संभाला। उसने जमीनों को सींचा और खेती के योग्य बनाया तथा सिंचित जमीन लोगों को खेती के लिए दी। उसके बाद जब बलिराजा आए तो उन्होंने पूरे राज्य को समृद्ध कर दिया। उनका राज नौ खंडों में विस्तृत था। नौ खंड मतलब नौ प्रदेश। आज दक्षिण में जाते हैं तो महाबलीपुरम का जिक्र मिलता है। महाराष्ट्र में बलिराजा के बारे में दो-तीन प्रचलित कहानियां मिलती है। महाराष्ट्र में एक बहुत ही अच्छी कहावत है– “इडा पीडा टळो, बळीचे राज्य येवो”। यानी जितनी भी समस्याएं हैं, दुख हैं, वे टल जाएंगे, उनका निवारण हो जाएगा जब बलिराजा का राज आएगा। दिलचस्प है कि बलि प्रतिपदा के मौके पर महाराष्ट्र में बहनें यह कहती हैं। लेकिन आज के जैसे सरकार की योजनाओं वाली लाडली बहनें नहीं।
पहले मातृसत्तात्मक व्यवस्था थी। बाद में पितृसत्ता स्थापित हुई। जब पितृसत्ता की तरफ लोग बढ़े थे उस समय बलिराजा ने अपनी बहनों को राज्य दिया। बहनें यानी स्त्रियां कहती थीं कि बलिराजा के राज में हमारे ऊपर हमले नहीं होते, अत्याचार नहीं होता। इसी समय महिलाओं के ऊपर अत्याचारों का दौर शुरू हो चुका था। द्रौपदी के चीरहरण की बात आती है। आज भी हम देखते हैं कि मणिपुर से लेकर अभी परसों काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में महिलाओं पर हमला किया गया। लेकिन जैसे आज की महिलाएं बिलकुल नहीं डरीं और उसी तरह उस समय की महिलाएं भी बहुत जीवट थीं। उन्होंने भी लड़ना शुरू कर दिया था। लेकिन एक समय ऐसा आया कि बलिराजा उस समय युद्ध के मैदान में थे और उनके राज्य के पुरुष भी युद्ध पर गए हुए थे। तब वामन ने अलग-अलग रूप लेकर उनकी स्त्रियों पर हमला किया। उसमें ब्रह्मा ने भी भट्ट वामन का रूप धारण किया था। ऐसा ब्राह्मणों के द्वारा कहा जाता है। इस ब्रह्मा की कहानी भी फुले ‘गुलामगिरी’ में जोड़ते हैं और उसे वर्तमान संदर्भ से भी जोड़ते हैं कि किस तरह ब्रह्मणवादियों ने बलिराजा के स्थान पर भट्ट वामन को प्रस्थापित करने की कोशिश की है। इस बारे में फुले लिखते हैं कि बलिराजा के बारे में कहानी बनाई गई की वह युद्ध में मर गए। उनके मरने की बात सुनकर स्त्रियों ने शोक मनाना शुरू कर दिया। यहां तक कि खुद को युद्ध में समर्पित करने की बात भी हुई। वहां से स्त्रियों के समर्पण की गाथा की शुरुआत हुई। बलिराजा के राज में जिस तरह की सुख-सुविधाएं थीं, वामन ने उन्हें खत्म कर दिया। उसने उनकी जमीनों और उनके नौ खंडों पर कब्जा करने की कोशिश की। जब स्त्रियां अकेली रह गईं तो वामन ने उनके ऊपर भी कब्जा करने की कोशिश की।
इसलिए बलिराजा का महत्व ये भी है कि किसी भी परिस्थिति में नहीं हारे और उन्होंने सभी लोगों को संरक्षित किया। इसलिए मराठी में “इडा पीडा टळो, बळीचे राज्य येवो” की कहावत है। बलिराजा के बारे में एक कहावत यह भी है कि बलि अगर है तो आपका कान वो पकड़ेगा।
