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आइए, मंडल कमीशन की रिपोर्ट को समझें (दूसरा भाग)

मंडल कमीशन की सिफारिशें ऐसी थीं, जो लागू हो जातीं तो भारत आज कमोबेश चीन की अर्थव्यवस्था के आस-पास खड़ा होता। कम-से-कम मिडिल इनकम देशों की श्रेणी में होता। मध्यवर्ग का दायरा आज की तुलना में कई गुना बड़ा होता। पढ़ें, डॉ. सिद्धार्थ रामू द्वारा मंडल कमीशन की रिपोर्ट और उसमें उद्धृत अनुशंसाओं के विश्लेषण का दूसरा भाग

पहले भाग से आगे : क्या होता यदि मंडल कमीशन की सभी सिफारिशें ईमानदारी से लागू कर दी जातीं?

मंडल कमीशन की रिपोर्ट की मौजूदा दौर में प्रासंगिकता और अहमियत को समझने के लिए हमें अत्यंत संक्षेप में सही, कमीशन के गठन के इतिहास और उसकी सिफारिशों को देख लेना चाहिए। 20 दिसंबर, 1978 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने संसद में दूसरा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की घोषणा की थी। परिणामस्वरूप 1 जनवरी, 1979 को तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी के द्वारा इसके गठन की अधिसूचना जारी की गई। चूंकि इस आयोग का अध्यक्ष पूर्व सांसद बी. पी. मंडल को बनाया गया था, इसलिए इसे मंडल कमीशन के नाम से भी जाना जाता है। इसके अध्यक्ष सहित इस आयोग के कुल 6 सदस्य थे। इस आयोग ने दो वर्षों के अंदर ही अपनी रिपोर्ट 31 दिसंबर, 1980 को राष्ट्रपति को सौंप दिया था।

इसे दूसरा राष्ट्रीय द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग इसलिए कहा जाता है, क्योंकि पहले राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन काका कालेलकर की अध्यक्षता में 29 जनवरी, 1953 को किया गया था। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट 23 मार्च, 1955 को सौंपी थी। तत्कालीन नेहरू सरकार द्वारा इस आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकृत कर दिया गया था।

सनद रहे कि दोनों आयोगों का गठन संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत किया गया था, जिसके अनुसार, राष्ट्रपति ऐसे आयोग की नियुक्ति कर सकते हैं जो:

1. सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की दशा और उनकी कठिनाइयों की जांच करे;

2. उनकी स्थिति सुधारने के लिए उपायों की सिफारिश करे; और

3. राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे।

अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए मंडल कमीशन ने जो अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति सौंपी, वह 2 भागों, 7 खंड़ों और 14 अध्यायों में विभाजित है। इसमें कुल 404 पृष्ठ हैं।

यहां यह सवाल खड़ा होता है कि दूसरा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग और ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के बीच क्या रिश्ता है? क्यों इसे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से जोड़कर देखा जाता है? इसकी मूल वजह यह है कि ऐतिहासिक तौर पर सामाजिक एवं शैक्षणिक तौर पर पिछड़े वर्ग के दो घटकों – एससी एवं एसटी (दलित और आदिवासी) – की पहचान संविधान के निर्माण से पहले ही की जा चुकी थी और संविधान लागू होने के बाद एससी-एसटी को उनकी जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सरकारी नौकरियों/सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण का प्रावधान कर दिया गया था।

बताते चलें कि पिछड़े वर्ग के वंचित तबके रूप में एससी समुदाय वह समुदाय था, जिसे पिछड़े वर्ग की अन्य वंचनाओं के साथ अस्पृश्यता का शिकार भी बनाया गया था। संविधान में एससी-एसटी को अन्य विभिन्न तरह के संरक्षण और उनकी उन्नति-प्रगति के लिए विशेष प्रावधान भी किए गए थे और ऐसे अन्य प्रावधान करने के लिए कानूनों को बनाने का रास्ता भी साफ कर दिया गया था। मसलन, संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता का उन्मूलन किया था और इसे एक दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया था। एसटी समुदायों के हितों की रक्षा के लिए संविधान के अनुच्छेद 244 और पांचवी-छठी अनुसूची के तहत प्रावधान लागू किए गए, जो आज भी लागू हैं।

ऐतिहासिक तौर पर यह स्वयं सिद्ध तथ्य था कि एससी-एसटी के अलावा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग एक बड़ा समुदाय ऐसा है, जो वर्ण-जाति व्यवस्था के भीतर सामाजिक-शैक्षणिक वंचना के साथ आर्थिक-राजनीतिक वंचना का भी शिकार था। ऐसे वर्गों की पहचान और उन्नति-प्रगति के लिए सिफारिशें करने का कार्यभार एक आयोग को देने का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 340 में किया गया। मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट और सिफारिशों में यही कार्यभार पूरा किया।

