द्वारका भारती ‘मोची : एक मोची का अदबी जिंदगीनामा’ आत्मकथा के लेखक हैं। उनकी इस आत्मकथा की समीक्षा करते हुए दलित साहित्यकार मोहनदास नैमिशराय लिखते हैं कि “यह जिंदगीनामा एक मोची की रूदन-कथा नहीं है, बल्कि चमड़े को मथने के समान आत्मकथाकार के जीवन में हुई घटनाओं को आगे बढ़ाया गया है, जिनसे पाठकों के भीतर से अनेक सवाल खुद-ब-खुद उभरने लगते हैं। कहना न होगा कि इस स्वकथन के बहाने द्वारका भारती भारतीय समाज की पुरातनपंथी का फातिहा पढ़ने का इरादा रखते हैं और इसे नेस्तनाबूद करने की इच्छा भी रखते हैं।”
द्वारका भारती जी के साहित्य-कर्म में विविधता रही है। इसका प्रमाण हमें उनकी कृतियों में मिल जाता है। उनकी कृतियों में शामिल हैं– ‘आलम काब’ (कविता संग्रह, संपादन, 1994), ‘मानववाद : एक संदर्भ’ (पंजाबी, संपादन, 1995), ‘जूठन’ (ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा का पंजाबी अनुवाद, 1998), ‘पंजाबी साहित्य में दलित कदम’ (संपादन, 2001), ‘तल्हण कांड के बाद’ (रिपोर्ताज, पंजाबी, 2007), ‘दलित-दर्शन’ (लेख संग्रह, संपादन, 2009), ‘मशालची’ (उपन्यास, अनुवाद, 2009), ‘काल कालांतर’ (सरुप सियालवी की पंजाबी कहानियों का हिंदी अनुवाद, 2013), ‘जलालत’ (सरुप सियालवी की पंजाबी में आत्मकथा का हिंदी अनुवाद, 2021), ‘हिंदुत्व के दुर्ग’ (ज्ञान सिंह बल के लेखों का संपादन व हिंदी में अनुवाद, 2016), ‘राष्ट्र और राष्ट्रवाद’ (लेख संग्रह, 2021), ‘मोची : एक मोची का अदबी जिंदगीनामा’ (आत्मकथा, 2021) और ‘आंबेडकर से कौन डरता है?’ (प्रकाशनाधीन)।
एक अद्भूत कर्मस्थली
द्वारका भारती सचमुच चमड़े को ही नहीं, समाज को भी मथते हैं और समाज में फैले जातिवाद, पाखंड, भेदभाव पर अपनी लेखनी से प्रहार करते हैं। बीते 4 सितंबर, 2026 की सुबह उनसे मिलने हमदोनों दिल्ली से चले थे और बस से यह 9 घंटे का सफर तय कर रामगड़िया चौक पहुंचे थे। इसी चौक से मुश्किल से सौ कदम हम चले होंगे। द्वारका भारती जी ने बताया कि यह सुभाष नगर है। यहीं मेरी दुकान है। फिर करीब सौ कदम चलने के बाद सड़क किनारे एक दुकान पर लिखा था– ‘राजू शू स्टोर’। दुकान न खुली थी न बंद थी। शीशे के दरवाजे पर बाहर एक कुंडी लगी थी, जिसे द्वारका भारती जी ने खोल दिया और हम उनकी दुकान में दाखिल हो गए। उत्तर भारत के किसी इलाके में किसी मोची की ऐसी दुकान शायद ही देखने को मिले। सामान्य तौर पर तो यही होता है कि मोची सड़क किनारे किसी चौक पर, हाट-बाजार में बैठकर अपना काम करते हैं। लेकिन हम जिस मोची की दुकान में थे, वह महज दुकान नहीं है।

हमदोनों एक बेंच पर बैठे जिसपर साफ-सुथरा और पतला गद्दा था। द्वारका भारती जी हमारे सामने जमीन पर बैठे। वह उनका आसन है। दीवार से लगी मसनद और जमीन पर साफ बिछौना। सामने जूते बनाने के सांचे और कुछ निर्माणाधीन जूते भी। वहीं दायीं हाथ पर एक लकड़ी के स्टूल पर मोटर लगा था। पूछा तो द्वारका भारती जी ने कहा कि इसका इस्तेमाल जूते के सोल को आकार देने और चमड़े को घिसने के लिए किया जाता है। उनके ठीक सामने उनके औजार थे। सभी औजार इस तरीके से करीने से रखे गए थे कि आवश्यकता पड़ने पर आसानी से मिल जाएं। उनके सामने ही हाथी के दांत के रंग का एक चौकोर पत्थर था। इसके बारे में पूछा तो उन्होंने उसके बारे में कहा कि इसे सिल कहते हैं। कुछ लोग पत्थर भी कह देते हैं। इसी पर रखकर जूते बनाने से संबंधित काम के अलावा मैं इसी पर लिखता भी हूं। तो मेरे लिए यह राइटिंग पैड भी है। अब तक जो भी लिखा-पढ़ा है, इसी पर लिखा-पढ़ा है। इसी सिल पर ‘होशियारपुर भास्कर’ (हिंदी दैनिक भास्कर का होशियारपुर संस्करण) अखबार इसकी गवाही देता नजर आया।
