मानव सभ्यता के इतिहास में सामाजिक बुराइयों से मुक्ति के लिए अनेकानेक कोशिशें होती रही हैं। लेकिन मुस्लिम समाज के बारे में बात की जाए तो अब तक पैगंबर हजरत मुहम्मद (सल्ललाहु अलैहे वसल्लम) के अलावा यहां कोई भी बड़ा समाज सुधारक नहीं हुआ। नबी[1] (स.अ.) ने इस समाज को बेहतर बनाने के लिए अपना सर्वस्व लगा दिया, ताकि समाज में समानता, भाईचारा और सामाजिक न्याय स्थापित हो सके और एक सशक्त आदर्श समाज बन सके।
लेकिन अफसोसजनक बात यह है कि पैगंबर हजरत मुहम्मद (स.अ.) के आखिरी खुतबे (धार्मिक उपदेश) में दिए गए पैगाम को मुस्लिम समाज के शोषक तबके ने पहुंचने नहीं दिया और इसे छिपाए रखा। यह पैगाम उन्होंने आखिरी हज (हज्जतुल विदाअ) के मौके पर दिया था। यह स्पष्ट तौर पर समानता, भाईचारा एवं सामाजिक न्याय की उद्घोषणा है–
“लोगों! खबरदार रहो, तुम सबका खुदा एक है। किसी अरबी को किसी गैर-अरबी पर, किसी गैर-अरबी को किसी अरबी पर, किसी गोरे को किसी काले पर और किसी काले को किसी गोरे पर, कोई बरतरी (श्रेष्ठता) हासिल नहीं है। अगर है तो खुदा से डरने को लेकर। तुममें सबसे बड़ा इज्जत वाला वह है जो सबसे अधिक खुदा से डरने वाला है।”[2]
हजरत पैगंबर (स.अ.) इस बात पर इतना जोर देते हैं कि वे सभा में मौजूद सभी लोगों से कहते हैं कि “जो यहां मौजूद हैं, वे उन लोगों तक यह बात पहुंचा दें जो यहां मौजूद नहीं हैं।”
‘मुसनद अहमद’ प्रसिद्ध सुन्नी मुस्लिम विद्वान इमाम अहमद इब्न हनबल द्वारा संकलित हदीसों का एक विशाल संग्रह है। इसमें लगभग 30,000 से 40,000 हदीसें शामिल हैं। यह मूल रूप से अरबी भाषा में है। मुसनद अहमद की हदीस संख्या 23489, जिसे अबू नज़रा ने एक सहाबी (जिन्होंने नबी का ख़ुत्बा सुना था) के माध्यम से रिवायत किया है, इस्लाम में मानव समानता, नस्लवाद के खात्मे और तक़वा (परहेजगारी) के महत्व का सबसे बड़ा घोषणापत्र है।
सूरह अल-हुजुरात (49:13) में हजरत मुहम्मद (स.अ.) ने पूरी मानवता को संबोधित करते हुए समानता और भाईचारे का संदेश दिया है। इस आयत के अनुसार, सभी मनुष्य एक ही स्त्री और पुरुष (आदम और हव्वा) से पैदा हुए हैं और जातियों या गोत्रों का विभाजन केवल पहचान के लिए है। अल्लाह की नजर में श्रेष्ठ वह है जो सबसे अधिक नेकी और परहेज़गारी (तकवा) रखता है।
इन धार्मिक सिद्धांतों के विपरीत वास्तविकता यह है कि पैगंबर-ए-इस्लाम से रिश्ता जोड़ने वाले अशराफ समाज के लोग आज अजलाफ, अरजाल मुसलमानों से नफरत करते हैं। उन्होंने इस समाज को जातियों और कबीलों में ही नहीं बांटा, बल्कि उसे फिरकों (पंथों अथवा संप्रदायों) में भी बांट दिया।
