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आइए, मंडल कमीशन की रिपोर्ट को समझें (पहला भाग)

कमीशन साफ-साफ कहता है कि जब तक उत्पादन के साधनों पर उच्च जातियों का मालिकाना बना रहेगा, तब तक पिछड़े वर्गों की वंचना और अधीनता की स्थिति में बुनियादी परिवर्तन नहीं आएगा और न ही पिछड़े वर्गों की अधीनता कायम करने वाली जाति की संरचना टूटेगी। पढ़ें, डॉ. सिद्धार्थ रामू द्वारा मंडल कमीशन की रिपोर्ट और उसमें उद्धृत अनुशंसाओं के विश्लेषण का पहला भाग

जातियां हिंदू सामाजिक संरचना की बुनियादी आधार हैं।जाति ने हिंदुओं को अनेक समूहों में बांट दिया है, जिन्हें ऊंचनीच के श्रेणीक्रम में व्यवस्थित किया गया है।[1]

जातियों के इस कर्मकांडीय (धार्मिक) श्रेणीबद्ध व्यवस्था का नतीजा यह हुआ कि उच्च जातियों में गहरे स्तर पर निहित स्वार्थ पैदा हो गए। उच्च जातियों को इस सामाजिक संगठन के संस्थागत ढांचे के माध्यम से निम्न जातियों का शोषण करने का मौका मिला।इस प्रक्रिया में शासक वर्गों (उच्च जातियों) ने विभिन्न उपायों के माध्यम से अपने विशेषाधिकारों को स्थायी बनाए रखने का प्रयास किया। यह काम इस अभिजात्य वर्ग ने धार्मिक संस्थाओं के साथ गठजोड़ करके किया।यह सारा कुछ ब्राह्मणवादी विचारधारा के तहत हुआ।[2]

जातिव्यवस्था की असली जीत सिर्फ ब्राह्मणों की सर्वोच्चता बनाए रखने में नहीं, बल्कि निम्न जातियों की चेतना इस तरह का बना देने में है कि वे स्वयं ही ऊंचनीच के इस अनुष्ठानिक श्रेणीक्रम को सहज प्राकृतिक व्यवस्था की तरह अपना लें।[3]

पौराणिक कथाओं और अनुष्ठानों की एक विस्तृत, जटिल और बारीक जाल के माध्यम से ब्राह्मणवाद जातिव्यवस्था को एक नैतिक आधार प्रदान करने में सफल रहा।धर्म और पौराणिक कथाओं का इस्तेमाल बहुत ही सिद्धहस्त तरीके से इस जादुई जाल को बुनने के लिए किया गया। इसके अनेक उदाहरण हैं, जैसे वेद [ऋग्वेद] का पुरुष सूक्त।[4]

यह कहना पूरी तरह उपयुक्त होगा कि परंपरागत भारतीय समाज में सामाजिक पिछड़ापन जाति व्यवस्था के श्रेणीबद्ध पदानुक्रम का प्रत्यक्ष नतीजा रहा है। अन्य प्रकार के पिछड़ापन भी इसी अपंगसी कर देने वाली व्यवस्था से सीधे पैदा हुए।[5]

उत्पादन के साधनों पर उच्च जातियों का करीबकरीब पूर्ण नियंत्रण है, जिसके चलते ये जातियां पिछड़े वर्गों (एससी, एसटी और ओबीसी) को अपने वर्चस्व में बनाए रखने और नियंत्रित करने में सक्षम रही हैं।[6]

जब तक पिछड़े वर्गों की मूल समस्या का समाधान नहीं होता है, तब तक सरकारी नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण और वित्तीय सहायता केवल आंशिक राहत ही दे पाएगा।[7]

जब तक वर्तमान उत्पादन संबंधों की जकड़बंदी को क्रांतिकारी भूमि सुधारों के माध्यम से नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक वंचित और विशेषाधिकारविहीन वर्गों (एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों) की उच्च जातियों पर निर्भरता बनी रहेगी।[8]

इस बात पर आयोग (मंडल कमीशन) का दृढ़ विश्वास है कि मौजूदा उत्पादन संबंधों में आमूलचूल बदलाव सभी पिछड़े वर्गों (एससी, एसटी, ओबीसी) के कल्याण और उन्नतिप्रगति के लिए उठाया जा सकने वाला एकमात्र सबसे महत्वपूर्ण कदम है।[9]

