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लुंबिनी : प्राचीन भारत का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक साक्ष्य

यह असोक स्तंभ साफ तौर पर घोषणा करता है– “हिद बुधे जाते शाक्यमुनि ति।” अर्थात् यहां शाक्यमुनि (बुद्ध) पैदा हुए थे। इससे रूम्मनदेई के रूप में लुंबिनी की स्थिति निश्चित हो जाती है। सम्राट अशोक ने अपने शासन के लगभग 20वें वर्ष यानी 249 ईसापूर्व में लुंबिनी की यात्रा की। पढ़ें, एन.के. गौतम व डॉ. सिद्धार्थ रामू का यह यात्रा वृत्तांत

लुंबिनी नेपाल के दक्षिणी तराई क्षेत्र के रुपन्देही जिले में स्थित महामानव गौतम बुद्ध की जन्मस्थली है। यह एक अंतरराष्ट्रीय बौद्ध केंद्र है। यहां हर वर्ष 5 लाख से लेकर 20 लाख तक बौद्ध भिक्खु, उपासक और पर्यटक आते हैं। बौद्ध, पालि एवं अन्य साहित्य, सम्राट अशोक के अभिलेख और पुरातात्विक साक्ष्य इसके साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि यहीं शाक्यमुनि गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। यूनेस्को ने 1997 में इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था। बौद्ध ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार जब रानी मायादेवी अपने मायके देवदह की ओर जा रही थीं तब यात्रा के दौरान लुंबिनी के उपवन में उन्होंने सिद्धार्थ को जन्म दिया। देवदह वर्तमान समय में देवदह नगरपालिका के रूप में नेपाल के रूपन्देही जिले में स्थित है। यह लुंबिनी से 35 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है।

हालांकि गौतम बुद्ध की जन्मतिथि को लेकर इतिहासकारों में कुछ मतभेद हैं। लेकिन इतिहासकारों के बीच उनकी जन्म की तिथि 563 ईसापूर्व और उनके परिनिर्वाण की तिथि 483 ईसापूर्व के बीच एक आम स्वीकृति है। लुंबिनी स्थित अशोक स्तंभ (249 ईसापूर्व) इसकी पुष्टि तो करता है कि यही बुद्ध का जन्म स्थान है, लेकिन उनके जन्म की सटीक तिथि की पुष्टि इससे नहीं होती है। यूनेस्को औपचारिक तौर पर 623 ईसापूर्व को बुद्ध की जन्मतिथि के रूप में स्वीकार करता है।