जूते भी, किताबें भी
हम जिस बेंच पर बैठे थे, उसके दायीं ओर एक और बेंचनुमा स्टूल था, जिसके ऊपर कई किताबें और नोट्स रखी गई थीं। और हमारे बाईं ओर एक बुक शेल्फ जिसमें ताला नहीं लगा था। शायद इसलिए कि यदि कोई उसमें रखी किताबों को देखना चाहे तो देखे, पढ़ना चाहे तो निकाल कर पढ़े। शेल्फ के ऊपर भी किताबें थीं। उनमें कुछ किताबों के नाम जो हिंदी में दिखे, वे हैं– ‘सत्यार्थ प्रकाश’, ‘भारत का इतिहास’, ‘गुनाहों का देवता’। अनेक किताबें पंजाबी में थीं, जिन्हें हम पढ़ नहीं पाए।
दुकान में चमड़े से बने जूते व जूतियां बाहर शो-केस में रखे गए थे। अंदर में भी कुछ जूते शीशे के शो-केस में रखे गए थे। दुकान बिल्कुल साफ-सुथरा था। हम जिस बेंच पर बैठे थे, उसके ठीक ऊपर डॉ. आंबेडकर की तस्वीर टंगी थी और वहीं पर लाल पगड़ी भी। बिल्कुल वैसी ही जैसी पगड़ी जोतीराव फुले पहनते थे। उस पगड़ी पर दर्ज था– 9 मार्च, 2024, नई दिल्ली। यह पगड़ी उन्हें दिल्ली में एक संगठन द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दिए जाने के मौके पर दिया गया था। इस अवार्ड समारोह की एक तस्वीर द्वारका भारती जी के आसन के ऊपर दीवार में टंगी थी। एक फोटो में द्वारका भारती जी का प्रशस्ति पत्र दिखा जो अंग्रेजी में लिखा था। उसके आरंभ में दर्ज था– “स्टेट ऑफ कोलोराडो, यूएसए…”
हमारे बैठने से पहले द्वारका भारती जी ने हमें पानी दिया। लेकिन शायद उन्हें लगा कि हम भूखे हों, क्योंकि सुबह साढ़े आठ बजे से लेकर साढ़े पांच बजे तक की यात्रा हमने की थी। उन्होंने कहा कि आप बैठिए मैं समोसे लेकर आता हूं। फिर बात होगी। मैंने [नवल] उनसे उनके साथ चलने का अनुरोध किया। उनकी दुकान से करीब बीस मीटर की दूरी पर एक दुकान थी। वह दुकान मूल रूप से डेयरी थी, जहां दूध, दही और मक्खन अदि बेचा जाता है। उसी दुकान में समोसे भी थे। दुकानदार सिर पर पगड़ी बांधे एक नौजवान था। उसने अदब के साथ द्वारका भारती जी का अभिवादन किया। वे पंजाबी में बात कर रहे थे, लेकिन जो मैं समझ पा रहा था, वह अदब की बात है, या कहिए कि सम्मान की बात है। शायद ही बिहार या उत्तर प्रदेश के किसी शहर में किसी मोची के साथ कोई दुकानदार इतनी अदब से बात करता हो, जितनी अदब से वह दुकानदार बात कर रहा था।
एक रचनाकार की खुद्दारी
द्वारका भारती जी ने चार समोसे खरीदे। उन्होंने सोचा होगा कि हम दो युवाओं के लिए यह आवश्यक होगा। लेकिन समोसे बड़े आकार के थे। हमने एक-एक समोसा खाया। फिर चाय की बारी आई। द्वारका भारती जी ने पहले हमसे पूछा कि हम चाय लेंगे या कॉफी। हमदोनों ने समवेत स्वर में कहा– चाय। वे फिर अपने आसन पर बैठ गए और बगल से ही चाय बनाने के लिए छोटा-सा पतीला निकाला। और अपनी बाईं ओर कोने में लगे नल से पानी निकालकर अच्छे से धोने के बाद उसमें पानी लिया। और बस एक हाथ से भी कम की दूरी में रखे इलेक्ट्रीक हीटर को ऑन कर पतीले को चढ़ा दिया।
हम देख रहे थे कि कैसे करीब 80 साल के बुजुर्ग ने अपने जीवन को अपने हिसाब से व्यवस्थित करके रखा है। सबकुछ मानो यह सोचकर कि किसी की सहायता न लेनी पड़े। सामान्य अर्थों में कहें तो यही खुद्दारी है, जो द्वारका भारती के साहित्य कर्म और उनके पेशागत कर्म में साफ-साफ दिखाई देती है।
ब्राह्मण ने दिहाड़ी नहीं दी, तो पिता गए लाहौर