भारत में इस्लामिक आध्यात्मिकता, ज्ञान और दर्शन पर अशराफ समुदाय के लोगों का ही कब्जा है। मसूद आलम फलाही अपनी पुस्तक ‘जात-पात और मुसलमान’ के पृष्ठ संख्या 576 में उदाहरण देते हुए बताते हैं कि देवबंदी संगठन के संस्थापक मौलाना क़ासिम नानौतवी शेख बिरादरी के और मौलाना राशिद अहमद गंगोही शेख अंसारी बिरादरी के थे। ऐसे ही तबलीगी जमात के संस्थापक मौलाना मुहम्मद इलियास कंधलवी शेख बिरादरी से ताल्लुक रखते थे। बरेलवी मसलक के संस्थापक मौलाना अहमद रजा खान पठान बिरादरी के थे। इसी तरह अहल-ए-हदीस मसलक के संस्थापक मौलाना सनाउल्लाह अमृतसरी, सैयद मुहम्मद नजीर हुसैन देहलवी, नवाब सिद्दीक हसन खान भोपाली सैयद बिरादरी के रहे। जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी और शिया मसलक के संस्थापक मौलाना नूरुल्लाह शौश्तरी सैयद बिरादरी के रहे।
जबकि इल्म (ज्ञान) हासिल करने के सवाल पर पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) का कहना है कि “जो व्यक्ति इल्म हासिल करने के लिए किसी रास्ते पर चलता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान कर देता है।”[3] नबी (स.अ.) का मानना था कि मस्जिद केवल नमाज़ अदा करने की जगह नहीं है, बल्कि यह शिक्षा और मार्गदर्शन का केंद्र भी है। यहां क़ुरआन, धर्म, नैतिकता, ज्ञान और जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण बातें सिखाई और समझाई जाती हैं। मदीना की मस्जिद-ए-नबवी से जुड़ा अहल-ए-सुफ्फा का समूह शिक्षा और प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण उदाहरण है। वे पढ़ने-लिखने और सीखने पर इतना जोर देते थे कि उन्होंने कैदियों को भी शिक्षित करने के लिए कहा है कि बद्र के युद्ध के बाद कुछ कैदियों को इस शर्त पर रिहाई दी गई कि वे मदीना के लोगों को पढ़ना-लिखना सिखाएं। इससे इस्लाम में शिक्षा के महत्व का पता चलता है।

हजरत मुहम्मद (स.अ.) महिला शिक्षा के भी अग्रदूत माने जाते हैं। महिलाओं की शिक्षा पर एक प्रसिद्ध हदीस (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस 101) में महिलाओं को अलग से शिक्षा देने के लिए दिन निर्धारित करने का अनुरोध किया और हजरत मुहम्मद (स.अ.) ने उनके लिए समय निर्धारित किया। यहां तक कि वे अंतर्वर्गीय (भारतीय संदर्भ में कहें तो अंतर्जातीय) विवाह के भी समर्थक थे। उन्होंने कबीलों में एकता स्थापित करने के लिए दूसरे कबीलों से शादी करने पर जोर भी दिया था। हज़रत मुहम्मद (स.अ.) की पत्नी हज़रत जुवैरिया बिन्त अल-हारिस बनू मुस्तलिक क़बीले से थीं। हज़रत सफ़िय्या बिन्त हुयय का संबंध बनू नज़ीर से था। पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) ने अपने पूर्व गुलाम जैद की शादी अपनी फूफी की बेटी जैनब से कर दी थी। वे दासों की बेहतरी चाहते थे। हालांकि उनके समय में यह काम आसान नहीं था। लेकिन उन्होंने अपनी ज़िंदगी में हद से ज्यादा किया, जिसके लिए उन्हें आलोचनाएं भी झेलनी पड़ीं। इस्लाम के इतिहास में यह दर्ज है कि पहली बार मुसलमानों को पांचों वक्त नमाज में बुलाने के लिए अजान देने का अधिकार हजरत मुहम्मद (स.अ.) ने गुलाम हजरत बेलाल को दिया था।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सह-संस्थापक एम.