बौद्ध ग्रंथों में वर्णित बुद्ध के जन्म की कहानी के बारे में बौद्ध अध्येता डॉ. अण्णासाहेब हरी सालुंखे (आ.ह. सालुंखे) लिखते हैं कि “कोलिय गण के अंञन की कन्याएं महामाया देवी और महाप्रजापति दोनों शाक्य गण के प्रमुख की पत्नियां थीं। सिद्धार्थ का जन्म महामाया देवी की कोख से हुआ। वे प्रसूति के लिए अपने मायके देवदह नामक नगर जा रही थीं कि रास्ते में ही लुंबिनी नामक उद्यान में शालवृक्ष के नीचे उन्हें प्रसव पीड़ा हुई। सिद्धार्थ का जन्म खुले आकाश के नीचे हुआ। आगे चलकर उनका पूरा जीवन ‘भीतर-बाहर’ एक ही तरह खुला रहा। जन्म देने के सात दिनों पश्चात ही महामाया देवी का निधन हो गया। महाप्रजापति ने अत्यंत वात्सल्य से उनका लालन-पालन किया।”[1] इस संदर्भ में राहुल सांकृत्यायन अपनी किताब ‘महामानव बुद्ध’ में लिखते हैं कि “सिद्धार्थ की मां माया देवी अपने मायके जा रही थीं, उसी वक्त कपिलवस्तु से कुछ मील पर लुंबिनी नामक शालवन में सिद्धार्थ पैदा हुए। उनके जन्म के 318 वर्ष बाद अपने राज्यभिषेक के बीसवें साल असोक ने इसी स्थान पर एक पाषाण स्तंभ गाड़ा था, जो अभी वहां मौजूद है।”[2] बुद्ध के जन्म के बारे में डॉ. आंबेडकर अपनी चर्चित किताब ‘भगवान बुद्ध और उनका धम्म’ में लिखते हैं कि बुद्ध की मां महामाया ने गर्भ धारण करने के बाद अपने पति शुद्धोदन से मायके देवदह जाने की इच्छा प्रकट की। उसके बाद आंबेडकर इन शब्दों में बुद्ध के जन्म की कथा कहते हैं– “देवदह के मार्ग में महामाया को शाल-वृक्षों के उद्यान-वन मे गुजरना था, जिसके कुछ वृक्ष पुष्पित थे, कुछ अपुष्पित। यह लुंबिनी-वन कहलाता था।… जड़ से वृक्षों की शाखाओं के छोर तक पेड़ फलों और फूलों से लदे थे। नाना रंग के भ्रमर-गण गुंजार कर रहे थे। पक्षी चहचहा रहे थे। यह देखकर महामाया के मन में इच्छा उत्पन्न हुई कि वह कुछ समय तक वहां रहें … महामाया पालकी से उतरीं और एक सुंदर शाल वृक्ष की ओर बढ़ी। मंद पवन बह रहा था। संयोग से एक शाखा काफी नीचे झुकीं हुई थी। महामाया ने पंजों के बल खड़ी होकर उसे पकड़ा। …महामया को प्रसव-वेदना आरंभ हुई।”[3] इसी शाल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ का जन्म हुआ।

सम्राट असोक के द्वारा स्थापित कराया गया पत्थर का स्तंभ

हमें यहां गौतम बुद्ध को जन्म देने वाली उनकी मां महामाया के मायके देवदह के बारे में थोड़ा जान लेना चाहिए। पालि निकाय (ग्रंथों) में देवदह को प्राय: शाक्यों का ही कस्बा (निगम) बताया गया है। ‘मज्झिम निकाय’ के देवदह-सुत्तंत के आदि में कहा गया है कि “एक समय भगवान शाक्य देश में शाक्यों के निगम (कस्बा) विहार करते थे।” ‘संयुक्त निकाय’ के देवदहखण-सुत्त में भी हम तथागत बुद्ध को ‘शाक्यों के निगम’ (कस्बे) देवदह में विहार करते देखते हैं। ‘महावंस’ में भी देवदह राजा को शाक्य बताया गया है। भगवान बुद्ध की माता महामाया देवी, मौसी महाप्रजापति और पत्नी भद्रा कात्यायनी, देवदह नगरी की थीं। महाप्रजापति गौतमी ने तो ‘अपदान’ में अपना परिचय देते हुए कहा भी है, “पच्छिमे च भवे दानि जाता देवदहे पुरे। पिता अंञन सक्को मे माता मम सुलक्खणा। ततो कपिलवत्थुस्मिं सुद्धोदनघरं गता।” अर्थात् इस अंतिम जन्म में मैंने देवदह नगर में जन्म लिया। मेरे पिता अंञन शाक्य थे और माता सुलक्षणा। फिर मैं कपिलवस्तु में राजा शुद्धोदन के घर गई।”

स्थविर पक्ख और स्थविर रक्खित, जिनके उदगार थेरगाथा में सन्निहित हैं, देवदह नगर के ही निवासी थे। देवदह नगरी रोहिणी नदी के पूर्वी किनारे से लगी हुई थी। इस प्रकार से सीमा के विचार से तो वह कोलिय जनपद में ही थी और इसीलिए संभवत: उत्तरकालीन साहित्य में कोलिय जनपद की राजधानी मान ली गई। भगवान बुद्ध कई बार देवदह गए थे।[4]