चाय पीने के बाद हमारे बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। आरंभ में हमारी उत्सुकता उनके अपने जीवन के बारे में थी। कब जन्म हुआ, किस पारिवारिक पृष्ठभूमि में जन्म हुआ, कहां पढ़ाई-लिखाई हुई और यह कि जूते बनाने के साथ साहित्य-कर्म का सिलसिला कब आरंभ हुआ। द्वारका भारती हमदोनों से मुखातिब थे। उनके मुताबिक, उनका जन्म इसी होशियारपुर में एक नीमपहाड़ी गांव में हुआ था, जो मुख्य शहर से करीब 10-12 किलोमीटर दूर है। उनके पिता का नाम था भगवान दास राजू। और आपके दादा जी का नाम क्या था? यह सवाल सुनते ही द्वारका भारती जी ने कहा– चंदू राम।
अब हमारे सामने तीन पीढ़ियां थीं। पहली पीढ़ी का सरनेम राम, दूसरी पीढ़ी का सरनेम दास और तीसरी पीढ़ी जो हमारे सामने थी, उसका सरनेम भारती। देखें तो यह बदलाव की बेहद दिलचस्प कहानी है। द्वारका भारती जी अपने पिता के बारे में बता रहे थे कि कैसे जब वह छोटे थे तभी लाहौर चले गए थे। उनके मुताबिक हुआ यह था कि एक बार उनके पिता भगवान दास ने एक ब्राह्मण के यहां दिहाड़ी की थी। दिन भर उसके यहां काम करने के बाद शाम को जब उन्होंने उस ब्राह्मण से अपनी दिहाड़ी मांगी तो उसने देने में आनाकानी की। उस ब्राह्मण ने कहा कि मजदूरी दे दूंगा, कहीं भागा थोड़े न जा रहा हूं। इससे मेरे पिता के मन को ठेस पहुंची। उन्होंने किसी एक व्यक्ति से एक रुपए कर्ज लिया। उस समय एक रुपए का सिक्का चांदी का होता था। तो मेरे पिता ने लाहौर का टिकट लिया और चले गए। उस समय होशियारपुर से एक ट्रेन रात में लाहौर के लिए जाती थी।

अपने पिता की कहानी बताते हुए द्वारका भारती बताने लगे कि लाहौर जाने पर उनके पिता ने कैसे एक मोची जो कि उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे, के यहां रहकर जूते-जूतियां बनाने का हुनर हासिल किया और वहां अपना काम शुरू किया। द्वारका भारती के मुताबिक, उनके पिता महिलाओं के लिए जूतियां बनाने में एक्सपर्ट थे। लाहौर में उनका काम चल निकला। लेकिन देश विभाजन के बाद वे वापस होशियारपुर आ गए। यहां आकर उन्होंने एक जूते की दुकान खोली और अपना काम शुरू किया। इस काम में उनका साझेदार एक ब्राह्मण था। वह ब्राह्मण जरूर था, लेकिन कई बार वह खुद अपने हाथ से जूते बनाने में सहयोग करता था। एक बार की बात है कि मैं उसी दुकान में बैठा था। मैं देखता था कि जो भी ग्राहक आते थे, वे उस ब्राह्मण को आदरपूर्वक संबोधित करते थे और मेरे पिता को सम्मान नहीं देते थे। मैंने इस संबंध में अपने पिता से कहा भी। उन्होंने इसका कारण जातिवाद बताया। तब मुझे पहली बार लगा कि जाति क्या चीज होती है, जो किसी मनुष्य को सम्मान का पात्र तो किसी को निरादर का पात्र बना देती है। बाद में मेरे पिता ने अपनी दुकान इसी होशियारपुर शहर में खोली।
द्वारका भारती बताते रहे और हम सुनते जा रहे थे। हमारा एक सवाल था कि पहली बार आपने बाबासाहब डॉ. आंबेडकर का नाम कब सुना? जवाब में उन्होंने कहा कि बाबासाहब के विचारों से जुड़ाव बचपन में ही हो गया था। मेरे पिता रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के होशियारपुर के अध्यक्ष थे। घर में राजनीतिक माहौल था। बाबासाहब की चेतना थी।
दलितों को हिंदू बनाने की तकनीक और जाति के नाम घृणा
अपने बारे में द्वारका भारती ने बताया कि उन्होंने बारहवीं तक पढ़ाई इसी होशियारपुर शहर के सनातन धर्म सीनियर सेंकेडरी स्कूल में हुई। उनके मुताबिक, “इस स्कूल में सनातनी प्रथा थी। सुबह में असेंबली में हनुमान चालीसा का पाठ कराया जाता था। कहीं भूल न हो जाए, इसके लिए हनुमान चालीसा को कागज के पन्ने में लिखकर रखना पड़ता था। इसके अलावा रोज चंदन घिसकर हम सभी को तिलक भी लगाया जाता था।” क्या स्कूल में कभी जातिगत उपेक्षा झेलनी पड़ी?
