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‘जाति के अंत के लिए बुद्ध, फुले और आंबेडकर तीनों आवश्यक’

‘छत्रपति शाहू महाराज ने महात्मा फुले के समग्र वैचारिक दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया था। यह तथ्य है। उन्होंने फुले के विचारों में से केवल यह स्वीकार किया कि जाति-व्यवस्था अन्यायपूर्ण, शोषणकारी और समाज की प्रगति में बाधक है।’ पढ़ें, डॉ. भरत पाटणकर का यह संबोधन

[गत 25 जुलाई, 2026 को फारवर्ड प्रेस द्वारा आरक्षण दिवस (26 जुलाई, 1902) की पूर्व संध्या पर ऑनलाइन गोष्ठी आयोजित की गई। इसका विषय था–‘मौजूदा आरक्षण के संदर्भ में फुले का बलिराज और शाहूजी महाराज की विरासत’। इसमें मुख्य वक्ता डॉ. लता प्रतिभा मधुकर और डॉ. सिद्धार्थ रामू रहे। फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार ने इसका संचालन किया। गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. भरत पाटणकर ने की। प्रस्तुत है उनका संबोधन]

आज [गोष्ठी] का जो विषय है – ‘मौजूदा आरक्षण के संदर्भ में फुले का बलिराज और शाहूजी महाराज की विरासत’ – इसमें जाति व्यवस्था के अंत के संदर्भ में, स्त्री आजादी के संदर्भ में बातचीत होनी चाहिए। मैंने दो-तीन बातों को गोष्ठी के दौरान सुना। हमें समझना होगा कि महात्मा फुले ने इसके बारे में क्या कहा। उन्होंने अपने ग्रंथ ‘गुलामगिरी’ में क्या कहा है। इसमें उन्होंने मुख्य रूप से यही कहा है कि हमारा इतिहास ब्राह्मणों ने अलग तरीके से लिखा हुआ है और उस इतिहास में हम सभी लोगों को गुलामी करने के लायक कहा गया है। जिन लोगों को गुलाम बनाया गया, फुले ने उसकी व्याख्या भी की है।

महात्मा फुले का फार्मूला है कि – स्त्री, शूद्र, अतिशूद्र – इनका अलायंस [एकता] होना चाहिए। फुले का कहना था कि स्त्रियां चाहे किसी भी जाति की भी हों, वो शोषित हैं। और सबसे ज्यादा शोषित गैर-ब्राह्मण स्त्रियां हैं।

और [फुले ने] शूद्र किसको कहा था? जो लोग अपने हाथ से काम करते हैं, चाहे वे खेती करने वाले हों या मछुआरे हों, कारीगरी करने वाले हों, सफाई करने वाले हों। तो यह सारे जो काम हैं, जिन्हें ‘गंदा’ कहा जाता है, उन्हें छोड़कर श्रमसाध्य कार्य करने वाले, जिनके पास मेहनत करने के सिवाय दूसरा कोई काम नहीं है, उन्हें शूद्र कहा गया। ऐसे ही, अतिशूद्र किसे कहा गया? जिन कामों में मेहनत भी लगती है और वे काम ऐसे चुने गए हैं, जिन्हें गंदा भी समझा जाता है। [इन्हें फुले ने अतिशूद्र कहा।]

इस जाति-व्यवस्था को कैसे खत्म करना है, इसे फुले ने एक कोण से नहीं देखा है। उनका एक कथन है कि जो गुलाम बने हैं यह लोग, इसलिए बने हैं, क्योंकि उनके पास विद्या नहीं है, क्योंकि समाज में उन्हें पढ़ने-लिखने का अधिकार नहीं था। इसकी इजाज़त नहीं थी। विद्या बंदी को बहुत महत्व दिया गया था।