अक्सर सामाजिक न्याय के सवाल को आरक्षण के दायरे तक सीमित कर दिया जाता है। एक ऐसी समझ बना दी गई है कि सामाजिक न्याय और आरक्षण एक-दूसरे के पर्याय हैं या सामाजिक न्याय का कार्यभार पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था से संपन्न हो सकता है, या हो जाता है। यह समझ बहुत सीमित और अधूरी है। आरक्षण मंडल कमीशन की रिपोर्ट और सिफारिशों का सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा है। असल में, मंडल कमीशन ने सिर्फ सरकारी सेवाओं/नौकरियों और शिक्षा संस्थाओं में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिशें ही नहीं प्रस्तुत किया था, उच्च जातियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व को कैसे तोड़ा जाए, इस चौतरफा वर्चस्व की अधीनता में जीने वाले पिछड़े वर्गों को इस अधीनता से कैसे मुक्त किया जाए और इस अधीनता के चलते पिछड़े वर्गों के बीच पैदा हुई वंचना को कैसे खत्म किया जाए, इसके लिए उस समय के अनुसार मुकम्मल और ठोस सिफारिशें भी प्रस्तुत की थीं, जिनमें से एक सिफारिश आरक्षण से संबंधित भी है।

तमाम प्रतिबंधों और शर्तों के साथ नौकरियों और शिक्षा संस्थानों के मामले में, जो दो सिफारिशें लागू हुईं, उसने भारतीय समाज को कितना समावेशी बनाया, किस हद तक सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र का विस्तार किया, इस बारे में बहुत सारी रिपोर्टें आ चुकी हैं, जो इसकी सकारात्मक भूमिका को रेखांकित करती हैं। हालांकि पहली सिफारिश में शामिल यह अनुशंसा कि  पदोन्नति में ओबीसी को आरक्षण मिले, लागू नहीं किया गया। इसके अलावा मंडल कमीशन ने क्रीमीलेयर की कोई बात नहीं की थी और न ही वी.पी. सिंह ने लागू करने की घोषणा के समय यह प्रतिबंध लगाया था। क्रीमीलेयर का प्रतिबंध सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाया गया।

नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के अलावा शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े वर्गों के छात्रों के लिए कई अन्य महत्वपूर्ण सिफारिशें मंडल कमीशन ने की थीं। जैसे कि बडे़ पैमाने पर पिछड़े वर्गों के छात्रों के लिए हॉस्टल, जिनमें खाने, रहने की मुफ्त सुविधाएं हों, पिछडे़ वर्गों की घनी आबादी वाले इलाकों में आवासीय विद्यालय, देश-विदेश में पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति, प्रोफेशनल इंस्टीट्यूशंस और कोचिंग संस्थान आदि की सिफारिश की गई थीं। आयोग ने किसी भी तरह से सरकारी सहायता प्राप्त करने वाले निजी संस्थानों में आरक्षण लागू करने की भी सिफारिश की थी। इसमें से कुछ भी लागू नहीं किया गया। सरकारी नौकरियों में और उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण – किसी तरह दो सिफारिशों को आधे-अधूरे तरीके से लागू किया गया, जिसके दायरे में बहुलांश मध्यवर्गीय या ज्यादा-से-ज्यादा कुछ निम्न मध्यवर्गीय समूह आते हैं। लेकिन अन्य कई महत्वपूर्ण सिफारिशें, जिन्हें यदि लागू कर दिया जाता, तो उत्पादक, कारीगर और मेहनतकश समूहों की जिंदगी में गुणात्मक परिवर्तन ला देतीं। लेकिन उन सिफारिशों की न तो चर्चा की जाती है, न ही उन्हें लागू करने के बारे में कोई बात होती है।

दूसरे राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के पहले भाग का आवरण पृष्ठ व आयोग के अध्यक्ष बी.पी. मंडल

यहां तक कि जो समूह या वर्ग इन दो सिफारिशों के लागू होने से लाभान्वित हुआ, वह भी अन्य मुख्य सिफारिशों की कोई चर्चा नहीं करता है। स्वयं आयोग ने कहा था कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण से बहुत छोटे हिस्से की जिंदगी में परिवर्तन आएगा। शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी अधिकांश सिफारिशें भी तो लागू ही नहीं की गईं। इन सिफारिशों के अलावा वे कौन-कौन सी अन्य चार-पांच सिफारिशें थीं, जो यदि लागू हो जातीं तो भारत में सचमुच सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र काफी हद तक कायम हो जाता। ये सिफारिशें निम्न थीं–