उनके मुताबिक, “मैं और मेरे छोटे भाई तब आठवीं कक्षा में एक साथ पढ़ते थे। उस समय दलित समुदाय के छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति दी जानी थी। तो हुआ यह कि शिक्षक ने ऐसे सभी छात्रों को खड़े होने के लिए कहा, जो दलित समुदाय के थे। यह सुनकर मैं और मेरे भाई भी अन्य दलित छात्रों के साथ खड़े हो गए। लेकिन हम दोनों की साफ पोशाक आदि देखकर उस शिक्षक को यकीन नहीं हुआ कि हम दलित हैं। फिर उसने पूछा कि तुम्हारे पिता क्या करते हैं। मैंने कहा कि वे जूते बनाते हैं। इसके बावजूद उसे यकीन नहीं हुआ। उसने कहा कि पहले अपने घर जाओ और पूछ कर आओ। जब हम घर जा रहे थे तब उसने मेरे साथ स्कूल के चपरासी को लगा दिया। मैं अपने पिता के पास उनकी दुकान में पहुंचा तब चपरासी ने उनसे पूछा कि क्या यह आपका बेटा है।”
जाति की मानसिक पीड़ा क्या होती है, इसका पहला अनुभव बताते हुए द्वारका भारती जी कहते हैं कि “मैंने अपनी आत्मकथा में इसके बारे में लिखा है। तब मैं नवीं कक्षा का छात्र था। मैं गणित में बहुत कमजोर था। एक दिन मेरा पेपर फेंकते हुए गणित के शिक्षक विद्यासागर ने पूछा– ‘तुम्हारा बाप क्या करता है?’ मैं चुप था, बोला ही नहीं जा रहा था। मेरे एक सहपाठी रतन ने उसे बताया– “जूते बनाता है। मोची है।” विद्यासागर ने मेरे सिर के बालों को कसकर पकड़ लिया और पूरी ताकत से खींचा। कुछ समय के लिए मैं स्तब्ध रह गया। ऐसा लग रहा था जैसे वह मेरे बाल नहीं, मेरी जाति खींच रहा है।”
द्वारका भारती वर्तमान में हमारे सामने थे। कह रहे थे– “मैंने क्षण भर के लिए विद्यासागर की आंखों में झांका था। उसकी आंखों से घृणा का लावा दहक रहा था। मुझे लगा कि यह दहकता हुआ लावा मेरे लिए कम, मेरी जाति के लिए ज्यादा था। सदियों से चली आ रही घृणा को उसने जैसे एक बार में ही मेरे वजूद पर उड़ेल दिया हो। मैंने पूरी कक्षा की ओर नजर दौड़ाई। उनकी आंखों में एक ऐसा अजनबी अहसास था कि जैसे मैं उन पलों में उनके लिए पराया हो गया था।”
पंजाब में दलित साहित्य के पदचिह्न
दलित साहित्य के प्रति आपका रूझान कब हुआ? यह हमारा सवाल भी था और एक तरह का कौतुहल भी, क्योंकि इसके पहले द्वारका भारती जी यह बता चुके थे कि “कैसे मैंने बारहवीं के बाद आईटीआई से डिप्लोमा किया। आईटीआई में मैंने इलेक्ट्रिशियन का प्रशिक्षण लिया था। इसके बाद मैं बिजली विभाग में काम करने लगा। इसी क्रम में मुझे एक स्टोर रूम की चौकीदारी का काम दिया गया। वहां बैठने का ही काम था तो पढ़ने का खूब समय मिलता था। वहीं खूब सारी कहानियों की किताबें पढ़ीं। खासकर जासूसी कहानियां और उपन्यास भी। यहीं होशियारपुर में एक लाइब्रेरी थी, वहां से किताबें लाकर पढ़ता था। उस समय यह लगता था कि इन कहानियों में कोई मोची क्यों नहीं है जो जूते बनाता है? वह आदमी क्यों नहीं है जो गंदे नाले साफ करता है? तभी से दलित साहित्य के प्रति झुकाव हुआ। हालांकि 1979 में मैं जार्डन चला गया था। वहां एक साल काम करने के बाद इराक चला गया। वहां इरान-इराक युद्ध के कारण इराक छोड़कर भारत वापस आना पड़ा तब यहां गुजर-बसर के लिए छोटे भाई की दुकान में काम करने लगा। बाद में वह परिवार सहित अमेरिका चला गया। “यह वही दुकान है। अभी मेरा छोटा भाई भी मेरे गांव नीमपहाड़ी में रहता है और जूते बनाने में मेरा सहयोग करता है। वह मुझसे दो साल छोटा है। उसकी पत्नी और बच्चे अभी अमेरिका में ही रहते हैं। तो हुआ यह कि इसी दुकान में जूते भी बनाता था और किताबें पढ़ता था। उन दिनों ही रमणिका गुप्ता और विमल थोराट आदि से संपर्क हुआ। यह तब हुआ जब मैंने ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ का पंजाबी में अनुवाद किया। मैंने 1994-95 में इसी होशियारपुर में दलित साहित्य को लेकर भव्य आयोजन किया था। उस कार्यक्रम में दिल्ली और पंजाब के अनेक बड़े-बड़े साहित्यकार जुटे थे। इनमें एक श्योराज सिंह बेचैन भी थे।”