जिस लुंबिनी के शालवन में भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। वह शाक्य जनपद का ही एक अंग था। इसके साक्ष्य पाली बौद्ध साहित्य में मिलते हैं। पालि साहित्य में लुंबिनी को एक जनपद कहकर पुकारा गया है। ‘नालक-सुत्त’ में कहा गया है– ‘जनपदे लुंबिनेय्ये’। बुद्ध शाक्य गण में पैदा हुए थे। इसका साक्ष्य वे स्वयं देते हैं। जब बोधिसत्त्व गृह-त्याग करके राजगृह (वर्तमान में बिहार का राजगीर) गए थे, तो राजा बिंबिसार ने उनसे पूछा था कि “तुम कौन हो?” तब बुद्ध ने कहा था–

उजुं जानपदो राजा हिमवन्तस्स पम्मन्तो।
धनविरियेन सम्पन्नो कोसलेसु निकेतिनो॥

आदिच्चा नाम गोत्तेन, साकिया नाम जातिया।
तंहा कुल पब्बजितो राज न कामे अभिपत्थयं॥

अर्थात् “हे राजा, यहां से सीधे हिमालय की तलहटी में कोसल देश में [प्राप्त] है। उसका गोत्र आदित्य है और जाति शाक्य। हे राजा, उस कुल से कामेच्छा छोड़कर, मैं परिव्राजक बन गया हूं।” इस गाथा में ‘कोसलेसु निकेतिनो’ शब्द महत्वपूर्ण है, जिसका मतलब है– “कोसल देश में गिने जाते हैं।” इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उस समय शाक्य पूरी तरह स्वतंत्र गणराज्य नहीं रह गया था। वह गणराज्य कोसल राज्य के अधीन हो चुका था। हालांकि शाक्यों को आंतरिक मामलों में स्वतंत्रता प्राप्त थी, लेकिन वे कोसल के अधीन थे।

लुंबिनी में असोक का स्तंभ 1896 में पाया गया, जिसमें ब्राह्मी लिपि (धम्म लिपि) में अभिलेख पाया गया। यह अभिलेख असोक शासन के बीसवें वर्ष में 249 ईसापूर्व का है, जिसमें साफ लिखा है कि ‘लुमिनी गामे उबलिके कटे।’ इस ‘लुमिनी गाम’ निर्देश से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह स्तंभ लुंबिनीवन के उस स्थान पर गाड़ा गया था, जहां तथागत बुद्ध का जन्म हुआ था। यह असोक स्तंभ साफ तौर पर घोषणा करता है– “हिद बुधे जाते शाक्यमुनि ति।” अर्थात् यहां शाक्यमुनि (बुद्ध) पैदा हुए थे। इससे रूम्मनदेई के रूप में लुंबिनी की स्थिति निश्चित हो जाती है। सम्राट अशोक ने अपने शासन के लगभग 20वें वर्ष यानी 249 ईसापूर्व में लुंबिनी की यात्रा की। उन्होंने वहां एक पत्थर का स्तंभ स्थापित कराया और जन्मस्थान को चिह्नित किया। स्तंभ पर प्राकृत/पाली भाषा और प्रारंभिक ब्राह्मी लिपि में अभिलेख है। उसका आशय है–

राजा प्रियदर्शी (असोक) ने स्वयं यहां आकर पूजा की, क्योंकि यहां शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म हुआ था; इसलिए यहां पत्थर का स्तंभ स्थापित कराया गया और लुंबिनी गांव के कर को घटाकर आठवें भाग के बराबर कर दिया गया। यह अभिलेख अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि तीसरी शताब्दी ईसापूर्व का समकालीन ऐतिहासिक साक्ष्य है।

