साल 2016 के 15 अक्टूबर, 2016 को दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र नजीब अहमद अचानक लापता हो गए थे। बताया जाता है कि इसके एक दिन पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कुछ कार्यकर्ताओं से उनकी झड़प हुई थी। घटना के बाद छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन को घेरा और मांग की कि वह नजीब अहमद के गायब होने की जवाबदारी ले। “नजीब कहां गया?” इस प्रश्न को केंद्र में रखकर एक आंदोलन शुरू हुआ।
लेकिन आज दस साल बाद भी यह सवाल अनुत्तरित है। मामले की जांच आधिकारिक रूप से जून, 2025 को समाप्त हो गई जब दिल्ली की एक अदालत ने सीबीआई द्वारा दाखिल खात्मा रिपोर्ट मंज़ूर कर लिया। उसी साल दिसंबर में दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया। अदालतें यह पता नहीं लगा सकीं कि नजीब कहां है या उसके साथ क्या हुआ।
मगर इस घटना ने एक और प्रश्न को जन्म दिया – और उसका संबंध इस विश्वविद्यालय के राजनीतिक जीवन से है और वह यह कि आखिर ‘जेएनयू के विचार’ का क्या हुआ?
मैं सन् 2015 के मध्य से जेएनयू के राजनीतिक जीवन का हिस्सा और उसका गवाह रहा हूं। जेएनयू वह जगह थी, जहां केवल चुनाव और संगठित एक्टिविज्म के ज़रिए ही विद्यार्थी राजनीति का ककहरा नहीं सीखते था। क्लासरूमों, हॉस्टलों, फ़ूड कोर्टों और रोजाना की बातचीत – राजनीति इन सबका हिस्सा होती थी। विश्वविद्यालय को असहमति की मुखर अभिव्यक्ति, बौद्धिक आज़ादी और बहुवाद के लिए जाना जाता था और साथ ही उसे अधिक समावेशी भारत के निर्माण के सपने का केंद्र भी माना जाता था।
फरवरी, 2016 में ‘द हिंदू’ समाचारपत्र में प्रकाशित अपने एक लेख में विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पीटर डिसूज़ा ने लिखा, “जेएनयू में हमने एक ऐसे भारत के विचार को जन्म दिया और पाला-पोसा जो समावेशी होगा, जिसमें भेदभाव नहीं होगा, जहां लैंगिक न्याय होगा, जो पर्यावरणीय दृष्टि से टिकाऊ होगा, रचनात्मक कलाओं का केंद्र होगा, बहुवादी होगा और जहां का समाज संसाधनों का इस तरह पुनर्वितरण करेगा जिससे असमानता कम हो… जेएनयू एक ऐसा विश्वविद्यालय है जो राज्य तंत्र के संचालन और नागरिक समाज में काम करने के लिए सुपात्र और योग्य व्यक्ति उपलब्ध करवाता आया है। जेएनयू असहमति को प्रोत्साहन देता रहा है… वैश्विक बहुवाद में यकीन रखने वाला कोई भी विश्वविद्यालय समाज की एक कीमती धरोहर होता है क्योंकि वह नए प्रश्नों और उत्तरों को सामाजिक विमर्श का हिस्सा बनाता है, वह स्थापित विचारों को चुनौती देता है और कथित प्रामाणिक ग्रंथों के वैकल्पिक पाठ उपलब्ध करवाता है। यह सब आज खतरे में है। बाहरी तत्व विचारों और सामाजिक रिश्तों पर रोक-टोक को ‘जेएनयू के विचार’ का हिस्सा बना रहे हैं।”
दरअसल, यह सब हर विश्वविद्यालय में होना चाहिए। विश्वविद्यालय को असहमत होने के अधिकार की रक्षा करना चाहिए, उसे सत्ता से प्रश्न पूछने चाहिए और उसमें ऐसे विचारों के लिए जगह होनी चाहिए जो व्यवस्था को चुनौती देते हों। मगर किसी विचार – चाहे उसके सिद्धांत कितने ही प्रगतिशील क्यों न हों – के बारे में राय केवल उसके घोषित मूल्यों के आधार पर नहीं बनाई जा सकती। हमें यह भी जानना होगा कि क्या इन मूल्यों को आचरण में उतारा जाता है? क्या उनके ऊपर प्रश्न खड़े किए जाते हैं और उन्हें अस्वीकार किया जाता है?