हमारा अपना ज्ञान अप्लाइड [व्यवहारिक] ज्ञान है। जैसे कि हमारी कारीगरी, हमारी खेती। यानी हमारे लोगों को थियोरेटिकल नॉलेज [सैद्धांतिक ज्ञान] नहीं दिया जाता है। तो हमें क्या करना चाहिए? हमें अपने लोगों को सैद्धांतिक ज्ञान देना चाहिए, क्योंकि जब तक हम यह नहीं देंगे तब तक हम क्रिएटिव [सृजनशील] नहीं बन सकते हैं। हमारे अपने ज्ञान की निर्मिति हम नहीं कर सकते हैं। विद्या बंदी इसी अर्थ में था।

ज्ञान एक भौतिक ताकत है। ज्ञान को फुले ने भौतिक ताकत माना। और यह भौतिक ताकत ऐसी है जो अगर हमारे पास है तो ही हम सभी कल्पनाओं को आत्मसात करके व्यवहार के स्तर पर गुलामी से मुक्त हो सकते हैं। बिना सैद्धांतिक ज्ञान के हम यह नहीं कर सकते।

महात्मा फुले ने ज्ञान को व्यवहार में करके दिखाया। खेती क्षेत्र को मद्देनजर रखते हुए ‘शेतकऱ्याचा असूड’ (किसान का कोड़ा) किताब लिखी। किसानों में सभी जातियां, जो कष्ट सहने वाली हैं, और मेहनत से काम करने वाली हैं। फुले ने वैज्ञानिक तरीके से खेती-पानी का संबंध, खेती-जंगल संबंध और खेती-उद्योग का संबंध इन तीन कोणों से खेती की तरफ देखा है।

अगर हम खेती को इन तीनों कोणों से नहीं देखेंगे, केवल खाना-पूर्ति करेंगे तो हम गुलाम ही रह जाएंगे। उसमें अलग-अलग चीजें ऐसी होनी चाहिए कि हमारा समाज अपने बलबूते खड़ा हो सके। हमें विकेंद्रित उद्योग निर्माण करना चाहिए। जो हम उगा सकते हैं उसके आधार पर उद्योग करना चाहिए। इस तरह फुले ने कृषि औद्योगिक समाज की कल्पना की। ऐसा करना है तो हमारे अंदर जो ऊंच-नीच अथवा ऊंची जाति-नीची जाति का भेद है, उसे खत्म करना होगा। यह इसकी पहली शर्त है। फुले ने यह भी कहा है कि हमें अंतरजातीय विवाह करना चाहिए। हमें औरतों को उनकी गुलामगिरी से निकालना चाहिए। नया समाज बनाने के लिए हमें एकजुट होना चाहिए।

इसका व्यवहारिक उदाहरण 1922-24 में तब नजर आया जब पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ जिलों में एक विद्रोह हो गया। यह विद्रोह सिर्फ किसानों का नहीं था, बल्कि शूद्र, अतिशूद्र और स्त्रियों का भी था। एक तरफ यह विद्रोह जमींदारों और साहूकारों के ख़िलाफ़ था तो दूसरी तरफ यह ब्राह्मणवादी शोषण के ख़िलाफ़ भी था। एक ही आंदोलन में जाति व्यवस्था अंत की दिशा और उसी आंदोलन में किसान मुक्ति, दोनों के बीज उसमें थे। यह बहुत ही सफल आंदोलन रहा और उसका प्रभाव वर्षों तक महाराष्ट्र में रहा। तो हम यह कहेंगे कि फुले का यह जो सूत्र है, उसमें एनिहिलेशन ऑफ कास्ट [जाति का विनाश] निहित है। उसमें ज्ञान और व्यवहार को एक साथ लाकर नई निर्मिति का सवाल है। स्त्री मुक्ति का सवाल है और कृषि औद्योगिक समाज का सवाल है। ये मुद्दे पूरे भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में लागू हो सकते हैं।