बलि देने वाले वैदिकों के खिलाफ लड़ाई का पहला प्रतीक बलिराजा को माना जाता है। इसलिए बलिराजा का महत्व बहुत है। उन्होंने पूरी यज्ञ संस्कृति का विरोध किया और लोगों को ज़मीन और पशुओं का महत्व बताया। आज हम लोग बोलते हैं, लेकिन उस समय पशुओं की हत्या यज्ञों में आहूति के रूप में होती थी। कृषि संस्कृति में भी पशुओं की ऐसी हत्या नहीं होती थी। पशुओं की हत्या केवल पशु खाने तक ही सीमित थी। लेकिन यज्ञों में पशुओं की बलि देना, आर्यों के कारण शुरू हुआ था। यह वैदिक परंपरा से शुरू हुआ था। अश्वमेध यज्ञ में घोड़ों की बलि दी जाती थी या बैलों अथवा गायों की बलि दी जाती थी। ऐसी परंपरा भारत के कृषि इलाके में कहीं नहीं थी।

शाहूजी महाराज पर बात कहने से पहले मैं बताऊं कि कबीर की एक संकल्पना थी– अमरदेसवा। ऐसे ही संत रविदास की एक संकल्पना थी– बेगमपुरा। इनके बारे में काफी लिखा गया। डॉ. गेल ऑम्वेट जी ने तो किताब लिखी है– ‘सीकिंग बेगमपुरा : दी सोशल विजन ऑफ एंटी-कास्ट इंटेलेक्चुअल्स’। इस तरीके से हमारे यहां काफी सारे संतों ने ऐसी कल्पना की थी। जहां तक मुझे पता है बहुत सारी महिलाओं ने भी इसी तरह कल्पना की। अक्क महादेवी ने भी एक अलग कल्पना की थी कि हमारा समाज कैसा होना चाहिए। जनाबाई ने भी कल्पना की। उन्होंने कहा कि मेरा जो मिट्ठू है, मेरा भगवान है, वह भगवान है ही नहीं बल्कि वह तो मेरा दोस्त है। हम दोस्त के जैसे रह सकते हैं। स्त्री-पुरुषों के बीच नातेदारी और मित्रता का संबंध कैसा हो? जैसे संत रविदास और मीरा की दोस्ती की बात आती है। उस जमाने में मीराबाई कैसे निर्भयता के साथ निकलती हैं। लेकिन आज इसके बारे में बोला नहीं जाता है।
जैसे संत रविदास का बेगमपुरा था, वैसे ही फुले का बलिराज था। सभी को सम्मान देने वाला समतामूलक और न्यायप्रिय राज्य होना चाहिए। कोल्हापुर रियासत में शाहूजी का शासनकाल 1894 से 1922 तक रहा था। उन्होंने यह तय किया था कि उनकी रियासत में इस तरीके की संस्कृति रहेगी। देखिए कि ब्रिटिश सरकार ने सामाजिक न्याय का आगाज नहीं किया। यह शाहूजी की रियासत में उनके काल में होता है। यहां सामाजिक न्याय और आरक्षण की संकल्पना जो है शाहूजी बलिराजा से लेते हैं। बलिराजा के राज्य में जिस तरह से सामाजिक न्याय था, उसी तरीके का सामाजिक न्याय लागू किया जाएगा। यानी ज़मीन भी होगी, ज्ञान भी होगा, संस्कृति भी समृद्ध होगी और सभी को को न्याय मिलेगा। डॉ. भरत पाटणकर जो पानी के लिए संघर्ष चला रहे हैं, उसका नाम बहुत खूबसूरत है– समन्यायी जल वितरण। इसमें उनके साथ नागनाथ अन्ना और बाबूराव पाटणकर सहित और भी लोग हैं। यह जो समन्यायी शब्द है, उसका मतलब है न्याय के साथ पानी मिले। यानी किसी को चौबीसों घंटे और किसी को एक घंटा भी नहीं तो यह न्याय नहीं हो सकता है।
आप देखिए कि पानी के प्रबंधन और समुचित वितरण की व्यवस्था शाहूजी ने शुरू की। 1980 के दशक में श्रमिक मुक्ति दल के भरत पाटणकर और अन्य लोगों ने एक वैकल्पिक बांध बनाया, जिसका नाम बलिराजा डैम रखा गया। हालांकि हम नदियों पर बड़े बांधों का विरोध करते हैं, लेकिन गांवों को पानी मिले, इसके लिए डैम आवश्यक हैं। यही शाहूजी महाराज ने किया था। उन्होंने राधानगरी जैसा बांध बनवाया।