यहीं ‘जस्टिस फॉर नजीब’ आंदोलन महत्वपूर्ण बन जाता है। तब क्या होता है जब आम लोग – जो असहमति के अधिकार की रक्षा के प्रति एक विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता की सराहना करते नहीं थकते – उसी विश्वविद्यालय से न्याय की मांग करते हैं और यह मांग उस विश्वविद्यालय को असहज बनाती है?
‘जेएनयू के विचार’ की सीमाएं
कोई विचार उन मूल्यों के रास्ते वैधता हासिल कर सकता है, जिन मूल्यों का वह प्रतिनिधित्व करता है। समय के साथ, ये मूल्य, आदर्श बन जाते हैं। उन्हें बार-बार, लगातार दोहराया जाता है, उनका बचाव किया जाता और अंततः उस विचार पर प्रश्न उठाना शत्रुतापूर्ण व्यवहार बन जाता है। ‘जेएनयू का विचार’, इस प्रक्रिया का अपवाद नहीं था। उसकी सराहना, उसे आदर्श का दर्जा देने से कभी-कभी वह विश्वविद्यालय के भीतर व्याप्त असमानताओं और बहिष्करण की पड़ताल में बाधा बन जाता है।
समस्या यह नहीं थी कि जेएनयू में असहमति के परंपरा नहीं थी। समस्या यह थी कि इस परंपरा को इस बात का अकाट्य सबूत मान लिया गया कि विश्वविद्यालय का चरित्र पूर्णतः लोकतांत्रिक है।
‘जस्टिस फ़ॉर नजीब’ आंदोलन ने इसी विरोधाभास का पर्दाफाश किया। छात्र अपने गायब हो गए सहपाठी के बारे में सवालों के जवाब मांग रहे थे। वे चाहते थे कि उन्हें यह बताया जाए कि उनके साथी के गायब हो जाने के पीछे घटना के पहले के घटनाक्रम की क्या भूमिका थी। वे मांग कर रहे थे कि उन्हें बताया जाए कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस बाबत क्या किया। आंदोलन के दौरान विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन का घेराव किया गया। पूरा आंदोलन इस मसले पर केंद्रित हो गया कि प्रशासन का छात्रों की मांगों पर क्या रुख है।

घेराव पर कई तरह के विवाद खड़े हो गए। विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने उन्हें नज़रबंद कर दिए जाने पर घोर आपत्ति की। छात्रों का कहना था कि प्रशासन ने नजीब के गायब होने के मामले पर पर्याप्त और उचित कार्यवाही नहीं की। इस विवाद को उसके ऐतिहासिक संदर्भों में समझा जाना ज़रूरी है। मगर उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि जवाबदेही तय करने का मुद्दा जल्दी ही एक समस्या क्यों बन गया, जिसे सम्हाला या नियंत्रित या समाप्त किया जाना चाहिए था?
किसी भी विश्वविद्यालय को केवल इसलिए पड़ताल से मुक्त नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका असहमति को स्वीकार करने का लंबा इतिहास है और न ही विश्वविद्यालय पर बाहरी तत्वों के हमलावर होने को इस आधार पर गलत ठहराया जा सकता है कि विश्वविद्यालय के कैंपस में तो पहले से ही लोकतांत्रिक वातावरण है। हमें विश्वविद्यालय के अपने आचरण, उसमें शक्तियों के आतंरिक वितरण की पड़ताल भी करनी होगी और इस बात की भी कि जब हाशियाकृत समुदायों के छात्र न्याय की मांग करते है तब विश्वविद्यालय की प्रतिक्रिया क्या होती है।
यह सब कहने का अर्थ यह नहीं है कि जेएनयू के भीतर हर मतभेद केवल पाखंड और दिखाऊ होता है। और न ही इसका अर्थ यह है कि हर वह व्यक्ति जो घेराव का विरोध कर रहा था उसे नजीब के गायब हो जाने से कोई सरोकार न था। यह मानना, विश्वविद्यालय के अंदर की राजनीतिक असहमतियों को नज़रंदाज़ करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है विश्वविद्यालय ने किन शर्तों पर छात्रों के साथ एकजुटता का प्रस्ताव किया; वे कौन-सी मांगें और कौन-सी शिकायतें थीं, जिन्हें वह सामान्य हालात की बहाली की खातिर मानने या दूर करने को तैयार था?
किसकी पीड़ा दिखती है?