एन. राय ने ‘इस्लाम धर्म की ऐतिहासिक भूमिका’ में लिखा है– “अरब में शांति और एकता का राज कायम होने के बाद दर्शन और विज्ञान का युग प्रारंभ होता है, जो लगभग 500 वर्षों तक रहा। अरब के इतिहासकार, वैज्ञानिक, चिकित्साशास्त्री, दार्शनिक, खगोलशास्त्री दुनिया में प्रसिद्ध थे। बगदाद में दुनिया का सबसे बड़ा पुस्तकालय स्थापित किया गया था। उन दिनों योरोपीय समाज अंधकार युग में था। अरब में पुनर्जागरण की शुरुआत हुई थी।”[4]
जबकि भारत में शिक्षा की बात की जाए तो यहां खूब सारे विरोधाभास दिखते हैं। भारत में इस्लाम के आगमन के बाद से पसमांदा समाज की शिक्षा पर रोक लगाकर रखी गई थी। जब तक सल्तनतें कायम रहीं, किसी ने विश्वविद्यालय या फिर कॉलेज खोलने की जरूरत नहीं समझी।
हालांकि आधुनिक दौर में स्थितियां बदलीं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना 24 मई, 1875 को हुई। इसके संस्थापक रहे सर सैयद अहमद खां भी पसमांदा समाज के लोगों को शिक्षा देने के घोर विरोधी थे। उनका कहना था कि उन्होंने ये इदारा (एएमयू) छोटी जातियों के लिए कायम नहीं किया है। मदरसे के बारे में सर सैयद अहमद खां ने बरेली के एक मदरसा अंजुमन इस्लामिया की इमारत के शिलान्यास कार्यक्रम में अपने भाषण में कहा था– “आपने अपने एड्रेस में कहा हम लोगों को दूसरी कौमों के उलूम पढ़ाने में भी उज्र नहीं है। (शायद इस जुमले से अंग्रेजी पढ़ाने की तरफ इशारा है।) मगर मैं कहता हूं कि ऐसे मदरसों में जैसा कि आपका मदरसा है, अंग्रेजी पढ़ाने का ख्याल एक बहुत बड़ी गलती है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमारी कौम में अंग्रेजी जबान और अंग्रेजी उलूम की तालीम की बहुत जरूरत है। हमारी कौम के सरदारों और शरीफों को लाज़िम है कि अपनी औलाद को अंग्रेजी उलूम की आला दर्जे की तालीम दें। मुझसे ज्यादा कोई शख्स न निकलेगा जो मुसलमानों में अंग्रेजी तालीम व उलूम की तरक्की देने का हामी और ख्वाहिशमंद हो। मगर हर काम के लिए एक समय और अवसर है। इस वक्त मैंने देखा कि आपके मदरसे की मस्जिद के आंगन में जिसके करीब आप मदरसा बनाने चाहते हैं, 75 लड़के पढ़ रहे हैं। जिस हैसियत और जिस दर्जे के ये लड़के हैं, उनको अंग्रेजी पढ़ाने से कोई फायदा नहीं पहुंचेगा। उनको उसी प्राचीन शिक्षा पद्धति में तालीम देना उनके हक़ में और मुल्क के हक़ में ज्यादा लाभदायक है।”[5]
किसी को सुनकर यह ताज्जुब हो सकता है कि ऐसा भी कहीं होता है। लेकिन मेरा खुद का अनुभव है। मैं खुद मदरसे में 3 साल तक पढ़ता रहा। एक बार मदरसे में दुनियावी शिक्षा देने की बात को लेकर हो-हल्ला मचा था एक मास्टर साहब ने उर्दू अरबी के अलावा अन्य विषयों को पढ़ाना शुरू किया। बच्चे बहुत खुश हुए थे। लेकिन 2-3 दिन के बाद ही यह बंद हो गया।
