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‘पीली छतरी वाली लड़की’ की जाति

अगर विश्वविद्यालय में दिखाई देने वाला जातिवाद आसमान से नहीं टपका है, बल्कि यह समाज में मौजूद जातिवाद का ही विस्तार है, तो फिर जाति के प्रश्न को समाज और परिवार तक ले जाने में उपन्यासकार उदय प्रकाश ने क्यों दिलचस्पी नहीं ली? पढ़ें, अभय कुमार की यह समालोचना

उदय प्रकाश हिंदी साहित्य के एक मारूफ़ लेखक हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा सागर विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हुई। उनके चर्चित उपन्यास ‘पीली छतरी वाली लड़की’ की पृष्ठभूमि विश्वविद्यालय और वहां के छात्र जीवन से जुड़ा है।[1] हालांकि उपन्यास का शीर्षक महिला किरदार अंजलि जोशी के नाम से मंसूब है, जो कॉलेज में पीली छतरी ओढ़े आती थी, मगर लेखक ने एक मर्द किरदार को तरजीह दी है।

राहुल और अंजलि दोनों सहपाठी हैं और हिंदी साहित्य में एम.ए. कर रहे थे। उपन्यास का पूरा प्लॉट राहुल के आस-पास ही बुना गया है। लेखक को जहां-जहां रोमांस के सीन की ज़रूरत महसूस होती थी, वहां वे अंजलि की एंट्री करा देते थे। पूरी रचना पढ़ने के बाद ऐसा महसूस होता है कि लेखक अपने प्रतिनिधि के तौर पर राहुल को आगे करते हैं।

इस रचना की लोकप्रियता के पीछे एक प्रमुख कारण इसके विषय का चुनाव था। हिंदी साहित्य में विश्वविद्यालय के रोज़मर्रा के जीवन पर बहुत कम लिखा गया था। इस ख़ला (कमी) को लेखक ने बख़ूबी भरा।

लेखक की एक और बड़ी ताक़त उनकी भाषा-शैली है। हिंदी विभागों में प्रचलित अभिजनवादी भाषा के विपरीत, उदय प्रकाश की भाषा अवामी के क़रीब है, जबकि हिंदी साहित्य के तथाकथित दिग्गज अक्सर ऐसी संस्कृतनिष्ठ हिंदी लिखते रहे हैं, जो लोगों को जोड़ने के बजाय उनसे दूरी पैदा करती है। अंग्रेज़ी के लोकप्रिय शब्दों के इस्तेमाल से उदय प्रकाश को परहेज़ नहीं है। यही वजह है कि उनका कहने का लहजा अटपटा और पराया नहीं लगता है। शायद पत्रकारिता में लेखक ने जो एक लंबा समय दिया है, वहां उन्होंने यह सब हुनर सीखा हो।

इस उपन्यास का सबसे बड़ा योगदान यह है कि लेखक ने हिंदी विभागों में मौजूद घोर जातिवाद पर क़लम उठाई है। उन्होंने हिंदी विभागों में एक ख़ास जाति के वर्चस्व पर आवाज़ बुलंद की है। वे बड़ी बेबाक़ी से कहते हैं कि हिंदी साहित्य दरअसल ‘ब्राह्मण साहित्य’ है। लेखक का यह कहना बिल्कुल सही है कि ब्राह्मण उच्च शिक्षा में, विशेषकर हिंदी विभागों में, मलाई काट रहे हैं। वे अपने कास्ट-नेटवर्क का बेशर्मी से इस्तेमाल कर दूसरों का हक़ मारते हैं।

हिंदी साहित्य या ‘ब्राह्मण साहित्य’?

उदय प्रकाश के दौर के पहले के अधिकांश सवर्ण लेखकों ने जाति से जुड़े जिन सवालों को नहीं छुआ था, ‘पीली छतरी वाली लड़की’ ने उन्हें पूछने की हिम्मत की। यही वजह है कि यह उपन्यास उन बड़ी संख्या में मौजूद छात्रों से जुड़ सका, जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था के शिकार रहे हैं।