इस आंदोलन की एक घटना से मैंने बहुत कुछ सीखा।
घेराव के दौरान, कुलपति और रजिस्ट्रार की पत्नियां प्रशासनिक भवन पहुंचीं। उस दिन करवा चौथ का त्यौहार था और वे अपने पतियों से मिलना चाहती थीं। विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने इस घटना का विवरण ट्विटर पर किया जिससे आमजनों का ध्यान उस ओर आकर्षित हुआ और इस पर चर्चाएं शुरू हो गईं, जिनसे छात्रों पर घेराव समाप्त करने का दवाब बना।
हालत यह हो गई कि विरोध प्रदर्शन के मूल मुद्दे से ज्यादा बहस इस मसले पर होने लगी। एक गायब हो गए छात्र के लिए न्याय की मांग के सामानांतर चर्चा का विषय यह भी बन गया कि पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कितना ज़रूरी है और अधिकारियों को कैद रखने से उनके परिवारों को किस तरह की पीड़ा भोगनी पड़ रही है।
एक पत्नी की करवा चौथ के दिन अपने पति से मिलने की इच्छा से मुझे कोई परेशानी नहीं है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है और न ही एक मां के दर्द और एक पत्नी की चिंता को हम अलग-अलग करके देख सकते हैं। मुद्दा यह था कि इन दोनों प्रतिस्पर्धी दावों को समाज किस दृष्टि से देख रहा था और किसे ऐसा दावा मान रहा था जिसका निराकरण तुरंत होना चाहिए।
फातिमा नफीस अपने गायब बेटे नजीब को खोज रहीं थीं। उन्हें किसी प्रतीकात्मकता या आम जनता की सहानुभूति की दरकार नहीं थी। वे जानना चाहती थीं कि उनके बेटे नजीब के साथ क्या हुआ? वे चाहती थीं कि जिन लोगों पर नजीब को खोजने की ज़िम्मेदारी है वे अपना काम करें। मगर ‘नजीब कहां गया?’ आंदोलन पर प्रतिक्रिया, केवल विरोध प्रदर्शन के कारण होने वाली कठिनाईयों पर केंद्रित हो गई।
फर्क एकदम साफ़ था। किसी महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर पर पत्नी की अपने पति से मिलने की इच्छा को जनता की सहानुभूति आसानी से हासिल हो गई। मगर एक मां की उसके बेटे को ढूंढ़ने की अपील को संस्थागत उपेक्षा और राजनीतिक विरोध के साथ-साथ सामान्य हालात बहाल करने के दबाव का सामना भी करना पड़ा।
यह दो तरह की पीड़ाओं के बीच प्रतिस्पर्धा का मुद्दा नहीं था। मुद्दा यह था कि असमान स्थितियों के चलते समाज दोनों तरह की पीड़ाओं को किस तरह अलग-अलग ढंग से देखता है। क्या कारण है कि एक तरह की पीड़ा को जनता की सहानुभूति हासिल हो जाती है और दूसरी तरह की पीड़ा को जनता के लिए असुविधा का कारक मान लिया जाता है?
विश्वविद्यालय के अधिकारियों या उनके परिवारों का असली मंतव्य क्या था, इस पर बात करना बेमतलब होगा। पड़ताल इस बात की होनी चाहिए कि पूरे घटनाक्रम को जिस रूप में जनता के सामने रखा गया, उसके राजनीतिक निहितार्थ क्या थे? संस्थान के जवाबदारों की पीड़ा फोकस में आ गई और जो पीड़ा इस विरोध प्रदर्शन का कारण थी, वह नेपथ्य में चली गई।
नजीब के गायब होने के मुद्दे ने पहले ही राजनीतिक रंग अख्तियार कर लिया था। जो लोग नजीब के लिए न्याय की मांग कर रहे थे, उन पर पहले से ही मुस्लिम-विरोधी ताकतें हमलावर थीं। ऐसे में विरोध को किस रूप में देखा जाता है, यह बहुत अहम बन जाता है। इससे ही यह तय होता है कि किसी हाशियाकृत व्यक्ति की मांग को जायज़ माना जाता है या उसे संस्थागत तंत्र के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
समानता-विहीन असहमति
समानता के बगैर असहमति का क्या मतलब है? एकजुटता क्या है यदि वह केवल कुछ मसलों तक सीमित हो?