जब हम आरक्षण के मुद्दे पर पहले बात करते हैं तो हमें यह समझना चाहिए कि आरक्षण का मुद्दा समन्यायी की बात करता है। स्वयं शाहूजी इस बारे में क्या विचार रखते थे। बलिराजा के दर्शन में आरक्षण रूपी समन्यायी की संकल्पना है। जैसे आरक्षण सबसे पहले अंतिम व्यक्ति को मिलना चाहिए। स्त्रियों को मिलना चाहिए। ऐसी थी बलिराजा की संकल्पना थी। ऐसे ही शाहूजी कहते हैं कि उन्होंने अपनी रियासत के हर संस्थान में मागासवर्गीय (पिछड़े वर्गों) लोगों के लिए आरक्षण की घोषणा की। इसके अलावा उन्हें शिक्षित करने व प्रोत्साहन देने के लिए हमने कुछ कदम उठाए हैं। बहुत सोचने के बाद मुझे लगा कि उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद भी वंचित समुदायों के बच्चों के पास किसी भी तरह का अवसर नहीं है। अगर उन्हें अवसर देना है तो शासकीय स्तर पर एक योजना और एक नीति के तहत काम करना होगा। देखा जाना चाहिए कि यह कितनी बड़ी बात है कि जिस समय एक तरफ तिलक थे और दूसरी तरफ शाहूजी थे। तिलक के बारे में कहानी क्या है? तिलक के बचपन के बारे में एक कहानी है कि उनके क्लास में मुंगफली के छिलके पड़े हुए थे। बच्चों ने मुंगफली खाकर छिलके वहीं फेंक दिया। जब शिक्षक ने तिलक से पूछा और उठाकर फेंकने को कहा तो उन्होंने कहा कि मैंने तो खाया ही नहीं है, इसलिए मैं छिलका नहीं उठाऊंगा। इसे तिलक का स्वाभिमान बताया जाता है। दूसरी ओर शाहूजी कहते हैं कि ऐसी ही बात अगर निम्न जातियों के बच्चों ने कहा होता – आपने तो बाहर पूरा मल-मूत्र कर रखा है तो हम क्यों उठाएंगे – तो इसके बारे में क्या कहा जाता?
देखिए कि दो नेताओं में कितना बड़ा फ़र्क़ है। ऊंची जातियों के लोग गंदगी करेंगे और निम्न जातियों के लोग सारा साफ करेंगे। ऊंची जाति के लोग सारी चीजों का उपभोग करते हैं। कुम्हार से मिट्टी के बर्तन लेते हैं, लोहार से लोहे के शस्त्र लेते हैं। ऊंची जातियों के लोगों को इन लोगों से सबकुछ लेना है, लेकिन लोहार को अछूत मानना है, धोबी को अछूत मानना है, माली को अछूत मानना है। यह समाज जाति और वर्ण आधारित भेदभावों को मानता है। लेकिन शाहूजी के राज में यह व्यवस्था खारिज कर दी गई। जैसे बलिराजा ने अपने सभी नौ खंडों (प्रांतों) में समतामूलक राज कायम किया था, जिसे देखकर भट्ट ब्राह्मणों – ब्रह्मा और विष्णु – को बहुत तकलीफ़ हुई थी। ऐसा पौराणिक कथाओं में कहा गया है। शाहूजी ने देखा कि ब्रिटिश जरूर हैं, लेकिन उनके होने से कुछ नहीं होगा। शिक्षा की जिस क्रांति की शुरुआत महात्मा जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले ने शुरू की, वह शिक्षा सबको समान मिलनी चाहिए। ऊंची जातियों के जो लोग उनकी पहल का विरोध करते थे, धीरे-धीरे वे भी उनके विद्यालयों में शिक्षा लेने लगे। 