सच तो यह है कि हिंदू समाज में आरक्षण की एक अत्यंत ही कठोर व्यवस्था हमेशा से मौजूद रही है। हिंदू समाज में आरक्षण की व्यवस्था जातिव्यवस्था के माध्यम से पूरे समाज के नसनस में घुसी हुई थी। एकलव्य को जाति आधारित इस आरक्षण की व्यवस्था के नियमों का उल्लंघन करने के कारण अपना अंगूठा कटवाना पड़ा और शंबूक का सिर ही काट दिया गया, मतलब उसे जान ही गंवानी पड़ी।[10]

हमारी शिक्षा व्यवस्था अपनी संरचना और स्वरूप में अभिजनवादी है, जिसके नतीजे के तौर पर बड़े पैमाने पर संसाधनों की बर्बादी होती है। यह शिक्षा व्यवस्था हमारे देश जैसे अधिक जनसंख्या वाले और विकासशील देश की आवश्यकताओं के लिए सबसे कम उपयुक्त है। यह शिक्षा व्यवस्था हमें ब्रिटिश शासन से विरासत के तौर पर प्राप्त हुई। ब्रिटिश विरोधी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस शिक्षा व्यवस्था की तीखी आलोचना की गई थी। इस शिक्षा व्यवस्था की संरचना और स्वरूप में बिना कोई बुनियादी परिवर्तन किए हमने उसे अपना लिया। यह शिक्षा व्यवस्था पिछड़े वर्गों की आवश्यकताओं के लिए नहीं के बराबर उपयुक्त है, लेकिन कोई दूसरा विकल्प होने के कारण इन वर्गों को भी इसी प्रतिस्पर्धा की दौड़ (रैट रेस) में भाग लेने के लिए विवश होना पड़ता है।[11]

देश की आबादी में बहुसंख्यक होने के बावजूद भी पिछड़े वर्ग उच्च जातियों के आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व के अधीन बने हुए हैं। देश में वयस्क मताधिकार के लागू हुए तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है। इसके बावजूद भी अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां और अन्य पिछड़े वर्ग राजनीतिक शक्ति का केवल सीमित हिस्सा ही प्राप्त कर सके हैं, जबकि इनकी आबादी देश की कुल आबादी का करीब तीनचौथाई है।[12]

मंडल कमीशन की रिपोर्ट की पृष्ठभूमि

मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट और सिफारिशों में वेद-पुराण, हिंदू धर्मशास्त्रों और मनु-याज्ञवल्क्य के वर्ण-जाति के चक्रव्यूह को तोड़ने का एक मुकम्मल एवं ठोस प्रस्ताव और सिफारिशें प्रस्तुत किया था। ये प्रस्ताव और सिफारिशें ऐसी हैं कि इनसे पिछड़े वर्ग (एससी, एसटी और ओबीसी) जाति-व्यवस्था की जकड़न से मुक्त हो सकते हैं। उनकी समग्र उन्नति-प्रगति और कल्याण का रास्ता खुल सकता है। संविधान की प्रस्तावना और भावना के अनुसार भारत को एक समता, स्वतंत्रता, बंधुता आधारित आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में तब्दील किया जा सकता है। ऊंच-नीच और बहुसंख्य पिछड़ों की वंचना एवं अधीनता पर आधारित वर्ण-जाति व्यवस्था को भी इन प्रस्तावों और सिफारिशों के आधार पर तोड़ा जा सकता है। भारत को सच्चे अर्थों में एक राष्ट्र और समाज बनाया जा सकता है। समय के साथ जो तब्दीलियां आई हैं, उनके आधार पर कमीशन की सिफारिशों में कुछ जोड़ा तो सकता है, लेकिन कोई ऐसी सिफारिश नहीं है कि जिसके बारे में यह कहा जा सके कि अब इसकी कोई आवश्यकता नहीं रह गई है।

दूसरे राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के पहले भाग का आवरण पृष्ठ व आयोग के अध्यक्ष बी.पी. मंडल

मंडल कमीशन के प्रस्ताव और सिफारिशें हिंदी पट्टी में वर्ण-जाति आधारित संरचना और वर्चस्व एवं अधीनता के रिश्ते को तोड़ने का अब तक का सबसे मुकम्मल एजेंडा है। हालांकि मंडल कमीशन के प्रस्ताव और सिफारिशें पूरे भारत के लिए हैं, लेकिन दक्षिण भारत ने इसमें से कई चीजों को आजादी से पहले ही हासिल कर लिया था। कई चीजें आजादी के बाद पूरी हुईं। कमीशन ने इस संदर्भ में अपनी रिपोर्ट में दक्षिण भारत और हिंदी पट्टी, विशेषकर बिहार और यूपी में उच्च जातियों की जकड़बंदी एवं वर्चस्व कायम रहने के बुनियादी कारणों और इसके स्वरूप को विस्तार से विवेचन एवं विश्लेषण किया है। इसके साथ कमीशन ने हिंदी पट्टी, विशेषकर बिहार एवं यूपी में पिछड़े वर्गों की कमजोरियों एवं नाकमियों की वस्तुगत और मनोगत वजहों को भी ठोस तरीके से रेखांकित किया है।