नजीब के लिए न्याय आंदोलन ने हमें दिखाया कि किस प्रकार असहमति का उत्सव मनाने वाली राजनीतिक संस्कृति को भी हाशियाकृत समुदायों के अधिकारों को स्वीकार करने में कठिनाई होती है। वामपंथी एकता के प्रति प्रतिबद्धता या प्रगतिशील सोच अपने आप में उस राजनीति के तंत्र में व्याप्त असमानताओं का समाधान नहीं कर पातीं।
एकता को सबसे ज्यादा महत्व दिए जाने, उसे सबसे ऊपर रखे जाने से यह खतरा भी उत्पन्न होता है कि कथित वृहत्तर समुदाय के हितों की रक्षा की खातिर विशिष्ट व्यक्तिगत शिकायतों को परे धकेल दिया जाता है। जो लोग असहज करने वाले प्रश्न उठाते हैं उनसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यह अपेक्षा की जाती है कि वे व्यापक संघर्ष की बलिवेदी पर अपनी मांगों को कुर्बान कर दें।
यह समस्या न तो जेएनयू तक सीमित है और न ही राजनीतिक वामपंथ तक। यह उन सब समूहों का सरोकार है जो यह मानते हैं कि समानता के प्रति उनकी घोषित प्रतिबद्धता के चलते वे स्वयं अपने आचरण की पड़ताल करने की ज़रूरत से मुक्त हैं।
कोई समुदाय समावेशी होते हुए भी सामाजिक ऊंच-नीच से ग्रस्त हो सकता है। कोई समूह विभिन्नता का उत्सव मनाते हुए भी यह अपेक्षा कर सकता है कि हाशियाकृत वर्ग उसकी राजनीति द्वारा निर्धारित प्राथमिकताओं के अनुरूप आचरण करें। कोई आंदोलन किसी बाहरी ताकत से असहमत होने के अपने हक़ का बचाव करते हुए भी तब असहज महसूस कर सकता है जब उसके भीतर से असहमति के स्वर उठें।
हममें से जिन लोगों के सरोकारों में सामाजिक न्याय शामिल है, वे इस विरोधाभास को मामूली मान कर उसे ख़ारिज नहीं कर सकते। सैद्धांतिक समानता स्वमेव उन असमानताओं का अंत नहीं कर सकती जो यह निर्धारित करतीं हैं कि किसकी आवाज़ सुनी जाएगी, किसकी पीड़ा पर ध्यान दिया जाएगा और अपनी बात रखने के किसके अधिकार को मान्यता दी जाएगी। एकजुटता का मतलब केवल यह नहीं हैं कि किसी राजनीतिक समुदाय के सभी सदस्यों को एक-बराबर घोषित कर दिया जाय। इसके लिए उन परिस्थितियों का अध्ययन किया जाना भी ज़रूरी है जिनके चलते उसी राजनीतिक समुदाय के कुछ सदस्यों के अपनी मांग रखने के उनके हक़ को कमतर आंका जाता है।
जेएनयू की लोकतांत्रिक विरासत का उत्सव तब तक अधूरा रहेगा जब तक कि वह अपने-आप से यह नहीं पूछता कि क्या यह विरासत हाशियाकृत वर्गों को स्थापित राजनीतिक मठाधीशों की आज्ञा के बगैर अपने असंतोष और अपनी व्यथा को अभिव्यक्त करने की इज़ाज़त देती है।
सवाल यह नहीं है कि जेएनयू असहमति को सम्मान देने वाली संस्था के रूप में अपनी छवि के साथ न्याय करता है या नहीं? सवाल यह है कि क्या वह अपनी इस छवि को तब भी बनाए रख सकता है जब न्याय की मांग उसके स्वयं के आचरण को चुनौती देती हो?
अतीत के प्रति आकर्षण से विवेक की ओर
किसी संस्थान की राजनीतिक विरासत को मन में संजोए रखने और उसे पुनीत मानने के बीच में अंतर है। अतीत के प्रति आकर्षण, संघर्षों की याद अक्षुण्ण रखने में मददगार हो सकता है, मगर वह हमें यह प्रश्न करने से रोक भी सकता है कि जो वायदे उस संस्थान ने किए थे, उसकी जो प्रतिबद्धताएं थीं, उनका पालन हुआ या नहीं।
‘वी आर जेएनयू’ – यह नारा सार्वजनिक शिक्षा, अकादमिक स्वतंत्रता और विश्वविद्यालय के कैंपस में आज़ादी के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता को अभिव्यक्त कर सकता है। मगर सवाल यह है कि उस समूह में कौन-कौन शामिल है और किन शर्तों पर? क्या इस नारे में उन लोगों के लिए जगह है जिनकी मांगें संस्थान की अपनी पसंदीदा छवि को खंडित करती हों? क्या विश्वविद्यालय किसी हाशियाकृत विद्यार्थी के अपनी बात कहने के अधिकार को मान्यता देने को तैयार है, बिना इस शर्त के कि उसकी पीड़ा प्रगतिशील एकता के नैरेटिव में फिट बैठे?