इस अभिलेख से यह भी निश्चित हो जाता है कि कपिलवस्तु इस स्थान (रूम्मनदेई) के पश्चिम में होना चाहिए, क्योंकि पालि विवरण के अनुसार लुंबिनी वन कपिलवस्तु के पूर्व में कपिलवस्तु और देवदह नगरों के बीच स्थित था। लुंबिनी की स्पष्ट पहचान ने ही बाद में कपिलवस्तु की पहचान निश्चित करने में मदद की। अपने शासन के बीसवें वर्ष में जब सम्राट असोक ने यहां की धम्म यात्रा की, तो उन्होंने भगवान बुद्ध का जन्मस्थान होने के कारण लुंबिनी गांव से राजस्व कर के रूप में जो आठवां भाग लिया जाता था, उसे नहीं लेने का निर्णय लिया। पांचवी शताब्दी में चीनी यात्री फाहियान[5] ने लुंबिनी वन की यात्रा किया था। उन्होंने लिखा– “नगर (कपिलवस्तु) के पूर्व 50 ली[6] पर राजा का बाग है। बाग का नाम लुंबिनी है। महारानी (महामाया) ने एक कुंड में प्रवेश कर स्नान किया था। वह कुंड के उत्तर किनारे से निकली, 20 पग चलीं। उन्होंने हाथ उठाकर एक वृक्ष की शाखा पूर्वाभिमुख होकर पकड़ीं और कुमार को जना।”[7] एक और चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी लुंबिनी की यात्रा की थी।[8] उन्होंने इसका वर्णन इन शब्दों किया है– “सरकूप के उत्तर-पश्चिम लगभग 80 या 90 ली[9] चल कर हम लुंबिनी वाटिका में गए। यहां पर शाक्य लोगों के स्नान का तड़ाग है, जिसका जल दर्पण के समान स्वच्छ और चमकीला है। इस जल के ऊपर अनेक फूल खिले हुए हैं। .. इसके उत्तर की ओर 24-25 पग पर असोक वृक्ष है, जो इन दिनों सूख गया है। इसी स्थान पर वैशाख मास शुक्ल पक्ष की अष्टमी को बोधिसत्व ने जन्म धारण किया था। … स्थाविर कहते हैं कि जन्म वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंद्रहवीं तिथि को हुआ था … इसके पूर्व में एक स्तूप असोक राजा का बनवाया हुआ है। … इन स्तूपों के निकट ही एक ऊंचा पत्थर स्तंभ है, जिसके ऊपर घोड़े की मूर्ति बनी है। यह स्तंभ राजा असोक का बनवाया हुआ है।… इसके निकट ही एक छोटी-सी नदी दक्षिण-पूर्व की ओर बहती है। वहां के लोग इसे तैल-नदी कहते हैं।”[10]

लुंबिनी की गणना चार मुख्य बौद्ध पावन स्थलों में की जाती है। यहां भगवान बुद्ध तथागत पैदा हुए थे। शेष तीन महान पावन बौद्ध स्थल बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर हैं। बोधगया, जहां भगवान बुद्ध ने ज्ञान (बोध) प्राप्त किया। सारनाथ, जहां उन्होंने अपना पहला धम्मोपदेश दिया और कुशीनगर, जहां उन्होंने परिनिर्वाण प्राप्त किया। ‘दीघ निकाय’ के महापरिनिब्बान-सुत में इन चार पावन स्थलों को दर्शनीय अर्थात संवेजनीय यानी वैराग्य उत्पन्न करने वाला कहा गया है।

विश्राम करते बौद्ध भिक्खुगण

भारत और नेपाल स्थित बौद्ध स्थलों में आज की तारीख में लुंबिनी सबसे रमणीय, शांत, मनमोहक और भीतरी ऊर्जा से भर देने वाला स्थान है। यहां का पूरा वातावरण सुरम्य है। यहां पहुंचने पर थोड़ी देर के लिए लगता है कि ईसापूर्व की छठवीं शताब्दी में प्रवेश कर गए हैं। यह पूरा क्षेत्र करीब 7.7 वर्ग किलोमीटर में फैला है। शहर के कंक्रीट के जंगलों से निकल यहां पहुंचने पर घने पेड़-पौधों की शृंखला एक छोटे जंगल के बीच होने का अहसास कराती है। इनके बीच में पानी से भरे जलाशय और छोटी नहरें मौजूद हैं। यहां सब कुछ सुसज्जित और व्यवस्थित है। चारों ओर विभिन्न तरह की पक्षियों का कलरव भी आपको शाम-सुबह सुनाई देगा। देश-दुनिया के भिक्खुओं, उपासकों और पर्यटकों के चलते यहां चहल-पहल तो रहती है, लेकिन भीड़ का कोई अहसास नहीं होता।