स्त्री शिक्षा की बात जाए तो अशराफ स्त्री शिक्षा के घोर विरोधी रहे हैं। हालांकि सर सैयद अहमद खां जो कि नारी शिक्षा के नाम पर उच्च वर्ग की लड़कियों को तालीम याफ्ता देखना चाहते थे, लेकिन पसमांदा समाज की महिलाओं के प्रति उनकी सोच बिल्कुल वही थी जो हिंदुओं के ग्रंथ मनुस्मृति में दर्ज है। 20 अप्रैल, 1884 को जालंधर (पंजाब) में एक मीटिंग में उन्होंने कहा कि “मैं लड़कियों को स्कूल भेजने के सख्त खिलाफ हूं। पता नहीं किस तरह की लड़कियों से उसकी सोहबत हो। मगर मैं निहायत जोर देकर कहता हूं कि अशराफ लोग जमा होकर अपनी लड़कियों की तालीम का ऐसा इंतजाम करें जो नजीर हो पिछली तालीम की जो किसी जमाने में होती थी। कोई शरीफ खानदान का शख्स यह नहीं ख्याल कर सकता कि वह अपनी बेटी को ऐसी तालीम दे जो टेलीग्राम ऑफिस में सिगनलर होने का काम दे या पोस्ट आफिस में चीट्ठियों पर मुहर लगाया करे।”[6]
हम पाते हैं कि जब जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले शूद्र-अतिशूद्रों की शिक्षा एवं नारी शिक्षा पर अलख जगा रहे थे, उन्हीं के समकालीन अलीगढ़ विश्वविद्यालय के जन्मदाता सर सैयद अहमद खां ने पसमांदा को अपने कॉलेज में पढ़ने पर रोक लगा रखी थी। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा के सवाल पर कोई भी कार्य नहीं किया।
वर्तमान में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में शिक्षा के स्वरूप और पसमांदा बिरादरियों की हालात पर प्रकाश डालते हुए मसूद आलम फलाही ने अपनी किताब ‘हिंदुस्तान में जात-पात और मुसलमान’ में लिखा है– “अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में आज भी किसी अहम प्रोफेशनल कोर्स जैसे मेडिकल, इंजीनियरिंग वगैरह में पसमांदा बिरादरी से संबंध रखने वाले छात्र को आरक्षण नहीं दिया जाता है। हालांकि हिंदुस्तान की अधिकतर यूनिवर्सिटियों और अहम नौकरियों तक में आरक्षण की सुविधा मौजूद है।”[7]
सच्चर आयोग और रंगनाथन मिश्रा आयोग द्वारा मदरसों के आधुनिकीकरण की सिफारिशों को आज तक अशराफों ने लागू होने नहीं दिया। दीनी उलेमाओं (धार्मिक गुरुओं) ने दशकों पहले से अंग्रेजी सीखने, विज्ञान पढ़ने, नक्षत्र का ज्ञान लेने के खिलाफ फतवा लगा रखा था ताकि इससे दूर रहा जाए, क्योंकि इससे ईमान कमजोर होता है, शरीयत की खिलाफवर्जी होती है। लेकिन उन मौलवियों की सारी नस्लें विदेशी शिक्षा हासिल करती रहीं और हाशिए पर रहने वाले लोग इनके फतवों के डर से इनके मदरसों की जीनत (शोभा की वस्तु) बने रहें। इसकी वजह सिर्फ यह थी कि कहीं पिछड़े मुसलमान भी दुनियावी शिक्षा हासिल करके अशराफों के बराबर न हों जाएं।
इकबाल अंसारी लिखते हैं कि “सिर्फ नमाज पढ़ने और कुरान पढ़ने के अलावा नबी (स.