भारतीय समाज एवं राष्ट्र का दुर्योग यह है कि मंडल कमीशन की सिफारिशों को पहले तो 10 वर्षों तक (1980 से 1990 तक) कूड़ेदान में छोड़ दिया गया था। दस साल बाद 1990 में इसकी एकमात्र सिफारिश केंद्र सरकार के अधीन सरकारी नौकरियों/सेवाओं में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की घोषणा तत्कालीन वी.पी. सिंह की सरकार ने की। इस घोषणा पर दो वर्षों तक सुप्रीम कोर्ट कुंडली मार कर बैठा रहा। उसके बाद इस पहली सिफारिश में कांट-छांट करके लागू करने की इजाजत सुप्रीम कोर्ट ने दी। यह कांट-छांट इस सिफारिश के प्रतिकूल थी।।

उच्च शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश के मामले में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण के मंडल कमीशन के दूसरे प्रस्ताव को करीब 15 वर्षों का और इंतजार करना पड़ा और 2006 में यूपीए सरकार में मानव संसाधन मंत्री रहे अर्जुन सिंह ने इसे लागू करने की घोषणा की और इसके लिए संविधान संशोधन किया गया।

मंडल कमीशन के शेष बुनियादी सिफारिशों को कूड़ेदान में डाल दिया गया और पूरे देश में ऐसी समझ बना दी गई या बन गई जैसे नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण के साथ मंडल कमीशन की बुनियादी प्रस्ताव और सिफारिशें मान ली गईं। दुर्योग की बात यह है कि यही समझ पिछड़े वर्गों (एससी, एसटी और ओबीसी) के बड़े हिस्से की भी है, जिनकी हर तरह की वंचना से मुक्ति का एक मुकम्मल ठोस प्रस्ताव कमीशन ने प्रस्तुत किया था। ओबीसी के उस 27 प्रतिशत आरक्षण और एससी-एसटी के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण को पिछड़े वर्गों की एक मुकम्मल निर्णायक विजय के रूप में देखा गया, जिस आरक्षण के बारे में स्वयं मंडल कमीशन का कहना था कि “जब तक पिछड़े वर्गों की मूल समस्या का समाधान नहीं होता है, तब तक सरकारी नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण और वित्तीय सहायता केवल आंशिक राहत ही दे पाएगा।”

मंडल कमीशन के प्रस्तावों एवं सिफारिशों के संबंध में इस तरह तीन बुनियादी गलत समझ बनी या कहिए कि अब तक किसी न किसी रूप में बडे़ हिस्से में बनी हुई हैं। पहली तो यह कि जैसे मंडल कमीशन की सिफारिश का मतलब सिर्फ ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण था, जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। दूसरी बुनियादी गलत समझ यह बनी कि जैसे यह कमीशन सिर्फ पिछड़े वर्गों में सिर्फ ओबीसी के लिए जाति-व्यवस्था की वंचना से मुक्ति के प्रस्ताव एवं सिफारिशें करता है। जबकि सच यह है कि मंडल कमीशन कुछ विशेष संदर्भों में ही ओबीसी की बात करता है। विशेषकर आरक्षण के बारें में। चूंकि बहुत पहले संविधान में एससी-एसटी को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण मिल चुका था, इसके चलते आरक्षण की सिफारिशों के मामले में कमीशन स्वयं को ओबीसी तक सीमित रखता है। कमीशन की रिपोर्ट और प्रस्ताव एवं सिफारिशों में बार-बार संपूर्ण पिछड़े वर्गों (एससी, एसटी और ओबीसी) की जाति आधारित वंचना के कारणों और उनसे मुक्ति के उपायों के बारे में विस्तृत विवेचन एवं विश्लेषण किया गया है।

कमीशन साफ-साफ कहता है कि जब तक उत्पादन के साधनों पर उच्च जातियों का मालिकाना बना रहेगा, तब तक पिछड़े वर्गों की वंचना और अधीनता की स्थिति में बुनियादी परिवर्तन नहीं आएगा और न ही पिछड़े वर्गों की अधीनता कायम करने वाली जाति की संरचना टूटेगी। कमीशन की सिफारिशों को पढ़कर कोई समझ सकता है कि वह सामाजिक और शैक्षिक तौर पर पिछड़े सभी वर्गों की मुक्ति की राह सुझाता है, उसका दायरा सिर्फ ओबीसी तक सीमित नहीं है। वैसे भी मंडल कमीशन का नाम दूसरा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग है, न कि ओबीसी कमीशन।