भारत की तरह यहां दुकानदार और भीख मांगने वाले आप को घेर नहीं लेते हैं। करीब 3 वर्ग किलोमीटर के दायरे में बाहरी दुकानों की लिए इजाजत नहीं है। सिर्फ बौद्ध धम्म से जुड़ी किताबों का एक केंद्र है। आने वालों के आराम के लिए कुछ विश्राम स्थल बने हुए हैं। बाहरी यात्रियों के टिकने के लिए इस दायरे से बाहर ही होटल, बौद्ध विहार या अन्य जगहें बनी हुई हैं। अंदर की सड़कें चौड़ी हैं, जिनके दोनों ओर घने पेड़ों की छाया है। यहां करीब-करीब सभी बुद्धिस्ट देशों और अन्य देशों के बौद्ध मंदिर, मठ और विहार हैं। अलग-अलग देशों की स्थापत्य कला और बौद्ध धम्म एवं विरासत की अपनी विशिष्टता दिखाई देती है। इन देशों के बौद्ध भिक्खु ही मुख्य रूप से इनमें मौजूद हैं। तमाम समानताओं के बीच सबकी अपनी पूजा-अर्चना, ध्यान और उपासना की पद्धतियां हैं।

ये सारे बौद्ध मंदिर, मठ और विहार एक-दूसरे से दूर-दूर बने हैं। सब के सब घने पेड़ों से घिरे हुए हैं। इन मंदिरों, मठों और विहारों में अपूर्व ऊर्जा और शांति मौजूद होती है। यहां धर्म के कारोबारी नहीं के बराबर दिखाई देते हैं। धर्म इनके लिए कोई धंधा नहीं है। अधिकांश भिक्खु और उपासक गहन धम्म भावना से ओत-प्रोत लगते हैं। सबके अपने-अपने अनुष्ठान-कर्मकांड तो हैं, लेकिन धम्म के मूल भाव पर हावी नहीं है। अधिकांश के चेहरे पर एक कांति-आभा और गहन शांति दिखाई देती है। यहां मौन साधे देश-दुनिया के उपासक आप को सहज ही मिल जाएंगे, जिन्हें देखकर एक अलग-सी प्रेरणा मिलती है। उनके चेहरे की शांति और गहन मानवीय भाव (करूणा) उनके जैसा होने की चाहत पैदा करती है। हमने कई बार इस स्थल की यात्रा की है। तमाम बौद्ध स्थलों की तुलना में यह एक ऐसा स्थल लगता है, जहां लंबा समय व्यतीत करने का तीव्र आकर्षण महसूस होता है। लगता है कि यही वह जगह है, जहां एक प्राकृतिक वातावरण में चिंतन-मनन किया जा सकता है, ध्यान और सच्ची उपासना की जा सकती है। इतिहास के हजारों वर्षों की यात्रा का अनुभव किया जा सकता है। बुद्ध और उनके समकालीन जीवन को महसूस किया जा सकता है। सम्राट असोक, फाहियान और ह्वेनसांग आदि के पदचाप को सुना जा सकता है। इन सभी ने शाक्यमुनि बुद्ध के इस जन्म स्थल की यात्रा की थी।

लुंबिनी के एक बौद्ध मंदिर में निर्मल अरोडा (दिल्ली ), डॉ. सिद्धार्थ रामू, रामेश्वर दयाल, रविंद्र कुमार गौतम, जगदीश प्रसाद (पिथौरागढ़), महेंद्र सिंह, कलावती देवी, पिथौरागढ़, गोविन्द राम गौतम (पिथौरागढ़), शारदा कुमारी सिंह औऱ शकुंतला दयाल आदि