राहुल बार-बार हिंदी विभाग में चल रहे ब्राह्मण शिक्षक पर सवाल खड़े करता है और हिंदी साहित्य की विषय-वस्तु पर भी प्रश्न उठाता है। यह सब कुछ विभाग के मठाधीशों को नागवार गुज़रता है और फिर उसे परेशान किया जाता है। सवाल करने वाले छात्रों को अक्सर हिंदी विभाग के मठाधीश दुख की मक्खी की तरह निकालकर बाहर फेंक देना चाहते हैं। राहुल की इस स्थिति को लेखक ने कुछ यूं कहा है कि उसने “हिंदी विभाग में एडमिशन लेकर इसलिए भयानक गलती की है क्योंकि उस विभाग में चपरासी से लेकर हेड ऑफ़ दि डिपार्टमेंट तक सब के सब ब्राह्मण हैं।”[2]

बात दरअसल यह थी कि राहुल ने हिंदी विभाग में इसलिए एडमिशन लिया था कि उसे अंजली से प्यार हो गया था। यह सच है कि राहुल मोहब्बत में गिरफ़्तार था, मगर उसने मोहब्बत को अध्ययन से अलग नहीं समझा। लेखक ने जिस तरह राहुल के माध्यम से हिंदी के साथ-साथ वेस्टर्न लिटरेचर से जुड़े हुए संदर्भों और सोशल साइंस के कामों का हवाला दिया है, वह लेखक की व्यापक अध्ययन की भी अलामत है। यह सब उपन्यास के मज़बूत पक्ष हैं।

उदय प्रकाश व उनके उपन्यास ‘पीली छतरी वाली लड़की’ का आवरण पृष्ठ

बात-बात पर राहुल कई सारे लेखकों की रचनाओं का हवाला देता है। उसके दिमाग़ में सवालों का अंबार है। वह ख़ूब बहस करता है। राहुल का चित्रण लेखक ने इस उपन्यास में एक पढ़ने-लिखने वाले प्रगतिशील छात्र के तौर पर किया है। हिंदी विभाग में कुछ समय गुज़ारने के बाद राहुल को इस बात का यक़ीन हो जाता है कि हिंदी साहित्य के नाम पर उसे ‘ब्राह्मण साहित्य’ पढ़ाया जा रहा है। विभाग से लेकर पाठ्यक्रम और सिलेबस तक, हर चीज़ को ब्राह्मणों ने अपने नियंत्रण में कर लिया है।

राहुल यह सब देखकर काफ़ी निराश और परेशान हो जाता है और कहता है कि “सारे संसार में ऐसा कहीं नहीं होगा कि किसी एक जाति समूह ने एक समूची भाषा का ऐसा अधिग्रहण किया हो। यह इस देश की भाषा, संस्कृति और साहित्य का टोटल सोलर एक्लिप्स है!… संपूर्ण सूर्य ग्रहण। खग्रास”[3]

जाति के प्रश्न पर अंतर्विरोध

राहुल के व्यक्तित्व में जाति के प्रश्न पर ही अंतर्विरोध दिखाई देता है। क्या यह अंतर्विरोध प्रगतिशील आंदोलन का भी है, जिसे सवर्णों ने हाईजैक कर लिया है, जहां जाति के प्रश्न उठते भी हैं, मगर वे सच्चे मन से नहीं उठाए जाते?

मिसाल के तौर पर राहुल जातिवादी ब्राह्मण शिक्षकों की आलोचना करने में मुखर है, जिसके लिए उसकी सराहना की जानी चाहिए। लेकिन वह उस सामाजिक परिवेश की चर्चा नहीं करता, जिसमें उसका ख़ुद का पालन-पोषण हुआ। वह अपनी माशूक़ा की जाति को तो बार-बार चिह्नित करता है, मगर अपनी जाति के बारे में कुछ खोलकर नहीं बात करता। जिस समाज से राहुल आया है, क्या वहां जातिवाद नहीं था?

उपन्यास में लेखक इन सवालों पर ख़ामोश हैं। अगर विश्वविद्यालय में दिखाई देने वाला जातिवाद आसमान से नहीं टपका है, बल्कि यह समाज में मौजूद जातिवाद का ही विस्तार है, तो फिर जाति के प्रश्न को समाज और परिवार तक ले जाने में लेखक ने क्यों दिलचस्पी नहीं ली?