ये प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि कोई विश्वविद्यालय स्वायत्त हो और उसके अंदर न्याय हो, ये कामनाएं परस्पर विरोधाभासी नहीं हैं। किसी विश्वविद्यालय को केवल इसलिए लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह बाहरी हस्तक्षेप का प्रतिरोध करता है। उसके लोकतांत्रिक होने का एक मानक यह भी है कि क्या वह अपनी चहारदीवारी के भीतर की असमानता का मुकाबला करने को तत्पर है।
यही बात ‘आइडिया ऑफ़ इंडिया’ के बारे में भी सच है। अगर हम अपने राष्ट्र को समावेशी और लोकतांत्रिक मानते हैं तो इस मान्यता की कसौटी होगी उन लोगों के अनुभव, जो यह पाते हैं कि वे उसके लोकतांत्रिकता और समावेशिता के वायदे से महरूम हैं। कोई राष्ट्र केवल इसलिए अपनेआप को विविधता का सम्मान करने वाला नहीं कह सकता क्योंकि वह विविधता की अमूर्त धारणा की अभ्यर्थना करता है। और न ही कोई विश्वविद्यालय यह दावा कर सकता है कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों का रक्षक है क्योंकि उसका इतिहास असहमति को स्वीकार करने का रहा है।
दमितों और हाशियाकृत लोगों के लिए यह ज़रूरी नहीं होना चाहिए कि वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को केवल किसी संस्था की प्रतिष्ठा, किसी आंदोलन के एकता या किसी राष्ट्र की काल्पनिक नैतिकता की खातिर समर्पित कर दें। न्याय की उनकी मांग, लोकतंत्र के रास्ते में बाधा नहीं है। वह तो उन कई तरीकों में से एक है जिनके जरिए लोकतंत्र को कसौटी पर कसा जाता है।
नजीब अहमद के लापता होने के आज दस साल बाद भी विश्वविद्यालय और आमजनों को यह प्रश्न परेशान कर रहा है कि वे आखिर हैं कहां? जांच बंद हो गई है मगर किसी को यह पता नहीं है उनके साथ क्या हुआ। जांच के औपचारिक रूप से बंद हो जाने का मतलब यह नहीं है कि उनके मां जिन प्रश्नों के जवाब खोज रही हैं, वे भी गायब हो गए हैं।
नजीब को याद करना केवल किसी आंदोलन को याद करना या किसी नारे को दोहराना भर नहीं है। हमें उन मुद्दों पर भी फिर से विचार करना चाहिए जो इस आंदोलन से उभरे – सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही, पीड़ा को मान्यता देने में असमानता, राजनीतिक एकता की सीमाएं और असहमति व समानता का परस्पर रिश्ता।
अगर यह पूछना कि ‘नजीब कहां है?’ शत्रुतापूर्ण हरकत है तो हमें यह पूछना चाहिए कि आखिर हम किस विचार की रक्षा कर रहे हैं, और किसके लिए? अगर ‘जेएनयू के विचार’ में इस प्रश्न के लिए जगह नहीं है तो सामाजिक न्याय और एकजुटता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता के दावे में छेद हैं।
किसी विचार की सत्यता की कसौटी यह नहीं है कि जब उस पर आंच नहीं आ रही हो तब वह कितने जोर-शोर से न्याय की बात करता है। कसौटी यह है कि तब क्या होता जब न्याय की मांग ऐसे व्यक्ति की ओर से आती है जिसकी पीड़ा उस विचार को असहज बना देती हो।
दस साल बाद भी यह प्रश्न जिंदा है और हमें उसे पूछने की अपनी इच्छा को भी जिंदा रखना चाहिए।
(यह आलेख मूल अंग्रेजी में ‘द न्यूज मिनट’ द्वारा पूर्व में प्रकाशित व यहां हिंदी अनुवाद लेखक की सहमति से प्रकाशित है। अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)
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