मंडल कमीशन के बारे तीसरी बुनियादी गलत समझ यह दिखाई देती है कि जैसे यह कोई हिंदू धर्म के लोगों तक सीमित हो। जबकि कमीशन इस्लाम, ईसाई, सिख आदि सभी धर्मों के लोगों को सामाजिक-शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों में शामिल किया है। यहां तक कि ओबीसी के लिए जो आरक्षण की सिफारिश की गई है, उसमें सभी धर्मों के लोग शामिल हैं।

कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में हिंदुओं के साथ-साथ अन्य सभी धर्मों के लोगों को पिछड़े वर्ग में क्यों शामिल किया, इसका विस्तृत जवाब दिया है– “इसमें रत्ती भर कोई संदेह नहीं है कि गैर-हिंदुओं में सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ापन उसी स्तर का है, जैसा हिंदू समुदायों में है। हालांकि जाति-व्यवस्था हिंदू समाज की एक अनोखी व्यवस्था है, फिर भी जमीनी सच्चाई यह है कि यह गैर-हिंदुओं में विभिन्न मात्राओं में व्याप्त है। इस परिघटना के दो मुख्य कारण हैं। पहली तो यह कि जाति-व्यवस्था व्यक्ति के मनोभाव को गहरे स्तर पर प्रभावित करती है और व्यक्ति की सामाजिक चेतना एवं सांस्कृतिक रीति-रिवाजों पर अमिट प्रभाव छोड़ती है। इसका नतीजा यह हुआ कि धर्म-परिवर्तन के बाद भी हिदू समाज के पूर्व सदस्य अपने साथ सामाजिक श्रेणीक्रम (ऊंच-नीच का क्रम) और स्तरीकरण के अपने भीतर गहरे रूप से जमे हुए विचारों-मनोभावों को लेकर गए। इससे हिंदू धर्मांतरित व्यक्ति अनजाने में इस्लाम, ईसाई धर्म, सिख धर्म आदि जैसे अत्यंत समतावादी धर्मों में जाति-व्यवस्था के ट्रोजन हार्स के जैसे कार्य करने लगे। इसका दूसरा कारण यह है कि मुख्य रूप से हिंदू समाज व्यवस्था के परिवेश में रहने वाले गैर-हिंदू अल्पसंख्यक इसके ताकतवर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों से बच न सके। इस प्रकार भीतर और बाहर दोनों ओर से गैर-हिंदू समुदायों में जाति को सतत् तौर पर खाद-पानी और प्रोत्साहन मिलता रहा। “… सैयद और शेख ब्राह्मणों की तरह पुरोहित जातियां हैं और मुगल एवं पठान हिंदुओं के बीच के क्षत्रियों की तरह हैं। जिनकी वीरता का बखान होता है।..कुछ दस्तकार-शिल्पकार और अन्य पेशे करने वाली जातियां हैं, जिन्हें श्रेणीक्रम में निम्न जातियां माना जाता है। .. इस प्रकार वहां भी जातियों के उनके पेशे पर आधारित वंशानुगत नाम हैं। उनके भीतर भी अंतर्विवाह (हिंदुओं की तरह अपनी जाति के भीतर विवाह) की मूल-प्रवृति पाई जाती है।”[13] इसके चलते कमीशन ने गैर-हिंदुओं को सामाजिक एवं शैक्षणिक तौर पर पिछड़े वर्गों में शामिल किया। उनको अपने आरक्षण की सिफारिशों के दायरे में शामिल किया।

क्रमश: जारी

संदर्भ :

[1] मंडल कमीशन की रिपोर्ट, पहला भाग, पृष्ठ 14

[2] वही

[3] वही

[4] वही

[5] वही

[6] वही, पृष्ठ 60

[7] वही

[8] वही

[9] वही

[10] वही, पृष्ठ 58

[11] वही

[12] वही, पृष्ठ 60

[13] वही, पृष्ठ 55

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

डॉ. सिद्धार्थ रामू

डॉ. सिद्धार्थ रामू लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। इन्होंने बद्रीनारायण की किताब “कांशीराम : लीडर ऑफ दलित्स” का हिंदी अनुवाद 'बहुजन नायक कांशीराम' नाम से किया है, जो राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। साथ ही इन्होंने डॉ. आंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” (अनुवादक : राजकिशोर) का एनोटेटेड संस्करण तैयार किया है, जो फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

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