बौद्ध स्थलों में लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर सबसे शीर्ष स्थान रखते हैं। इसमें लुंबिनी आज के नेपाल में है, जबकि शेष तीन स्थल भारत में हैं। हम सभी जानते हैं कि देशों-राष्ट्रों की आज भौगोलिक सीमाएं आधुनिक काल में निश्चित स्वरूप लेती हैं। बुद्ध ने जिस शाक्य गणराज्य में जन्म लिया था, उसका क्षेत्र आज के भारत और नेपाल की सीमा से सटा तराई क्षेत्र था। इसका केंद्र कपिलवस्तु था। कपिलवस्तु शाक्यों की राजधानी थी। इसके पूर्व में रोहिणी नदी थी, जिसके उस पार कोलिय गणराज्य था। प्राचीन शाक्य गणराज्य के उत्तर में हिमालय, पूर्व में रोहिणी नदी, पश्चिम में राप्ती (अचिरावती) कोसल और दक्षिण में पावा कुशीनगर तक फैला हुआ था। ऐतिहासिक विवरणों में शाक्य गणराज्य का क्षेत्रफल 5,200-7,800 वर्ग किलोमीटर तक फैला बताया गया है। उसका अधिकांश भाग आज के नेपाल के तराई क्षेत्र में था। कुछ हिस्सा वर्तमान के उत्तर प्रदेश में भी आता है। वर्तमान समय में इसे नेपाल के रूपन्देही और आसपास के तराई क्षेत्र तथा भारत के सिद्धार्थ नगर और आसपास के क्षेत्र हैं।

लुंबिनी को सुनियोजित योजना के तहत संरक्षित और व्यवस्थित किया गया है। इसके विकास का एक पूरा मास्टर प्लान बनाया गया था। इसे जापानी वास्तुकार केंजो टांगे ने तैयार किया था। यह मास्टर प्लान 1978 में स्वीकृत हुआ था। इस 7.7 वर्ग किलोमीटर फैले क्षेत्र में तीन हिस्से हैं। पहला सेक्रेड गार्डन (पावन लुंबिनी), मोनास्टिक जोन (बौद्ध विहार/ मठों का क्षेत्र) और कल्चरल सेंटर (सांस्कृतिक क्षेत्र), इसे न्यू लुंबिनी विलेज भी कहा जाता है। 1967 में संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव यू थांट ने लुंबिनी की यात्रा की और इसके अंतरराष्ट्रीय विकास की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके बाद केंजो टांगे को लुंबिनी के लिए मास्टर प्लान तैयार करने का कार्य दिया गया। यह योजना 1978 में स्वीकृत हुई। नेपाल सरकार ने 1985 में लुंबिनी डेवलपमेंट ट्रस्ट की स्थापना की। इसका उद्देश्य लुंबिनी के संरक्षण, पुरातात्त्विक उत्खनन और मास्टर प्लान के अनुसार विकास को आगे बढ़ाना है। आज लुंबिनी में विभिन्न बौद्ध देशों के मठ और धार्मिक केंद्र हैं। इस कारण यह केवल नेपाल का धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बौद्ध तीर्थस्थल बन चुका है।

सेक्रेड गार्डन (पावन लुंबिनी) सबसे मुख्य क्षेत्र है, जहां मायादेवी मंदिर, असोक स्तंभ, बुद्ध के जन्म-चिह्न, पुष्करिणी तालाब और प्राचीन बौद्ध अवशेष स्थित हैं। यह केंद्रीय क्षेत्र करीब 2.6 वर्ग किलोमीटर में फैला है। मोनास्टिक ज़ोन लुंबिनी विकास क्षेत्र का वह हिस्सा है जहां दुनिया के विभिन्न बौद्ध देशों और परंपराओं ने अपने-अपने बौद्ध मठ, विहार और मंदिर स्थापित किए हैं। लुंबिनी के मोनास्टिक ज़ोन को मुख्यतः दो भागों में बांटा गया है–

  • पूर्वी मोनास्टिक ज़ोन। मुख्यतः थेरवाद बौद्ध परंपरा से जुड़े मठ। यहां श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया आदि देशों की स्थापत्य एवं धार्मिक परंपराएं दिखाई देती हैं।
  • पश्चिमी मोनास्टिक ज़ोन। मुख्यतः महायान और वज्रयान परंपराओं से जुड़े मठ। चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, नेपाल आदि की बौद्ध स्थापत्य शैलियां यहां देखने को मिलती हैं।