पंजाबी साहित्य में दलित और हिंदी साहित्य में दलित विमर्श के सवालों पर बात करने के क्रम में हमें समय का भान नहीं रहा। द्वारका भारती जी ने कहा कि चलिए अब खाना खाते हैं। हमारे मन में एक दुविधा थी रात गुजारने की। हमने उनसे पूछा कि क्या यहां रात गुजारने के लिए कोई होटल मिल सकेगा। उन्होंने हंसते हुए कहा कि मैंने आपके रहने का इंतजाम कर रखा है।
एक गुरुद्वारा ऐसा, जिसे बनाने वाला रविदास, लेकिन रैदास बानी नहीं
दुकान बंद करने में उन्हें दो मिनट का भी समय नहीं लगा। जो दो समोसे बच गए थे, उन्हें अपने साथ लिया और अपनी साइकिल के आगे वाले कैरियर में डाल दिया। हमें यह देखकर अच्छा लगा कि इस उम्र में वे साइकिल की सवारी करते हैं। असल में द्वारका भारती श्रम को महत्व देते हैं, श्रम को महान मानते हैं। यह उनके जीवन का फलसफा है। उनके साथ हम उनके घर जा रहे थे। उनका घर टिब्बा साहब मुहल्ला में है। इस मुहल्ले में एक गुरुद्वारा है, जिसका नाम टिब्बा साहब गुरुद्वारा है। द्वारका भारती जी ने हमें यह बताया कि इस गुरुद्वारा का निर्माण एक रविदासिया समाज के व्यक्ति ने कराया था। टिब्बा शब्द पंजाबी का शब्द है, जिसका मतलब होता है ऊंचा टीला। उन्होंने यह भी बताया कि आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस गुरुद्वारे का निर्माण भले ही रविदासिया समाज के एक व्यक्ति ने करवाया, लेकिन यहां संत रैदास की बानी का कीर्तन नहीं होता।
होशियारपुर के सुभाष नगर स्थित उनकी दुकान से टिब्बा साहिब मुहल्ले के उनके घर तक पैदल पहुंचने में हमें कम से कम दस मिनट का समय तो लगा ही होगा। इसी दस मिनट में उन्होंने हमें यह भी बताया कि इसी मुहल्ले में एक छोटा गुरुद्वारा है, जिसका निर्माण गड़िया समाज के लोगों ने कराया है। गड़िया यहां बढ़ई जाति को कहते हैं। रामगड़िया चौक पर जो प्रतिमा है वह गड़िया समाज के ही एक शासक का है, जो होशियारपुर के राजा थे।
अब हम उनके घर पर थे। उनके तीन बेटे हैं जो अपने परिवार के साथ उसी घर में रहते हैं। उनके छोटे बेटे राहुल से मुलाकात हुई, जो बैंक ऑफ बड़ौदा के होशियारपुर शाखा में कार्यरत हैं।
हम जिस कमरे में बैठे, उससे घर सुविधा-संपन्न लग रहा था। जिस सोफे पर हम बैठे थे, उसके बाईं ओर डॉ. आंबेडकर और जोतीराव फुले की तस्वीरें थीं। इस बीच उनकी पत्नी आईं। मुस्कुराते हुए ममत्व से परिपूर्ण शब्दों से उन्होंने हमारा स्वागत किया। वे पंजाबी बोल रही थीं, जिसे हम थोड़ा-बहुत समझ पा रहे थे।
रामदासिया और रविदासिया में फर्क नहीं
अगली सुबह यानी 5 सितंबर को द्वारका भारती जी हमसे मुखातिब थे। रविदासिया समाज और रामदासिया समाज के बीच क्या अंतर है? हमारे इस सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि इन दोनों में कोई फर्क नहीं है। रविदासिया समाज को ही लोग बोलने के क्रम में रामदासिया समाज कह देते हैं। हालांकि सिक्ख धर्म के एक गुरु रामदास भी हुए, जिन्हें मानने वाले खुद को रामदासिया कहते हैं। लेकिन सभी केशधारी और कड़ाधारी ही होते हैं। इसे ऐसे समझिए कि सिक्ख धर्म के दसों गुरुओं को मानने वाले लोग हैं। कोई गुरु नानक को अपना गुरु मानता है तो कोई गुरु रामदास को तो कोई गुरु गोविंद सिंह को। गुरु रामदास को अपना गुरु माननेवाले रामदासिया अधिकतर शूद्र समाज के लोग होते हैं।