1. उत्पाद संबंधों में ढांचागत परिवर्तन लाने हेतु भूमि सुधार की सिफारिश

मंडल कमीशन ने जो सबसे बड़ी सिफारिश मेहनतकश उत्पादकों और गरीबों के लिए की थी। वह थी, प्रगतिशील क्रांतिकारी भूमि सुधार। आयोग ने साफ-साफ शब्दों में भूमिहीन समूहों को खेती योग्य भूमि देने की बात की थी। आयोग इससे देश भर के मौजूदा उत्पादन संबंधों में ढांचागत एवं प्रभावी बदलाव लाने की बात करता है। इसके लिए सीलिंग लागू करने की सिफारिश करता है। मंडल कमीशन की यह सिफारिश भारत के बहुसंख्यक लोगों की जिंदगी बदल देती। खासकर पिछड़े वर्गों में सेवक, दस्तकार और कारीगर जातियों और व्यापक पैमाने पर भूमिहीनता के शिकार एससी समुदाय की।

भूमि सुधार भारतीय पूंजीवादी विकास और बाजार को कितना बड़ा बना देता, इस संदर्भ में बहुत कुछ लिखा जा चुका है और बहुत सारी रिपोर्टें आ चुकी हैं। भारत का मध्यवर्गीय दायरा और लोगों की क्रय शक्ति कितनी बढ़ जाती, इसके भी बहुत सारे आंकड़े हैं। लेकिन मंडल कमीशन की क्रांतिकारी भूमि सुधार और इससे जुड़े संरचनागत परिवर्तन की सिफारिश पर न तब चर्चा हुई, न अब होती है। अब तो यह कहा जाता है कि भूमि सुधार की जरूरत ही नहीं रह गई है।

गौर तलब है कि मंडल कमीशन के अध्यक्ष बी.पी. मंडल खुद एक बडे़ भूस्वामी थे, लेकिन उन्होंने अपनी सिफारिश में भूस्वामियों की जगह भूमिहीनों को केंद्र में रखा। लेकिन अब तो भूमि सुधार और उत्पादन संबंधों में ढांचागत एवं प्रभावी बदलाव को कुछ सिरफिरे क्रांतिकारी लोगों या कुछ एक संगठनों की सिरफिरी मांग कहने का रिवाज चल पड़ा है।

2. छोटे और मझोले उद्योगों को सबसे अधिक बढ़ावा देने की सिफारिश

मंडल आयोग भूमि सुधार के बाद सबसे अधिक जोर छोटे और मझोले उद्योगों को बढ़ावा देने पर जोर देता है। इसके लिए सरकार से यह मांग करता है कि इन उद्योगों को पूंजीगत सहायता के साथ तकनीकी सहायता भी मुहैया कराई जाए। आयोग की नजर में छोटे और मझोले उद्योगों का व्यापक विस्तार और विकास ही देश के बहुसंख्यक लोगों की जिंदगी में समृद्धि ला सकता है। आज भी यही उद्योग देश में कृषि के बाद सबसे अधिक रोजगार यानी रोजी-रोटी उपलब्ध कराते हैं। हालांकि पिछले 12 सालों में इन्हें तबाह और बर्बाद किया गया है। छोटे और मझोले उद्योगों का सिकुड़ना देश में बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण है, लगभग सभी अर्थशास्त्री इसे स्वीकार करते हैं। देखिए कि मंडल आयोग 1980 में पुरजोर तरीके से इसकी वकालत करता है। जबकि बी.पी. मंडल और मंडल आयोग की बात करनेवालों ने भी कभी इसकी कोई जोर देकर चर्चा नहीं की। जबकि भूमि सुधार के बाद लोगों के जीवन में गुणात्मक परिवर्तन लाने का यह सबसे बड़ा उपाय साबित होता।

3. देशव्यापी स्तर पर पेशेगत समूहों की सहकारी समितियां

मंडल आयोग की सिफारिशों को देखकर लगता है कि आयोग को इस बात का गहरा अहसास था कि सहकारी समितियां देश और बहुसंख्य लोगों की समृद्धि और उनके जीवन में गुणात्मक विकास के लिए अपरिहार्य हैं। आयोग पेशेगत समूहों की सहकारी समितियों की बात करता है। जैसे दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति, जो आज देश में एक कारगर सहकारी समिति है। आयोग इसी तरह के अन्य उत्पादकों की सहकारी समितियां बनाने की सिफारिश करता है। उसकी इस सिफारिश पर भी चुप्पी साध ली गई।