इन दोनों मोनास्टिक ज़ोन में कई देशों के प्रसिद्ध बौद्ध संस्थान हैं। जैसे चाइना मंदिर/झोंग हुआ मंदिर, म्यांमार गोल्डन टेंपल, थाई बौद्ध मंदिर, श्रीलंका का मठ, कंबोडियन मठ, कोरियन बौद्ध मंदिर, जापानी बौद्ध संस्थान, तिब्बती परंपरा के मठ, जर्मन मठ, फ्रांसीसी बौद्ध मठ और नेपाल के विभिन्न बौद्ध विहार। यह क्षेत्र मायादेवी मंदिर और असोक स्तंभ वाले पवित्र जन्मस्थल क्षेत्र (सेक्रेड गार्डन) से अलग है। मोनास्टिक ज़ोन का उद्देश्य लुंबिनी को अंतरराष्ट्रीय बौद्ध तीर्थ एवं अध्ययन-केंद्र के रूप में विकसित करना है।

न्यू लुंबिनी विलेज लुंबिनी विकास क्षेत्र का वह हिस्सा है जहां यात्रियों और तीर्थयात्रियों के लिए आवास, सेवाएं, बाजार तथा अन्य नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इसका उद्देश्य मुख्य पवित्र क्षेत्र को अपेक्षाकृत शांत और धार्मिक स्वरूप में बनाए रखते हुए आवश्यक आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

ग्रेटर लुंबिनी एरिया लगभग 5,260 वर्ग किमी में फैला है। इसमें लुंबिनी, तिलौराकोट (प्राचीन कपिलवस्तु), देवदह और रामग्राम जैसे प्रमुख बौद्ध स्थल शामिल हैं। प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति-सभ्यता को जानने-समझने के लिए लुंबिनी की यात्रा जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही आत्मिक-बौद्धिक चिंतन-मनन और शांति-ध्यान के लिए वह आकर्षक स्थल है।

संदर्भ

[1] आ.ह. सालुंखे, सर्वोत्तम भूमिपुत्र गोतम बुद्ध, संवाद प्रकाशन, मेरठ, प्रथम संस्करण, 2023, पृ. 21-22

[2] राहुल सांकृत्यायन, महामानव बुद्ध, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली, पांचवा संस्करण, 2019, पृ. 9

[3] डॉ. आंबेडकर, भगवान बुद्ध और उनका धर्म (अनुवाद- डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन), बुद्धभूमि प्रकाशन, नागपुर, पृ. 5-6

[4] बुद्धकालीन भारत, डॉ. भरतसिंह उपाध्याय, बुद्धम् पब्लिशर्स, जयपुर, संस्करण, 2024, पृ. 136-137

[5] चीन के बौद्ध तीर्थ-यात्री, जिन्होंने 399 ईस्वी से 414 ईस्वी के बीच भारत की यात्रा करते हुए व्यतीत किया, विशेषकर बौद्ध स्थलों की।

[6] दूरी मापने की एक चीनी इकाई। एक ली का मतलब 500 मीटर होता है। यहां 50 ली का मतलब करीब 25 किलोमीटर है।

[7] फाहियान की भारत यात्रा, अनुवाद-जगन्मोहन शर्मा, सिद्धार्थ बुक्स, दिल्ली। प्रथम संस्करण-1975, पृ. 86

[8] चीनी बौद्ध तीर्थ-यात्री ह्वेनसांग ने 602 ईस्वी से 664 ईस्वी के बीच भारत की यात्रा की।

[9] करीब 45 किलोमीटर

[10] ह्वेनसांग की भारत यात्रा, ह्वेनसांग, सिद्धार्थ बुक्स, दिल्ली, प्रथम संस्करण-2022, पृ. 191-92

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

एन.के. गौतम/सिद्धार्थ रामू

बौद्ध विरासत में रुचि रखने वाले एन.के. गौतम सामाजिक कार्यकर्ता व सिंचाई विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार में अधीक्षण अभियंता हैं। डॉ. सिद्धार्थ रामू लेखक और पत्रकार हैं।

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