किसी से कोई पूर्वाग्रह नहीं रखने वाला एक समालोचक
दलित साहित्य में आप किसे अपना आदर्श मानते हैं? बिना किसी हिचक के द्वारका भारती जी कहते हैं कि सभी अच्छे हैं, सभी ने अच्छा लिखा है। इनमें यह कहना कि अमुक ने अच्छा लिखा और अमुक ने कम अच्छा लिखा, ठीक नहीं है। भगवान दास ने भी अच्छा काम किया, शरण कुमार लिंबाले और ओमप्रकाश वाल्मीकि के योगदानों को भी कम नहीं आंका जा सकता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि से तो कई दफा आमने-सामने की बातचीत भी हुई। वे बहुत सहज व्यक्ति थे। मूल बात यह है कि दलित साहित्य सभी के समवेत प्रयासों से आगे बढ़ा है और यह आगे बढ़ता रहेगा। इस क्रम में डॉ. धर्मवीर का जिक्र आने पर द्वारका भारती जी कहते हैं कि वे विद्वान लेखक थे। वे तो बुद्ध को भी नकारते थे। लेकिन दलित साहित्य के समालोचना के क्षेत्र में उनका अहम योगदान रहा है। कंवल भारती, श्योराज सिंह बेचैन, मोहनदास नैमिशराय सभी ने दलित साहित्य को संवारा है, समृद्ध किया है। द्वारका भारती को आंबेडकर के चिंतन के सबसे नजदीक शरण कुमार लिंबाले लगे, क्योंकि वह महाराष्ट्र के हैं।

दलित साहित्य के सौंदर्य को लेकर आप क्या सोचते हैं? जवाब में द्वारका भारती जी कहते हैं कि साहित्य का सौंदर्य यथार्थ से जुड़ा है। दलित साहित्य यथार्थ का साहित्य है। इसमें उत्पीड़न, भेदभाव और संघर्ष है। जब ये सब रहेंगे तो सौंदर्य भी ऐसा ही होगा। इससे इतर यदि यथार्थ नहीं होगा तो वह दलित साहित्य नहीं कहा जाएगा। फिर यह सवाल कि दलित ही दलित साहित्य लिख सकते हैं, इस बारे में आपकी राय क्या है, द्वारका भारती जी सहज शब्दों में कहते हैं कि सब लिखें। यदि कोई गैर-दलित दलितों के विषय में लिखेंगे तो वे अपना नजरिया सामने लाएंगे। इससे उनकी दृष्टि भी सामने आएगी। उदाहरण के लिए प्रेमचंद ने भी दलितों के बारे में लिखा, जिससे यह सामने आया कि दलितों और अछूतों के बारे में उनकी सोच क्या थी। लेकिन एक बात तो अवश्य है कि स्त्री साहित्य कोई पुरुष नहीं लिख सकता। स्त्रियों का साहित्य केवल स्त्रियां लिख सकती हैं, कोई पुरुष उनके अहसासों को अभिव्यक्त नहीं कर सकता। यह मुमकिन ही नहीं है।
पंजाब की राजनीति में दलित हाशिए पर
साहित्य से अलग राजनीति, खासकर पंजाब में दलित राजनीति से संबंधित सवाल के जवाब में द्वारका भारती जी ने कहा कि पंजाब में दलितों की आबादी 22 प्रतिशत के करीब है। लेकिन सब अलग-अलग बंटे हैं। एक उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि इसी दुकान में जहां मैं बैठता हूं, अपने काम करता हूं, दो-तीन साल पहले एक कैलेंडर टंगा था। कैलेंडर में बुद्ध की तस्वीर थी। तब हुआ यह कि रविदास जाति का एक व्यक्ति आया और उसने विरोध व्यक्त किया कि मैंने बुद्ध की तस्वीर को क्यों लगा रखा है। उसने तो यहां तक विरोध किया कि उसने मुझसे तस्वीर हटाने की बात कही। लेकिन मैंने तस्वीर नहीं हटाई। तो मूल बात यह है कि संख्या अधिक होने के बावजूद अलग-अलग खेमों में बंटे रहने के कारण दलित राजनीति प्रभावशाली नहीं हो पाई।
कांशीराम और बसपा का जिक्र होने पर द्वारका भारती जी कहते हैं कि कांशीराम ने तो इसी होशियारपुर से बसपा की शुरुआत की। यहां [सुभाष नगर, जहां उनकी दुकान है] से थोड़ी दूर एक जनसभा को कांशीराम और मायावती ने संबोधित किया था। अब भले ही मायावती कुछ नहीं बोल रही हैं, लेकिन उस समय मायावती बहुत ओजस्वी वक्ता थीं। और कांशीराम ने तो अपना पहला चुनाव इसी होशियारपुर से लड़ा। लेकिन बाद में जैसे ही उन्होंने पंजाब को छोड़कर उत्तर प्रदेश पर अपना ध्यान केंद्रित किया, सब खत्म होता गया। आज की तारीख में बसपा का कहीं कोई कैडर नहीं बचा है।