यह सच है कि हिंदी विभागों में ब्राह्मण जातियों का प्रभुत्व है, लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ग़ैर-ब्राह्मण उच्च जातियों की हिंदी विभागों में मज़बूत स्थिति है। उनकी हालत दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों और टीचरों की तुलना में बहुत बेहतर है।

लेखक इस प्रश्न पर भी मौन हैं कि कैसे ग़ैर-ब्राह्मण सवर्ण शिक्षक भी विश्वविद्यालयों के भीतर ब्राह्मणवादी व्यवस्था का ही पोषण करते हैं। कई बार यह देखा गया है कि जब किसी वंचित तबके का हक़ मारने की बात आती है, तो सवर्ण समाज की तमाम जातियों के बीच की आपसी प्रतिस्पर्धा अचानक ग़ायब हो जाती है और सब एक हो जाते हैं। तभी तो रिज़र्वेशन का विरोध ब्राह्मण के साथ-साथ तमाम सवर्ण जातियां एक ही स्वर में करती हैं। इसलिए ब्राह्मणवाद बनाम क्षत्रियवाद की लड़ाई व्यवस्था परिवर्तन की नहीं, निजी स्वार्थ की लड़ाई है।

 

पूरे उपन्यास में राहुल दूसरी ग़ैर-ब्राह्मण सवर्ण जातियों के विशेषाधिकारों पर ख़ामोश है। आख़िर क्यों? क्या इसके पीछे कहीं यह वजह तो नहीं है कि राहुल का भी ताल्लुक़ किसी ग़ैर-ब्राह्मण सवर्ण जाति से है? हालांकि, लेखक ने उपन्यास में राहुल की जाति पर खुलकर बात नहीं की है, मगर एक जगह राहुल इसका संकेत ख़ुद दे देता है, जब वह अपने को क्षत्रिय जाति से संबंध की ओर संकेत करता है। वह बड़े ही गर्व के साथ कहता है कि “आई बिलांग टु अ मार्शल रेस।”[4]

क्या राहुल भी भारतीय वामपंथी और प्रगतिशील विचारधारा से जुड़े उन सवर्ण कार्यकर्ताओं की तरह ही है, जो दुनिया बदलने और मज़दूरों के अधिकार की बात तो करते हैं, लेकिन जाति-व्यवस्था के उन्मूलन और जाति के आधार पर मिले विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते?

उपन्यास पढ़ते वक़्त कई तरह के सवाल ज़ेहन में दौड़ते हैं। जैसे, क्या राहुल की ब्राह्मणवाद की आलोचना केवल इसलिए है कि उसे और उसकी जाति को ब्राह्मणवादी व्यवस्था में अपना विशेषाधिकार ब्राह्मणों से कम मिलता है? क्या यह वजह तो नहीं है कि राहुल का जाति-व्यवस्था के ख़िलाफ़ विरोध सीमित है?

इन सवालों के जवाब उपन्यास में सीधे-सीधे नहीं मिलते। लेकिन यह तो साफ़ ज़ाहिर है कि राहुल के व्यक्तित्व और उसकी जाति-संबंधी दृष्टि में वह बात नहीं दिखती है, जो दलित आंदोलन से जुड़े किसी लेखक में मिलती है।

एक और अंतर्विरोध यह है कि राहुल अक्सर राम बनाम रावण के बाइनरी में बात करता है। उसके लिए ब्राह्मण “रावण की हरामी औलाद” हैं[5], जबकि वह राम के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करता है। क्या यह इसलिए तो नहीं है कि राहुल ख़ुद की क्षत्रिय पहचान है?

राहुल का चित्रण लेखक ने प्रगतिशील छात्र के तौर पर किया तो है, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि राहुल भी पॉपुलर मीडिया द्वारा घर-घर पहुंचाए गए धार्मिक विमर्श से आगे नहीं सोच पा रहा है।

दरअसल, रामकथा के बहुत से अलग-अलग पाठ और व्याख्याएं रही हैं। पेरियार जैसे सामाजिक न्याय के बड़े नेता ने रामायण की ऐसी व्याख्या की, जिसमें रावण खलनायक नहीं, बल्कि नायक है। पेरियार रावण को अनेक गुणों से संपन्न व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं और कहते हैं कि “वह महान विद्वान, महान संत, शास्त्रों और वेदों का ज्ञाता, अपनी प्रजा और संबंधियों का दयालु रक्षक था।”[6]

आज भी हिंदुस्तान के कई हिस्सों में रावण की पूजा की जाती है। मगर इन बातों से राहुल बेख़बर है। क्या इसलिए कि सवर्ण समाज में बनी उसकी समझदारी उसे वैकल्पिक विमर्श को समझने में रुकावट पैदा कर रही है?