बुद्ध, जोतीराव फुले व डॉ. बी.आर. आंबेडकर

इसी के आधार पर फुले ने यह भी बताया है कि आरक्षण कैसे होना चाहिए। इसका इस्तेमाल शायद कांशीराम जी ने किया था। [जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी] जिस जाति का जितना प्रतिशत हो, उनको उतनी नौकरियां मिलनी चाहिए।

छत्रपति शाहू महाराज ने महात्मा फुले के समग्र वैचारिक दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया था। यह तथ्य है। उन्होंने फुले के विचारों में से केवल यह स्वीकार किया कि जाति-व्यवस्था अन्यायपूर्ण, शोषणकारी और समाज की प्रगति में बाधक है। इसलिए ऐसी व्यवस्था को चुनौती देना और उसे कमजोर करना आवश्यक है। उनका मानना था कि जिस जाति-व्यवस्था ने सदियों तक बहुजन समाज को शिक्षा, ज्ञान और अवसरों से वंचित रखा, उसे समाप्त किए बिना समानता और न्याय की स्थापना संभव नहीं है।

इसी सोच के आधार पर शाहू महाराज ने यह भी माना कि जो समुदाय ऐतिहासिक रूप से शिक्षा, रोजगार और सामाजिक अवसरों से वंचित रहे हैं, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए राज्य को विशेष उपाय करने चाहिए। इस उद्देश्य से उन्होंने शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का समर्थन किया तथा उसे व्यवहार में लागू भी किया। उनके लिए आरक्षण केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय की आंशिक भरपाई और सामाजिक न्याय स्थापित करने का एक प्रभावी माध्यम था।

अभी रिजर्वेशन की जो पॉलिसी है, उसमें सूचित जातियों के अंदर जो संघर्ष हो रहे हैं, यह होंगे ही, क्योंकि हम जाति-व्यवस्था को बरकरार रखते हुए विकास करने की राह पर जा रहे हैं। यह फुले जी का सपना नहीं था। इसलिए बाबा साहब डॉ. आंबेडकर ने भी अंतरिम अवधि के लिए आरक्षण को एक विकल्प के रूप में देखा था और शाहू जी महाराज ने भी ऐसे ही देखा था।

लेकिन शाहूजी महाराज में एक चीज खास थी। उनमें इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट के बारे में जागृति थी। वे इसके लिए पहल करते थे जिससे कृषि का ऐसे विकास हो, उद्योग-धंधों का विकास हो सके। वे मजदूरों की मदद करने के लिए, उनके लिए आंदोलन करने मुंबई वगैरह जाते थे। कुर्मियों की एक परिषद [बैठक] हुई थी यूपी-बिहार में, तो वहां पर शाहू महाराज ने कहा था कि मैं कुर्मी हूं। तो एक तरह से यह उनका दूसरा भी पक्ष है। लेकिन जब उनको ब्राह्मणों द्वारा कहा गया कि आपको वेदों का अधिकार नहीं है तो शाहूजी महाराज ने वेद पढ़ाने वाली पाठशाला शुरू की और क्षात्र जगतगुरु की स्थापना कोल्हापुर के नजदीक की। इससे उनके बाकी जो सारे कार्य हैं, उस पर धब्बा लगाने वाला काम उनके जीवन में हुआ है। उसकी वजह से जो मराठा खुद को कुनबी कहते थे, खुद को क्षत्रिय कहने लगे। उन्होंने कहा कि हम अगर मराठा कहें तो हम क्षत्रिय हैं, कुनबी नहीं हैं। और यह वेद पढ़ने की पाठशाला में मराठा जाकर मंत्र पढ़ना सीख जाएंगे। फिर वह ब्राह्मणों की जगह शादियां करवाएंगे, उपनयन संस्कार करवाएंगे। इसकी वजह से बीते दस वर्षों में मराठा क्रांती मोर्चा या मराठा समाज ने आंदोलन किया। यह आंदोलन जब हुआ तो आपत्तियां उठाई गईं कि तुम कौन हो, तुम क्षत्रिय मराठा हो या कुनबी मराठा हो? 1956 तक कोई भी खुद को क्षत्रिय मराठा या इस तरह का कुछ कहता नहीं था, लेकिन बाद में यह एकदम से हो गया। और यह सब शाहू जी की सलाह से हुआ। 