जाति के विनाश के प्रयासों के चार दशक
द्वारका भारती पिछले 40 सालों से बौद्ध रीति-रिवाजों से अंतरजातीय विवाह करवाते रहे हैं। इस संबंध में हमारी जिज्ञासा देखकर उन्होंने बताया कि यह एक मुश्किल काम होता है। अक्सर जब लड़की ऊंची जाति की हो और लड़का निम्न समझी जाने वाली जाति का तो ऐसे युगलों की सुरक्षा का भी ख्याल रखना पड़ता है। सामूहिक विवाह को बढ़ावा देने के लिए यहां एक बौद्ध विहार है, जहां यह आयोजन किया जाता है। एक बार कुछ लोगों ने सवाल भी उठाया और विवाद पैदा करने की कोशिश की। लेकिन विरोध करने वाले लोगों की संख्या बहुत कम थी और वे हमारे द्वारा सख्त विरोध के बाद भाग खड़े हुए। द्वारका भारती जी के मुताबिक, अब भी लोग उनके पास अंतरजातीय विवाह के लिए आते हैं। विवाह के उपरांत एक दस्तावेज भी दिया जाता है, जिसमें वर-वधू का पूरा विवरण होता है।
उल्लेखनीय यह कि उपरोक्त सामाजिक कार्य के अलावा द्वारका भारती जुलाई, 1987 से एक मासिक हिंदी पत्रिका ‘बौद्ध धर्म प्रचारक’ के प्रकाशन व संपादन के हिस्सेदार रहे हैं। इसके संस्थापक संपादक सोहन लाल शास्त्री थे। वर्तमान में इसके संपादक रमेश सिद्धू तथा द्वारका भारती व सोहन सहजल सह-संपादक हैं।
एक शहर, जहां संरक्षित है उसका अतीत
बातचीत का सिलसिला लंबा रहा। उन्होंने पंजाब के समाज, साहित्य और राजनीति के विभिन्न आयामों को हमारे सामने रखा। सुबह के नाश्ते के बाद हम एक ई-रिक्शा पर सवार होकर उनके साथ होशियारपुर शहर देखने को निकल पड़े। इस क्रम में हम वह होशियारपुर देख पा रहे थे, जो कि मूल शहर है। पहले वे हमें चों के पास ले गए। चों पंजाबी में जलग्रहण क्षेत्र को कहा जाता है। अक्सर होता यह है कि जब बरसात में नदी का पानी बढ़ जाता है तब चों में पानी छोड़ दिया जाता है। इससे शहर को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। इसी चों में हमें स्लम भी दिखा। सैंकड़ो परिवार प्लास्टिक की झुग्गी-झोपड़ियां बना कर रहते हैं। ये कौन हैं, के जवाब में द्वारका भारती जी ने हमें बताया कि इसमें दूसरे राज्यों से आए गरीब हैं। इनमें दक्षिण भारत के भी लोग शामिल हैं। ये लोग यहां दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण है कि पंजाब के अन्य जिलों की तरह यहां होशियारपुर से भी बड़ी संख्या में युवा कनाडा, आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और अमेरिका आदि देशों में पलायन कर गए हैं। कई गांव ऐसे हैं, जहां अधिकतर बुजुर्ग नजर आते हैं। इसका असर यहां की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। समृद्धि आई है लेकिन अब खेती बिहार और उत्तर प्रदेश से आए मजदूरों के आसरे है।

हम ई-रिक्शे पर बातचीत कर रहे थे। अचानक द्वारका भारती जी ने ई-रिक्शा चालक को रोकने को कहा। “यहां रामलीला का मंचन होता है। बचपन में कई बार मैं यहां रामलीला देखने आया करता था। अब तो यहां भव्य मंदिर और मंच का निर्माण करा दिया है।” हमने भी हनुमान की एक बड़ी प्रतिमा देखी। द्वारका भारती हमें वहां उस जगह ले गए जहां बोर्ड पर हनुमान चालीसा दर्ज था। उन्होंने पूछा कि आपने इसे पढ़ा है? फिर कुछ देर बाद एक जगह रूक गए जहां लिखा था– “हाथ वज्र और ध्वजा विराजे, कांधे मूंज जनेऊ छाजै”। “यह है हकीकत। यहां हनुमान को मूंज का जनेऊ पहनने की बात कही गई है। मूंज का मतलब रस्सी होता है। जबकि ये ब्राह्मण स्वयं कपास के सूतों से बना जनेऊ पहनते हैं।” हनुमान से द्वारका भारती जी का इशारा दलित-बहुजनों की ओर था जो ब्राह्मणवादी पाखंड में आकंठ डूबे हैं।