पेरियार और अन्य दलित-बहुजन चिंतकों से अलग, राहुल के आदर्श राम हैं। बड़ी अजीब बात है कि राहुल को इस बात पर भी गर्व है कि हिंदू धर्म के देवताओं का जन्म ब्राह्मण जाति में नहीं, बल्कि ग़ैर-ब्राह्मण जातियों में हुआ था। कुछ पल के लिए अगर राहुल की बात मान भी ली जाए कि हिंदू धर्म के भगवान केवल क्षत्रियों और अन्य ग़ैर-ब्राह्मण उच्च जातियों में पैदा हुए, तो क्या फ़र्क़ पड़ता है?

राहुल से यह सवाल पूछा जा सकता है कि कौन किस जाति में पैदा हुआ है, इससे भी बड़ा सवाल यह है कि वह करता क्या है, उसकी सोच और विचारधारा क्या है और समाज के प्रति उसकी प्रतिबद्धता क्या है। यही वजह है कि राहुल की ब्राह्मणवाद की आलोचना बहुत आगे नहीं जा पाती है।

विचारधारा को लेकर भी राहुल में यह विरोधाभास कई जगह दिखाई देता है। वह बात-बात में कई बहुत सारे विचारकों का संदर्भ देता है। गांधी का ज़िक्र भी वह ख़ूब करता है। लेकिन पूरी पुस्तक में दलित-बहुजन चिंतकों – जैसे आंबेडकर, फुले और पेरियार – के विचारों के साथ लगभग कोई गंभीर संवाद नहीं है। बुद्ध का उल्लेख आया है, लेकिन उनकी जाति-विरोधी शिक्षाओं और सामाजिक चिंतन के साथ भी राहुल कोई ख़ास मुकालमा नहीं करता है।

राहुल के चरित्र में दिखाई देने वाला यह विरोधाभास ऊंची जातियों के नेतृत्व वाले प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास में दिखाई देता है। दलित-बहुजन विचारकों को लंबे समय तक पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया और जाति के प्रश्न को वर्ग-संघर्ष को कमज़ोर करने वाला कहा गया।

राहुल के व्यक्तित्व और विचारों में जातिवाद के ख़िलाफ़ कोई ऐसी गंभीरता दिखाई नहीं देती, जो जाति-व्यवस्था की पूरी संरचना को चुनौती देता हो। यही वजह है कि राहुल का रैडिकलिज़्म एक हद तक ब्राह्मणों को चुनौती देता है, लेकिन वह ब्राह्मणवाद को पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए कुछ ख़ास करता नहीं दिखता।

बहरहाल, उदय प्रकाश का उपन्यास ‘पीली छतरी वाली लड़की’ अपने प्रकाशन के दो दशक बाद भी आज महत्वपूर्ण नज़र आता है। ख़ासकर हिंदी विभागों में ब्राह्मणों के वर्चस्व और हिंदी साहित्य के ब्राह्मणीकरण का सवाल महत्वपूर्ण है। इस लिहाज़ से देखें तो उदय प्रकाश समकालीन हिंदी के उन रूढ़िवादी सवर्ण लेखकों की बड़ी टोली से एक क़दम आगे नज़र आते हैं। मगर जब इस उपन्यास का विश्लेषण दलित-बहुजन चिंतन और रेडिकल लेफ़्ट तथा फ़ेमिनिस्ट नज़रिए से किया जाता है, तो उपन्यास के नायक राहुल के भीतर कई सारे विरोधाभास उभरकर सामने आते हैं। लेखक के विचारों का प्रतिनिधि राहुल है और उसके भीतर दिखाई देने वाले ये विरोधाभास उन विरोधाभासों से अलग नहीं हैं, जो इस देश के कई सवर्ण प्रगतिशील लेखकों के विचारों और राजनीतिक रुख़ में दिखाई देते हैं।

संदर्भ :

[1] उदय प्रकाश, पीली छतरी वाली लड़की, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2017 (प्रथम संस्करण, 2005)

[2] वही, पेज 51

[3] वही, पेज 136

[4] वही, पेज 40

[5] वही, पेज 41

[6] पेरियार, द रामायण: अ ट्रू रीडिंग, सेल्फ-रिस्पेक्ट प्रोपेगैंडा इंस्टीट्यूशन, द्रविड़र कड़गम

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अभय कुमार

जेएनयू, नई दिल्ली से पीएचडी अभय कुमार संप्रति सम-सामयिक विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन करते हैं।

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