1848 में जब फुले दंपत्ति के स्कूल खुल गए और 1902 तक आते-आते सभी जातियों के बच्चों ने पढ़ाई की। लेकिन रोजगारों पर ऊंची जातियों के लोगों का कब्जा हो गया। और जो पिछड़े लोग थे, निम्न लोग थे, वे अपने-अपने कामों में ही लगे रहे। किसान किसान ही रह गए। मज़दूर मजदूर ही रह गए। धोबी धोबी रह गए। लोहार लोहार रह गए। उन्हें कोई अवसर नहीं मिला था। यह अवसर उन्हें शाहूजी ने दिया। शाहूजी ने स्कूल और हॉस्टल खोले, लेकिन केवल मागास वर्ग यानी पिछड़े वर्गों के लिए नहीं खोले, बल्कि ब्राह्मणों, पारसियों और मुसलमानों के लिए भी खोले। स्कूलों में जब वे एक-दूसरे के साथ खाना खाने से इंकार करने लगे तब शाहूजी ने यह तय किया कि पहले ही सबको एक साथ नहीं जोड़ सकते। इनके लिए अलग-अलग हॉस्टल खोलने होंगे और फिर धीरे-धीरे उन्हें एक साथ लाना होगा। उन्होंने तो जैन लड़कियों का भी अलग से स्कूल खोला और मैं बता दूं कि तकरीबन आठ जैन लड़कियां उस समय उच्च शिक्षा के लिए इस कोल्हापुर रियासत की सहायता से विदेश गईं। डॉ. आंबेडकर की मदद जैसे सयाजीराव गायकवाड़ ने की थी, उसी तरीके से डॉक्टर रखमाबाई को कोल्हापुर रियासत से भी मदद मिली। तो जो महिलाएं डॉक्टर बनने के लिए तैयार थीं, जो महिलाएं उच्च शिक्षा लेने के लिए तैयार थीं, उनकी मदद शाहूजी ने की। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी बहन को भी पढ़ाया-लिखाया। उनसे प्रेरणा लेकर विट्ठल रामजी शिंदे अपनी बहन को पढ़ाते हैं। आप देखें कि उसी दौर में एक महर्षि करवे थे। वे कहते थे कि अभी तक हमारे संस्थान में निचली जाति के महिलाओं को लेने की शुरुआत नहीं हुई। ऐसा कहते हुए उन्होंने अपने संस्थान में विट्ठल रामजी शिंदे की बहन को प्रवेश नहीं दिया। लेकिन करवे के बहुत पहले महात्मा जोतीराव फुले 1848 में सभी को प्राथमिकता देते हैं। उनका कहना था कि मैं सभी को अपने हृदय से लगाता हूं। वे चार-वर्णी व्यवस्था पर प्रहार करते हैं, लेकिन साथ ही, उनमें बहुत करुणा है। अभी महात्मा फुले के जन्म के दो सौ साल हुए हैं। एक तरह से द्विशताब्दी वर्ष शुरू हो रहा है। लोग उनके बारे में सोचेंगे-विचारेंगे। फुले की करुणा शाहूजी में दिखती है। शाहूजी महाराज से सयाजी राव गायकवाड़ तक दिखती है। यही करुणा डॉ. आंबेडकर तक आई। यह करुणा तथागत बुद्ध से शुरू होती है। जिससे ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ की संकल्पना निकली। शाहूजी ने इसी आधार पर ऐसी व्यवस्था अपनी रियासत में कायम की जो अंग्रेजों के यहां भी नहीं थी। अंग्रेज तो ब्राह्मणों का साथ भी देते थे। कुछ मिशनरियों के स्कूल बहुत अच्छे थे, लेकिन सभी में ईस्ट इंडिया कंपनी का स्वार्थ था।