हमारे सामने होशियारपुर का मुख्य बाजार था। पतली और संकीर्ण गलियों का इलाका। द्वारका भारती जी हमारे गाइड तो थे ही, हमारे सामने इतिहास की तहें भी उघाड़ रहे थे। उन्होंने हमें गलियों के संकीर्ण होने का कारण बताया। उनके मुताबिक, यह सब सुरक्षा के लिहाज से बनाई गईं। मुसलमानों और हिंदुओं ने अपने-अपने इलाके की रक्षा के लिए संकीर्ण गलियों का निर्माण कराया ताकि यदि कोई हमला करे तो सब मिलकर उसका मुकाबला कर सकें और संकीर्ण गलियां होने के कारण बचकर जाने न पावे।

होशियारपुर के इतिहास से रू-ब-रू होते हुए हम वहां दो पुस्तकालयों में भी गए। पहले डिस्ट्रिक्ट लाइबेरी, होशियारपुर। हमारे सामने एकमंजिली इमारत थी। अंदर कुछ युवा किताबें पढ़ रहे थे। एक मेज पर कुछ किताबें रखी थीं। हमें सुखद आश्चर्य तब हुआ जब हमने यह देखा कि वहां डॉ. आंबेडकर से जुड़ी कई किताबें ऊपर में रखी थीं। इस लाइब्रेरी के बारे में हमें द्वारका भारती जी ने बताया कि पहले यह लाइब्रेरी दूसरी जगह पर थी और बहुत बड़ी थी। यहां इसे चार-पांच साल पहले लाया गया। हालांकि इसकी स्थिति बेहतर नहीं है, लेकिन यह जगह कायम है, फिलहाल इसी से संतोष है।

दूसरी लाइब्रेरी जहां हम गए वह लक्ष्मणदास म्यूनिसिपल रीडिंग रूम था। एक पुरानी इमारत जिसकी सुंदरता के अवशेष अब भी मौजूद हैं। यहां मुख्य दरवाजे पर लगाए गए शिलालेख के मुताबिक इसका निर्माण 1938 में कराया गया था। इसके बारे में बताते हुए द्वारका भारती जी भावुक हो गए। उन्होंने हमें बताया कि यह वही लाइब्रेरी है जहां मैं रोज आया करता था। घंटों पढ़ा करता था। तब यहां बैठने को जगह नहीं होती थी। लोग अंदर-बाहर जहां जगह मिलती, पढ़ते रहते थे। लेकिन अब तो यहां किताबों को भी देखने वाला कोई नहीं। वहां के बुक शेल्फों के बारे में द्वारका भारती जी ने बताया कि लकड़ी के बने ये शेल्फ कम-से-कम 200 साल पुराने होंगे। हमें बताने के क्रम में वे एक शेल्फ में बेतरतीब ढंग से रखी किताबों को ठीक तरीके से रखने लगे। उस समय हम उनकी आंखों को नहीं देख पाए। मुमकिन है कि ऐसा करते हुए उनकी आंखें लाइब्रेरी की बुरी स्थिति को देखकर नम हो गई होंगी। इसी लाइब्रेरी के बाहर हमें वह दिखा, जो शायद ही भारत के किसी शहर में हो। यह था– ‘लेबर शेड’। टीन की एक शेड, जिसके नीचे निर्माण मजदूर बैठते हैं। होशियारपुर नगर निगम द्वारा बनवाए गए इस ‘लेबर शेड’ के निर्माण में वित्तीय सहयोग एक संगठन ने किया है, जिसका नाम है– ‘कंस्ट्रक्शन वर्कस वेलफेयर एसोसिएशन’।

होशियारपुर शहर में ही हम द्वारका भारती जी के बचपन के स्कूल सनातन धर्म सीनियर सेंकेंडरी स्कूल भी गए। उनके मुताबिक यहां उन्होंने 1950 के दशक में पढ़ाई की थी। वैसे यह स्कूल 1890 का है। जब वे हमें यह बता रहे थे कि इसी परिसर में असेंबली होती थी, जहां हनुमान चालीसा का पाठ करवाया जाता था और हम सभी को चंदन का तिलक लगाया जाता था, हमारी जेहन में महाराष्ट्र में जोतीराव फुले का शिक्षा आंदोलन और आर्य समाज के स्कूल थे। मुमकिन है कि प्रतिक्रांतिकारी स्कूलों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य तथाकथित सनातन धर्म की रक्षा करना रहा हो।
और अंत में
बहरहाल, हम अपनी इस यात्रा के आखिरी चरण में पहुंचे। एक जिम्मेदार मेजबान के रूप में द्वारका भारती जी हमें जब बस पड़ाव तक छोड़ने के लिए साथ चले तब उनके पास उनकी साइकिल थी। एक ऐसे शख्स की साइकिल जो इस बात का अहसास कराता हो कि यदि अतीत में संत रैदास रहे होंगे तो वे ऐसे ही रहे होंगे। श्रम को महत्व देने वाले और सत्य का शोध करने वाले।
(संपादन : राजन)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in