4. ग्रामीण कारीगरों को व्यवसायिक परीक्षण और वित्तीय एवं तकनीकी सहायता

आयोग लोहार, बढ़ई, तेल निकालने वालों, बर्तन बनाने वालों (कुम्हार-ठठेरा) को आदि व्यवसायिक प्रशिक्षण देने और वित्तीय एवं तकनीकी सहायता देने की सिफारिश करता है। यह कदम ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समृद्ध बनाती ही, साथ में लोगों को कुशल कारीगर में तब्दील कर देती। लोगों की क्रय शक्ति बढ़ती और देशव्यापी स्तर पर मांग बढ़ती, जो पूरे देश की समृद्धि और लोगों के जीवन में गुणात्मक परिवर्तन का कारण बनती।

मंडल कमीशन की ये ऐसी सिफारिशें थीं, जो लागू हो जातीं तो भारत आज कमोबेश चीन की अर्थव्यवस्था के आस-पास खड़ा होता। कम-से-कम मिडिल इनकम देशों की श्रेणी में होता। मध्यवर्ग का दायरा आज की तुलना में कई गुना बड़ा होता। निम्न मध्यवर्गीय और गरीब कहे जाने वाले लोगों का जीवन भी आज की तुलना में गुणात्मक तौर पर भिन्न होता। देश सच्चे अर्थों में एक आर्थिक शक्ति होता और यह केवल जुमलेबाजी नहीं होती। अगर मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होतीं तो भारत में आज राजनीतिक लोकतंत्र के साथ सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र भी कमोबेश कायम हो चुका होता। आज भी मंडल कमीशन की बुनियादी बातें अपनी जगह बुनियादी तौर पर सही हैं, भले उन्हें लागू करने के तरीकों मे कुछ परिवर्तन लाना पड़े।

भारतीय सामाजिक जीवन के तथ्यों से परिचित कोई भी व्यक्ति इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकता कि भारत में मामला चाहे संसाधनों में हिस्सेदारी का हो या फिर शासन-प्रशासन में भागीदारी का, बहुसंख्यक दलित, पिछड़े और आदिवासी आज भी हाशिए पर हैं। और यह भी कि उनकी हैसियत क्या है। दरअसल, हैसियत इससे तय होता है कि वर्ण-जाति के श्रेणीक्रम में उसकी अवस्थिति कहां है? भारतीय संविधान के लागू होने (26 जनवरी, 1950) के करीब 75 वर्ष बाद भी भारतीय समाज में सभी निर्णायक केंद्रों पर उन तथाकथित उच्च जातियों का बिना किसी अपवाद के करीब-करीब पूर्ण रूपेण नियंत्रण है, जिन्हें इस श्रेणीक्रम के शीर्ष तीन वर्णों – ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य – में शामिल किया गया था। इस श्रेणीक्रम के चलते चौथे वर्ण शूद्रों (अन्य पिछड़ा वर्ग) की हैसियत हर स्तर पर इन तीन वर्णों से आज भी नीचे ही है। इन चार वर्णों से बाहर कर दिए गए, अंत्यजों (अनुसूचित जातियों) की स्थिति ऐतिहासिक तौर पर इस चौथे वर्ण से भी बदतर रही है और आज भी है, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सरकारी नौकरियों एवं शिक्षा के क्षेत्र में उनकी (दलितों की) स्थिति आनुपातिक तौर पर ओबीसी से बेहतर हो गई है। यानि दलितों की स्थिति अन्य पिछड़ा वर्ग से उन क्षेत्रों बेहतर हो गई है, जिन क्षेत्रों में उनके लिए संविधान लागू होने के साथ ही आरक्षण लागू हो गया। इन क्षेत्रों में ओबीसी, दलितों-आदिवासियों से पिछड़ गए, क्योंकि उन्हें आरक्षण नहीं दिया गया, जो आरक्षण उन्हें छत्रपति शाहूजी महाराज ने अपनी कोल्हापुर रियासत में 1902 में ही प्रदान कर दिया था।

इसका निहितार्थ यह है कि वर्ण-जाति श्रेणीक्रम आधारित असमानता तोड़ने या कम करने का अभी तक केवल आरक्षण ही जमीनी तौर कारगर उपाय साबित हुआ है। इसके अलावा कोई भी अन्य उपाय मनु की संहिता की उस जकड़बंदी में सेंध नहीं लगा पाया है, या कहिए कि इसके लिए अवसर भी नहीं दिया गया, जिसमें उन्होंने वर्णों के आधार पर अधिकारों एवं कर्तव्यों का बंटवारा किया था और हर वर्ण की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हैसियत तय कर दी थी।

क्रमश: जारी

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

डॉ. सिद्धार्थ रामू

डॉ. सिद्धार्थ रामू लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। इन्होंने बद्रीनारायण की किताब “कांशीराम : लीडर ऑफ दलित्स” का हिंदी अनुवाद 'बहुजन नायक कांशीराम' नाम से किया है, जो राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। साथ ही इन्होंने डॉ. आंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” (अनुवादक : राजकिशोर) का एनोटेटेड संस्करण तैयार किया है, जो फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

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