इस तरह विचारों के आधार पर शाहू जी महाराज को लेकर विरोधाभास दिखता है। एक तरफ सभी जातियों के लिए वे हॉस्टल बनाते हैं, आरक्षण लागू करने की पहल करते हैं जो कि भारत में पहली बार हुआ था तो दूसरी तरफ उन्होंने महात्मा फुले के विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास नहीं किया है। हालांकि उन्होंने अंतरजातीय विवाह करवाया। अपनी और भाई की बेटियों की शादी होलकर परिवार में किया। हालांकि होलकर राजा थे, वे धनगड़ (गड़रिया) थे। वह एक क्रांति थी लेकिन जाति के विनाश के संबंध में फुले का जो दृष्टिकोण था, वह शाहूजी के पास नहीं था। यदि बहुजन समाज को हमें आगे बढ़ाना है और यदि हमने शाहू जी की खामियों को ध्यान में नहीं रखा तो उनके अच्छे विचारों को भी आगे ले जाने में दिक्कतें आएंगीं।

अंत में मैं यह कहना चाहूंगा कि अब हमें आगे क्या करना चाहिए। एक कोशिश उत्तर प्रदेश में माननीय कांशीराम जी ने की थी। उन्होंने उत्तर भारत में फुले को आधार के रूप में लिया। मैं नहीं कह रहा हूं कि वे [कांशीराम] एक आदर्श थे, उन्होंने गलतियां कीं। लेकिन उन्होंने एक दिशा दी। वह सभी गैर-ब्राह्मणों को केवल एकजुट करने की दिशा नहीं थी। उत्तर प्रदेश में बसपा के मुख्यमंत्री बनने के बाद [कांशीराम की] सारी रणनीतियां धाराशायी हो गईं। उसके बाद उनकी कोई भी रणनीति फुलेवादी तरीके की नहीं थी। यह हम जानते हैं और मानते भी हैं। लेकिन एक कोशिश हुई थी। फुले को आधार बनाकर उन्होंने एक रणनीति बनाई। फुले और आंबेडकर के विचारों को शामिल किया और पूरे भारत में उन्होंने अच्छे तरीके से आंदोलन चलाया था।

बुद्ध की परंपरा तो उत्तर में भी है और दक्षिण में भी है। बहुत सारे लोगों को पता नहीं कि बुद्ध ने खेती के बारे में क्या कहा है। इसके बारे में भी चर्चा होनी चाहिए। बुद्ध, फुले और आंबेडकर के विचारों का सम्मिश्रण होगा, और पूरे भारत में उनके विचारों के आधार पर रणनीतियां बनाकर जाति का विनाश, वर्ग-भेद का नाश, महिलाओं की मुक्ति के आंदोलन को लेकर ही हम चर्चा आगे ले जा सकते हैं, और जमीनी स्तर पर कुछ कर पाएंगे।

(संपादन : फैयाज आलम/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

डा. भरत पाटणकर

महाराष्ट्र के सांगली जिले के एक गांव कासेगांव के निवासी डा. भरत पाटणकर लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। श्रमिक मुक्ति दल के संस्थापक डा. पाटणकर ने किसानों के आंदोलनों का नेतृत्व किया है। इसके अलावा गेल ऑम्वेट के साथ मिलकर इन्होंने अनेक शोध प्रबंधों का लेखन किया है। इनकी प्रकाशित कृतियों में “कांटेंपररी कास्ट सिस्टम”, “महात्मा फुले आणी सांस्कृतिक संघर्ष” व “दी सांग्स ऑफ तुकोबा” (सहअनुवाद : गेल ऑम्वेट) शामिल हैं।

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