शाहूजी ने पढ़ाने की तकनीक पर भी ध्यान दिया। महिलाओं के लिए खेलकूद की व्यवस्था की। उन्होंने तय किया था कि महिलाओं को भी कुश्ती सिखाई जाएगी। आज हम गीता फोगाट, बबीता फोगाट की बात करते हैं। लेकिन शाहूजी ने अपने समय में महिलाओं को खेलकूद और आर्मी का प्रशिक्षण दिया। ऐसी प्रगतिशील सोच थी उनकी। इतना ही नहीं, उन्होंने पेंटिंग को बढ़ावा दिया। अक्सर जब पेंटिंग की बात होती है तो अमृता शेरगिल की बात कही जाती है कि वह कितनी महान पेंटर थीं। लेकिन शाहूजी के राज में बहुत सारे लोग पेंटिंग करने वाले थे।
शाहूजी के कृतित्व और व्यक्तित्व के संबंध में अभी-अभी कुछ दस्तावेज मिल रहे हैं। हमें पता चलता है कि उनका नजरिया वैज्ञानिक नजरिया था। उन्होंने केवल प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की ही व्यवस्था नहीं की बल्कि उच्च शिक्षा की भी व्यवस्था कायम की, ताकि युवा साइंटिस्ट, डॉक्टर और इंजीनियर बन सकें। टीपू सुल्तान ने जिस तरह से अपनी रियासत में इंजीनियरिंग की शिक्षा को महत्व दिया था, वैसे ही शाहूजी ने भी दिया। दोनों अपने समय से बहुत आगे थे। यह मैं देख कर अचंभित होती हूं कि हमारे यहां ऐसे लोग थे जिन्होंने इंजीनियरिंग की शिक्षा दी।
मुझे लगता है कि सामाजिक न्याय की संकल्पना को जिस तरीके से शाहूजी ने आगे बढ़ाया वह कोई सुंदर कहानी नहीं, बल्कि हकीकत है। एक बार शाहूजी के एक मित्र उनके यहां आए हुए थे। उनके मित्र ने जब उनसे पूछा कि आरक्षण क्यों देना चाहिए तो शाहूजी उन्हें साथ लेकर अपने अस्तबल में गए। वहां एक घोड़ा था। वह बिल्कुल पतला-दुबला था, कमजोर था। एक दूसरा घाेड़ा तगड़ा और मजबूत था। उसके सामने बहुत अच्छा खाना था। शाहूजी ने अपने मित्र से कहा कि इन दोनों में रेस लगाते हैं। तब उनके मित्र ने कहा कि यह कमजोर और पतला-दुबला घोड़ा क्या रेस जीतेगा? तो शाहूजी ने उससे पूछा कि तो फिर यह रेस जीत सके, इसके लिए क्या करना होगा? उनके मित्र ने कहा कि पहले इस कमजोर घोड़े को दूसरे घोड़े की तरह तगड़ा बनाया जाए। इस पर शाहूजी ने कहा कि आपने खुद से ही अपने सवाल का जवाब दे दिया है कि आरक्षण क्यों दिया जाना चाहिए।
शाहूजी ऐसे ही थे। एक बार दीपावली का मौका था। उनके यहां काम करने वाला एक लड़का कुछ छिपाने की कोशिश कर रहा था। शाहूजी को पहले थोड़ा शक हुआ कि लड़का क्या छुपा रहा है। जब उन्होंने पूछा तो वह लड़का थोड़ा डर गया। शाहूजी ने कहा कि डरो मत, बताओ तो क्या है? उन्होंने देखा कि उसकी मां ने उसे जवार की रोटी और मिर्ची की चटनी दी है और वह खाने ही वाला है। तब शाहूजी की आंखों में आंसू आ गए कि मेरे घर में त्यौहार है, मैं राजा हूं और मैं सबके साथ आज त्यौहार मनाने वाला हूं और मेरे यहां काम करने वाला यह लड़का जवार की रोटी और चटनी खा रहा है। उन्होंने तुरंत उस लड़के के लिए नए कपड़े लाने का आदेश दिया और कहा कि उसके घर में भी त्यौहार का खाना हमारे घर से जाएगा। जैसे ही शाहूजी की पत्नी को यह पता चला तो उन्होंने कहा कि ऐसा है तो फिर उन्होंने सभी कर्मियों के लिए नए कपड़े और खाना की व्यवस्था सुनिश्चित करवाई।