अ.) की पूरी ज़िंदगी का कोई भी ऐसा अमल नहीं जो इनकी [अशराफ समुदाय की] जि़ंदगी में दिखाई दे। फिर भी दीन [धर्म] के यही ठेकेदार हैं। ये हमारी भीड़ इकट्ठा करके हमें शिर्क, बिदअत, दरूद शरीफ, सलाम, ताजिया, तबलीगी जमात इत्यादि के मसलों में उलझाकर लड़ाकर हमारे विकास को बाधित कर रहे हैं। इन्हें विशेष तौर से दोषी ठहराने के पीछे कारण यह है कि ये हमारे रहनुमा, रहबर, सरदार, और लीडर घोषित हैं, इसलिए जिम्मेदार भी यही हैं। इनका ईमानदार सार्थक प्रयास रहा होता तो आपस के जातीय झगड़े नहीं होते। समाज में ऊंच-नीच नहीं होता। समान रूप से सम्मान के हकदार होते, भेदभाव की जगह आपसी मिल्लत होती। इस्लाम की जो अवधारणा आप नबी (स.अ.) ने दिया, उसका दस प्रतिशत भी इन मौलवियों में नहीं दिखाई देता और न ही अशराफों में। किसी भी समाज की दयनीय स्थिति के लिए उस समाज के शिक्षित और संपन्न लोग ही जिम्मेदार होते हैं। ये उनकी जिम्मेदारी बनती है कि कैसे पिछड़ा समाज शिक्षित बने, विकास करे और आदर्श समाज बने।”[8]
मुस्लिम समाज में लोकतंत्र और भाईचारे की बात मात्र छल है। मुस्लिम समाज में एकता की बात इसलिए की जाती है कि ताकि नेतृत्व हमेशा शेख, सैयद, मुगल, पठान का रहे। मुस्लिम एकता इनकी जरूरत है, क्योंकि इसी एकता के बल पर इन्हें शोहरत, इज्जत और संसद, विधान सभाओं में जगह मिलती है। संसद, विधान सभाओं, अल्पसंख्यक संस्थाओं, उर्दू अकादमी, पर्सनल लॉ बोर्ड, वक्फ बोर्ड, इमारते शरिया, अल्पसंख्यक कॉलेज, यूनिवर्सिटी आदि संस्थाओं में इनकी जगह पक्की बनी रहे। इसलिए वे हमेशा मुस्लिम एकता की राग अलापते रहते हैं।
ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ के संस्थापक अली अनवर के एक विश्लेषण के अनुसार, 2019 की 17वीं लोकसभा में चुने गए 25 मुस्लिम सांसदों में से 18 अशराफ (उच्च जाति) थे और केवल 7 सांसद पसमांदा (पिछड़ा/अनुसूचित जनजाति) समुदाय से थे। आजादी से लेकर अब तक कुल 400 से अधिक मुस्लिम लोकसभा सांसदों में से लगभग 300 से अधिक अशराफ रहे हैं, जिससे पसमांदा समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व उनकी विशाल आबादी के अनुपात में हमेशा बहुत कम रहा है।
निष्कर्ष के तौर पर देखा जाए तो हजरत मुहम्मद (स.अ.) का हज्ज्तुल विदा का खुतबा, जिसने इस समाज को समानता, भाईचारे और न्याय पर आधारित जिस आदर्श समाज की परिकल्पना की थी भारत में जाति-पाति के समर्थक अशराफ वर्ग ने इसे लागू नहीं होने दिया। यह पैगाम पूर्णतया पसमांदा समाज के हित में है। इसे लागू करने के लिए पसमांदा समाज को कठिन संघर्ष से गुजरना होगा।
संदर्भ :
[1] पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) के लिए एक संबोधन
[2] मुसनद अहमद, हदीस : 23489
[3] सहीह मुस्लिम
[4] समयांतर, अप्रैल 2020, ‘इस्लाम धर्म की ऐतिहासिक भूमिका’ पुस्तक की समीक्षा, पृष्ठ 44
[5] सर सैयद अहमद खां : एक सियासी मुताला, अतीक अहमद सिद्दीकी, पृष्ठ 144-145
[6] अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट, 15 मई, 1984, जिल्द 29, पृष्ठ 279
[7] मसूद आलम फलाही, हिंदुस्तान में जात-पात और मुसलमान, पृष्ठ 291
[8] इकबाल अंसारी, मेरी आवाज सुनो, पृष्ठ 13
(संपादन : नवल/अनिल)
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