ऐसे ही कुछ और बातें और भी हैं। उन दिनों हिंदू-मुस्लिम दंगे होते थे। शाहूजी जानते थे कि इनके पीछे कौन लोग थे। ये वही लोग थे जो बंटवारा चाहते थे। यह अंग्रेजों की नीति रही है और यहां के ब्राह्मणों की भी नीति रही है। उन्होंने तय किया कि उनकी रियासत में यह दंगे की संस्कृति को बाहर रखना होगा और मानवता की संस्कृति बनानी होगी, ताकि हिंदू और मुस्लिम दोनों आपसी भाईचारे के साथ रहें। एक समय था जब मोहर्रम के मौके पर ताजिया निकाली जाती तब हिंदू, मुसलमानों के लिए ताजिया बनाते थे। ऐसे ही हिंदुओं के त्यौहार में मुस्लिम आगे रहते थे। कितनी सुंदर परंपरा थी यह। लेकिन आज ऐसा माहौल हिंदुत्ववादियों ने बना दिया है कि हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे को शक की निगाह से देखते हैं। इनके पाखंड और चरित्र को उजागर करने वाले पानसरे, दाभोलकर और गौरी लंकेश का खून बहाया गया। यह सब हमने देखा है। गोविंद पानसरे कोल्हापुर के ही रहने वाले थे। उन्होंने लोगों को बताया कि शिवाजी असल में कौन थे। कैसे वे प्रजा के राजा थे? पानसरे जी ही थे, जिनकी वैचारिकी फुले, शाहूजी और डॉ. आंबेडकर से जुड़ी हुई थी।
इस सामाजिक क्रांति की परंपरा को को हमें जीवित रखना है। आज दिल्ली में युवाओं को जो जीत मिली है, वह इसी कारण से मिली है।
आज हम स्त्री और पुरुष के बीच समानता की बात करते हैं, लैंगिक न्याय की बात करते हैं। लेकिन मैं आपको बताऊं कि ये बातें शाहूजी ने अपने शासनकाल में कही थी। इसके लिए कार्य भी किये। उन्होंने कृषि प्रबंधन की बात कही। मजदूरों की बात कही। उन्होंने जेंडर जस्टिस को भी समझा और कास्ट को भी। लेकिन इस राजा को बहुत अपमान सहन करना पड़ा खासकर वेदोक्त प्रकरण के कारण। ऐसा ही शिवाजी के समय भी हुआ था और इसलिए काशी से उन्हें ब्राह्मणों को बुलवाना पड़ा था।
इसी तरीके से हमने आज भी देखा है कि राष्ट्रपति होने के बावजूद द्रौपदी मुर्मू को मंदिर के गर्भगृह में अंदर नहीं आने दिया गया। राम मंदिर का उद्घाटन हुआ तो उन्हें अलग रखा गया। हालांकि राम मंदिर के पुजारी चोरी करते हैं, यह सामने आ चुका है। लेकिन एक आदिवासी अगर राष्ट्रपति है और राष्ट्रपति प्रधानमंत्री से बड़ा होने के बावजूद भी उन्हें अंदर प्रवेश नहीं करने दिया जाता है। यह जो पूरा ब्राह्मणवाद आज है, उसके खिलाफ उस समय लड़ना शाहूजी के लिए कितना मुश्किल रहा होगा। लेकिन शाहूजी ने अपनी पहचान सबसे अलग रखी। इसलिए उनको केवल शाहूजी महाराज नहीं कहा जाता है। उन्हें रैयत का राजा कहा जाता है। यहीं संबोधन शिवाजी महाराज के लिए भी था। राजर्षि ऐसे शाहूजी रैयत के राजा बने, लोगों के राजा बने, समन्याय के प्रतीक बने। यह प्रतीक बलिराजा के समन्याय का प्रतीक है। ऐसे शाहूजी द्वारा आरक्षण लागू किए जाने की वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर आपने मुझे संबोधन का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपके प्रति आभारी हूं।
(संपादन : फ़ैयाज़ आलम/नवल/अनिल)
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